ऊर्जस्वित पर्व - नवरात्र
नवरात्रि शक्ति उपासना का एक प्रमुख पर्व है, जिसमें मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। यह पर्व आत्मशक्ति, संयम, भक्ति और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है। विजयदशमी के साथ समाप्त होने वाला यह उत्सव बुराई पर अच्छाई की विजय को दर्शाता है और पूरे भारत में विभिन्न सांस्कृतिक रूपों में मनाया जाता है।
संपूर्ण जगत की मूल चेतना `शक्ति' की उपासना का लोकप्रिय पर्व नवरात्रि भारतीय दर्शन की स्वास्थ्य चेतना का प्रतीक है जहां शक्ति को सर्वाधिक महत्वपूर्ण, सम्माननीय और सृजनात्मक तत्व माना गया है। नवरात्रि के समय को शक्ति आराधना का सर्वोत्तम समय माना जाता है। शक्ति साधना में नवरात्रों का विशेष महत्व है। यह पर्व ऊर्जा और शक्ति के साथ बल बुद्धि एवं साधना का प्रतीक भी माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार किसी भी संवत्सर (वर्ष) में चार नवरात्र होते हैं जो क्रमशः चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से आरंभ होकर नवमी तिथि पर्यंत माने जाते हैं। आषाढ़ और माघ मास के नवरात्रों को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है और चैत्र तथा अश्विन मास के नवरात्रों को प्रकट नवरात्रि कहा जाता है। चैत्र नवरात्रों को वासंतिक नवरात्र तथा अश्विन नवरात्रों को शारदीय नवरात्र भी कहते हैं। जनमानस में यही दो नवरात्र अधिक प्रसिद्ध प्रचलित है। चैत्र नवरात्र के अंत में रामनवमी और शारदीय नवरात्र के अंत में दुर्गा नवमी मनाई जाती है। कुछ लोग इन्हें क्रमशः राम नवरात्री और दुर्गा नवरात्रि भी कहते हैं। शारदीय नवरात्रि में नवमी के अगले ही दिन विजयदशमी मनाई जाती है। मान्यता अनुसार देवी ने नौ रात्रि और दस दिनों तक असुरों से युद्ध के पश्चात महिषासुर का वध करके विजय प्राप्त की थी इसीलिए विजयदशमी मनाई जाती है। नो रात्रि तक युद्ध में संलिप्त रहने के कारण यह पर्व नवरात्रि के नाम से जाना जाता है। जिसे जन सामान्य बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से मनाता है। इसी दिन भगवान राम ने भी रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त की थी इसीलिए इस पर्व को दशहरे (विजयदशमी) के रूप में भी मनाया जाता है। भगवान राम ने भी युद्ध में विजय की अपेक्षा हेतु शक्ति पूजा कर वरदान की प्राप्ति की थी। इसीलिए दशहरे पर शस्त्र पूजा का विशेष विधान भी है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस दशमी को शुक्र तारा उदय होने के कारण विजय मुहूर्त बनाता है अतः यह काल सर्व सिद्धि दायक माना जाता है। इसीलिए इसे विजयदशमी कहते हैं। इस दिन विवाह को छोड़कर शेष सभी शुभ कार्य करना बहुत शुभ माना जाता है। नवरात्रि शक्ति पूजा का पर्व है जिसमें हर्ष और उल्लास के साथ वीरता, पराक्रम और विजय का उत्सव मनाया जाता है। शाक्तों में शक्ति साधना के लिए शारदीय नवरात्र का विशेष महत्व है।
बंगाल क्षेत्र में शारदीय नवरात्रों में ही दुर्गा पूजा का विशिष्ट महत्व दिखाई पड़ता है। इन दिनों शक्ति पूजा के लिए अनेक विशिष्ट उत्सवों का आयोजन किया जाता है। बंगाल में देवी दुर्गा की मिट्टी की मूर्तियां बनाकर इन दिनों में उनकी विशेष पूजा अर्चना की जाती है। बंगाल में सप्तमी, अष्टमी और नवमी को देवी की पूजा की जाती है। दशमी को मूर्तियां तालाब या नदी में विसर्जित कर दी जाती है। यहां मां दुर्गा को कन्या रूप में माना जाता है। मान्यता अनुसार विवाहित पुत्री इन दिनों में पति के घर से पिता के घर आती है। प्रायः बंगाल में दस भुजाओं में दस प्रकार के आयुधों से सज्जित सिंह वाहिनी मां दुर्गा महिषासुरमर्दिनी के रूप में पूजित होती है। तत्पश्चात सिंदूर खेला का भव्य आयोजन होता है। वस्तुत: भारत ही नहीं अपितु संसार भर में इतना शक्ति पूजा का इतना बड़ा और भव्य उत्सव बंगाल के अतिरिक्त कहीं नहीं होता।
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भारत में दुर्गा पूजा वैदिक काल से चली आ रही है। ऋग्वेद की प्रारंभिक ऋचा में आद्या महाशक्ति के रूप का वर्णन है। त्रेता में भगवान राम द्वारा की गई शक्ति पूजा का वर्णन भी शास्त्रों में उल्लिखित है। द्वापर युग में भी महाभारत के युद्ध के समय पांडवों ने विजय हेतु शक्ति पूजा की थी। वर्तमान में भी नवरात्रि में शक्ति पूजा का विशेष महत्व है। जन सामान्य से लेकर विद्वत समाज और संत-जन तक इस समय अपनी-अपनी सामर्थ्य अनुसार साधना में लीन रहते हैं। उपवास के द्वारा संयम साधते हुए इच्छाओं का त्याग करते हैं। वास्तव में उपवास का उद्देश्य ही होता है कि अपने भीतर की नकारात्मक शक्तियों, अहंकार लोभ, क्रोध, आलस को जीत कर आत्म बल, संयम और आध्यात्मिक शक्ति को जागृत करना। जिसके लिए भक्तजन देवी के नौ रूपों की साधना कर अपने भीतर शक्ति और ऊर्जा को अंतस में प्रवाहमान बनाने का प्रयास करते हैं। नौ दिवसीय इस उत्सव का एक महत्वपूर्ण पहलू व्रत और उपवास भी है। जो सिर्फ भोजन त्यागने का नहीं अपितु मन और इंद्रियों पर नियंत्रण पाने का माध्यम है जिसके द्वारा साधक अपने विचारों पर नियंत्रण कर अपनी आत्मिक उन्नति की ओर बढ़ता है। व्रत उपवास कर संयम साधते हुए वह अपनी आंतरिक शक्ति का संचय करता है। उपवास का अर्थ ही होता है उपासना के पास रहना। व्रत के द्वारा हम इंद्रियों को वश में कर स्वयं के भीतर झांक पाते हैं जिससे मन स्थिर और शुद्ध होता है और यही शुद्ध मन साधना की सफलता निश्चित करता है। महिषासुर मनुष्य की नकारात्मक शक्तियों का प्रतीक है अपनी आंतरिक शक्ति से जिसका दमन कर हम स्वयं पर विजय पा सकते हैं यही मां के महिषासुरमर्दिनी स्वरूप का वास्तविक अर्थ है। जिसका उद्देश्य साधक को सांसारिक आसक्तियों से हटकर साधना के प्रकाश द्वारा आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करना है। नवरात्रि केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं अपितु आत्मशक्ति ,भक्ति, साधना और संयम का एक बहुत ही ऊर्जावान पर्व है ।
नवरात्रि भारत में बहुत ही श्रद्धा और उल्लास पूर्वक मनाया जाता है। पंजाब, हिमाचल प्रदेश,राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार,झारखंड,छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात आदि राज्यों में नवरात्रि को बहुत धूमधाम से नृत्य गायन के अनेक उत्सवों द्वारा मनाया जाता है। सभी सभी जगह यह पर्व अपनी कुछ खास स्थानीय विशेषताओं के साथ मनाया जाता है जैसे गुजरात में नवरात्रि पर होने वाले गरबा डांस ने तो भारत ही नहीं, भारत से बाहर भी विशेष प्रसिद्ध प्राप्त कर ली है। बंगाल के अतिरिक्त उत्तराखंड, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में भी देवी की मूर्तियां मिट्टी या गाय के गोबर आदि से बनाई जाती है जिन्हें भिन्न-भिन्न रंग और चमकीले कागज आदि से सजाकर दीवार पर लगाया जाता है। जिसे सांझी या सांझी माई कहते हैं। सांझी देवी के साथ देवी का भाई भी अवश्य बनाते हैं। माना जाता है की देवी नौ दिनों के लिए अपने मायके आई है। संध्या काल में घर की स्त्रियों और विशेष कर छोटी बच्चियों के द्वारा सांझी देवी की आरती की जाती है।आरती के इन गीतों में में ग्रामीण आंचल की विशेष खुशबू महकती है। अपने गांव के घर के आंगन में लगी सांझी और सांझी की आरती की स्मृतियां आज भी मेरे भीतर ज्यों की त्यों विद्यमान है। संध्या के समय, सांझी माई की मूर्ति के नीचे बैठकर पास पड़ोस और परिवार की सभी बच्चियों के द्वारा गाए जाने वाला यह सांझी गीत मैं आज भी गुनगुना उठती हूं।-
आरता री आरता मेरी देबी माई आरता
काहे का दीबला अर काहे की बाती
सोने का दिबला और चांदी की बाती सरसों का तेल जले दिन राती
क्या मेरी सांझी ओढ़ेगी? क्या मेरे सांझी पहरेगी?
लाल दूसला ओढेगी, सुंदर लहंगा पहरेगी
बरस दिना में आवेगी, नौ दिनों में जावेगी
खोल मेरी देवी खोल किवाड आए तेरे पूजन हार।...
सीमा तोमर
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