वोकल फॉर लोकल
वहां की हालत देखकर वह दंग रह जाती है गांव बस नाम मात्र का गांव रह गया था विदेशी सामानों ने हर घर में अपनी पैठ बना ली थी। प्लास्टिक के खिलौने, विदेशी चॉकलेट, नॉन स्टिकी बर्तन और आयातित कपड़े इत्यादि। यह देखकर उसकी अंतरात्मा बहुत दुखी हुई वह सोचने लगी क्यों हम विदेशी वस्तुओं पर निर्भर है? क्यों हम अपनी वस्तुओं को हीन दृष्टि से देखते हैं और उसकी उपेक्षा करते हैं। इन्हीं बातों पर विचार करते-करते वह सो गए सुबह वह अपने कुछ मित्रों से बात करने लगी और इन बातों पर विश्लेषण करने लगी विश्लेषण करने पर कुछ बिंदु सामने आए जैसे जानकारी का अभाव, देशी वस्तु महंगी होना, स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव से अनभिज्ञता।
चंद्रपुर गांव में एक लड़की रहती थी उसका नाम सुकन्या था, अपने नाम के अनुरूप ही वह सुंदर गुणों से युक्त थी।
उसे अपने देश के संस्कृति और परंपराओं से बहुत प्यार था। सुकन्या पढ़ने में मेधावी लड़की थी , उसने एम. बी ए नागपुर से पूरा किया, उसे विदेश से और अपने देश में भी बड़ी नामी गिरामी कंपनियों से ऑफर आने लगे,पर बचपन से ही उसके मन में एक चाहत थी कि पढ़ लिखकर अपने देश को वह गौरवान्वित करेगी इसी चाहत का दीप जलाए वह अपने गांव चंद्रपुर वापस जाती है।
वहां की हालत देखकर वह दंग रह जाती है गांव बस नाम मात्र का गांव रह गया था विदेशी सामानों ने हर घर में अपनी पैठ बना ली थी।
प्लास्टिक के खिलौने, विदेशी चॉकलेट,नॉन स्टिकी बर्तन और आयातित कपड़े इत्यादि।
यह देखकर उसकी अंतरात्मा बहुत दुखी हुई वह सोचने लगी क्यों हम विदेशी वस्तुओं पर निर्भर है? क्यों हम अपनी वस्तुओं को हीन दृष्टि से देखते हैं और उसकी उपेक्षा करते हैं। इन्हीं बातों पर विचार करते-करते वह सो गए सुबह वह अपने कुछ मित्रों से बात करने लगी और इन बातों पर विश्लेषण करने लगी विश्लेषण करने पर कुछ बिंदु सामने आए जैसे जानकारी का अभाव,देशी वस्तु महंगी होना, स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव से अनभिज्ञता।
सुकन्या ने अपने मित्रों को इकट्ठा किया और कहा दोस्तों हमें नया स्टार्टअप करना चाहिए हम स्वदेशी अपनाएंगे और अपने हस्त शिल्पियों और कारीगरों का समर्थन करेंगे ।
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सब ने एक साथ मिलकर प्रतिज्ञा की ‘स्वदेशी अपनाएंगे देश बचाएंगे' सुकन्या ने गांव के कुछ बड़े बुजुर्गों से बात कर उनका समर्थन प्राप्त किया और आपस में सलाह किया वे मिट्टी के नॉन स्टिक बर्तन बनाएंगे उन्होंने वहां के स्थानीय कुम्हार को प्रशिक्षित करने का कार्य शुरू कर दिया । गांव में यही चर्चा का विषय था की अरे प्रिâज होने पर मटका कौन खरीदना है? आजकल मिट्टी के बर्तन में भला खाना कौन बनाता है ? खाना मिट्टी के बर्तन में बनाना तो पुराने समय की बात हो गई अभी तो कुकर है फटाक से तीन सिटी दिया दाल तैयार ।
चारों तरफ से व्यंग्य, उपहास और आलोचनाओं को झेलते हुए सुकन्या आगे बढ़ते रही।
दादाजी कहते हैं बेटा हिम्मत मत हारना एक छोटा सा दिया भी अंधेरे को चीर देता है । कार्य तीव्र गति से आगे बढ़ने लगा बैंक से लोन भी मिल गया कारीगरों के हाथ में भी सफाई आ गई सुकन्या और उसके दोस्तों ने अपनी कंपनी का नाम रखा `वोकल फॉर लोकल' इन्होंने गांव में बहुत बड़े मेले का आयोजन किया सोशल मीडिया के द्वारा उसका लगातार प्रचार हो रहा था ।
सुकन्या अपने समय की टॉपर थी तो शहर से उसके बहुत से मित्र और नामी गिरामी कंपनियां भी मेले में आई , गांव वालों के लिए कौतूहल का विषय था कि इतनी बड़ी-बड़ी गाड़ियों से लोग आए हैं और इन मिट्टी के बर्तनों को बड़े तादाद में खरीद कर ले जा रहे हैं सुकन्या की चाची ने अपनी सहेली से कहा 'जिनकी कंपनी के समान हमारे घरों में है वह यह सामान ले जा रहे हैं कुछ तो बात जरूर है।'
सहेली : ‘हां सही कहा तूने छोरी ने तो कमाल कर दिया।' मेले का आयोजन शानदार रहा, और उसका परिणाम उससे भी जानदार और उसके मित्र बहुत प्रसन्न थे काफी अच्छी मात्रा में फायदा हुआ था अगले दिन के प्रतिष्ठित समाचार पत्र में सुकन्या का नाम और उसकी कंपनी के काम की जमकर तारीफ की गई थी ।
सुकन्या के दादाजी और उनके मित्रों के पांव खुशी से जमीन पर नहीं पड़ रहे थे कि आखिरकार हमारा अभियान सफल रहा तथा पूरे गांव में इस समय इन वस्तुओं की धूम मची थी।दादाजी के आंखों में आज खुशी के आंसू छलक रहे थे कि आज गांधी जी के स्वदेशी के सपनों को एक छोटी सी उड़ान मिली है।
वंदना मिश्रा
रंगिया (असम)
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