कृष्णा सोबती के कथा-साहित्य में स्त्री विमर्श

यह आलेख Krishna Sobti के कथा-साहित्य में स्त्री चेतना, आत्मसम्मान, यौनिकता, सामाजिक बंधनों और स्त्री अस्मिता के विविध आयामों का विश्लेषण करता है। सोबती ने अपनी रचनाओं में स्त्री को देवी या दासी नहीं, बल्कि संवेदनशील, संघर्षशील और इच्छाशक्ति से परिपूर्ण मनुष्य के रूप में प्रस्तुत किया है। ‘मित्रो मरजानी’, ‘ऐ लड़की’, ‘डार से बिछुड़ी’ और ‘सूरजमुखी अँधेरे के’ जैसी कृतियों के माध्यम से उन्होंने स्त्री के मनोविज्ञान, उसकी दबी इच्छाओं, आत्मसम्मान, यौन हिंसा और सामाजिक विसंगतियों को बेबाकी से अभिव्यक्त किया। उनका साहित्य स्त्री-विमर्श को नई दृष्टि और सशक्त स्वर प्रदान करता है।

May 15, 2026 - 15:56
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कृष्णा सोबती के कथा-साहित्य में स्त्री विमर्श
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आधुनिक काल की महिला कथाकारों में कृष्णा सोबती का नाम एक सशक्त कथाकार के रूप में उभरा है। भारतीय साहित्य को अपनी रचनाओं से समृद्ध करने वाली कृष्णा सोबती की कलम ने कभी सामाजिक बेड़ियों में बँधी नारी को मुखर होने की ताकत दी, तो कभी बँटवारे के उस दर्द से रूबरू कराया, जिसके बारे में सोचकर भी आज भी सिहरन होती है। सात दशक से भी ज्यादा समय तक हमारे आसपास के समाज, समस्याओं की तस्वीरें शब्दों के जरिए उकेरने वाली कृष्णा सोबती एक ऐसी रचनाकार थीं, जिन्होंने शब्दों की शक्ति को कमजोर होने से बचाया और उन्हें नए सिरे से सशक्त किया। उनके लेखन के एक-एक शब्द के पीछे कड़वी सच्चाई का जोर और अदम्य साहस का आधार है, जो किसी भी तरह के रोब में झुकना नहीं जानता। अपनी शर्तों पर जीने और लिखने का नाम ही है-‘कृष्णा सोबती’।
सोबती जी गहन चिंतक, मौलिक विचारक और नारी चेतना की सजग प्रहरी हैं। स्त्री के बोल्ड लेखन ने उन्हें पृथक पहचान दिलाई है। वे जीवन को नग्न यथार्थ के साथ जीने में और सत्य को सम्पूर्णता के साथ अभिव्यक्ति देने में विश्वास रखती हैं। कृष्णा सोबती के लेखन में स्त्री की एक अलग ही छवि उभरकर सामने आई है, ऐसी छवि जो अब तक हाशिए पर ही रही थी।  
सोबती जी के लेखन ने समाज को बताया कि स्त्री होना क्या होता है? स्त्री होने का मतलब देवी या दासी होना नहीं है, बल्कि हाड़-मांस की वे लड़कियाँ होना भी होता है, जिनकी अपनी इच्छाएँ होती हैं, जिनकी अपनी हताशाएँ होती हैं और जिनकी अपनी विफलताएँ होती हैं, लेकिन इन सबके बावजूद जिनके भीतर लड़ने और जीने का अपना माद्दा भी होता है। `ऐ लड़की’, ‘डार से बिछुड़ी’, ‘दिलोदानिश’, ‘सूरजमुखी अँधेरे के’, ‘मित्रो मरजानी’, ‘समय सरगम’, ‘तिन पहाड़’, ‘यारों के यार’ जैसी ढेरों रचनाएँ हैं, जो अलग-अलग चरित्रों और कहानियों में ढलकर बार-बार कृष्णा सोबती की अपनी जीवन-दृष्टि के बेबाक बयान की तरह सामने आती रहीं।
सिर्फ दो पात्रों को लेकर लिखी गई कहानी ‘ऐ लड़की’ में सोबती जी स्पष्ट रूप से यह दर्शा देती हैं कि स्त्री को जन्म से ही स्वयं में एक बहुत बड़ी चुनौती बना दिया जाता है। बूढ़ी स्त्री एक प्रसंग में लड़की से कहती है- ‘गृहस्थी में पाँव रखते ही स्त्री का जो मन्थन-मर्दन होता है, वह भूचाल के झटकों से कम नहीं होता है और स्त्री सहन कर लेती है, क्योंकि उसे सहन करना पड़ता है।’
किंतु, ‘आज, ‘आदर्श’ को आत्मनिशेध के रूप में बेनकाब किया गया है। आज नारी के मानस के ये सारे आरोपित आदर्श एक नए शब्द की थपेड़ से उखड़ चुके हैं। अब नारी जीवन बलिदान के केन्द्र के आस-पास नहीं घूमता।’ कृष्णा सोबती की सर्वाधिक चर्चित स्त्री-पात्र ‘मित्रो’ है, जो अपनी देह-कामनाओं को लेकर सहज है। ‘मित्रो’ अपनी जिठानी से कहती है-‘देवर तुम्हारा मेरा रोग नहीं पहचानता। ... बहुत हुआ हफ्ते-पखवारे... और मेरी देह में इतनी प्यास है, इतनी प्यास कि मैं मछली-सी तड़पती हूँ!’  
स्वाभिमान और आत्मविश्वास से भरी ये स्त्रियाँ, वे वास्तविक स्त्रियाँ हैं, जो स्त्री जीवन को नया विस्तार देती हैं। `मित्रो के रूप में हिंदी उपन्यासों में पहली बार एक ऐसी नारी-पात्र की सृष्टि हुई जिसमें देह-धर्म के उफनते ज्वार के सहज स्वीकार की सम्पूर्ण साहसिकता है।’
पुनीता जैन जी के शब्दों में-‘अपनी दैहिक कामनाओं को लेकर ‘मित्रो मरजानी’ की नायिका ‘मित्रो’ में कोई झिझक नहीं, तमाम पारिवारिक मर्यादाएँ उसके किसी काम की नहीं हैं। इनकी आड़ में वह अपनी इच्छाओं को झुठलाती नहीं। यह साहस आज भी ऐसे प्रकट रूप में कम देखने को मिलेगा।... सच को सच की तरह स्वीकार करने का यह माद्दा इस चरित्र-रचना को विशिष्ट आभा प्रदान करता है।... उसके साहस का एक रूप यह है कि जितने साहस से वह देह-कामनाओं की तृप्ति चाहती है, उतने ही साहस से अपनी माँ को लताड़ कर अपने पति व परिवार की ओर लौटती है।... यह चरित्र जितना उन्मुक्त व क्रांतिकारी है, सामाजिक मूल्यों की ओर उसका प्रत्यावर्तन भी उतना ही अचरज से भरा है।’
‘तिन पहाड़’ की प्रेमाकांक्षी जया (पर पूरे आत्मसम्मान के साथ), ‘दिलोदानिश’ की महक बानो, कुटुम्बप्यारी, धुन्ना बुआ जो अपने-अपने आत्मसम्मान हेतु छटपटाती दिखती हैं, तो ‘डार से बिछुड़ी’ की ‘पाशो’ अपनी ‘आजादी’ और ‘बेसिक एहसास’ दिलाने वाले मान-सम्मान के लिए तड़पती रहती है। इसी क्रम में बलात्कार पीड़ित स्त्री की मनःस्थिति, उसके शेष जीवन में पुरुष की मौजूदगी और देह को लेकर उसकी प्रतिक्रिया को केंद्र में रखकर लिखा गया उपन्यास है ‘सूरजमुखी अँधेरे के’। ‘रत्ती’ जो इस उपन्यास की नायिका है, उसका रौंदा हुआ बचपन उसे पाषाण बना देता है। कृष्णा जी ने ‘रत्ती’ के माध्यम से बचपन की बुरी यादों से आतंकित स्त्री-मन के मनोविज्ञान, उसके आत्मसंघर्ष, अधूरेपन की अनुभूति, स्वयं को पहचानने की कसकती चाह, अपनी ही गहन उदासी और अवसाद की थाह पाने का संघर्ष आदि पक्षों को अपनी लेखनी से पूरी मुखरता के साथ अभिव्यक्त किया है। रत्ती का यह कथन-‘जिस सड़क का कोई किनारा नहीं-रत्ती वही है। वह आप ही अपनी सड़क का ‘डेड-एण्ड’ है। आखिरी छोर है।’-स्त्री की ऐसी मनःस्थ्िाति को प्रकट करता है जहाँ सिर्फ अवसाद है और ऐसी उदासी है जो चलती ही चली जा रही है, पर ऐसा कोई पड़ाव नहीं आ रहा है जिसपर पहुँच कर यह उदासी ठहर जाए। स्त्री की जंग खुद से खुद तक ही है। रत्ती की लड़ाई है खुद के स्त्रीत्व से। ‘एक लंबी लड़ाई। हर बार बाजी हार जाने वाली और हर बार हार न मानने वाली।’  
घनीभूत संवेदनशीलता स्त्री का स्वभाव है, परंतु रत्ती का रौंदा हुआ बचपन उसकी कोमलता को उभरने ही नहीं देता- ‘...वह एक काला जहरीला क्षण हर बार मुझे झपट लेता है और मैं काठ की हो जाती हूँ।’  
रत्ती का अतीत उसके जीवन को आमूल-चूल प्रभावित करता है।
कृष्णा सोबती जी के कथा-साहित्य के अध्ययन के पश्चात् यह कहा जा सकता है कि उनका दृष्टिकोण अत्यंत व्यापक है। सोबती स्त्री-मन के कोमल, कमजोर, मजबूत और दृढ़ सभी कोनों को झाँकती हुई अपने रचना-संसार का सृजन करती हैं। स्त्री विमर्श की सशक्त हस्ताक्षर कृष्णा सोबती द्वारा स्त्रियों की सामाजिक स्थितियों के बाह्य आवरण पर विमर्श करने के साथ ही उनके आंतरिक परतों से संबंधित विषय-वैविध्य जैसे-विशेष व्यक्तित्व, आत्मसम्मान, यौन हिंसा जैसी पृष्ठभूमियों पर लेखनी चलाई गई। सोबती जी ने स्त्रीवादी परिप्रेक्ष्य से स्त्री के पक्ष में जोरदार ढंग से लिखा और स्त्री के साथ होने वाले अमानवीय और बर्बरतापूर्ण व्यवहार पर प्रश्न उठाए। डॉ. रोहिणी अग्रवाल के शब्दों में- ‘एक स्त्री के नजरिए से कृष्णा सोबती को जब-जब देखा है, लगता रहा है, मित्रो का बाना पहन कर जो धमाका उन्होंने किया, वह तो होना ही था।'
संदर्भ ग्रंथ :-
१.कृष्णा सोबती, ‘ऐ लड़की’, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, दूसरी आवृत्ति २०१२  
२. रावत व खण्डेलवाल, हिंदी कहानी : फिलहाल, पृष्ठ-१०६  
३. कृष्णा सोबती, ‘मित्रो मरजानी’, राजकमल प्रकाशन, बारहवाँ
संस्करण २०२५  
४. मधुरेश, हिंदी उपन्यास का विकास, लोकभारती प्रकाशन, २०१८  
५. पुनीता जैन, ‘कृष्णा सोबती के रचना संसार में स्त्री’ लेख, सेतु (मासिक) पत्रिका, पिट्सबर्ग अमेरिका, सितंबर २०१८  
६. कृष्णा सोबती, ‘सूरजमुखी अँधेरे के’, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण १९७२  
७. डॉ. रोहिणी अग्रवाल – ‘एक नजर कृष्णा सोबती पर’ (बस एक मिनट)
कु. ज्योति

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