मेघनाद साहा मिट्टी से जुड़े एक महान वैज्ञानिक
मेघनाद साहा भारत के महान वैज्ञानिकों में से एक थे, जिन्होंने खगोल भौतिकी के क्षेत्र में क्रांतिकारी योगदान दिया। उनके द्वारा प्रतिपादित साहा आयनीकरण समीकरण ने तारों के तापमान और संरचना को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साधारण परिवार से उठकर विश्वप्रसिद्ध वैज्ञानिक बनने तक उनकी जीवन यात्रा संघर्ष, प्रतिभा और दृढ़ संकल्प का प्रेरणादायक उदाहरण है।
मेघनाद साहा का जन्म ६ अक्टूबर, १८९३ बांग्लादेश की राजधानी ढाका के करीब एक गांव शाओराटोली में हुआ था। मेघनाद साहा के पिता का नाम जगन्नाथ साहा था। माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। उनके पिता जगन्ननाथ साहा एक छोटे से दुकानदार थे, जो अपने बड़े परिवार का खर्चा मुश्किल से चला पाते थे और मेघनाद उनके आठ बच्चों में से पांचवें नंबर पर थे। उनकी इच्छा थी कि प्रारंभिक शिक्षा के बाद मेघनाद उनकी दुकान के काम में हाथ बंटाए। लेकिन मेघनाद की इच्छा आगे पढ़ने की थी। वे बचपन से बहुत मेधावी थे और उनकी विज्ञान में विशेष रुचि थी। कक्षा में भी उनके सवाल अध्यापकों को चकित कर देते थे। एक बार उन्होंने अपने शिक्षक से सूर्य के आसपास चक्र जैसी चीज के बारे में पूछा। जिसका जवाब अध्यापक नहीं दे पाए। उस समय मेघनाद ने कहा था कि वह उसके बारे में खोज करेंगे और पता लगाएंगे। शिक्षक को लगा कि मेघनाद काफी प्रतिभाशाली है। वह इस सोच में पड़ गए कि उनके परिवार वाले मेघनाद को आगे पढ़ा पाएंगे या नहीं। उनका मानना था कि मेघनाद की पढ़ाई जारी रहनी चाहिए।
अध्यापक ने मेघनाद के भाई से इस सम्बंध में बात की। मेघनाद का भाई पिता के पास गया और बोला, मेघनाद पढ़ने में बहुत अच्छा है। ऐसा उसके अध्यापक भी कह रहे हैं। अध्यापक चाहते हैं कि वह आगे पढ़े। इस पर पिता ने कहा कि मेघनाद होनहार तो बहुत है लेकिन उसको पढ़ने के लिए दूसरे गांव जाना पड़ेगा जिसके लिए उनके पास पैसा नहीं है। मेघनाद के भाई ने कहा कि हम डॉक्टर अनंत से इस संबंध में मदद करने के लिए बात करेंगे। उनके पिता ने अपनी सहमति दे दी। डॉ. अनंत कुमार एक संपन्न और प्रभावशाली डॉक्टर थे। साथ ही वह एक नेकदिल इंसान भी थे। डॉ.अनंत दास ने मेघनाद साहा को आगे पढ़ने में मदद की। मेघनाद ने दूसरे गांव के एक अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में दाखिला ले लिया। वे डॉ. अनंत कुमार के घर ही रहते थे। अपनी लगन और कठिन परिश्रम से आठवीं क्लास में मेघनाद साहा ने न सिर्फ अपने स्कूल में टॉप किया बल्कि पूरे ढाका जिले में सर्वोच्च स्थान हासिल किया। उनके परिवार वालों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अब मेघनाद साहा को छात्रवृत्ति मिलने लगी। साथ ही उनको ढाका के राजकीय हाई स्कूल में प्रवेश मिल गया। मेघनाद ने इंटरमीडिएट की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में पास की।
मेघनाद १९११ में प्रतिष्ठित प्रेसीडेंसी कॉलेज में पढ़ने के लिए कोलकाता आ गए। १९१३ में उन्होंने गणित में सम्मान के साथ बीएससी की डिग्री हासिल की और अपनी कक्षा में दूसरे स्थान पर रहे। उनकी गणितीय प्रतिभा ने उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया। १९१५ में उन्होंने अनुप्रयुक्त गणित में एमएससी की डिग्री पूरी की और फिर से सत्येंद्रनाथ बोस के बाद दूसरे स्थान पर रहे। कॉलेज के दौरान उनका शैक्षणिक प्रदर्शन उत्कृष्ट रहा। कलकत्ता विश्वविद्यालय में साहा ने पूरे विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान प्राप्त किया। गांव के इस बालक मेघनाद साहा ने प्रगति और विकास की ओर एक बार जो कदम बढ़ाया आगे बढ़ते गए। फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
साहा के समय में प्रेसीडेंसी कॉलेज असाधारण प्रतिभाओं से गुलज़ार था। उनके सहपाठियों में सत्येंद्रनाथ बोस (बोस-आइंस्टीन सांख्यिकी के लिए जाने जाते हैं), निखिल रंजन सेन, ज्ञानेंद्र नाथ मुखर्जी और ज्ञान घोष जैसे भविष्य के अग्रदूत शामिल थे। प्रशांत चंद्र महालनोबिस, जिन्होंने बाद में भारतीय सांख्यिकी संस्थान की स्थापना की उनसे एक साल वरिष्ठ थे। स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस उनसे तीन साल जूनियर थे। प्रतिभाशाली मस्तिष्कों के इस जमावड़े ने बौद्धिक विकास के लिए एक आदर्श वातावरण तैयार किया।
साहा ने प्रेसीडेंसी कॉलेज में भारत के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक विद्वानों से शिक्षा प्राप्त की। उनके प्रोफेसरों में सर जगदीश चंद्र बोस, सर आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय, प्रोफ़ेसर डीएन मलिक और प्रोफ़ेसर सीई कुलिस। इन अग्रदूतों ने साहा की वैज्ञानिक सोच और दृष्टिकोण को महत्वपूर्ण रूप से आकार दिया। उनके ऊपर प्रफुल्ल चंद्र राय का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। हालाँकि साहा ने गणित का अध्ययन किया था, राय का मार्गदर्शन रसायन विज्ञान की कक्षाओं से कहीं आगे तक गया। इन्हीं प्रेसीडेंसी के मार्गदर्शकों ने साहा को विज्ञान को एक अलग नज़रिए से देखने के लिए प्रेरित किया। १९१७ में, मेघनाद साहा कलकत्ता में नव-स्थापित यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ साइंस में व्याख्याता के रूप में नियुक्त हुए जहाँ उन्होंने क्वांटम भौतिकी विषय पढ़ाया। एस.एन. बोस के साथ मिलकर उन्होंने आइंस्टीन और मिंकोवस्की द्वारा सापेक्षता पर जर्मन में प्रकाशित शोधपत्रों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। १९१९ में, अमेरिकन एस्ट्रोफिजिकल जर्नल ने मेघनाद साहा का एक शोध पत्र `ऑन सेलेक्टिव रेडिएशन प्रेशर एंड इट्स एप्लीकेशन' प्रकाशित किया। उन्होंने एक `आयनीकरण सूत्र' प्रस्तुत किया जो वर्णक्रमीय रेखाओं की उपस्थिति की व्याख्या करता था। यह सूत्र खगोल भौतिकी में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। वे विदेश गए और दो साल तक वहीं रहे। उन्होंने इंपीरियल कॉलेज, लंदन और जर्मनी की एक शोध प्रयोगशाला में शोध कार्य में समय बिताया। १९२७ में, मेघनाद साहा लंदन की रॉयल सोसाइटी के फेलो चुने गए।
मेघनाद साहा भारत वापस आकर इलाहाबाद चले गए और १९३२ में उत्तर प्रदेश विज्ञान अकादमी की स्थापना हुई। १९३८ में वे कलकत्ता साइंस कॉलेज लौट आए। इसी दौरान साहा की रुचि नाभिकीय भौतिकी में हुई। १९४७ में उन्होंने नाभिकीय भौतिकी संस्थान की स्थापना की, जिसका नाम बाद में साहा नाभिकीय भौतिकी संस्थान रखा गया। उन्होंने उच्च विज्ञान अध्ययन के पाठ्यक्रम में नाभिकीय भौतिकी को शामिल करने का पहला प्रयास किया। विदेशों में नाभिकीय भौतिकी के अनुसंधान में साइक्लोट्रॉन का उपयोग देखकर, उन्होंने संस्थान में एक साइक्लोट्रॉन स्थापित करने का आदेश दिया। १९५० में, भारत में पहला साइक्लोट्रॉन चालू हुआ।
मेघनाद साहा ने १९२० में अपना अभूतपूर्व तापीय आयनीकरण समीकरण विकसित किया। अब हम इसे साहा आयनीकरण समीकरण कहते हैं। यह तापीय संतुलन में गैस की आयनीकरण अवस्था और तापमान व दाब के बीच के संबंध को दर्शाता है। यह समीकरण क्वांटम यांत्रिकी और सांख्यिकीय यांत्रिकी का अद्भुत संयोजन प्रस्तुत करता है। यह वर्णन करता है कि अत्यधिक ताप पर तारों के अंदर परमाणु कैसे आयनित हो जाते हैं। यह समीकरण विभिन्न आयनीकरण अवस्थाओं में परमाणुओं के संख्या घनत्व को जोड़ता है और तापमान, इलेक्ट्रॉन घनत्व और आयनीकरण ऊर्जा को ध्यान में रखता है।
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साहा का समीकरण हमें यह समझने में मदद करता है कि तारकीय तापमान पर गैसें कैसे व्यवहार करती हैं। यह तापीय संतुलन में किसी भी गैस के आयनीकरण की मात्रा को दाब और तापमान के साथ उसके संबंध को दर्शाकर प्रकट करता है। यह समीकरण सिद्ध करता है कि तापमान बढ़ने पर, विशेष रूप से आयनीकरण ऊर्जा सीमा से ऊपर,परमाणु अधिक इलेक्ट्रॉन खोते हैं। यह प्रक्रिया साधारण गैस को प्लाज़्मा में बदल देती है-जिसे कई वैज्ञानिक पदार्थ की चौथी अवस्था कहते हैं। साहा के इस समीकरण ने खगोलभौतिकी की एक नई शाखा की नींव रखी थी जिसे तारकीय (ेूात्त्ar) स्पेक्ट्रोस्कोपी कहते है।
दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने साहा के काम का महत्व तुरंत समझ लिया। राल्फ एच. फाउलर और चार्ल्स गैल्टन डार्विन ने उनके समीकरण की और विस्तृत व्युत्पत्तियों के साथ पुष्टि की। एडवर्ड आर्थर मिल्ने और फाउलर ने १९२३ में साहा के काम को आगे बढ़ाया। उन्होंने तारकीय वायुमंडल के भौतिक मापदंडों को निर्धारित करने के नए तरीके दिखाए। साहा को कभी नोबेल पुरस्कार नहीं मिला,लेकिन वैज्ञानिक उनके आयनीकरण समीकरण को `नोबेल पुरस्कार श्रेणी का' कहते हैं। उनका काम २०वीं सदी के भारतीय विज्ञान की सर्वोच्च उपलब्धियों में गिना जाता है। आज, दुनिया भर के छात्र सांख्यिकीय यांत्रिकी और ऊष्मागतिकी पाठ्यक्रमों में उनके समीकरण सीखते हैं। मेघनाद साहा की गणितीय अंतर्दृष्टि ने हमें तारों को पहले से कहीं बेहतर ढंग से समझने में मदद की है।मेघनाद साहा ने १९४३ में कोलकाता में परमाणु भौतिकी संस्थान की स्थापना की। आइरीन जोलियट-क्यूरी ने ११ जनवरी, १९५० को इस अग्रणी संस्थान का औपचारिक उद्घाटन किया। बाद में यह संस्थान साहा परमाणु भौतिकी संस्थान के नाम से जाना गया। उनकी दूरदर्शिता ने इसे अनुप्रयुक्त परमाणु भौतिकी, जैवभौतिकी, क्रिस्टलोग्राफी और कई अन्य वैज्ञानिक विषयों के अनुसंधान केंद्र के रूप में परिवर्तित कर दिया।
कलकत्ता विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त होने के बाद, साहा ने १९५२ में कलकत्ता उत्तर-पश्चिम निर्वाचन क्षेत्र से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में संसद का चुनाव जीता। उनके चुनाव प्रचार के लिए धन इतना सीमित था कि उन्होंने अपनी पाठ्यपुस्तक के प्रकाशक से रु. ५००० अग्रिम मांगे। संसद में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने शैक्षिक सुधार, वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए धन मुहैया कराने और तर्कसंगत औद्योगिक नियोजन का पुरजोर समर्थन किया।
साहा का मानना था कि बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण से बेरोज़गारी कम होगी और राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता हासिल होगी। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस को १९३८ में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में राष्ट्रीय योजना समिति की स्थापना के लिए राजी किया। साहा का दृढ़ विश्वास था कि विश्वविद्यालयों को `ज्ञान के स्रोत' के रूप में कार्य करना चाहिए जहाँ मौलिक अनुसंधान फल-फूल सके।
साहा ने वैज्ञानिक सिद्धांतों को वास्तविक राष्ट्रीय चुनौतियों पर उल्लेखनीय रूप से लागू किया। नदी घाटी परियोजनाओं पर उनका काम सीधे तौर पर उनके बचपन के बाढ़ के अनुभवों से उपजा था। कैलेंडर सुधार में उनके नेतृत्व ने भारत के एकीकृत राष्ट्रीय कैलेंडर को जन्म दिया। इन विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से, वे योग्यता-आधारित अवसरों और वैज्ञानिक उत्कृष्टता के प्रति अपनी अडिग प्रतिबद्धता को बनाए रखने में सफल रहे, चाहे सामाजिक बाधाएँ कितनी भी हों।सीवी रमन भले ही ज़्यादा जाने जाते हों, लेकिन साहा की वैज्ञानिक उपलब्धियों और संस्थानों में उनके योगदान ने भारतीय विज्ञान पर एक अमिट छाप छोड़ी है। एक निम्न जाति के दुकानदार के बेटे से विश्व-प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी बनने तक की उनकी जीवनगाथा आज भी वैज्ञानिकों और नागरिकों, दोनों को प्रेरित करती है। मेघनाद साहा ने वैज्ञानिक प्रतिभा और राष्ट्रवादी दूरदर्शिता का अद्भुत संगम किया। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि दृढ़ बुद्धि समाज की सभी सीमाओं को पार कर सकती है।
एक गांव के दुकानदार के बेटे से विश्व प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी बनने तक मेघनाद साहा की उल्लेखनीय यात्रा, वैज्ञानिक उत्कृष्टता और अटूट दृढ़ संकल्प के माध्यम से विपरीत परिस्थितियों पर काबू पाने के बारे में शक्तिशाली सबक प्रदान करती है। १६ फरवरी, १९५६ को इस महान भारतीय वैज्ञानिक का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया और वे विज्ञान के क्षेत्र में अपना अविस्मरणीय और महान योगदान छोड़ गए।
डॉ. रवीन्द्र दीक्षित
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