सिनेमा जहां मानवीय भावनाओं की प्रगतिशील अभिव्यक्ति है वहीं जीवन को सरलता से समझने का एक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण भी है। सिनेमा मानवीय मूल्यों का एक सतरंगा कैनवास है जिसमें सुख-दुख,उमंग, उल्लास, मौन वेदना और ना जाने कितने जीवन के रंगों का खूबसूरती से चित्रण है। हमारा समाज स्त्री और पुरुष के परस्पर संबंध का सूचक है और सिनेमा समाज का आईना है।
हमने देखा है कि सिनेमा स्त्री और पुरुष द्वारा अभिनीत एक साझा उपक्रम है, परंतु भारतीय फिल्मों का यदि एक क्रमबद्ध विश्लेषण किया जाए तो निष्कर्ष के रूप में आप पाएंगे कि भारतीय सिनेमा की सफलता में महिलाओं का योगदान अतुलनीय है।
भारतीय सिनेमा ने हाल ही अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश किया है। १०० वर्षों की इस यात्रा में नायिकाओं के अभिनय का अपने समय के समाज पर बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा है। आम स्त्री सदैव ही परदे की नायिकाओं से प्रभावित होती रही। किसी ने सुंदरता निहारी तो किसी ने गुणों को आत्मसात किया। कुल मिलाकर फिल्मों के नारी पात्रों और वास्तविक नागरिक समाज में एक गहरा अंतर संबंध पाया गया है। वर्तमान में औरत की स्थिति वास्तविक और परदे के किरदारों का सामूहिक प्रभाव है।
आजादी के बाद भारत में फिल्मों का व्यवसायिक स्तर पर निर्माण शुरू हुआ। उस समय किसी भी महिला का फिल्मों के क्षेत्र में आना प्रतिबंध था, महिलाओं का किरदार भी पुरुष ही निभाते थे। ऐसे समय में महिलाओं का थिएटर और फिल्मों से जुड़ना वास्तव में एक क्रांतिकारी फैसला था। तो आज सिनेमा की इस स्वर्णिम यात्रा में हम रूबरू होंगे उन महिला अदाकारों से जिन्होंने भविष्य के सिनेमा में न केवल महिलाओं की सहभागिता को सुनिश्चित किया अपितु उन्हें शिखर पर पहुंचाया।
देविका रानी- देविका रानी भारतीय सिनेमा की पहली सफल अभिनेत्री थीं। लोग उन्हें स्टार सितारा के नाम से संबोधित करते थे। आजादी के पूर्व किसी स्त्री का फिल्मों में काम करना समाज की परंपरागत सोच को चुनौती देना था। चूकि देविका रानी एक बहुत ही पढ़े-लिखे कुलीन परिवार से ताल्लुक रखती थी इसलिए फिल्म इंडस्ट्री में काम करना उनके लिए सरल था। कहा जाता है कि विख्यात कवि श्री रविंद्र नाथ टैगोर रिश्ते में देविका रानी के चचेरे परदादा थे। १९३३ में प्रदर्शित फिल्म कर्मा ने देविका रानी को रातों-रात स्टार बना दिया। सिनेमा में उत्कृष्ट योगदान देने हेतु सन १९६९ में देविका रानी को दादा साहब फालके पुरस्कार प्रदान किया गया। सिनेमा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला एक और प्रसिद्ध चेहरा हुआ करता था राजकुमारी दुबे का। मात्र १० वर्ष की आयु से राजकुमारी जी स्टेज पर गाने लगीं,१५ वर्ष की आयु में उन्होंने फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया। उनकी आवाज की लोकप्रियता का आलम यह था कि उनका गाया गाना `सुन बरी बालम सच बोल रे, इब क्या होगा' घर-घर सुनाई देता था। उन्होंने गुजराती,पंजाबी फिल्मों में भी गाने गाए। इसके अलावा उन्होंने फिल्म `महल और’ `पाकीजा’ में भी कुछ गीत गाए। लगभग १०० गीत उनके खाते में दर्ज हैं। सन २००४ में राजकुमारी दुबे ने मुंबई में अंतिम सांस ली।
सुरों की सरताज सुरैया- १९४० से १९५० के दशक का सिनेमा लोकप्रिय गायिका और अभिनय की सरताज सुरैया के सुरूर में खोया हुआ था। सुरैया को हिंदी सिनेमा में `मलिकाए तरन्नुम' के खिताब से नवाज़ा गया। देवानंद और सुरैया की जोड़ी परदे पर बेहद कामयाब रही। सन २००४ में सुरैया जी का मुंबई में निधन हो गया।
इसी दौरान हिंदी सिनेमा में एक नई अभिनेत्री का प्रवेश हुआ जिन्होंने अपने अभिनय से हिंदी सिनेमा को मजबूती प्रदान की। सन १९५२ में आई फिल्म बैजू बावरा से मीना कुमारी ने हिंदी सिनेमा को अपने अभिनय के मोहपाश में बांध लिया। इस फिल्म की सफलता से मीना कुमारी दर्शकों की चहेती अभिनेत्री बन गईं। उन्हें इस फिल्म के लिए फिल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार प्रदान किया गया। मीना कुमारी के संजीदा अभिनय और दर्द भरी आवाज के चलते फिल्मी जगत में उन्हें `ट्रेजेडी क्वीन’ के नाम से पुकारा जाने लगा था।
फिल्मों में अपने सहज अभिनय और अप्रतिम खूबसूरती से अभिनेत्री मधुबाला ने भी खूब नाम कमाया। फिल्म `मुगले आज़म’ उनके फिल्मी करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म थी, जिसमें अनारकली की भूमिका निभाकर उन्होंने ऊंच-नीच और जातीय प्रथा जैसी सामाजिक कुरुतियों का पुरजोर विरोध किया है। मधुबाला जी ने अनारकली के किरदार के माध्यम से लोगों को इतिहास से जागरूक करवाया, वहीं प्रेम का असली स्वरूप और समाज में इसकी मान्यताओं को भी उजागर किया। मीना कुमारी,मधुबाला जैसी महान अभिनेत्रियों के साथ एक और अभिनेत्री रहीं जिन्होंने कांटो से आंचल खींचा और बिखरते वैवाहिक संबंधों से समाज को उबरना सिखाया। जी हां, वहीदा रहमान जी। इन्हें हाल ही दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्राप्त हुआ है।
कागज के फूल, चौदवी का चांद, तीसरी कसम, पत्थर के सनम और भी ना जाने कितनी क्लासिक फिल्मों को वहीदा जी ने अपने विशिष्ट अभिनय से संवारा है।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में नरगिस दत्त जी का नाम भी बड़ी शिद्दत से लिया जाता है। फिल्म मदर इंडिया में राधा के रूप में जहां नरगिस साहूकारिता के दंश झेलती हैं, वहीं दूसरी ओर स्त्री के मान-सम्मान की रक्षा करने हेतु अपने ही बेटे बिरजू को गोली मार देती हैं। न्याय के तराजू में तुलती ममता स्त्री की अस्मिता के मान से हार जाती है। नरगिस जी को इस फिल्म के लिए श्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार दिया गया।
इसी श्रृंखला में जातीय भेदभाव के खिलाफ लड़ती फिल्म सुजाता में अभिनेत्री नूतन ने अपने अभिनय से दर्शकों के दिल में अमित छाप छोड़ी है। एक अछूत कन्या को अपनाना और फिर अपने निजी स्वार्थ की पूर्णता के लिए उसे अछूत बताकर त्याग देने की कोशिश करना इस फिल्म की कहानी है। यह फिल्म दर्शाती है कि किस तरह जातिवाद का ज़हर लोगों में मनोवैज्ञानिक हीनता का अनुभव कराता है। नूतन जी द्वारा अभिनीत फिल्म बंदिनी भी पूरी तरह नारी के मनोभावों को पर्दे पर गढ़ने में सफल होती है। सिनेमा में महिलाओं के योगदान में सुप्रसिद्ध अभिनेत्री सुचित्रा सेन को भी हम नहीं भूल सकते।
फिल्म आंधी में आरती देवी (सुचित्रा सेन) एक राजनेता की भूमिका में नज़र आती हैं, जिस पर पुरुष प्रधान समाज की बंदिशें और अपेक्षाएं साफ़ दिखाई पड़ती हैं और अंत में उनका जनसभा में दिया गया बेबाक भाषण एक बार फिर नारी के परिणीता और नारायणी होने का प्रत्यक्ष अनुभव कराता है। ७० के दशक में आई सांवली सलोनी रेखा ने अपनी लगन और मेहनत से फिल्म इंडस्ट्री का दिल जीत लिया। कमर्शियल और आर्ट फिल्में दोनों ही में रेखा जी ने अपने अभिनय का लोहा मनवाया। वह चाहे सिलसिला की चांदनी हों या उमराव जान में अपने अस्तित्व की तलाश करती वैश्या, वे हर किरदार में बेहद उम्दा नजर आई हैं। रेखा जी भी दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित की जा चुकी हैं।
बात ८० के दशक की करें तो फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कई बदलाव आए और तकनीकी परिवर्तन के साथ फिल्मों के विषय भी बदले। पुनः एक बार फिर भारतीय महिलाओं का फिल्मों में काम करने के लिए आकर्षण बढ़ा। इस समय फिल्मों में अपने नृत्य और अभिनय से श्रीदेवी ने दर्शकों का दिल जीत लिया। उन्हें थंडर थाइज के नाम से भी पुकारा जाता था। उनके द्वारा अभिनीत फिल्म नागिन, लम्हे और चांदनी आज भी दर्शकों की पसंदीदा फिल्में हैं। श्रीदेवी को भी भारत सरकार ने कला के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान हेतु पद्मश्री से नवाजा। श्रीदेवी के बाद एक और भारतीय महिला हैं जिन्हें उनके शानदार फिल्मी करियर के लिए याद रखा जाएगा। जी हां, धक-धक गर्ल माधुरी दीक्षित।
कथक नृत्य कला में पारंगत माधुरी जी जितनी अच्छी डांसर हैं, उससे कहीं ज्यादा एक कुशल अभिनेत्री हैं। दर्शकों पर माधुरी दीक्षित की दीवानगी सर चढ़कर बोलती रही। तेजाब,राम-लखन और दिल जैसी रोमांटिक फिल्मों के साथ-साथ माधुरी दीक्षित ने बेटा, मृत्युदंड और गुलाब गैंग में अभिनय कर संपूर्ण फिल्म जगत में स्त्रियों की असीमित कला क्षमता का परचम फहराया है। माधुरी दीक्षित को भी पद्म श्री पुरस्कार प्राप्त है।
अतीत की सुनहरी यादों के साथ वर्तमान समय में भी भारतीय महिलाओं ने सिनेमा पर अपना प्रभुत्व बरकरार रखा है। बात चाहे डर्टी गर्ल, परिणीता में अभिनय करने वाली विद्या बालन की हो या फिर भूल भुलैया में भूत की भूमिका निभाती अभिनेत्री तब्बू की हो, भारतीय सिनेमा में सेंटर आफ अट्रैक्शन अभिनेत्रियां ही रहीं हैं। अभी कुछ साल पहले आई फिल्म गंगूबाई काठियावाड़ी, जिसमें अभिनेत्री आलिया भट्ट ने मुंबई के कमाठीपुरा में रहने वाली एक वैश्या का किरदार निभाया था, इस फिल्म को भी दर्शकों का भरपूर प्यार मिला। आलिया जी ने अपने अभिनय से साबित कर दिया कि स्त्री चाहे तो कीचड़ में भी कमल खिला सकती है।
यूं तो समाज के हर क्षेत्र में महिलाओं का योगदान है, परंतु सितारों सी चमकती और फूलों सी महकती नारी ने पुरुष प्रधान समाज में फिल्मों में अपनी उपस्थिति और दमदार पारी खेलकर आज से कई साल पहले ही नारी सशक्तिकरण का बिगुल बजा दिया था। समाज की जिन जटिलताओं को किताब भी नहीं समझ सकती, उन समस्याओं को पर्दे पर अभिनीत किरदारों ने स्त्री को सिनेमा के साथ-साथ समाज के केंद्र में रखने का भी प्रयास किया है।
सिनेमा कल भी स्त्रियों का था और आज भी स्त्रियों का रहेगा। भारतीय सिनेमा में अपनी अभिनय क्षमता से समाज को, परिवार को,राष्ट्र को जागृत करने वाली इन महिला अभिनेत्रियों को हमारा नमन और अशेष शुभकामनाएं!
दीये की भाती जलते हैं
बिजली सा दमकते हैं
हम चाँद - सूरज के जैसे
हर दिन ,हर पल चमकते हैं
डॉ. वर्षा महेश