ख़बर होने तक

यह गहन चिंतनशील रचना आधुनिक समाज की संवेदनहीनता, टूटते मानवीय मूल्यों और जीवन की कड़वी सच्चाइयों को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत करती है। लेखक ने ‘अपाहिज’ शब्द को केवल शारीरिक विकलांगता तक सीमित न रखकर मानसिक, सामाजिक और नैतिक पतन का रूपक बनाया है। गांवों से शहरों की ओर पलायन, मानवीय संवेदनाओं का क्षय, और व्यवस्था की खोखली सहानुभूति इस लेख की केंद्रीय भावभूमि है। यह रचना पाठक को आत्ममंथन करने के लिए विवश करती है।

May 20, 2026 - 13:49
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मैंने जब कभी हक़ीक़त का सामना करना चाहा है तो ख़ुद को अपाहिज महसूस किया है। इंसान कितना बे बस है, वक़्त के हाथों का खिलौना। इस पर यह तेवर कि मैं इंक़लाब ला सकता हूं। ज़िंदगी तेज़ ऱफ्तार से चलती रहती हैं, और इंसान ख़्वाब और हक़ीक़त के दो राहे से गुजरता रहता है। कभी लगता है कि हर ख़्वाब एक हक़ीक़त है, और कभी कभी लगता है कि हर हक़ीक़त एक ख़्वाब है। यह गुत्थी भी अजीब है ।
क्या कहें हम ज़िंदगी को?
ज़िंदगी को फ़ुर्सत नहीं अपने कारोबार से। कभी ज़िंदगी आगे तो हम पीछे, कभी हम आगे तो ज़िंदगी का सुकून बहुत पीछे।
भीड़ चली जा रही है , तेज़ धूप में बारिश में, मंज़िल का पता नहीं , हम भीड़ को रोक क्यों नहीं देते?
जिसके पास दिशा होती है उनकी दशा दयनीय हुआ करती हैं ।
मैं, हम, हम सब  ।
हम, हम नहीं रहे ।
ज़िंदगी की कड़वी सच्चाई को पानी की तरह पी रहे हैं और जी रहे हैं एक अपाहिज की तरह। शहर ने देहातों में बसने वाली आबादी की खुशियां छीन लीं। उनके हिस्से की रौशनी छीन ली। देहातों में अब क्या रह गया है?
हमारे क़दम अब गांव की तरफ़ नहीं जाते । दादा की हवेली अब सुनसान होती जा रही है और पीपल का पेड़, गांव की पगडंडियां??
लोगों का हुजूम, गांव से शहर की तरफ़ भागा जा रहा है सुकून की तलाश में मगर शहर ने क्या उन्हें सुकून दिया ?
महा नगरों में फुटपाथ पर टाट में लिपटी हुईं ज़िंदा लाशें, कूड़े के ढेर पर अपना भविष्य तलाश करते मासूम बच्चे , और भी बहुत कुछ ??
हम सब ज़िंदा लाशें हैं । जिसके हाथ में क़लम है, वह भी। क्योंकि उनकी क़लम से आज़ाद होने वाले शब्द अपना अर्थ खो चुके हैं। हमारा ज़मीर मुर्दा हो चुका है।
अभी मैं यह सब सोच ही रहा था कि सामने से कई तस्वीरें गुजरने लगीं।
एक इंसान के दो हाथ गायब थे।
एक इंसान कोढ़ी था, बिल्कुल गला  हुआ। चलने फिरने से मजबूर।
एक इंसान की टांगें नहीं थीं और वह किसी ट्राली चलाने वाले के द्वारा ले जाया जा रहा था।
एक का चेहरा जला हुआ था, और एक की आंखें नहीं थी ।
अपाहिजों की यह टोली एक दिशा में चली जा रही थी , और मेरी आँखें इन सब को घूर रही थीं। दिमाग़ यह सोच रहा था कि यह सब सपनों का स्वप्न फल है। सपना झूठा, स्वप्न फल वास्तविक ।
क़ुदरत कहानी गढ़ रही थी, फ़ितरत कहानी सुन रही थी, और इंसान इसकी कहानी में अलग अलग भूमिका निभा रहा था, कभी बीमार और कभी मसीहा। ख़ुद ही दर्द है, और ख़ुद ही दर्द का ईलाज भी ख़ौफ़ और सन्नाटे की फ़िज़ा छाई जा रही थी। अंधेरा बढ़ता जा रहा था। मगर अधूरे इंसान की कोशिशें अपनी जगह क़ायम थीं। पंडाल के एक कोने में बोर्ड पर लिखा था ‘अपाहिजों का वर्ष '।
बादशाह अपाहिजों की समस्याओं का हल निकालना चाहता था तो दूसरी तरफ़ रौशनी जगमगा रहीं थी। पूरी पंडाल रौशन था तभी कई आवाज़ें कानों में सुनाई देने लगीं-
मुझे हाथ दो 
मेरा कोढ़ दूर करो 
मुझे टांगें चाहिए 
मेरा चेहरा मुझे वापस लौटा दो-
मुझ को आँखें दो जिस से मैं दुनिया को देख सकूं ।
चीख, कराह, दर्द ।
आवाज़ें तेज़ होती जा रही थीं, पूरा पंडाल गूंज रहा था और मैं महसूस कर रहा था कि मैं अपंग हो चुका हूं । मेरे दिमाग़ और ज़हन में कोई हाल बाक़ी  नहीं रह गया था । तभी माइक पर आ कर मैं ने एलान किया- हमारे बादशाह ने अपाहिजों के लिए कंबल का इंतज़ाम किया है ।
अभी मेरा ऐलान मुकम्मल भी नहीं हो पाया था कि भीड़ से एक व्यक्ति उठा और चीख चीख कर गाने और नाचने लगा । वह व्यक्ति पागल था और उसे दिमाग़ की ज़रूरत थी। मगर मेरे पास दिमाग़ कहां था । मैं उसे वह दिमाग़ कहां से ला कर देता। जिस दिमाग़ से वह सर्दी और गर्मी को महसूस कर पाता। इसके लिए कंबल अर्थहीन थे । इस वक़्त मुझे महसूस हो रहा था कि इंसान, इंसान कहां रह गया है। वह तो अपाहिज हो चुका है । उसके हाथ टूट चुके हैं । उसकी टांगें टूट चुकी हैं। वह अपनी आंखों की रौशनी गंवा बैठा है , और उसका दिमाग़ लकवे का शिकार हो चुका है ।
खुर्शीद हयात

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