गांधी और राम- भारत की आत्मा के दो स्वर
यह लेख भारत की आत्मा में बसे उस गहरे द्वंद्व को प्रस्तुत करता है, जहाँ एक ओर महात्मा गांधी की अहिंसा और सत्य का मार्ग है, तो दूसरी ओर राम का धर्म और न्याय के लिए संघर्ष। लेख 1946 के ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ और कोलकाता दंगों के ऐतिहासिक संदर्भ में गांधीजी की शांति स्थापना के प्रयासों को उजागर करता है। यह दर्शाता है कि भारत की संस्कृति विरोधाभास नहीं, बल्कि संतुलन की अद्भुत मिसाल है—जहाँ प्रेम और पराक्रम दोनों साथ चलते हैं।
जहाँ एक ओर चरखा करुणा की बयार बहाता है, वहीं धनुष न्याय की लौ जलाता है।
दो अक्टूबर-अहिंसा के पुजारी, हमारे बापू का जन्मदिन। हम उन्हें पूजते हैं, याद करते हैं, उनके सिद्धांतों की बात करते हैं। पर यही तो ज़िंदगी का विरोधाभास है इसी महीने हम शस्त्रधारी राम से रावण का पुतला भी जलाते हैं। एक ओर बापू की अहिंसा का संदेश,दूसरी ओर अधर्म पर धर्म की विजय का उत्सव। जिस देश में हम रहते हैं, उसे भारत कहते हैं, और उस भारत के राष्ट्रपिता बापू हैं -जो सदा अहिंसा के पुजारी रहे।
भारत एक ऐसा देश है जहाँ विचारों, भावनाओं और प्रतीकों का संगम होता है। यहाँ यदि कोई जादू चलता है, तो या तो बापू का जादू चलता है, या फिर राम का।
एक ओर हैं अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी, जिन्होंने सत्य और प्रेम से दुनिया को जीतने का सपना देखा;
और दूसरी ओर हैं शस्त्रधारी राम, जिन्होंने अधर्म के विरुद्ध धर्म की स्थापना के लिए युद्ध का मार्ग चुना।
इन्हीं दो ध्रुवों के बीच भारत का जनमानस हमेशा कसक में रहता है-कि वह जाए किस ओर?
अहिंसा की शांति भरी राह पर, या फिर न्याय के लिए शस्त्र उठाने वाले मार्ग पर? दरअसल, यही द्वंद्व इस देश की आत्मा है। बापू हमें सिखाते हैं कि हिंसा से कभी स्थायी समाधान नहीं निकलता। वहीं राम यह बताते हैं कि अन्याय और अधर्म के सामने मौन रहना भी पाप है।
एक हाथ में बापू का चरखा है, तो दूसरे में राम का धनुष।
एक से करुणा की बयार बहती है, तो दूसरे से न्याय की लौ जलती है। भारत का जादू इसी संतुलन में बसता है -
जहाँ प्रेम और पराक्रम, दोनों की अपनी जगह है।
जहाँ बापू और राम, दोनों भारत की आत्मा के दो पहलू हैं, शायद इसी कारण यह देश अद्भुत है -
क्योंकि यहाँ अहिंसा भी पूजा जाती है, और धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र भी उठाए जाते हैं।
ऐसा नहीं है कि स्वयं बापू भी किसी का विरोध करते थे। वे विरोध नहीं, विचारों का संतुलन खोजते थे। महात्मा गांधी ने अपने जीवन में कभी किसी व्यक्ति से द्वेष नहीं किया; उन्होंने केवल असत्य, हिंसा और अन्याय का विरोध किया। शायद इसी कारण जब उन्हें गोली लगी, तब उनके अंतिम शब्द थे — `हे राम'।
इन दो शब्दों में समा गया था उनका पूरा जीवनदर्शन।
`हे राम' केवल ईश्वर-उद्बोधन नहीं था, वह अहिंसा और आस्था का प्रतीक था। बापू के लिए राम वह थे जो सबके भीतर हैं - न किसी धर्म, जाति या संप्रदाय से बंधे हुए, बल्कि मनुष्य के अंतर में बसने वाले सत्य और करुणा के प्रतीक।
परंतु विडंबना यह है कि जिस देश में बापू और राम दोनों का नाम श्रद्धा से लिया जाता है, वहीं बार-बार धर्म के आधार पर दंगे होते हैं। यह विरोधाभास हमें झकझोरता है।
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बापू ने कहा था - ‘धर्म यदि मनुष्य को जोड़ नहीं सकता, तो वह धर्म नहीं, अधर्म है।’
और राम ने अपने जीवन से यह सिखाया कि धर्म का अर्थ है मर्यादा, न्याय और करुणा, न कि हिंसा या द्वेष।
आज जब समाज धर्म के नाम पर बंटता है, तब लगता है जैसे हम बापू और राम दोनों की सीख से दूर होते जा रहे हैं। गांधीजी ने जिस रामराज्य की कल्पना की थी, वह राजनीतिक नहीं था, बल्कि नैतिक और सामाजिक न्याय पर आधारित था-जहाँ हर व्यक्ति सुरक्षित, समान और स्वतंत्र हो।
बापू और राम दोनों ही हमें एक ही दिशा दिखाते हैं —
‘सत्य की राह कठिन है, पर वहीं से होकर ही मनुष्य ईश्वर तक पहुँचता है।’
शायद आज आवश्यकता है कि हम फिर से उस ‘हे राम’ का अर्थ समझें,
जो बापू के होंठों से आख़िरी बार निकला था-
एक पुकार नहीं, बल्कि मानवता के जागरण का संदेश
मैं स्वयं एक हिंदू और ब्राह्मण परिवार से हूं। इस लेख को लिखते समय मैंने अपने आप को यथासंभव तटस्थ रखने का प्रयास किया है। मेरे उद्देश्य में न तो किसी धर्म की आलोचना है, न किसी आस्था का अपमान।
जो कुछ भी मैं इस लेख में प्रस्तुत कर रहा हूं, वह केवल संग्रहित तथ्यों और इतिहास के अध्ययन पर आधारित है। मेरा उद्देश्य केवल यह समझने का है कि धर्म और मानवता, दोनों के बीच संतुलन कैसे बना रहे।
आज जब विचारधाराएँ एक-दूसरे के विरोध में खड़ी होती जा रही हैं, तब आवश्यकता है कि हम सत्य को पक्षपात से परे रखकर देखें। यही इस लेख की मूल भावना है- न किसी धर्म के विरुद्ध, न किसी व्यक्ति के; बल्कि सत्य, तर्क और करुणा के पक्ष में।
साल १९४६- स्वतंत्रता की आहट से गूंजता भारत, परंतु साथ ही विभाजन की छाया भी गहराती जा रही थी।
१६ अगस्त को मुस्लिम लीग ने अपने नेता मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में `डायरेक्ट एक्शन डे' का आह्वान किया। उद्देश्य था- पाकिस्तान की मांग को लेकर अपनी ताकत और एकजुटता का प्रदर्शन करना।
उस दिन कलकत्ता (तत्कालीन बंगाल की राजधानी) की
हवा में एक विचित्र नारा गूंज रहा था -
`हाथ में लोटा, मुंह में पान, लड़के लेंगे पाकिस्तान!'
इस नारे में छिपा था धार्मिक उन्माद, जो जल्द ही भयावह रूप ले बैठा।
डायरेक्ट एक्शन डे ने देश को दंगे की आग में झोंक दिया। कलकत्ता की गलियों में इंसानियत कराह उठी - हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के लोग मारे गए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मृतकों की संख्या लगभग ४००० बताई गई, पर वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक मानी जाती है।
उस समय बंगाल के प्रधानमंत्री हुसैन शाहिद सुहरावर्दी थे, जिन्हें ‘कलकत्ता किलर’ कहकर भी आलोचना का सामना करना प्ाड़ा। यह प्रश्न आज भी इतिहास में अनुत्तरित है-
आखिर क्यों समय पर सेना नहीं बुलाई गई?
क्या यह प्रशासनिक लापरवाही थी या राजनीतिक रणनीति?
डायरेक्ट एक्शन डे केवल एक दिन का विरोध नहीं था - यह वह चिंगारी थी जिसने विभाजन की आग को प्रज्वलित किया। इसके बाद जो हुआ, उसने भारत के इतिहास को सदा के लिए बदल दिया।
नारायण बंद्योपाध्याय की बंगाली पुस्तक `बिप्लबेर संधान' (बिप्लव की तलाश में) में उन्होंने उल्लेख किया है कि १६ अगस्त को कोलकाता में हड़ताल के अवसर पर दंगे की संभावना सोलह आने पक्की थी।
दोनों ही पक्ष दंगे में भाग लेने के लिए तैयार थे।
लेकिन ब्रिटिश स्वामित्व वाले समाचारपत्रों में १९४६ की इस घटना को `ग्रेट कैलकट्टा' के नाम से वर्णित किया गया है।
इन अखबारों के अनुसार, दंगे केवल कोलकाता में ही नहीं, बल्कि पटना, इलाहाबाद और यहाँ तक कि रांची में भी हुए थे।
किन्तु उस समय जिस व्यक्ति ने शहर में शांति और सौहार्द का वातावरण वापस लाया, वे थे महात्मा गांधी।
गांधीजी की इस भूमिका को अमृत बाजार पत्रिका सहित कई अंग्रेज़ी अखबारों ने
`द ग्रेट कैलकट्टा मिरेकल' (ऊप उर्rीू ण्aत्म्ल्ूूa श्ग्raम्त) के नाम से संबोधित किया था।
१६ अगस्त १९४६ का वह भीषण दिन बीत चुका था। कुछ ही महीनों बाद शहर फिर से दुर्गा पूजा की तैयारियों में जुटने वाला था, लेकिन अब भी वातावरण में भय और अनिश्चितता व्याप्त थी। लोग सहमे हुए थे, हर गली-मोहल्ले में पिछले दंगों की स्मृतियाँ ताज़ा थीं।
दक्षिण कोलकाता के समाज सेवी और संघ जैसे इलाकों के निवासियों ने एकजुट होकर शांति और साम्प्रदायिक सौहार्द बनाए रखने का आह्वान किया। उन्होंने लोगों से भाईचारे और सद्भाव का संदेश फैलाने की अपील की। फिर भी, दिलों में एक अदृश्य डर अब तक घर किए बैठा था-मानो शांति केवल दिखावे की हो और भीतर कहीं फिर अशांति के भड़क उठने का भय दबा हो।
शहर कोलकाता का गांधीजी से परिचय बहुत पुराना है। साल १९३९, २८ अप्रैल को वे यहाँ एक महत्वपूर्ण बैठक में शामिल हुए थे, जिसमें सुभाष चंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू भी उपस्थित थे।
फिर १७ दिसंबर १९४५ को गांधीजी ने एल्गिन रोड स्थित नेताजी सुभाषचंद्र बोस के घर जाकर उनसे मुलाकात की थी।
दो साल बाद, १९४७ के मार्च महीने में, जब गांधीजी नवाखाली से पटना की ओर जा रहे थे, तब उन्होंने कोलकाता में विश्राम किया। कुछ ही महीनों बाद, वे पुनः कोलकाता लौटे- इस बार उनका गंतव्य सोदपुर था।
लेकिन उसी वर्ष अगस्त १९४७, जब पूरा देश आज़ादी की दहलीज़ पर था, कोलकाता एक बार फिर सांप्रदायिक दंगों की चपेट में आ गया। हालात गंभीर थे। गांधीजी ने तत्कालीन गवर्नर से मुलाकात की और उनसे शांति बनाए रखने की अपील की।
उसी रात गांधीजी से सोहरावर्दी की मुलाकात हुई, और देर रात तक दोनों के बीच लंबी बातचीत चली। निश्चय हुआ कि वे मिलकर दंगा-प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करेंगे और किसी भी तरह दंगे को रोकेंगे।
१३ अगस्त की शाम, गांधीजी बेलेघाटा के हैदरी मंज़िल में ठहरे।
लेकिन उस शाम कुछ युवकों ने गांधीजी का विरोध किया-‘गो बैक गांधी’ के नारे लगे।
इनमें अधिकांश हिंदू युवक थे। उनका कहना था कि १९४६ के दंगों में जब हिंदुओं पर अत्याचार हो रहा था, तब गांधीजी चुप थे, अब वे क्यों आए हैं?
गांधीजी ने शांत स्वर में उत्तर दिया —
‘पिछले साल की बातों को भूल जाना ही समय की ज़रूरत है।
आप पुरानी घटनाओं को याद कर समय को विष बना रहे हैं।
आप जितना भी विरोध करें, मैं यह शहर नहीं छोड़ूंगा।
मैं भी एक हिंदू हूं।’
उनके ये शब्द सुनकर विरोधी युवकों के चेहरे शांत हो गए।
वह क्षण था जब हिंसा के बीच भी एक महात्मा की शांति की ज्वाला जल उठी -
जो कोलकाता को फिर से प्रेम और सद्भाव की ओर मोड़ने का प्रयास कर रही थी।
१४ अगस्त को भारत के पहले स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर गांधीजी ने पूरे दिन उपवास किया और प्रार्थना सभा में जाकर कहा-
‘मैं दिल्ली नहीं जा रहा हूँ, मेरा स्थान यहाँ है।
तुम लोगों के बीच, इन कष्ट भोगी मनुष्यों के बीच ही रहूँगा।
यदि कलकत्ता शांत रह सका, तो यह एक अलौकिक घटना होगी —
और यह पूरे भारत के लिए एक शिक्षा बन जाएगी।’
अगले दिन देश आज़ाद था।
गांधीजी सोहरावर्दी की गाड़ी पर चढ़कर कोलकाता की गलियों में घूम रहे थे।
शहर की हवा में ‘हिंदू–मुस्लिम भाई–भाई’ के नारे गूंज रहे थे, और लोगों के मुख से ‘महात्मा गांधी की जय’ के जयकारे उठ रहे थे।
गांधीजी के सहयोगी प्यारेलाल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘महात्मा गांधी -द लास्ट फेज़’ में लिखा है कि देश के विभाजन के कारण बापू भीतर से बहुत टूट चुके थे।
जब बीबीसी के प्रतिनिधि ने उनसे साक्षात्कार लिया, तो वे लंबे समय तक मौन रहे।
उस समय उन्होंने निर्मल बसु से कहा था-
‘उन्हें भूल जाने दो कि मैं अंग्रेज़ी जानता हूँ।’
और ऑल इंडिया रेडियो को उन्होंने कहा था-
‘घ् प्aन rल्ह ्rब्’ - अर्थात् ‘अब मुझमें कुछ शेष नहीं रहा।’
स्वाधीनता प्राप्ति के बाद गांधीजी ने अपना पहला सार्वजनिक भाषण बेलघाटा के रासबागान मैदान में दिया था।
१५ अगस्त १९४७ तक कोलकाता में दंगे थम चुके थे।
गांधीजी के प्रयासों को देखकर दुनिया ने इसे नाम दिया —
‘ऊप उर्rीू ण्aत्म्ल्ूूa श्ग्raम्त’ —
और अंग्रेज़ प्रेस ने उन्हें कहा —
‘ऊप श्ग्raम्त श्aह.’
लॉर्ड माउंटबेटन ने उन्हें उपाधि दी थी —
‘ध्हा श्aह ँदल्ह्arब् इदrम.’
यह बात केवल इतिहास की नहीं है- आज भी गांधीजी के आदर्शों को कुछ लोग पूजते हैं और कुछ अस्वीकार करते हैं।
उसी समय कोलकाता पर फिर से काले बादल छा गए थे।
बापू ने पुनः अनशन आरंभ किया और घोषणा की-
‘जब तक लोग अपने अस्त्र नहीं त्यागते, मैं एक बूँद भी पानी नहीं पीऊँगा।’
यह स्थिति शहर में एक नई दुविधा उत्पन्न करती है -
क्या गांधीजी के पास जाकर आत्मसमर्पण किया जाए या नहीं?
बेलघाटा के युगल घोष और बऊबाजार के गोपाल मुखोपाध्याय- ये दो नाम उस समय अत्यंत चर्चित थे।
सन १९९७ में बीबीसी रेडियो ने इन दोनों का साक्षात्कार प्रसारित किया। युगल चंद्र घोष ने बताया कि दंगों के समय किसी की हत्या करने पर १०रु और किसी को गंभीर रूप से घायल करने पर ५रु मिलते थे।
दोनों पक्षों से लाशें गिरती थीं, और सबसे दर्दनाक बात यह थी कि उन लाशों को हटाने के लिए ब्रिटिश सेना ने एक स्वेच्छा संगठन
को नियुक्त किया था-
जिसे प्रति लाश हटाने पर ५रु दिया जाता था।
उसी समय अस्त्र समर्पण पर भी दो मत थे —
कुछ लोग तैयार थे, कुछ ने विरोध किया।
पर गांधीजी ने स्पष्ट कहा था —
‘यदि हम एक आँख के बदले दूसरी आँख निकालेंगे, तो पूरा संसार अंधा हो जाएगा।’
आज भी हम उसी द्वंद्व के बीच जी रहे हैं —
महीने की शुरुआत में हम अहिंसा के पुजारी गांधीजी का जन्मदिन मनाते हैं,
और उसी महीने के अंत में शस्त्रधारी राम द्वारा दशहरा के अवसर पर रावण-वध का उत्सव भी मनाते हैं।
यह विरोधाभास नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की विशेषता है —
जहाँ गांधी भी हैं, और राम भी।
एक हमें क्षमा और करुणा सिखाता है,
दूसरा धर्म और न्याय की रक्षा का संदेश देता है।
यही भारत की आत्मा है -
जहाँ प्रेम और पराक्रम, दोनों साथ चलते हैं।
गांधीजी ने जो दिखाया, वह केवल राजनीति नहीं थी -
वह मानवता का पुनर्जागरण था।
उन्होंने हमें सिखाया -
‘हथियारों से जीती गई लड़ाइयाँ सिर्फ सीमाएँ बदलती हैं,
पर प्रेम से जीती गई लड़ाइयाँ - इंसान का हृदय बदल देती हैं।’
पंकज कुमार झा
सिलीगुड़ी
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