एक जन्मदिन ऐसा
यह भावनात्मक कहानी कबीर, उसकी दादी के प्रति प्रेम, और एक वृद्धाश्रम से एक माँ को घर लाने की संवेदनशील यात्रा को दर्शाती है। देवांश की मासूम इच्छा परिवार को एक नया रिश्ता देती है और यह संदेश देती है कि सच्चा प्रेम और अपनापन किसी भी रिश्ते को जन्म दे सकता है।
४ अप्रैल, आज कबीर का जन्मदिन है। कबीर आज ३८ साल का हो गया है। उसकी जीवन संगिनी शिखा सुंदर सुघड महिला है। उनका ८ वर्ष का बेटा देवांश सचमुच ही धरती पर देवता का अंश ही है।`सावन टेबल पर से ड्राई प्रâूट्स के पैकेट,मिठाई और फलों की टोकरी गाड़ी में रखो।' कबीर ड्राइवर से कार में सामान रखवा रहा था।
शिखा गिफ्ट पैकेट उठाये देवांश के साथ कार में आ गई थी।
पिछले छः सालों से कबीर अपना जन्मदिन वृद्धाश्रम में ही मनाता आ रहा है।
ऐसा करने की वजह थी, कबीर का अपनी दादी से अथाह प्रेम।
कबीर के पिताजी आर्मी में ऑफिसर थे। उसकी माँ भी आर्मी में डॉक्टर थीं। दोनों की पोस्टिंग श्रीनगर में थी। वहां की परिस्थितियों के कारण १४ साल की उम्र में कबीर को दादा दादी के पास दिल्ली भेज दिया गया। मम्मी पापा से साल में दो बार ही मिलना होता था। एक दीपावली पे,जब वे दिल्ली आते और दूसरा गर्मियों की छुट्टियों में जब कबीर दादा दादी के साथ श्रीनगर जाता।
जो हमेशा साथ रहती थीं वो थी- दादी माँ
खुशियों की बौछारें हों या दर्द में आँसुओं की बारिश भीगता था - दादी का आँचल।
पापा चाहते थे कि कबीर भी आर्मी ऑफिसर बने पर कबीर ने अपने लिए सिविल सर्विसेज़ को चुना।
कार वृद्धाश्रम की ओर बढ़ रही थी,कबीर अतीत के समंदर में गोते लगा रहा था। सरदार वल्लभ भाई पटेल, पुलिस अकादमी,हैदराबाद की मेस में वो नाश्ता कर रहा था। उसकी ट्रेनिंग पूरी होने में २ महीने ही बचे थे। रेडियो पे समाचार शुरू हुए।
समाचार वाचक ने कहा- `आज के मुख्य समाचार-
‘श्रीनगर के बादामीबाग अस्पताल पर आतंकी हमला.......`इसके आगे कबीर और कुछ ना सुन सका।
इससे पहले की वो पापा को फोन करता,उसका मोबाइल बज उठा।
`कबीरे...`दादी बस इतना ही बोली।
`दादी माँ,मम्मी पापा ठीक हैं ना...`अनहोनी का अहसास होने पर भी कबीर ने प्रश्न किया।
`सब खत्म हो गया बेटा...तेरे पापा भी उस वक़्त अस्पताल में ही थे।' दादी रोये जा रही थी।
`मैं आ रहा हूँ दादी माँ .....मैं आ रहा हूँ.....आप ख़ुद को सम्भालो। आपको दादा जी को भी सम्भालना है।' कबीर मुश्किल से बोला।
`मैं यहीं हूँ कबीर' फोन पर शिखा की आवाज़ थी। वो ख़बर सुनकर पहुंच गई थी।
शिखा कबीर की बचपन की दोस्त थी। शिखा के पापा और कबीर के पापा परममित्र थे।
मम्मी पापा को बंदूकों की सलामी के साथ तिरंगे में अंतिम विदाई दे दी गई।
दादा-दादी को शिखा के भरोसे छोड़ कबीर को ट्रेनिंग पूरी करने हैदराबाद जाना पड़ा।
ट्रेनिंग के आख़री दो महीने के कठिन समय मे शिखा ने बहुत सम्भाला।
ट्रेनिंग समाप्त होते ही दादा-दादी ने कबीर और शिखा को विवाह के बंधन में बांध दिया। दादा जी
बेटे-बहु का सदमा नहीं बर्दाश्त कर सके और ६ महीने में ही चले गए।
कबीर को कानपुर पोस्टिंग मिली। वो दादी को भी साथ ले आया। एक सख़्त अफसर जब दादी माँ की गोद में सर रखकर लेट जाता तो किसी मासूम बच्चे सा लगता। दादी माँ उसे उसके पापा के बचपन के , उसके बचपन के किस्से सुनाती। अब यही यादें उसको सुकून देती थी।
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और फिर देवांश आ गया। घर एक बार फिर खुशियों से भर गया।
दादी को तो जैसे खिलौना मिल गया था। उसकी मालिश करना, नहलाना, तैयार करना सब दादी माँ ही करती। शिखा को लोरियां भी दादी माँ ने ही सिखाई। देवांश ने चलना शुरू कर दिया था। दादी माँ उसके साथ खेलती।
एक दिन जब कबीर अपने ऑफिस में काम कर रहा था, तभी मोबाइल बजा।
`इस समय शिखा का कॉल' वो मन ही मन बोला।
`कबीर.....दादी माँ गिर गई हैं। उनके सर पर बहुत चोट आई है। मैं उन्हें रॉयल अस्पताल ले जा रही हूँ। तुम भी वहीं पहुँचो।' शिखा बहुत घबराई हुई थी।
कबीर के तो जैसे होश ही गुम हो गए।
`आ रहा हूँ।' वो लगभग भागते हुए बाहर निकला।
अस्पताल पहुंचा तो शिखा रोये जा रही थी देवांश भी गोद में बैठा रो रहा था।
`क्या हुआ शिखा' घबराहट उसके लहजे में झलक रही थी।
`दादी माँ, देवांश के साथ खेलते बाहर निकलीं और सीढ़ियों से गिर पड़ी। सर में चोट आई है। खून ही नही रुक रहा था।' शिखा ने सिसकते हुए बताया।
बहुत प्रयासों के बाद भी दादी माँ को बचाया ना जा सका।कबीर के होंठों की हंसी तो जैसे खो ही गई। १ अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस के उपलक्ष्य में वृद्धाश्रम में एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ। कबीर को पहली बार वृद्धाश्रम जाने का अवसर मिला। उसे वहां हर वृद्धा में अपनी दादी माँ नज़र आई और तभी से शुरू हुआ वृद्धाश्रम में जन्मदिन मनाने का सिलसिला। जन्मदिन के अलावा हर त्यौहार पर कबीर परिवार के साथ वहां ज़रूर जाता।
अचानक से कार का ब्रेक लगा तो कबीर अतीत से वापस आया। गाड़ी स्वराज वृद्धाश्रम के गेट पर रुक गई थी।
`दादी - दादा ......मैं आ गया।'
`दादी माँ े ,मैं आ गया' देवांश आवाज़ लगाता ऐसे अंदर दौड़ा जैसे अपने ददिहाल पहुँच गया हो।
देवांश सभी को दादा- दादी कहता था पर कला को वो दादी माँ बुलाता था। वो उसे सबसे प्रिय थी। देवांश को गले लगा कला को भी असीम सुख की अनुभूति होती थी। उसके होंठों के साथ उसकी ममतामयी आंखें भी मुस्कुराती प्रतीत होती।
पूरा दिन वहीं व्यतीत कर देर रात वे लोग घर पहुंचे।
२९ अगस्त को देवांश का जन्मदिन था।
शिखा और कबीर ने देवांश से पूछा- ' बताअो,तुम्हे अपने जन्मदिन के उपहार में क्या चाहिए।'
`जो मैं माँगूंगा आप लोग मुझे दोगे।' देवांश ने गहरी नज़रों से देखते हुए पूछा।
`जो तुमने मांगा वो ना मिला हो,कभी ऐसा हुआ है क्या!!!!' कबीर ने हंस कर प्रश्न किया।
`वो तो सही है पापा । पर फिर भी वादा करो जो मैं माँगूंगा आप लोग मुझे दोगे।' देवांश ख़ासा गंभीर था।
`वादा' शिखा और कबीर दोनों ही एक साथ बोल पड़े क्योंकि वो दोनों जानते थे कि देवांश नाजायज़ ज़िद कभी भी नही करता।
`तो फिर मुझे उपहार में दादी माँ चाहिए है। कला दादी माँ।' वो खुश हो कर बोला।
शिखा और कबीर एक दूसरे को देखते रह गए। दोनों की आंखें भर आईं।
ये केवल देवांश का उपहार नही उनका भी उपहार था।
कबीर ने शिखा से कहा - `चलो ,हमें अभी चलना है।'
उसे ऐसा अनुभव हो रहा था,मानो अपनी दादी माँ को लेने जा रहा हो।
वृद्धाश्रम पहुँच कर उसने सबसे पहले कला माँ के परिवार की जानकारी ली तो पता चला उनका कोई नही है एक दूर का रिश्तेदार उन्हें यहां छोड़ गया था।
फिर कला माँ से बात की।
`आप तैयारी कीजिये।मैं कल देवांश के जन्मदिन पर आपको हमेशा के लिए अपने साथ ले जाऊंगा।' कला को अपने कानों पर विश्वास ही नही हुआ। देवांश के जन्मदिन की पार्टी से पहले कबीर और शिखा कला माँ को लेकर घर पहुँच गए।
एक बार फिर घर में प्यार करने वाली, आशीर्वाद देने वाली माँ, दादी माँ आ गईं।
आज कला का भी नए रूप में जन्मदिन था।
सीमा सरदेशमुख बंगलोवाला
इंदौर, मध्यप्रदेश
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