आधुनिक हिंदी गद्य के जनक- भारतेंदु हरिश्चंद्र
भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह माने जाते हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य को रीतिकालीन प्रवृत्तियों से मुक्त कर नवजागरण, राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक सुधार और खड़ी बोली के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। पत्रकारिता, नाटक, काव्य और गद्य के क्षेत्र में उनका योगदान अमूल्य है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। इनका मूल नाम ‘हरिश्चंद्र’ था,‘भारतेंदु’ उनका ेकाशी के विद्वानों द्वारा दी गई उपाधि थी। भारतेंदु ने रीतिकाल की विकृत सामंती संस्कृति की पोषकवृत्तियों को छोड़कर स्वस्थ परंपरा को अपनाया एवं नवीनता के बीज बोए। हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारतेंदु हरिश्चंद्र से माना जाता है। वे भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में आगे आए। उन्होंने देश की गरीबी, पराधीनता और शासको के अमानवीय शोषण को ही अपने साहित्य का विषय बनाया। अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे शोषण की ओर जनता को सचेत करते हुए भारतेंदु बाबू लिखते हैं-
‘भीतर भीतर सब रस चूसै, हँसि-हँसि के तन-मन-धन मूसै।’
भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म ९ सितंबर १८५० को काशी (अब बनारस) के एक समृद्ध और प्रतिष्ठित अग्रवाल वैश्य परिवार में हुआ था। १८५७ में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता स्वतंत्रता संग्राम के समय उनकी उम्र ७ वर्ष की रही होगी। उनके परिवार का हिंदी साहित्य से गहरा संबंध रहा। उनके पिता का नाम गोपालचंद्र था, जो स्वयं एक कवि थे और ‘गिरधर’ उपनाम से ब्रजभाषा में कविताएं लिखते थे। उनकी माता का नाम पार्वती देवी था। ५ वर्ष की अवस्था में उनकी माता का देहांत हो गया था और १० वर्ष की अवस्था में पिता की मृत्यु हो गई थी। इस प्रकार बचपन में ही वे माता-पिता के सुख से वंचित हो गए। उन्हें बचपन का सुख नहीं मिला। तेरह वर्ष की आयु में उनका विवाह मन्नूदेवी के साथ हुआ था। भारतेंदु के पूर्वज बंगाल के एक धनी बैंकर आमीन चंद्र के वंशज थे। भारतेंदु बचपन से ही अत्यंत संवेदनशील थे। अतः बचपन से ही उनके सोचने-समझने की शक्ति का विकास होने लगा। उनको काव्य-प्रतिभा पिता से विरासत में मिली थी। उन्होंने ५ वर्ष की अवस्था में ही निम्नलिखित दोहा बनाकर अपने पिता को सुनाया और सुकवि होने का आशीर्वाद प्राप्त किया:-
‘लै ब्यौढ़ा ठाढ़े भए, श्री अनिरुद्ध सुजान ।
बाणासुर की सेन को, हनन लगे भगवान।।’
पढ़ाई-लिखाई में उनका मन उखड़ा-उखड़ा सा रहा। क्वींस कॉलेज बनारस में प्रवेश लिया। तीन-चार वर्षो तक कॉलेज आते जाते-जाते रहे, पर यहाँसे उनका मन भागता रहा। स्मरण शक्ति तेज थी, ग्रहण क्षमता अद्भुत, इसलिए परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते रहे। बनारस में उन दिनों राजा शिवप्रसाद सितारे ‘हिंद’ रहा करते थे। भारतेंदु शिष्यभाव से उनके यहाँ जाते, उन्हीं से अंग्रेजी सीखी। भारतेंदु ने स्वाध्याय से संस्कृत,मराठी,बांग्ला,गुजराती, पंजाबी, उर्दू भाषाएं भी सीख लीं।
डॉ. गणपति चंद्रगुप्त (१८५७ से १९०० तक) के कालखंड को आधुनिक काल कहना अधिक समीचीन मानते हैं। भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र का जन्म १८५० ईस्वी में हुआ तथा उन्होंने अपनी रचनाएं ७ वर्ष की अवस्था से ही लिखना शुरू कर दिया था। उनका मत है कि १८५७ ईस्वी में राजनीतिक दृष्टि से जहाँ भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम प्रारंभ हुआ वहीं साहित्यिक दृष्टि से भी परिवर्तन शुरू हो गया था और रीतिकालीन प्रवृत्तियों का ह्रास होने लगा था। अतः आधुनिक काल के जनक भारतेंदु जी के रचनाकाल को दृष्टि में रखकर १८५७ ई. से ही आधुनिक काल का प्रारंभ मानना समीचीन प्रतीत होता है। भारतेंदु के साहित्यिक योगदान के कारण १८५७ से १९०० तक के काल को ‘भारतेंदु-युग’ के नाम से जाना जाता है। इस युग में सामाजिक चेतना, राष्ट्रीयता और नए विचारों का उदय हुआ जो नवजागरण की भावना से अनुप्राणितथा। इसलिए भारतेंदु-युग को नवजागरण काल, पुनर्जागरण काल के नाम से भी जाना जाता है। ब्रिटिश राज के दौरान भारत में आए राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तन शामिल थे, जिन्होंने देश में एक नई चेतना और नवजागरण की भावना को जन्म दिया। साहित्य पर सामंती मूल्यों से संघर्ष और साम्राज्यवादी ताकतों से मुकाबला करने का प्रभाव पड़ा,जिससेराष्ट्र-प्रेम,स्वदेशी और सामाजिक समस्याओं पर केंद्रित रचनाएं सामने आईं।
१५ वर्ष की आयु से ही भारतेंदु ने साहित्य सेवा की शुरुआत कर दी थी। १८ वर्ष की उम्र में उन्होंने ‘कवि वचन सुधा’ नामक पत्रिका निकाली, जिसमें उस समय के बड़े-बड़े विद्वानों की रचनाएं छपती थीं। २० वर्ष की आयु में वे ‘ऑनरेरी मजिस्ट्रेट’ बनाए गए और आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। भारतेंदु के साहित्यिक योगदान को देखते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा था- ‘भारतेंदु अपनी सर्वतोमुखी प्रतिभा के बल से एक ओर तो पद्माकर,द्विजदेव की परंपरा में दिखाई पड़ते थे तो दूसरी ओर बांगदेश के माइकेल और हेमचंद की श्रेणी में। प्राचीन और नवीन का सुंदर सामंजस्यभारतेंदु की कला का विशेष माधुर्य है।’
भाततेंदु हरिश्चंद्र बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। हिंदी पत्रकारिता, नाटक और काव्य के क्षेत्र में उनका बहुमूल्य योगदान रहा। हिंदी में नाटकों का आरंभ भारतेंदु से माना जाता है। नाटक पहले भी लिखे जाते रहे हैं किंतु नियमित रूप से खड़ी बोली में नाटक लिखकर भारतेंदु ने हिंदी नाटक की नींव को समृद्ध किया। भारतेंदु ने हरिश्चंद्र चंद्रिका, कवि वचन सुधा और बाला बोधिनी पत्रिकाओं का संपादन किया। वे एक उत्कृष्ट कवि, व्यंग्यकार, नाटककार,पत्रकार तथा ओजस्वी गद्यकार, निबंधकार, होने के साथ ही कुशल वक्ता भी थे। भारतेंदु ने मात्र ३५ वर्ष की आयु में ही विशाल साहित्य की रचना की।
भारतेंदुदु ने १८६८ में कवि वचन सुधा,१८७३ में हरिश्चंद्र मैगजीन और १८७४ में स्त्री शिक्षा के लिए बालाबोधिनी नामक पत्रिका निकाली। वैष्णो भक्ति के प्रचार के लिए उन्होंने ‘तदीय समाज’ की स्थापना की। राज भक्ति प्रकटकरने के बावजूद अपनी देश भक्ति की भावना के कारण उनको अंग्रेजी हुकूमत का कोपभाजन बनना पड़ा। उनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने उन्हें १८८० में ‘भारतेंदु’ की उपाधि प्रदान की। भाषा के क्षेत्र मेंभारतेंदु ने खड़ी बोली के उस रूप को प्रतिष्ठित किया जो उर्दू से भिन्न है और हिंदी क्षेत्र की बोलियों का रस लेकर संवर्धित हुआ है। इसी भाषा में उन्होंने अपने संपूर्ण साहित्य की रचना की।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी साहित्य गगन के इन्दु थे। उन्होंने हिन्दी साहित्य जगत को वह आलोक दिया जिससे हिन्दी जगत अनन्त काल तक जममगाता रहेगा। भारतेन्दु बाबू की प्रतिभा बहुमुखी थी। हिन्दी भाषा से उन्हें अनन्य-प्रेम था। उनका विचार था–
‘निज भाषा उन्नीति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को शूल।।
भारतेन्दु जी ने कविता को अश्लील श्रृंगार के कीचड़ से निकाला तथा उसे राष्ट्रीय भावना, समाज पार, तथा देशोद्धार की पवित्र भावनाओं से सुसज्जित किया। दूसरी ओर उन्होंने गद्य का रूप स्थिर और हिन्दी गद्य साहित्य को विकास की ओर अग्रसर किया।
भारतेंदु जी ने अपने नाटकों एवं एकांकियों में व्यंग्योक्तियों के माध्यम से तत्कालीन परिस्थितियों का सुंदर चित्रण किया है। अंधेर नगरी में चूरन वाला कहता है-
‘चूरन साहब लोगजो खाता । सारा हिंद हजम कर जाता।।
अँग्रेजी साम्राज्य से मुक्ति पाने के लिए भारतेंदु जी छटपटाहट का अनुभव करते हुए दिखाई देते हैं। अंधेर नगरी में वे लिखते हैं-
‘अँग्रेज राज सुखसाज सजे सब भारी।
पै धन विदेस चलि जात यहै अतिख्वारी।।’
भारतेन्दु जी से पहले हिन्दी गद्य का कोई निश्चित स्वरूप न था, हिन्दी गद्य की कोई निर्धारित शैली भी न थी। एक ओर राजा शिवप्रसाद ‘सितारे-हिन्द’ की उर्दू प्रधान शैली थी तो दूसरी ओर थी राजा लक्ष्मण सिंह की संस्कृत निष्ठ शुद्ध भाषा-शैली। ये दोनों ही हिन्दी जगत में मान्य न हो सकीं। भारतेन्दु जी ने मध्यम मार्ग अपनाया और हिन्दुस्तानी खड़ी बोली को हिन्दी गद्य की आदर्श भाषा-शैली के रूप में प्रस्तुत किया। उनकी शैली में न अरबी-फारसी के शब्दों की भरमार थी, न संस्कृत शब्दों का आग्रह था। उनकी भाषाशैली में न ‘सितारे-हिन्द’ का उर्दूपन था, न राजा लक्ष्मण सिंह की संस्कृत निष्ठता। वास्तव में उन्होंने एक ऐसी सर्वमान्य शैली का प्रयोग किया जो हिन्दी गद्य साहित्य के विकास के लिए सर्वथा उपयुक्त सिद्ध हुई। गद्य के क्षेत्र में ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली की स्थापना भारतेनंदु जी का अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य था।
भारतेन्दु जी का समय हिन्दी गद्य साहित्य के आविर्भाव का काल था। भारतेन्द्र जी ने हिन्दी में नाटक, निबंध, कहानी तथा जीवनी आदि विविध गद्य विधाओं को जन्म दिया। उन्होने स्वयं लिखा और दूसरों को लिखने के लिए प्रेरित किया। उनके मित्रों ने भी हिंदी भाषा के विकास में उन्हें सहयोग दिया। अनेक नाटक, निबन्ध, उपन्यास तथा कहानियाँ इस काल में लिखे गये। विविध गद्य विधाओं से हिन्दी साहित्य का भण्डार भरा गया। उनके मित्रों और सहयोगियों का एक बड़ा समुदाय बन गया जिसे ‘भारतेन्दु-मण्डल’ के नाम से जाना गया। यही कारण है कि भारतेन्दु जी को हिन्दी गद्य का जन्मदाता कहा जाता है।
भारतेन्दु जी ने अपनी थोड़ी आयु में बहुत कुछ लिखा। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं:-
नाटक- सत्य हरिश्चन्द्र, चन्द्रावली, भारतदुर्दशा, नीलदेवी, अन्धेरनगरी, बैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, बिषस्य विषमौषधम्, सती प्रताप, प्रेम योगिनी आदि।
अनूदित नाटक- मुद्राराक्षस, धनञ्जय-विजय, रत्नावली, कर्पुरमंजरी, विद्यासुन्दर, भारत-जननी, पाखण्ड-विडम्बन, दुर्लभ बन्धु आदि।
इतिहास ग्रन्थ- कश्मीर सुषमा, महाराष्ट्र देश का इतिहास, दिल्ली दरबार-दर्पण, अग्रवालों की उत्पत्ति, बादशाह दर्पण आदि।
निबन्ध तथा आख्यान- सुलोचना, मदालसा, लीलावती, परिहास-पंचक आदि।
काव्य ग्रन्थ- प्रेम फुलवारी, प्रेमप्रलाप, विजयनी विजय, बैजयन्ती, भारत बीणा, सतसई ।
हास्य प्रधान काव्य रचनाएँ- बंदर सभा,बकरी का विलाप,दानलीला आदि।
अन्य रचनाएँ- प्रेमाश्रु वर्णन, प्रेममाधुरी, प्रेम मालिका, प्रेम तरंग, प्रेम-प्रलाप, प्रेम- फुलवारी,प्रेम-सरोवर आदि।
यात्रा वृत्तांत- सरयू पार की यात्रा, दिल्ली, भारतेंदु, भारतवर्ष, उदयपुर, बदरीनाथ ।
भारतेन्दु जी की भाषा-
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कविता में पूर्व प्रचलित ब्रजभाजा का ही प्रयोग किया किन्तु गद्य के क्षेत्र में उन्होंने खड़ी बोली को प्रतिष्ठित किया। इनकी गद्य भाषा के दो रूप है- सरल व्यावहारिक भाषा तथा शुद्ध खड़ी बोली हिन्दी। इनमें पहले प्रकार की भाषा से अरबी, फारसी तथा अंग्रेजी आदि के आम प्रचलित शब्दो का प्रयोग हुआ है जबकि दूसरे प्रकार की शुद्ध भाषा में संस्कृत के तत्सम तथा तदभव शब्दों को ही मुख्य रूप से स्थान दिया गया है। इनकी भाषा बड़ी प्रभावपूर्ण, सशक्त तथा प्रवाहशील है। मुहावरों और कहावतो के प्रयोग से भाषा सजीव हो उठी है।
भारतेन्दु जी को थोड़े समय में बहुत लिखना था। लिखे हुए को दोबारा पढ़ने के लिए उनके पास समय ही नहीं था। इस कारण उनकी भाषा में कहीं-कहीं व्याकरण सम्बन्धी त्रुटियाँ पायी जाती हैं। वास्तव में ये भाषा के धनी थे। अपने समय के सभी लेखकों में उनकी भाषा सबसे अधिक साफ-सुथरी तथा सुव्यवस्थित थी।
धन के अत्यधिक अपव्यय के कारण भारतेंदु जी क्षीण हो गए और उनका शरीर से शिथिल पड़ गया। वे क्षय रोग से ग्रस्त हो गए। इस प्रकार साहित्य की सेवा करते हुए अल्पायु में ही सन १८८५ में उनका निधन हो गया।
प्रो. डॉ. दिनेशकुमार
कांदीवली, मुंबई
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