राष्ट्रभाषा हिंदी : भारतीय सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्रीयता की पुनर्स्थापना का संकल्प
यह लेख राष्ट्रभाषा हिंदी की आवश्यकता, भारतीय सभ्यता और संस्कृति में उसकी भूमिका तथा राष्ट्रीय एकता में उसकी सहभागिता पर केंद्रित है। इसमें हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता, भारतीय ज्ञान परंपरा, आध्यात्मिक चेतना, राष्ट्रीय दायित्व, सांस्कृतिक विरासत और वैश्विक स्तर पर भारतीयता के प्रसार जैसे विषयों को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। लेख में हिंदी को केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा, राष्ट्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक एकता का माध्यम बताया गया है।
‘राष्ट्र धर्म के निर्वहन में - ‘जय हिंद ...जय हिंदी ... जय भारत ...’ की व्यावहारिक अनुमोदना का शंखनाद-उत्तिष्ठ भारत: मां भारती पुकारती, के आह्वान में-‘सात्विक चेतना के दायित्वबोध द्वारा जिम्मेदारी और जवाबदेही के क्रियान्वयन...’ से सुनिश्चित किया जाना अनिवार्य है जिसमें राष्ट्रभाषा हिंदी के माध्यम से राष्ट्रीयता की पुनर्स्थापना को सुनिश्चित करते हुए- ‘स्वतंत्र मानसिकता में आजादी का मर्यादित जश्न...’ अवश्य ही मनाया जा सकता है।
भारत माता के प्रति जीवंत नैतिक चैतन्यता का व्यापक परिदृश्य सदा ही- ‘राष्ट्र गौरव हिंदी भाषा की प्राण प्रतिष्ठा...’ हेतु तत्पर रहता है जिसमें परंपरागत गुणात्मक विकास में नवीनतम व्यावहारिक प्रयोग विशिष्ट भूमिका निभाते हुए- ‘भारतीय जनमानस में रची-बसी, राष्ट्रभाषा हिंदी को संपूर्ण त्याग, तपस्या एवं बलिदान...’ की दीर्घकालीन प्रक्रिया के पश्चात अंततः आदर एवं सम्मान के ‘पवित्रतम प्रतिष्ठित स्वरूप में अधिकार एवं कर्तव्य के श्रेष्ठतम सामंजस्य...’द्वारा प्राप्त करने की उच्चतम अभिलाषा रखते हैं।
जागृत राजनीतिक इच्छाशक्ति का अदम्य साहस ही- ‘राजपथ पर विराजित राष्ट्रभाषा हिंदी को कर्तव्यपथ के स्वतंत्र स्वरूप...’ में स्थापित कर सकता है जिसमें राष्ट्रभाषा हिंदी की उद्घोषणा के मौलिक आयाम ‘विकसित भारत के निर्माण में राष्ट्रभाषा के जयघोष को भारतीय आत्मा की विहंगम संकल्पना...’ के स्वरूप में स्वीकार करते हैं। विश्व में राष्ट्रभाषा हिंदी द्वारा गौरवान्वित भारतीयता... ‘सर्वे भवंतु सुखिनः...’ की विशालता को आत्मिक जगत में सुसज्जित करके जब राष्ट्रभाषा हिंदी से निर्मित सृजनात्मक दृष्टिगत-नवदृष्टि द्वारा जगत गुरु के रूप में- ‘वसुधैव कुटुंबकम...’ का मंगलकारी स्वरूप अभिव्यक्त करता है तब भारतीय आत्मगत संचेतना की सहभागिता-‘वैश्विक परिदृश्य में राष्ट्रभाषा हिंदी : मातृभाषा के ममत्व, राजभाषा के एकत्व और राष्ट्रभाषा के समत्व द्वारा भारतीय सभ्यता, संस्कृति एवं राष्ट्रीयता की पुनर्स्थापना ’ का प्रतिपादन महत्वपूर्ण हो जाता है ।
राष्ट्रभाषा हिंदी द्वारा राष्ट्रीयता की स्थाई पुनर्स्थापना : वैश्विक जगत के मध्य भारत राष्ट्र की समृद्धशाली-अतीत, आगत एवं अनंत के संदर्भ एवं प्रसंग में जीवित जिजीविषा की जीवंत कर्तव्योन्मुखी मानवीय प्रवृत्ति जिसमें-मनुष्य, मनुष्यता और संवेदनशीलता की प्रासंगिकता को स्वीकार करते हुए राष्ट्रीय प्रतिबद्धता का विराट शंखनाद-भारत की स्वतंत्रता के ७५ वीं वर्षगांठ अर्थात भारत की आजादी का अमृत महोत्सव के श्रेष्ठतम एवं महानतम अवसर पर - राष्ट्रभाषा हिंदी की उद्घोषणा के शुभ, पवित्र और न्याय संगत स्वरूप के द्वारा ही सुनिश्चित किया जा सकता है जिसमें ‘मातृभाषा, राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा के ममत्व,एकत्व और समत्व द्वारा भारतीय सभ्यता, संस्कृति तथा राष्ट्रीयता की स्थाई रूप में पुनर्स्थापना’ से भारत को- ‘विश्व गुरु’ बनाने की संकल्पना का वास्तविक यथार्थ पूर्णतया समाहित रहता है ।
स्वतंत्र मानसिकता में आजादी का मर्यादित जश्न : ‘सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा...’ का सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक पक्ष संपूर्ण भारतीय जनमानस के भावनात्मक परिदृश्य और विचारगत परिवेश से संबद्ध हो जाने के कारण- ‘भारतीय आत्मा द्वारा स्वतंत्र मानसिकता में आजादी का मर्यादित जश्न...’ मनाने की दीर्घकालीन आशा से भरपूर विश्वसनीय आवश्यकता की अपेक्षित अभिलाषा से युक्त- ‘राष्ट्रवाद की मूलभूत संकल्पना...’ के सानिध्य में पुष्पित और पल्लवित- सृजनात्मक, संवेदनशील अभिव्यक्ति के माध्यम से विकसित भारत के निर्माण का रहस्यवादी, सकारात्मक तथा सार्थकता की दृष्टि से संपूर्ण रुप से समृद्ध दृष्टिकोण के व्यावहारिक क्रियान्वयन का उज्जवल स्वरूप-‘राष्ट्रभाषा हिंदी की प्राण प्रतिष्ठा...’ को व्यवस्थागत निर्णयात्मक गतिविधि के माध्यम से स्थापित करने की आत्मगत चेतना , आज भी प्रतीक्षारत है ।
भारत माता के प्रति जीवंत नैतिक चैतन्यता : विश्व मानवता के समग्र उत्थान एवं निरंतर उन्नयन में भारतीयता की अवधारणा सदा ही-‘आत्मगत चेतना द्वारा आंतरिक अभिप्रेरणा...’ से सर्व मानव आत्माओं के अंतरसंबंधों में नैसर्गिक जुड़ाव को भाषाई सुचिता की महत्वपूर्ण भूमिका से संबंध करके - ‘भारत माता के प्रति जीवंत नैतिक चैतन्यता...’ को शुद्ध एवं सुदृढ़ स्वरूप में निर्मित करते हुए संपूर्ण जगत को धर्म एवं कर्म का पाठ पढ़ाकर जीवात्मा को अध्यात्म और पुरुषार्थ का संबल प्रदान करके, राजयोग तथा मौन की नि:शब्दता को भी अंतत: आत्मिक पवित्रता के स्वरूप में ‘अध्यात्म-विश्व के मनुष्यों का धम...’बन जाने के लिए समदृष्टि से परिपूर्ण आत्मीय संबोधन की चेतना युक्त सृष्टि , जिसके अंतर्गत सम्मिलित- ‘विश्व शांति एवं सामाजिक समरसता...’ को स्थाई रूप से स्थापित करने के अग्रदूत बनकर, भारतीय आत्मा ने मानवता के मानस को संस्कारित चेतना से संपन्न तथा दिव्य गुणों एवं शक्तियों द्वारा सुरुचिपूर्ण ढंग से सुसज्जित कर दिया है।
राष्ट्र गौरव हिंदी भाषा की प्राण प्रतिष्ठा : भारत राष्ट्र में हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा के स्वरूप में लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत कानूनी रूप से लागू करने के लिए– ‘समस्त भगीरथ प्रयास की श्रम साध्य गौरवमई स्वर्णिम इबारत एक शताब्दी से भी अधिक ऐतिहासिक एवं पौराणिक धर्म ग्रंथों से सृजित विकास...’ यात्रा के संदर्भ और प्रसंग के जीवंत रूप से उपलब्धि की पूर्णता के साथ स्वयं सिद्धा की प्रतिमूर्ति बनकर – ‘राष्ट्र गौरव के रूप में हिंदी भाषा की प्राण प्रतिष्ठा...’ की बाट जोहने में संलग्न है और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रभाषा की बोधगम्यता के साथ-‘ राजभाषा अर्थात राजपथ से कर्तव्यपथ का अनुकरण तथा अनुसरण...’ करके यथाशीघ्र राष्ट्रभाषा हिंदी के आरंभ से अंततः तक की-‘ विकास से विकसित स्वरूप की यात्रा...’ में भाषाई गुलामी की अंतरकथा में उलझी हिंदी भाषा की व्यथा , स्वयं की ही स्वतंत्रता हेतु नित – नूतन , अनेकानेक विधि – विधान के अनुप्रयोग से मुक्ति की मन्नत में अस्तित्व की स्थापना का वास्तविक यथार्थ अनवरत रूप से यदा - कदा विभिन्न स्थितियों एवं परिस्थितियों के अंतर्गत ढूंढ रही है ।
परंपरागत गुणात्मक विकास में नवीनतम व्यावहारिक प्रयोग : राष्ट्रभाषा हिंदी के संपूर्ण विकास के अनुक्रम में सभी विधाओं के अंतर्गत – ‘ अंतःकरण की शक्ति का पूर्ण विनियोजन, संपूर्ण मनोयोग...’ द्वारा पुरातन काल से वर्तमान आधुनिक काल की व्यवस्थागत प्रणाली में परंपरागत गुणात्मक सहभागिता के द्वारा- ‘शासकीय, अशासकीय संस्थाओं के साथ-साथ गैर सरकारी एवं स्वैच्छिक संगठनों...’ के माध्यम से भारत के विभिन्न प्रांतों में राष्ट्र भाषा की उन्नति हेतु नवीनतम व्यावहारिक प्रयोग के प्रमाणिक दस्तावेज का निर्माण एवं प्रचार-प्रसार किया गया और बहुआयामी स्थितियों में सुदृढ़ और सशक्त तरीके से प्रभावशाली तथा प्रेरणादाई हिंदी के प्रकाशन को-दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, द्विमासिक, त्रैमासिक, चौमासा, छमाही, वार्षिकी, विशिष्ट सामाजिक पृष्ठभूमि से संबंधित विभिन्न लोक कल्याणकारी अवसर एवं राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय महत्वपूर्ण उपयोगी मुद्दों पर विभिन्न-विशेषांक , संस्थागत गतिविधियों के ब्योरे हेतु प्रस्तुत की जाने वाली-स्मारिका, साहित्यिक गतिविधियों के सामूहिक प्रस्तुतीकरण हेतु- साझा संकलन, के गद्य एवं पद्य विशेषांक तथा पुस्तकाकार स्वरूप में संदर्भ ग्रंथों को विश्व स्तरीय विराट एवं विशाल स्वरूप तक आदर और सम्मानपूर्ण विधि – विधान से पहुंचाया गया है जिसमें-‘मर्यादित संप्रेषण और व्यापक सामाजिक स्वीकारोक्ति की उच्चतम अवस्था से संबंधित व्यवस्था...’ भी गतिशीलता की प्रासंगिकता में निरंतर प्राप्त होती रही है जिससे राष्ट्रभाषा हिंदी में सृजनात्मक गतिविधियों का कुशलता से संपादन एवं दैनिक जीवन में उपयोग करने के अतिरिक्त नित्य-नूतन विधियों के व्यावहारिक क्रियाकलापों का क्रियान्वयन भी अति महत्वपूर्ण सिद्ध होता रहा है जिन्हें आत्मसात करने से राष्ट्रभाषा हिंदी को स्थापित होने में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष अर्थात सतत रूप से नवाचारी प्रासंगिकता में मदद प्राप्त होती रही है ।
भारतीय जनमानस में रची बसी राष्ट्रभाषा हिंदी : भारतीयता की मौलिक चिंतनशीलता सदैव चेतना के द्वारा राष्ट्रभाषा की आरंभिक स्थितियों में हिंदी की आवश्यकता से लेकर उपयोगिता को चुनौतीपूर्ण रूप से स्वीकार करते हुए- ‘जहां सुमति तहां संपत्ति नाना..’ के माध्यम से सात्विक गुणात्मकता के अनुक्रम में अभिव्यक्ति की-‘स्वतंत्रता को मानस पटल द्वारा अंगीकार करके...’ संपूर्ण व्यक्तित्व विकास की अवधारणा को व्यवहारिकता की कसौटी पर जीने के लिए सहज ही तत्पर हो जाना, इस बात का प्रमाण है कि- ‘ राष्ट्रभाषा हिंदी को रोजगार से जोड़ने...’ की प्रक्रिया का अनुगमन करके- ‘ हिंदी बोलें एक होलें...’ की प्रासंगिकता से आपसी संवाद द्वारा एक दूसरे से जुड़ जाने की विभिन्न स्थितियां भारत राष्ट्र में – ‘अनेकता में एकता अर्थात एक भारत श्रेष्ठ भारत...’ के उच्चतम स्वरूप के अंतर्गत निर्मित हुई है जो भारतीय जनमानस द्वारा शासकीय, अशासकीय, व्यावसायिक, स्वैच्छिक एवं गैर सरकारी संगठनों में भी राष्ट्रभाषा से संबंधित कार्यों की विधिवत रूप से की जाने वाली पूर्ण संपन्नता, उपलब्धिपूर्ण सफलता के रूप में प्राप्त हो सकी है ।
जागृत राजनीतिक इच्छा शक्ति का अदम्य साहस : भारत राष्ट्र की–‘राष्ट्रवाद से संबंध एवं प्रतिबद्ध राष्ट्रीयता का अभिमुखित प्रखरता से युक्त स्वरूप ही राष्ट्रभाषा हिंदी...’के द्वारा समस्त भारतीय भाषाओं के मध्य– ‘समन्वय, एकता और विकास की उपयुक्त एवं सही दशा एवं दिशा में सर्वश्रेष्ठ क्रिया – कलाप से संबंधित विभिन्न गतिविधियों...’ का कुशलता पूर्ण संचालन कर सकता है जिसमें भाषाई संबंधों की प्रगाढ़ता से अपनत्व स्थापित करके , सामाजिक समरसता की व्यापक संभावनाओं को सुनिश्चित करना अनिवार्य होता है जिससे – ‘ एक ही अध्यादेश के माध्यम से राष्ट्रभाषा हिंदी को राष्ट्रीयता की पक्षधरता का गहन...’ रूप से संज्ञान प्राप्त करके- ‘जागृत राजनीतिक इच्छाशक्ति के अदम्य साहस... ’ से अमृत काल के स्वर्णिम अवसर में हा- ‘कानूनी रूप से भारत राष्ट्र में राष्ट्रभाषा को विधिवत तरीके से लागू...’ किया जा सकता है ।
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राष्ट्रभाषा हिंदी की उद्घोषणा के मौलिक आयाम : भारत की आजादी के अमृत महोत्सव अर्थात भारत की स्वतंत्रता के ७५ वीं वर्षगांठ पर राष्ट्रभाषा हिंदी को स्थापित करने के महत्वपूर्ण कार्यों में- ‘केंद्र सरकार, राज्य सरकार, गैर सरकारी संगठन के साथ-साथ शैक्षिक संस्थानों के विभिन्न सामूहिक एवं व्यक्तिगत प्रयास...’ के संपूर्ण योगदान के पश्चात भी- ‘राष्ट्रभाषा हिंदी भारत वर्ष में लागू क्यों नहीं हो पाई है...? अभी तक राष्ट्रभाषा के विकास हेतु समग्रता के सानिध्य में जो कुछ भी किया गया है...’ उसका संपूर्ण विवरण से युक्त लेखा-जोखा अर्थात आलोचनात्मक मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है जिससे समस्त प्रकार के-‘अवदान की समालोचनात्मक व्याख्या विधिवत रूप करना सहज हो जाएगा और वास्तविक निष्कर्ष.. पर पहुंचा जा सकेगा है इस प्रकार राष्ट्रभाषा हिंदी के विकास में दीर्घकालीन समय से विशेष भूमिका निभाने के अंतर्गत- ‘देशभर के प्रतिष्ठित, विभिन्न केंद्रीय हिंदी संस्थान, राष्ट्रीय वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, केंद्रीय व्यवस्था द्वारा संचालित राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी विश्वविद्यालय, राष्ट्रभाषा हिंदी कार्यान्वयन समिति, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, संस्कृति भवन, हिंदी भवन, जनसंपर्क विभाग, रोजगार और निर्माण से संबंधित विभिन्न-माध्यम केंद्र, विद्यमान हैं ।
संपूर्णता एवं सक्रियता के सानिध्य में गतिशीलता : देश के सभी प्रांतों में संचालित हिंदी ग्रंथ अकादमी, केंद्रीय सूचना एवं पत्र कार्यालय, भारत सरकार का प्रकाशन विभाग, संपूर्ण राष्ट्र की समस्त शासकीय, अशासकीय एवं स्वैच्छिक संगठन के द्वारा प्रकाशित हिंदी की राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक स्तर की महत्वपूर्ण पत्र एवं पत्रिकाएं, प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया, बुक ट्रस्ट ऑफ इंडिया, देश और प्रदेश स्तर पर संचालित-राष्ट्रीय कला केंद्र, भारत भवन, मानव संग्रहालय, संगीत अकादमी, भारतीय आदिवासी सभ्यता को सुरक्षित रखने हेतु-प्रमुख कला केंद्र, नाट्य अकादमी, हथकरघा एवं हस्तशिल्प विभाग, गांधी भवन, मानस भवन, रामायण केंद्र, कालिदास अकादमी, लोक कला अकादमी, इत्यादि के अतिरिक्त साहित्यिक गतिविधियों के अंतर्गत संचालित राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न स्वैच्छिक संगठन, निश्चित रूप से अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिकाओं के साथ, आज भी संपूर्णता एवं सक्रियता के सानिध्य में गतिशील हैं तथा शेष २५ वर्ष के अमृतकाल में- ‘भारत की हिंदी पोषित, पुष्पित एवं पल्लवित संस्थाओं द्वारा आखिर और अंततः की भूमिका में राष्ट्रभाषा हिंदी के विकास हेतु परंपरागत गतिविधियों के अतिरिक्त नवीनतम स्वरूप से किन महत्वपूर्ण कार्यों को संपादित किया जाए? जिससे कि राष्ट्रभाषा हिंदी...’ को भारत की आजादी के शताब्दी वर्ष अर्थात स्वतंत्रता के १०० वीं वर्षगांठ पूर्ण होने पर विधिवत, कानूनी रूप से लागू किया जा सकेगा।
विकसित भारत के निर्माण में राष्ट्रभाषा का जयघोष : संपूर्ण जगत के अंतर्गत विश्व में शांति, अहिंसा एवं पवित्रता की स्थापना हेतु धर्म, अध्यात्म और राजयोग के अवदान को वैश्विक स्तर पर स्वीकारोक्ति प्राप्त होने के कारण ही भारत से धार्मिक कीर्तन और संकीर्तन का स्वरूप अपनी विशिष्टता के साथ आध्यात्मिक क्रांति के माध्यम से संक्रांति की उपयोगिता के बहुआयामी सिद्ध स्वरूप में परिणित होकर – ‘परिष्कृत चेतना की चेतनता द्वारा ऊर्ध्वगामी आत्मिक परिवर्तन से जीवात्मा को चेतना के परिष्कार...’ की महायात्रा में भारतीय आत्मा के जयघोष द्वारा सर्व आत्माओं के कल्याण का निहितार्थ बनकर-‘शुभभावना एवं शुभकामना के स्वरूप...’ में सम्मिलित हो जाता है जिसमें-‘जय जवान–जय किसान, के साथ ही जय-विज्ञान, जय-अनुसंधान की अनुगूंज को अब, जय-मातृभाषा, जय-राजभाषा तथा जय-राष्ट्रभाषा, की वास्तविक स्थितियों के धरातल पर भारतीय आत्मा की अवधारणा में पोषित-जय राष्ट्रवाद , के शंखनाद से गतिशीलता को प्राप्त होते हुए भारतीयता की ज्ञान – विज्ञान एवं मनोविज्ञान की परंपरा के निष्ठापूर्ण निर्वहन में –‘भारत की आजादी के अमृत महोत्सव से... स्वर्णिम भारत की ओर...’ वैश्विक शांति , अहिंसा एवं पवित्रता का अग्रदूत बनकर-भारत राष्ट्र ही अनवरत रूप से अग्रसर हो सकेगा ।
भारतीय आत्मा की विहंगम संकल्पना का स्वरूप :
राष्ट्र की एकता एवं अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखते हुए कल्याणकारी मनोभाव के व्यावहारिक क्रियान्वयन द्वारा मंगलकारी पवित्र उद्घोष से भारतीय आत्मा की पहचान वैश्विक जगत में स्थापित हुई है तथा संपूर्ण जगत भारतीयता की अवधारणा में – ‘ सर्व धर्म समभाव...’ के अंतर्गत आध्यात्मिक परिदृश्य के आत्मिक संबंधों में सर्वोत्कृष्ट आत्मीयता की – ‘ स्वान्तः सुखाय रघुनाथ गाथा...’ के दुर्लभ दार्शनिक स्वरूप के माध्यम से सृजित पृष्ठभूमि को निहारने का प्रयास करता है जिससे उन्हें – ‘ सर्वजन हिताय , सर्वजन सुखाय...’ की व्यावहारिकता परिलक्षित हो जाती है जो आत्मिक जगत के व्यावहारिक परिदृश्य को – ‘ सर्वे भवंतु सुखिन ...’ के सन्मार्ग पर सदा गतिशील रहकर आध्यात्मिक पुरुषार्थ के माध्यम से – वसुधैव कुटुंबकम...’ अर्थात संपूर्ण विश्व एक परिवार है इस उच्चतम अवधारणा के समदृश्य विराट स्वरूप के माध्यम से स्वीकार करके – ‘ आत्मिक दायित्वबोध से स्वयं को पूर्णरूपेण सुसज्जित रखने की क्रियाशीलता...’ को आत्मसात करके भारतीय आत्मा की - ‘ विहंगम संकल्पना को राष्ट्रभाषा हिंदी के नैसर्गिक...’ स्वरूप में स्वयं को व्यक्तिगत रुप से, शिक्षित-प्रशिक्षित करके सकारात्मक-सार्थक दृष्टिकोण को धारणात्मक चरित्र का आधार बनाकर ‘ पठन –पाठन, मनन-चिंतन, वर्णन-विश्लेषण, लेखन-संप्रेषण, अवलोकन- मूल्यांकन के पश्चात उससे प्राप्त होने वाली, संतुष्टि-उपयोगिता, आलोचना -समालोचना , प्रतिक्रिया-प्रतिपुष्टि, संवाद-समाधान, निर्वचन एवं अंतिम निष्कर्ष ...’ तक पहुंच कर ही व्यावहारिक स्तर पर परिष्कृत चिंतन के आयाम को – ‘गागर में सागर भर देने के महानतम स्वरूप में साकार...’ किया जा सकता है।
विश्व में राष्ट्रभाषा हिंदी द्वारा गौरवान्वित भारतीयता : ‘सत्यमेव जयते...’ की समग्रता के विराट स्वरूप में भारत की स्वतंत्रता के ७५ वीं वर्षगांठ अर्थात भारत की आजादी का अमृत महोत्सव के महान अवसर पर संपूर्ण विश्व में– ‘भारतीयता का परचम लहराने हेतु सर्वश्रेष्ठ उपाय-राष्ट्र के साहित्य सर्जको द्वारा स्वयं को भारतीय ज्ञान परंपरा...’ की समृद्धशाली धरोहर से शिक्षित-दीक्षित करते हुए चिंतनशील प्रक्रिया द्वारा अनुभवी बनकर भावनात्मक एवं वैचारिक प्रज्ञा में दक्षता रुपी सक्षमता से- ‘सूक्ष्म कल्पनाशीलता का प्रयोग करके सृजनात्मक साहित्य का सृजन जो हिंदी का प्राण जगत...’ है उसमें नवाचारी के प्रयोग से आधुनिक काल की विरासत को ईमानदारी से सुसज्जित करके- ‘ अतीत, आगत एवं अनंत की सृजनशील साहित्यिक विरासत के प्रति समादर भाव की पृष्ठभूमि में कल्याणकारी और मंगलकारी...’ साहित्य सृजन अनवरत स्वरूप से गतिशील है इसलिए- ‘उत्तिष्ठ भारत: मां भारती पुकारती : सात्विक चेतना के दायित्वबोध द्वारा जिम्मेदारी और जवाबदेही से क्रियान्वयन...’ के आह्वान को - ‘भारत राष्ट्र के नायकों द्वारा राजपथ के राजसिक स्वरूप से कर्तव्यपथ के सात्विक प्रांगण...’ में पधारकर – ‘राष्ट्रीय हिंदी दिवस, के महान अवसर पर- ‘राष्ट्रभाषा हिंदी को संपूर्ण भारतवर्ष में भारतीय संविधान के अनुसार कानूनी रूप से लागू करने की उद्घोषणा...’ किया जाना परम आवश्यक है जिसमें- ‘भारत राष्ट्र को विकसित भारत बनाने का महान लक्ष्य समस्त भारत के जनमानस की दृढ़ संकल्पबद्धता...’ की परिणिति है जो भारत की विराट दिव्य दृष्टि के रूप में भारत को विश्व गुरु बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है इसलिए ‘ भारतीय आत्मा द्वारा , सबका –साथ , सबका – विकास , सबका–विश्वास, की संपूर्णता के साथ-साथ, राजनीतिक इच्छाशक्ति से भरपूर साहस द्वारा-केवल एक अंतिम अधिसूचना के माध्यम से भारत माता के , सच्चे सपूत का सबूत -राष्ट्रभाषा हिंदी को लागू...’ करके ही दिया जा सकता है ।
राष्ट्रभाषा हिंदी से निर्मित सृजनात्मक सृष्टिगत नवदृष्टि : हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने हेतु – ‘ संपूर्ण भारतवर्ष की हिंदी संस्थाओं और उनसे संबंधित विभिन्न – सामाजिक , मनोवैज्ञानिक , दार्शनिक , धार्मिक , आध्यात्मिक क्षेत्र के साथ - साथ भारत की ज्ञान परंपरा से संबंधित – विज्ञान , तकनीकी , कला एवं वाणिज्य , अभियांत्रिकी , शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य , के स्वरूप में भी राष्ट्रभाषा हिंदी के द्वारा विभिन्न क्षेत्र के साथ , लगभग सभी विधाओं के अंतर्गत साहित्य निर्माण की निरंतरता के ७५ वर्षों के संघर्ष और विकास के माध्यम से विकसित हो जाने की प्रक्रिया में – ‘ योगदान की गौरव गाथा को संदर्भ एवं प्रसंग के विशाल स्वरूप में संज्ञान लेकर हिंदी दिवस के महान अवसर पर सूरज की प्रातः किरण के साथ भारतवर्ष में राष्ट्रभाषा हिंदी कानूनी रूप से लागू हो गई है...’ की सुखद अनुभूति का समाचार संप्रेषित होने से जब – ‘ भारतीयता की महत्वपूर्ण पहचान – निज भाषा उन्नति...’ के संदर्भ और प्रसंग में स्थापित हो जाती है तब – ‘ संपूर्ण विश्व में व्याप्त भारतीय जन समूह – राष्ट्र गौरव गान से आनंदित हो उठेगा क्योंकि भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी...’ आज राष्ट्रीय हिंदी दिवस , से भारतीय संसदीय व्यवस्था से उद्घोषित एवं कानूनी रुप से निर्धारित होकर राष्ट्रभाषा हिंदी भारत में पूर्णत: निर्मित , स्थापित एवं विकसित होने के मार्ग पर गतिमान हो गई है जो – ‘ मातृभाषा , राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा के ममत्व , एकत्व और समत्व द्वारा भारतीय सभ्यता , संस्कृति तथा राष्ट्रीयता की पुनर्स्थापना ’ का संवाहक बनकर संपूर्ण शताब्दी की महायात्रा में अनवरत रूप से गतिशील- थी भी, है भी और भविष्य में भी , विकास का यह गुणात्मक अनुक्रम बना रहेगा ।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रभाषा हिंदी की सहभागिता : भारतीय परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रभाषा हिंदी को – राष्ट्रभाषा के रूप में लागू कराने के लिए अर्थात राष्ट्र ऋण के प्रति व्यक्तिगत एवं सामूहिक आहुति प्रदान करने हेतु स्वयं को संपूर्ण समर्पण करने की, प्राण-प्रण से न्योछावर होने की संकल्पना का यथार्थ बनकर भारतीय आत्मा के आम जनमानस से संबद्ध राष्ट्रीय चरित्र के प्रति महानतम दृष्टि और विराट दृष्टिकोण के साथ- ‘अखिल भारतीय स्तर का सानिध्य और विश्व स्वरूप के अंतर्गत विगत ७५ वर्षों से राष्ट्रभाषा की समृद्धिशाली अवधारणा के मूलभूत उद्देश-राष्ट्रभाषा हिंदी के साथ-साथ सभी भारतीय भाषाओं के मध्य–आपसी सामंजस्य , समन्वय , समरसता , एकता ,एवं गुणात्मक विकास...’ के मूल मंत्र द्वारा राष्ट्रभाषा हिंदी के विकास हेतु समर्पित मनोभाव से आत्मगत संलग्नता के साथ गतिशील है ...। संपूर्ण भारत वर्ष के अंतर्गत लगभग सभी प्रांतों में शासकीय शासकीय एवं गैर शासकीय व्यवस्थाओं की संपूर्णता के माध्यम से समस्त महत्वपूर्ण विषय और उनसे जुड़े विविध आयाम की–‘सबल, सक्रिय एवं समर्थ सहभागिता द्वारा राष्ट्रभाषा हिंदी को अपने ही राष्ट्र में कानूनी रुप से लागू कराने हेतु– ‘संपूर्ण संपूर्ण भारतीय जनमानस की विशाल परिदृश्य से संबंधित-श्रेष्ठतम कल्पना, प्रयास और अनुभूति से संबंधित अकादमिक, व्यवसायिक, तकनीकी एवं अनुसंधानपरक सहभागिता और उसका विशिष्ट आयाम-राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जगत की महत्वपूर्ण भूमिका का संपूर्ण योगदान राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में दृढ़ संकल्पित मनोभाव से प्रतिबद्धता के साथ समर्पित एवं प्रेरणादाई स्वरूप में सदा ही विद्यमान रहते हुए गतिशील बना हुआ है ...। अतः राष्ट्र भाषा हिंदी की सम्मानित स्थिति और गौरवान्वित स्वरूपृ' विश्व समुदाय के मध्य, वसुधैव कुटुंबकम से मुखरित-ममत्व , एवं भारत की आजादी के अमृत महोत्सव द्वारा उत्पन्न-एकत्व , और राष्ट्रीय हिंदी दिवस में सन्निहित-समत्व, के माध्यम से भारतीय सभ्यता , संस्कृति एवं राष्ट्रीयता की पुनर्स्थापना...' में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से संलग्न-संपूर्ण भारतीय मानव आत्माओं के साथ-साथ समस्त देशवासियों और वैश्विक परिदृश्य में विराजमान राष्ट्रभाषा हिंदी की सेवा में समर्पित आत्मीयता से युक्त मनोभाव को-राष्ट्रीय हिंदी दिवस के महान गौरवमई अवसर पर अनेकानेक शुभकामनाएं एवं हार्दिक आत्मिक बधाई, जय हिंद ... जय हिंदी ... जय भारत ...।
डॉ. अजय शुक्ल
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