‘मैं नहीं तू - अध्यात्म की पहली सीढ़ी’

यह लेख मानव जीवन में अहंकार की भूमिका, उसके प्रभाव और उससे उत्पन्न संबंधों की दूरी को स्पष्ट करता है। इसमें बताया गया है कि अहंकार ही हमारे अस्तित्व की झूठी पहचान बन जाता है और सत्य की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा होता है। अहंकार का त्याग करके ही आत्मबोध, विनम्रता और आध्यात्मिक उन्नति संभव है।

Apr 9, 2026 - 16:14
 0  1
‘मैं नहीं तू - अध्यात्म की पहली सीढ़ी’
ahankar-tyag-aur-atmabodh

हम सब अपने अहंकार के साधक हैं। हमने जीवन-भर अहंकार को पाला है, उसका पोषण किया है। सोचने बैठें, तो अब तक की हमारी व्यक्तिगत पूँजी अगर कुछ है, तो वह केवल अहंकार ही है। बिना अहंकार के हमारा अस्तित्व हमें स्वयं को ही मान्य नहीं होगा। अहंकार हमारे अस्तित्व का परिचायक है। हम थोड़ा कुछ जानते नहीं कि हम में यह भाव आ जाता है कि हम ज्ञानी हो गए! जबकि जानकारी और ज्ञान का आपस में सम्बन्ध ही नहीं है। जानकारी तो एक इशारा-भर है, जो ज्ञान और अज्ञान के सम्बन्ध में हो सकता है, मगर ज्ञान, जानकारी नहीं है। एक सत्य के सम्बन्ध की बात है, दूसरा सत्य को जानने की, सत्य को उपलब्ध करने की।

तो जब तक हमारा अहंकार पुष्ट होता रहता है, हमें हमारे होने की जानकारी मिलती रहती है। तो वे सारे काम, जिनसे हमारा अहंकार पुष्ट होता हो, उसमें हमें रस मिलता है। लोग आपकी बात सुनते हैं, आपको देखते हैं, आपकी प्रशंसा करते हैं,आपको महसूस होता है कि वे आपको आदर भी देते हैं, तो ये सारे कामों से आपका अहंकार पुष्ट होता है। वहीं अगर कोई आपको इग्नोर कर दे, आपकी उपेक्षा करके आपकी ओर देखे भी नहीं, तो आप कहते हैं कि उसने मेरा अपमान किया, क्योंकि मूल में यह बात होती है कि उसने आपके अहंकार को नकार दिया, उस पर चोट कर दी। तो दुनिया में आपसी सम्बन्धों में जो दूरी पैदा होती है, उसका एकमात्र कारण आपके अहंकारों का आपसी टकराव है। अगर अहंकार ही नहीं हो मौजूद, तो फिर कैसी दूरी, कैसा दुराव! तब तो 'मैं’ का भी भाव मिट जाए! और जहाँ `मैं’ का भाव मिटा, वहाँ अपने-पराये का भाव भला कैसे जीवित रह सकेगा?

यह भी पढ़े :- ‘मैं नहीं तू - अध्यात्म की पहली सीढ़ी’

तो हमारे शास्त्र कहते हैं कि अपने अहंकार का त्याग करो। अपनेपन को मिटाकर ही स्वयं तक पहुँचा जा सकता है। अपने तक पहुँचने का इससे सरल मार्ग दूसरा कोई नहीं है, कोई हो भी नहीं सकता। अभी एक मूवी देख रहा था। उसमें माँ के निधन के उपरांत उत्तरक्रिया के दौरान पण्डित जी द्वारा कहा जाता है कि (कम से कम) बड़े बेटे को अपने केश कटवाने चाहिए। बच्चे नये ज़माने के हैं, बड़ी कम्पनी में नौकरी करते हैं। बड़े लोगों के साथ उठना-बैठना है। क्लाइंट मीटिंग में रहना होता है। तो ऐसे कैसे बाल उतार दिए जाएँ! क्या गंजा सिर लेकर ऐसी मीटिंग में जाया जाएगा? प्रश्न वाजिब है, हम में से कईयों के मन में कई बार ऐसे प्रश्न उपजे हैं। मेरे मन में भी आए हैं। मन प्रश्न करता है और तर्क से उपजे विमर्श के समाधान से कम में राजी भी नहीं होता। तो पण्डित जी उसे, उसकी भाषा में यह कहकर उसे समझाने का प्रयास करते हैं कि बाल देने के पीछे वैज्ञानिक कारण यह है कि हम अपने अहंकार का त्याग करें। आदमी के अहंकार के पीछे एक बड़ा कारण उसके केश हैं। बालों का अहंकार के साथ बड़ा गहरा सम्बन्ध है। हमारी मान्यता है कि हमारी ख़ूबसूरती बालों के कारण है। हम लोगों ने बड़ी चतुराई से व्यक्तित्व को पीछे हटाकर बालों को सौंदर्य का मानक बना डाला है। गोया, हमारा व्यक्तित्व, चरित्र न होकर, बालों तक सीमित हो गया है।

हालाँकि फिल्म देखकर आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता हुई, क्योंकि एक लम्बा दौर ऐसा देखा है, जिसमें सनातन परम्पराओं को पाखण्ड बताकर मखौल उड़ाया गया है। ख़ैर, मुद्दा यह है कि हम, अहम को त्यागें, तभी सत्य की राह में हमारे कदम बढ़ेंगे। इस 'होनेपन’ के भाव ने हमें बिगाड़ा हुआ है, हमारा मार्ग अवरुद्ध कर रखा है। जब तक हम में यह भाव है, हम कर्त्तापन के भाव से विमुक्त नहीं हो सकते। करने वाला वह, करवाने वाला वह, हम कौन हैं आख़िर? `मैं नहीं, तू’ का भाव जब उपजेगा, तभी अध्यात्म में पहला कदम समझो।
शुभम् भवतु।

दुर्गेश कुमार ‘शाद'
इन्‍दौर

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0