भाषाई विविधता और सांस्कृतिक पहचान का उत्सव

यह लेख अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के महत्व, भाषाई विविधता के संरक्षण और मातृभाषा की भूमिका पर केंद्रित है। इसमें यूनेस्को की पहल, बहुभाषी शिक्षा की आवश्यकता, भाषाओं के संरक्षण की वैश्विक चुनौतियाँ तथा भारत की भाषाई समृद्धि का विस्तृत वर्णन किया गया है। लेख यह संदेश देता है कि मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान, ज्ञान और सामाजिक जुड़ाव की आत्मा है।

May 28, 2026 - 13:40
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भाषाई विविधता और सांस्कृतिक पहचान का उत्सव
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21 फरवरी को विश्व भर में मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस भाषाई विविधता के संरक्षण और मातृभाषाओं के सम्मान का प्रतीक है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की सांस्कृतिक, बौद्धिक और सामाजिक विरासत का आधार है। मातृभाषा के माध्यम से ही व्यक्ति अपनी पहचान, परंपराओं, ज्ञान और मूल्यों से जुड़ता है।

इस दिवस की घोषणा सबसे पहले संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने की थी, जिसे बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी अपनाया। वर्ष 2002 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस पहल का स्वागत किया और 2007 में अपने प्रस्ताव A/RES/61/266 के माध्यम से सदस्य देशों से विश्व की सभी भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रयास करने का आह्वान किया।

बहुभाषावाद और शिक्षा की नई दिशा
समकालीन वैश्विक परिदृश्य में भाषाई परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। बढ़ते प्रवासन, डिजिटल तकनीक के विकास और बहुभाषावाद के संज्ञानात्मक, सामाजिक तथा आर्थिक लाभों की बढ़ती मान्यता ने भाषाओं की भूमिका को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। आज बहुभाषावाद को केवल एक सामाजिक वास्तविकता नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण मानवीय क्षमता और प्रभावी शैक्षिक दृष्टिकोण के रूप में देखा जा रहा है।
विशेष रूप से युवा पीढ़ी इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। वे डिजिटल प्लेटफार्मों के माध्यम से अपनी भाषाओं में सामग्री तैयार कर रहे हैं, नई तकनीकों का उपयोग कर भाषाओं के संरक्षण और पुनर्जीवन में योगदान दे रहे हैं तथा भाषाई विविधता को वैश्विक स्तर पर अधिक दृश्यमान बना रहे हैं। यह प्रयास भाषा, पहचान, शिक्षा और सामाजिक सहभागिता के बीच गहरे संबंध को उजागर करते हैं।
फिर भी वैश्विक स्तर पर एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। यूनेस्को के अनुसार विश्व के लगभग 40 प्रतिशत विद्यार्थियों को उस भाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिलता जिसे वे सबसे बेहतर समझते हैं। इसका सबसे अधिक प्रभाव स्वदेशी, प्रवासी और अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों और युवाओं पर पड़ता है। इस स्थिति से निपटने के लिए ऐसी शिक्षा नीतियों की आवश्यकता है जो बहुभाषी शिक्षा को प्राथमिकता दें और समावेशी तथा प्रभावी शिक्षण वातावरण का निर्माण करें।

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भाषाई विविधता का वैश्विक महत्व
भाषा मानव सभ्यता के विकास में केंद्रीय भूमिका निभाती है। यह संचार, सामाजिक एकीकरण, शिक्षा, सांस्कृतिक पहचान और ज्ञान के संरक्षण का प्रमुख माध्यम है। किंतु वैश्वीकरण, सामाजिक परिवर्तन और तकनीकी प्रभुत्व के कारण अनेक भाषाएँ आज विलुप्त होने के कगार पर हैं। यूनेस्को के अनुमान के अनुसार विश्व में लगभग 8324 भाषाएँ अस्तित्व में हैं, जिनमें से लगभग 7000 भाषाएँ आज भी प्रयोग में हैं। लेकिन इनमें से केवल कुछ सौ भाषाओं को ही शिक्षा प्रणाली और सार्वजनिक जीवन में पर्याप्त स्थान मिला है। डिजिटल दुनिया में तो स्थिति और भी चिंताजनक है, जहाँ 100 से भी कम भाषाओं का व्यापक उपयोग होता है।
चिंताजनक तथ्य यह है कि लगभग हर दो सप्ताह में एक भाषा विलुप्त हो जाती है, और उसके साथ ही एक संपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा, ज्ञान प्रणाली और सामाजिक स्मृति भी समाप्त हो जाती है। इसलिए भाषाओं का संरक्षण केवल सांस्कृतिक आवश्यकता ही नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की शुरुआत एक ऐतिहासिक आंदोलन से जुड़ी है। 21 फरवरी 1952 को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में लोगों ने अपनी मातृभाषा बंगाली को आधिकारिक मान्यता दिलाने के लिए आंदोलन किया। इस आंदोलन के दौरान कई छात्रों और नागरिकों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। उनके सम्मान में बांग्लादेश में इस दिन को “भाषा शहीद दिवस” के रूप में मनाया जाता है। बांग्लादेश की पहल पर 17 नवंबर 1999 को यूनेस्को ने 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस घोषित किया और वर्ष 2000 से यह दिवस वैश्विक स्तर पर मनाया जाने लगा।

यूनेस्को की पहल और वैश्विक कार्यक्रम
भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए यूनेस्को ने कई महत्वपूर्ण पहलें की हैं। इनमें प्रमुख हैं-

* विश्व की संकटग्रस्त भाषाओं का एटलस
* वैश्विक डिजिटल पुस्तकालय
* बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देने की पहल
* अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण
* भाषाई विविधता और बहुभाषावाद को प्रोत्साहन
इसके अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र ने 2022 से 2032 तक “स्वदेशी भाषाओं का अंतरराष्ट्रीय दशक” घोषित किया है। इसका उद्देश्य स्वदेशी भाषाओं के संरक्षण, पुनरुद्धार और उपयोग को बढ़ावा देना तथा उनके उपयोगकर्ताओं के मानवाधिकारों की रक्षा करना है।

भारत में भाषाई विविधता
भारत विश्व के सबसे समृद्ध भाषाई देशों में से एक है। यहाँ सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं। भारतीय संविधान में 22 भाषाओं को अनुसूचित भाषाओं का दर्जा दिया गया है।
भाषाई संरक्षण और डिजिटल पहुंच को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने कई पहलें की हैं। डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के अंतर्गत विभिन्न भारतीय भाषाओं में डिजिटल सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है। इसके साथ ही भारतवाणी परियोजना के माध्यम से अनेक भारतीय भाषाओं की सामग्री को डिजिटल रूप में संकलित और संरक्षित किया जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं है, बल्कि यह भाषाई विविधता, सांस्कृतिक पहचान और समावेशी शिक्षा के महत्व को समझने का अवसर भी है। मातृभाषा में शिक्षा न केवल सीखने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाती है, बल्कि यह सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सामाजिक सहभागिता को भी मजबूत करती है।

रूपाली वशिष्ठ

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