किन्नर विमर्श : हिंदी नाटक और सिनेमा के विशेष संदर्भ में

यह लेख हिंदी नाटक और सिनेमा में किन्नर एवं तृतीय लिंग समुदाय के चित्रण और सामाजिक स्थिति का विश्लेषण करता है। इसमें बताया गया है कि लंबे समय तक किन्नर समुदाय को हास्य, उपहास, विदूषक या पारंपरिक बधाई देने वाले पात्रों तक सीमित करके प्रस्तुत किया जाता रहा। समय के साथ शबनम मौसी, तमन्ना, दरमियान, सड़क जैसी फिल्मों तथा जानेमन और शिखंडी जैसे नाटकों ने किन्नर जीवन के संघर्ष, पहचान, सम्मान, सामाजिक भेदभाव और मानवीय संवेदनाओं को अधिक गंभीरता से सामने रखा। लेख यह रेखांकित करता है कि साहित्य, रंगमंच और सिनेमा सामाजिक जागरूकता पैदा करने तथा किन्नर समुदाय को मुख्यधारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

Sep 26, 2026 - 17:26
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किन्नर विमर्श : हिंदी नाटक और सिनेमा के विशेष संदर्भ में
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किन्नर विमर्श - हिंदी नाटक और सिनेमा के विशेष संदर्भ में

सामाजिक परिप्रेक्ष्यों से अलग हटकर चित्रण मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में बिना चुनाव ही है, क्योंकि ज्यादातर सिनेमा की मूल विषय-वस्तु सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक मूल्यों पर आधारित होती है और समाज की विभिन्न समस्याओं को उठाते हुए चलते हैं, उनके समाधान का प्रयास भी करते हैं। कुछ यही बात हिंदी फिल्मों में किन्नर और समलैंगिक समाज के चित्रण के संदर्भ में भी लागू होती है। इस समाज पर फिल्में बनी तो हैं, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं। वह या तो हाशिए के व्यक्ति को दर्शाती थीं या कुछ अलग हटकर ही उन्हें प्रदर्शित किया जाता था। कुछ गिनी-चुनी फिल्में ही हैं, जिनमें यह समाज का उपेक्षित वर्ग अपनी सशक्त उपस्थिति दर्शाता है, वरना इन्हें पीछे ही रखा जाता है।

अब तक भारतीय सामाजिक संरचना में किन्नर, समलैंगिक वर्ग सदैव हाशिए पर ही रहा है। भले ही इतिहास में मोहल्ला और शिखंडी जैसे चरित्रों को मान्यता दी गई हो, सामाजिक दृष्टि से तो यह वर्ग भी उपहास और विकृति के पर्याय रहे। कानूनी दृष्टि से भी इन्हें हमेशा अपेक्षित ही रखा गया। किन्नर समाज सदा उपेक्षित रहा। 15 अगस्त 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने किन्नर वर्ग को थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता दी। समलैंगिक अभी भी ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की धारा 377 को झेल रहे हैं। इस आधार पर उन्हें अपराधी माना जाता है और प्रत्येक इस पर जो मामला है, वह सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। 1993 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने समलैंगिकता को प्राकृतिक घोषित कर दिया था। भारत में अभी पहचान मिलना बाकी है।

फिल्मी समाज में किन्नर, उभयलिंगी, समलैंगिक समाज को हास्य के रूप में होने के बावजूद अभिनेता महमूद की फिल्म कुंवारा बाप में किन्नर समुदाय पर एक गीत फिल्माया गया है। इसमें परंपरागत रूप में जन्म के अवसर पर आते, नाचते दिखाया गया है। जो कि फिल्में समाज का आईना होती हैं, बहुत-सी फिल्मों में किन्नर पात्र का चित्रण इसी रूप में मिलता है कि वह विवाह, जन्म आदि के अवसर पर बधाई गीत करते हुए नजर आते हैं।

दूसरी ओर हिंदी फिल्मों में यह वर्ग सदैव स्टैंड गुणों से युक्त एक विदूषक के रूप में चित्रित होता आया है। सामाजिक ताने-बाने का असर फिल्मों पर भी होता है। समाज इनकी हँसी उड़ाता है, तो फिल्मों में भी यह विकृतिपरक अभिव्यक्ति ही ज्यादा पाता है।

कल हो ना हो फिल्म में यह सब मन तो नहीं है, पर ये "गे सीक्वेंस" को कॉमेडी के रूप में चित्रित किया गया है। वास्तविकता यही है कि समलैंगिकता को समाज विकृति मानता है। यही कारण है कि हिंदी फिल्मों में इस प्रकार के संबंध कॉमेडी रूप में दिखाए जाते हैं। दोस्ताना फिल्म में अभिनेता अभिषेक बच्चन और जॉन अब्राहम समलैंगिक होने का नाटक करते हैं। यहाँ भी समलैंगिकता हास्य की वस्तु है।

किन्नर पर बनी फिल्मों में शबनम मौसी प्रमुख है। यह फिल्म प्रथम किन्नर विधायक शबनम के जीवन पर आधारित है। उसके संघर्ष, पीड़ा का सशक्त चित्रण इस फिल्म में हुआ है। अभिनेता आशुतोष राणा ने शबनम मौसी का किरदार निभाया है।

जहाँ तक फिल्मों का सवाल है, किन्नर पर आधारित दूसरी चर्चित फिल्म तमन्ना है। नाटी कूलर की तमन्ना की कहानी पर आधारित यह फिल्म इस समाज को नई दृष्टि से देखने की सोच प्रदान करती है। टिकू अनाथ लड़की तमन्ना को पालता है। कितनी तरह की घटनाएँ यहाँ उसके सामने आती हैं और परिस्थितियों से वह लड़ता-टकराता है कि वह एक किन्नर है। इस पीड़ा की सशक्त अभिव्यक्ति फिल्म में मिलती है। अंततः फिल्म संदेश देती है कि किन्नर भी इंसान हैं, उन्हें इसी रूप में सम्मान दो। फिल्म में परेश रावल और पूजा भट्ट ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं।

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1966 की फिल्म दरमियान में 1940 के दशक की एक अभिनेत्री और उसके किन्नर पुत्र की कहानी है। अभिनेत्री अपने पुत्र को स्वीकार नहीं करती, उसे समाज से छुपाकर रखती है। कहानी वही पुरानी पारंपरिक सोच को दर्शाती है। किरण खेर और आरिफ जकारिया ने इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई है।

किन्नर फिल्म का प्रदर्शन सड़क फिल्म में भी है। इस फिल्म में किन्नर महारानी का किरदार एक खलनायक है, एक क्रूर खलनायक, जो नायिका का शत्रु है। परंपरागत किन्नर चित्रण में अलग या नवीन प्रस्तुति थी। ऐसा लगता है जैसे किन्नर महारानी पात्र समाज में अपनी स्थिति का प्रतिशोध ले रहा है। मुख्य भूमिका सदाशिव अमरापुरकर की रही।

नाटकों में भी किन्नर समुदाय के जीवन में होने वाले कष्टों को बेहद मार्मिक और भावपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया गया है। उनकी कई समस्याओं से रचे-बसे नाटक भी हैं। इन्हीं में से एक नाटक है सर। इस नाटक में भ्रूण हत्या और लड़की पैदा होने पर आम जनों की मानसिकता पर भी करारा प्रहार किया गया है। इसका मंचन सदर हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी स्थित जनमंच थिएटर में किया गया, जहाँ छत्तीसगढ़ फिल्म एंड विजुअल आर्ट सोसायटी के अध्यक्ष सुभाष मिश्रा उपस्थित थे।

जिसमें सुशीला एक बच्ची को लेकर घर आ जाती है, जो कूड़े में मिली थी और जब उसकी किन्नर माँ उसे मना करती है कि इसे नहीं पाल लेंगे, क्योंकि बड़ी होगी तो लोग कहेंगे, जहाँ से लाई थी, वहाँ छोड़ दिया। परंतु मानवता के नाते वह सुशीला के कहने पर बच्ची को रख लेती है। सुशीला रिपोर्ट दर्ज करवाने जाती है। वहाँ पुलिस उसे खरी-खोटी सुनाता है और कहता है, यह किन्नरों की कब से बच्ची होने लगी? फिर थानेदार रिपोर्ट लिखने की लालच देकर सुशीला के साथ जोर-जबरदस्ती करता है। बाद में उसे मारपीट के बाद वहाँ से भगा देता है। घर जाते वक्त सुशीला सड़क के किनारे खून से लथपथ पड़ी हुई मिलती है। वे लोग उसे घर ले आते हैं। देखते ही देखते उसकी मृत्यु हो जाती है। पूरे घर में मातम छा जाता है। अंत में किन्नरों को उस बच्ची के हत्यारे का पता चलता है और वह उसे मार देती है।

पंजाब कला भवन, सेक्टर 16 में चल रहे पाँच दिवसीय ऑल इंडिया थिएटर फेस्टिवल के दूसरे दिन मेरा करकर सोसाइटी, भिवानी में यह पेश किया गया कि किन्नर का जीवन नाचने और गाने तक सीमित नहीं होता, इनके जीवन के विभिन्न पहलू भी हैं।

नाटक जानेमन का निर्देशन सोनू रोनझिया ने किया, जिसमें किन्नर जीवन के विभिन्न पक्षों को पेश किया गया। नाटक की शुरुआत एक ऐसे बच्चे से होती है, जिसे किन्नर डेरे के बाहर छोड़ा गया है। किन्नर उसे उठाकर डेरे के अंदर लेकर जाते हैं, लेकिन उस बच्चे की खुद की कोई पहचान नहीं होती। उसके नाम के साथ कभी माता-पिता का नाम नहीं जुड़ सकता। वहीं दूसरे दृश्य में ऐसे बच्चे को दिखाया गया है, जिसमें हार्मोन्स बदलाव के चलते व्यवहार बदलता है और वह अपनों से ही यौन शोषण का शिकार होता है। वह अपने दर्द को किसी को बता भी नहीं सकता, क्योंकि उसे खुद को भी नहीं पता होता कि उसके साथ क्या हो रहा है।

और अंत में किन्नर के डेरे में यही दिखाया जाता है कि जब तक किसी को खुद का शिष्य नहीं बनाओगे, उस समय तक मोक्ष नहीं मिलेगा। और बुढ़ापे की बात पर भी चर्चा की गई है कि बुढ़ापे में खाना कौन देगा।

तो इस नाटक में ही दिखाने का प्रयास किया गया है कि उन्हें नाच-गाने तक सीमित न रहकर अपने बुढ़ापे की सुरक्षा हेतु कुछ अन्य कार्य भी करने की कोशिश करना चाहिए।

अभी हाल में ही टी.वी. सीरियल के रूप में शक्ति - अस्तित्व के अहसास की में किन्नरों की विभिन्न समस्याओं को दिखाया गया है और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास भी दिखाए गए हैं। पर उस प्रयास में उन लोगों को आने वाली बाधाओं का भी सुंदर और सफल चित्रण किया गया है कि किस प्रकार जो लोग सहानुभूति रखते हैं, इन्हें जोड़ना भी चाहते हैं, उन्हें भी किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है। फिर भी वे लोगों में जागरूकता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं कि किन्नर भी इंसान हैं और इनसे हमें इंसान की तरह ही व्यवहार करना चाहिए। इनके प्रति सहानुभूति भी हो, इनके विकास की ओर भी ध्यान हो और इन्हें मुख्यधारा से भी जोड़ा जा सके।

अब हम बात करेंगे उस नाटक शिखंडी की, जो आदरणीय भरत वेद के द्वारा रचित है। बुक क्लीनिक से इसका प्रकाशन हुआ है। अंजनी कुमार जी ने इसकी समीक्षा भी की है। उसी के आधार पर कहना चाहूँगी कि जिस वर्ग को केवल हास्य या विदूषक का पर्याय माना जाता है, उसी की आड़ लेकर कभी स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को संकेत दिया था और उसी की आड़ में वे भीष्म को बाणों से छेद सके थे। तो शिखंडी रूपी शुष्क वृक्ष ने किस प्रकार न केवल विजय की प्राप्ति दिलाई, बल्कि अपने रूप से जीवन में प्रसन्नता भरने का भी कार्य किया।

समीक्षा के अनुसार किस प्रकार सामाजिक दबाव, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और नर्मदा के धारी-किया युक्त माला रूप का एक बड़ा हिस्सा समाज व्यवस्था में अपनी पावर स्टार की भागीदारी के लिए संघर्षरत है।

वह अपनी हीनता के अवसाद से ऊपर उठकर रूदाली नहीं, हर्षाली बनकर मानव जीवन में उत्सव का आनंद भरकर ही हँसते से बना हुआ है। क्या आज के सभ्य समाज के सभी सोच वाले गाल पर मानवीय भेदभाव के विद्रोह को शुरू कराने की दिशा में करारा प्रहार है? इस नाटक ने हल्ला जीवन के संघर्ष को मानव जीवन की बंद और तंग गलियों से बाहर चौसर वर्णित चतुर्दिक विकास की सड़कों पर लाने का प्रशंसनीय कार्य किया है।

जी हाँ, एक नेता दौलत राम की कीरन, रमजानी, शोभाराम ने किस तरह जागरूक किया कि वह शिखंडी समाज हेतु उनकी हर शर्त को मानने को तैयार हो गया और उन्हीं की बदौलत विजय भी मिली।

इस तरह से शिखंडी समाज ने आज जागरूक होते समाज का सुंदर संदेश सबको दिया है। वेद जी ने इनके माध्यम से यह करवाया है कि आज अपना-अपना हँसना सभी को आता है और हँसी में क्या आवश्यकता भी है, चाहे वह किन्नर समाज ही क्यों न हो।

निश्चित रूप से भरत वेद जी का यह नाटक लोगों में मानवता के प्रति जागरूकता उत्पन्न करेगा और तृतीय लिंगी मानव के प्रति संवेदना उजागर करने का कार्य करेगा। इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं और हम उनसे आगे भी इस तरह की जागरूक रचनाओं की आशा करते हैं। उन्हें बहुत-बहुत बधाई पुनः।

अंत में हम यही कह सकते हैं कि फिल्म और नाटकों ने भी किन्नरों को पहचान दिलाने में विशेष योगदान दिया है। लोगों में जागरूकता फैलाने का कार्य भी किया है। आज हिंदी साहित्य में चाहे उपन्यास हो, कहानी हो, कथा हो, सभी के माध्यम से किन्नरों के प्रति समाज में जागरूकता उत्पन्न करने और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का जो संदेश दिया जा रहा है, उसका लाभ उन तक पहुँच रहा है। लोग समझने लगे हैं, उन्हें पहचान मिलने लगी है। सरकारी नौकरियों में उनके आरक्षण बन गए हैं और किन्नर कौशल्या आनंद गिरि को देखिए कि आज वह किन्नर अखाड़े की प्रदेश प्रभारी और महामंडलेश्वर हैं, जिन्होंने 40 खानाबदोश किन्नरों को अपनी औलाद माना है। इसी प्रकार किन्नर सोनू ने भी अपनी अलग पहचान बनाई है और कई किन्नर आज विधायक और राजनीति के विभिन्न पदों पर भी हैं। तो कुल मिलाकर नाटकों और फिल्मों के योगदान को भी कम नहीं आँका जा सकता। थोड़ा-थोड़ा ही सही, पर जागरूकता बढ़ाने के लिए उनका भी योगदान है।

डॉ. रश्मि लता मिश्रा
बिलासपुर।

(सौजन्य/साभार - संदर्भ हेतु गूगल के विभिन्न आलेख)

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