आधुनिक समाज, संस्कार और नारी विमर्श : एक चिंतन
यह लेख आधुनिक समाज में नैतिक मूल्यों, संस्कारों, पारिवारिक व्यवस्था और नारी विमर्श को लेकर लेखक के चिंतन को व्यक्त करता है। इसमें सामाजिक बदलाव, आधुनिकता, नारी स्वतंत्रता, पारिवारिक संस्कार, धर्म, नैतिकता और युवा पीढ़ी के व्यवहार पर प्रश्न उठाए गए हैं। लेख में धार्मिक ग्रंथों के संदर्भों के माध्यम से वर्तमान सामाजिक स्थितियों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
मैं जब भी सोसल मीडिया को शुरू करता हूं तब नारियों द्वारा किया जा रहा अत्याचार और समाज में फैलाया जा रहा आतंक, इस प्रकार की खबर प्राथमिक दृष्टि से सोसल मीडिया में छाई रहती है! इस तरह की खबरों को पढ़ कर मन विचलित हो उठ जाता है और सोचने पर विवश हो जाता है कि क्या सचमुच में भारतीय नारी इतने बड़े व्यापक पैमाने पर दुर्दांत दस्यु सुंदरी बन चुकी है...?
कई बार मैं एकांत में ध्यानास्थ हो कर यह चिंतन करता हूं कि शतरूपा ने तो उस कन्या को जन्म दिया था जिससे कालांतर में आगे चलकर राम जैसा सुपुत्र एवम सीता जैसी लक्ष्मी पैदा हो कर अपने मानव जीवन की कष्टभरी क्रियाओं द्वारा संपूर्ण विश्व को ज्ञानोपदेश दिया था और ग्रहस्थ जीवन जीने की कला सिखलाई गई..! क्या ये युग परिवर्तन का अभिशाप है कि आज की शिक्षित पढ़ी लिखी लड़कियां संस्कारहीन बन कर वर्णसंकर हो गई है? नववर्ष हो फिर आमदिन नाना प्रकार के नशे में धुत होकर सरे आम राह पर बेसुध होकर सूअर की भांति पड़े रहना, क्या ये अच्छे उत्तम कुल और उच्च घरानों के संस्कारों को शोभा के रूप में दर्शाता है...? भोग एवम कामविलास के कुंडों में डूबी आजकल की लड़कियां और लड़के क्या साबित करना चाह रहे है, समाज को, राष्ट्र को क्या संदेश देना चाह रहे है? नारकीय कुंडों में डूबे हुए तुम निशाचर कर्म करने वाले वर्णसंकर औलादें हो; क्योंकि तुमने अपने खानदानी पिता से जन्म नहीं लिए हो या अगर लिए भी हो तो तब तुम्हारा पिता का जन्म भी वर्णसंकर बीज से पैदा हुआ था अर्थात hybrid offspring.......!!
As the esed so the breed अर्थात :- जैसा बीज वैसी नस्ल; क्योंकि तुम्हारी पैदावार में भी तो लोचा पाया गया है, तुम्हारे पिता का जन्म भी तो hybrid है; अत: उसका प्रभाव तुम्हारे भीतरcarryed forward हो गया है, इसलिए तुम आज इस तरह के आसुरी शक्तियों के संग मिलकर अजीबो गरीब कर्मकांड और हरकतें कर रहे हो.....!!
भले ही तुम मनुष्य देह में हो, शिक्षित हो, परंतु तुम आसुरी अंश हो; क्योंकि तुम्हारी कर्म क्रियाएं दर्शा रही है?
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वर्णसंकर औलादें (hybrid offspring) :--
यदि उच्च वर्ण का पुरुष और निम्न वर्ण की स्त्री से उत्पन्न संतान (जैसे ब्राह्मण पुरुष और क्षत्रिय स्त्री) या फिर निम्न वर्ण का पुरुष और उच्च वर्ण की स्त्री से उत्पन्न संतान (जैसे शूद्र पुरुष और ब्राह्मण स्त्री) इस तरह की पैदावार वर्णसंकर कहलाती है; जो कुल, घराना एवम् खानदान का सर्वनाश किया करती है that whiched stroys.....!!
वर्णसंकर औलादें कुल (वंश) एवम् खानदान के लिए घातक मानी जाती है और पूरे समाज में अराजकता और आतंक फैलाती है! धर्म का ह्रास करती हुई अधर्म की वृद्धि करती रहती है और अन्तत: नर्क कुंड में गिर जाना होता है....!!
हिंदु धर्मशास्त्रों के अनुसार, वर्ण संकर औलादे मांगलिक कार्यों को करने का अपना अधिकार खो देती है, अत: उनके द्वारा किये जाने वाले धार्मिक एवम् मांगलिक कार्य निष्फल हो जाते है! उनके हाथों द्वारा दिया गया पिंडदान या जल पितरों (पूर्वजों) को प्राप्त नहीं होता है और उनका पितर लोक से पतन हो जाता है; जिसके कारण उनको दुःख की प्राप्त होती है और वो रूष्ट होकर अपने परिवारजनों को श्राप दे देते है और जिससे पितृ दोष लग जाता है...!!
गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है कि आसुरी स्वभाव मनुष्य में दंभ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोरता तथा अज्ञान भरा हुआ रहता है....!!
प्रवृत्तिम् च निवृत्तिम् च जना न विदुरासुरा:!
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते!!
अर्थात:- जो आसुरी लोग है उनको यह ज्ञान नहीं है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए! उनमें न तो पवित्रता, न उचित आचरण और न ही सत्य पाया जाता है....!!
आसुरी लोग कहते है कि यह जगत मिथ्या है, इसका कोई आधार नहीं है और इसका नियमन किसी ईश्वर द्वारा नहीं होता है! उनका कहना है कि यह कामेच्छा (काम) से उत्पन्न होता है और काम के अतिरिक्त कोई अन्य कारण नहीं है...!! आज की नारी, नारी सशक्तिकरण की ओट में निशाचारणी बन रही है, क्योंकि आसुरी प्रभाव से वह निर्लज्ज बनकर निकृष्ट कर्म पर उतारू हो गई है! इसलिए तो वह रोज कुकर्त्य - कुकर्म कर रही है! पराए मर्दों के संग शारीरिक संबंध (खासकर शादीपूर्व में), शादी पश्चात अपने पतियों के साथ मिलकर न रहना बल्कि विरुद्ध कदम उठाकर अनैतिक कार्य करना, आशिक की सहायता से पति की बेरहमी से हत्या कर देना, आजादी की ओट में पराए मर्दों की बांहों में झूला झूलना, निशा में शराब पीकर फूहड़ता से झूमना, इस तरह के ये सब कुकर्म एक आसुरी स्वभाव वाली नारी ही कर सकती है...! हकीकत में ऐसी लड़कियों के मां बाप गुनहगार एवम् अपराधी है जिन्होंने उत्तम गुणवत्ता वाले संस्कारों से अपनी औलादों को वंचित रखा! सशक्तिकरण तथा आधुनिकता के नाम पर सीमा से अधिक आजादी एवम् स्वतंत्रता दे देना, बेटी / बेटा क्या कर रहे है उस पर नजर नहीं रखना और रोकटोक का ना करना; आगे चलकर बड़े होकर ये फिर मां बाप के मुंह पर कालिख पोत देते है। और अंतत: खानदान की इज्जत के तीतर उड़ जाते..!!
पवन सुरोलिया "उपासक"
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