त्योहारों में स्त्री की भूमिका : साहित्यिक दृष्टिकोण

भारतीय त्योहारों की आत्मा में स्त्री का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह केवल परंपराओं का निर्वाह नहीं करती, बल्कि उन्हें सहेजती, संवारती और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाती है। महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम और जयशंकर प्रसाद जैसे साहित्यकारों ने स्त्री को संवेदना, श्रद्धा और सृजन का प्रतीक माना है। त्योहारों में उसकी रचनात्मकता, त्याग, प्रेम और सांस्कृतिक चेतना ही उन्हें जीवंत बनाती है।

Apr 9, 2026 - 14:46
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वह जले दीप सी उजियारा है,
वह हँसे तो उत्सव सारा है,
हर पर्व की वह प्राणधारा है,
स्त्री ही संस्कृति का तारा है।

भारतीय संस्कृति उस रंग-बिरंगे फूलों से भरी हुई टोकरी के समान है, जहाँ का ताना-बाना जितना रंगीन है उतना ही विविध है पर त्यौहार हमारे सामाजिक जीवन की आत्मा है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि भावनाओं, परंपराओं और मानवीय संबंधों का उत्सव है। इन उत्सवों की सौंदर्यता, गरिमा, शालीनता का कोई केंद्र बिंदु है तो वह है स्त्री। इन उत्सवों में स्त्री की भूमिका गहन और बहुआयामी है जो विभिन्न उत्सवों में भावनात्मक, सांस्कृतिक और नैतिक चेतना का संचार करती है। साहित्य में स्त्री के अभूतपूर्व योगदान को बार-बार रेखांकित किया गया है
`स्त्री न केवल जीवन की बल्कि उत्सव की भी आधारशिला है' उसके अंदर ईश्वर प्रदत्त करुणा, संवेदना, त्याग, क्षमा, सृजनशीलता के भाव ही त्यौहारों की आत्मा को जीवंत रखते है।
 किसी भी त्यौहार के आगमन पर उस त्यौहार की तैयारी से लेकर समापन तक स्त्री की भागीदारी अदृश्य होते हुए भी सर्वाधिक व्यापक है। स्त्री त्यौहारों को कला का रूप देती है। रंगोली, अल्पना, दीप सज्जा, व्रत गीत, मेहंदी, वस्त्र सज्जा यह सब स्त्री की रचनात्मकता के प्रतीक है।
भारतीय संस्कृत में त्यौहार केवल तिथियां और अनुष्ठानों का संगम नहीं है वे जीवन की भावनात्मक, सांस्कृतिक और सामाजिक धड़कन है हमारे यहाँ त्यौहार ऋतुओं के परिवर्तन, धार्मिक श्रृद्धा, पारिवारिक एकता और सामाजिक मेल मिलाप के प्रतीक रहे हैं। इन त्यौहारों के गढ़ने, सहेजने और पीढ़ियों तक पहुँचाने में जिसका सबसे बड़ा योगदान है वह है स्त्री। जो इन उत्सवों में जीवन का रंग, संवेदना और अर्थ भरती है। वास्तव में त्योहारों की धार्मिक परंपराएं प्रायः स्त्री के हाथों से ही जीवित है जब कोई नव विवाहिता अपनी ससुराल आती है, वहीं से शुरू होती हैं परंपराएं और इन परंपराओं का संवर्धन करने वाली होती है एक स्त्री। जिसको सासू माँ कहा जाता है। जो घर परिवार में चलते आ रहे पूजन, व्रत, उपवास, कथा पाठ, और पर्व-संस्कारों में एक दूसरी स्त्री को निपुण बनाती है। जो भविष्य में एक नई पीढ़ी को तैयार करती है। लोक साहित्य में त्योहारों की प्रतीकात्मकता में स्त्री के योगदान को प्रतिध्वनित करती है। लोक साहित्य त्योहारों का जीवन्त दस्तावेज है। इसमें स्त्री की उपस्थिति सर्वव्यापी है। चाहे विरहा,कजरी,सोहर,सावन गीत, फाग या बन्ना-बन्नी हों हर जगह स्त्री की भावनाओं की झंकार मिलती है ।

होली में स्त्री के चुलबुली प्रफुल्लता,
 दीपावली में सजग गृह लक्ष्मी का रूप, 
नवरात्रि में शक्ति स्वरूपा छवि,
करवा चौथ में प्रेम और प्रतीक्षा की तपस्या
अहोई अष्टमी संतान से अथाह प्यार, 
भाई-दूज,रक्षाबंधन संबंधों को संजोए रखना

ये सब लोकगीतों और कविताओं में सौंदर्य और आस्था का अनोखा रंग रचते हैं। साहित्यकार अमृता प्रीतम ने इस रूप को अत्यंत कोमल भाव से व्यक्त किया है' वह मिट्टी में रंग घोल देती है और दुनिया उसे त्यौहार कहती है' त्योहारों की साज सज्जा,पकवानों की सुगंध,घर की रौनक इन सब के पीछे एक स्त्री का सृजनात्मक हृदय होता है। त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं परिवार और समाज को जोड़ने का एक अवसर भी है और इसकी डोर ईश्वर द्वारा रचित अनूठी रचना स्त्री के हाथ में होती है। स्त्री केवल गृहस्थी की आधारशिला ही नहीं बल्कि सामाजिक एकता की प्रेरणा भी बनती है।
जयशंकर प्रसाद ने लिखा है `नारी! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास- रजत-नग पगतल में' यही वह श्रद्धा का रूप है जो पर्व को अर्थपूर्ण बनाता है भारतीय साहित्य में त्योहारों का वर्णन अनेक रूप में हुआ है और लगभग हर युग के साहित्य में स्त्री इस वर्णन की केंद्रीय प्रेरणा रहीहै। प्रेमचंद की कहानियों में स्त्री का यह रूप अत्यंत संवेदनशील है उनकी ईदगाह में स्त्री का मातृत्व,स्नेह और त्याग की भावना, पर्व की आत्मा बन कर उभरी है। 
कफन में स्त्री बिना, उत्सव की भावना ही शून्य हो जाती है इससे यह स्पष्ट होता है कि स्त्री बिना त्योहार औपचारिक रह जाते हैं।
`स्त्री तुम हो श्रद्धा तुम ही हो प्राण की गहराई' जयशंकर प्रसाद ने स्त्री को श्रृद्धा और करुणा का प्रतीक बताया है। यह श्रद्धा ही है जो हर त्योहार को अर्थ देती है।
साहित्यिक पृष्ठभूमि में स्त्री का यह रूप उस भाव का प्रतीक है जो मानव को भौतिकता से ऊपर उठाकर आत्मिक उल्लास की ओर ले जाती है और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाती है।
महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, सूर्यकांत त्रिपाठी `निराला' और अमृता प्रीतम जैसे साहित्यकारों ने स्त्री को केवल पूजनीय रूप में नहीं बल्कि संवेदनशील मानव के रूप में प्रस्तुत किया है जो त्यौहारों की आत्मा में धड़कती है।
वह घर को मंदिर बनाती है और घर के हर कोने में सौंदर्य और श्रद्धा का वातावरण रखती है।

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महादेवी वर्मा ने स्त्री को सृजन की मूर्ति कहा है `स्त्री ही है जो जीवन के हर अंधकार को दीपक की तरह उजाला देती है' यह दीपक ही त्योहारों का प्रतीक है उजाला, आशा और नूतनता का।
उत्सव की सृजन हार, पोषक और संवाहक तीनों रूपों में जब उसका स्पर्श जुड़ता है तब उत्सव का वास्तविक सौंदर्य निकलता है।
नवरात्रि में दुर्गा, दीपावली में लक्ष्मी, हरतालिका में पार्वती और होली में राधा ये प्रतीक मात्र, देवत्व के नहीं बल्िक स्त्री के भीतर छिपी शक्ति सौंदर्य प्रेम के रूप है। त्योहारों में स्त्री की भूमिका केवल परंपरा का निर्वाह नहीं बल्कि संस्कृति की धड़कन और साहित्य की आत्मा है।करवा चौथ की रात चाँद का दीदार केवल प्रेम का प्रतीक नहीं बल्कि प्रतीक्षा की सुंदरता का चित्र है साहित्य में यह प्रतीक्षा ही स्त्री को अनुभूति का केंद्र बनाती है जहाँ धर्म और प्रेम, श्रद्धा और सौंदर्य एकाकार हो जाते हैं। स्त्री की रचनात्मकता ही त्योहारों को रंग, गंध और राग प्रदान करती है।

साहित्य में जब कवि दीपावली का वर्णन करता है-

 `जल उठा अंतःपुर, हँस उठी काया 
दीप की पंक्ति में जीवन की छाया'
तो उसमें उस स्त्री की कला की झलक होती है जिसने अपने अस्तित्व से घर को मंदिर बना दिया है।
त्योहारों में स्त्री का अस्तित्व एक दीपक की तरह है जो हर युग, हर घर और हर हृदय में प्रकाश भरता है।
 वह दीप है वह आरती
 वह पूजा की भावना
सर्वस्व न्यौछावर है उसका
त्यौहारों की वह आत्मा ।

आज जब उपभोक्तावाद त्योहारों की आत्मा को म्लान कर रहा है तब भी स्त्री अपने अंतर्जगत की सच्चाई से इन पर्वो को जीवित रखे हुए हैं। वह अब केवल गृह लक्ष्मी ही नहीं बल्कि परंपरा और प्रगति के बीच का पुल बन चुकी है आधुनिक युग में त्योहारों के अर्थ और स्वरूप में परिवर्तन आया है व्यस्त दिनचर्या, शहरीकरण, तकनीकी जीवन ने पर्वों को प्रभावित किया है फिर भी स्त्री ने इस बदलाव को अपनाते हुए त्योहारों को नए अर्थों में पुर्नपरिभाषित किया है। अब वह केवल पूजा करने वाली ही नहीं बल्कि आयोजन करता, सांस्कृतिक संरक्षक और आर्थिक सहभागी के रूप में भी उभर रही है। दीपावली में अपने हाथों से दिए बनाना, राखी के समय हस्त निर्मित उपहार तैयार करना, होली पर ऑर्गेनिक रंग को बढ़ावा देना यह सभी आधुनिक स्त्री की सजग सामाजिक भूमिका के प्रतीक हैं। साहित्य में भी समकालीन लेखिकाओं ने स्त्री को आधुनिक परिपेक्ष्य में दिखाया है उनके लेखन में त्यौहार केवल धार्मिक अवसर नहीं नहीं बल्कि स्वतंत्रता, आत्मबोध और अस्तित्व की पहचान का प्रतीक बन जाते हैं भविष्य का साहित्य स्त्री को इस रूप में देख रहा है जो अपने हाथों से दिए जलाने के साथ-साथ अपने चेतना की ज्योति भी प्रज्ज्वलित करती है।

नीलम पाठक

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