चाचा जी

यह संस्मरण स्व. अमरेश सिंह के जीवन की प्रेरक और भावुक कर देने वाली कहानी है। बचपन में माता-पिता को खोने के बाद बड़े भाई चन्द्रेश सिंह और भाभी के संरक्षण में उनका पालन-पोषण हुआ। सीमित शिक्षा के बावजूद उन्होंने मेहनत और शारीरिक क्षमता के बल पर रेलवे सुरक्षा बल में नौकरी प्राप्त की। मुंबई में जीवन बिताते हुए उन्होंने परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाईं, कठिन परिस्थितियों का सामना किया और परिवार की आर्थिक उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यह कहानी भाईचारे, त्याग, संघर्ष और पारिवारिक एकता के अमूल्य संदेश को सामने लाती है। सारांश कॉपी करें

Oct 13, 2026 - 13:29
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चाचा जी
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मेरे पिताजी दो भाई थे। बाबूजी का नाम दादा स्व.दलजीत सिंह ने चन्द्रेश सिंह रखा था। चाचाजी का नाम दादी ने बाबूजी से मिलता-जुलता अमरेश सिंह रखा क्योकि चाचाजी के पैदा होने के पहले दादाजी असमय ही काल के गाल में समा गए। चाचाजी दस वर्ष के भी नहीं थे, दादी जी भी स्वर्ग सिधार गईं। माता-‌पिता विहीन लगभग दस वर्षीय बालक का पालन-पोषण मेरे पिताजी तथा माँ ने किया। चाचाजी का जन्म आजादी पूर्व लगभग १९४४-४५ में हुआ था । दादाजी की अल्पायु में मृत्यु होने के कारण पिताजी खुद नही पढ़ सके, बस  किसी तरह साक्षर थे। रामायण, महाभारत,गीता पढ़ लेते थे। इसे दैवीय वरदान भी कहा जा सकता है। सात-आठ वर्ष की उम्र होने के बाद ही उस समय बच्चे स्कूल जाया करते थे। स्कूल भी गाँव से दो-डेढ़ किलोमीटर दूर बंधवा बाजार में था। चौथी या पाँचवीं कक्षा पास होने बाद ही चाचा ने पढ़ाई छोड़ दी। बाबूजी पहलवान थे, उन्होंने चाचा को पहलवान बनाने की सोची। चाचाजी भैंस चराते,खेती-बारी के कामों में लगे रहते। बाबूजी गाय या भैंस का दूध निकालते, तुरंत जितना चाचा पी सकते थे पिलाते। चाचा का स्वास्थ्य अच्छा था, किंतु बाबूजी से कद-काठी में छोटे थे।
        आजादी के पहले ही हमारे गाँव के पाल मुंबई आ गये थे। अंधेरी (पूर्व) नागरदास रोड पर पंडोही पाल का तबेला था। हमारा गाँव बहुत संपन्न नहीं था। शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा था। १९६५ के बाद बंधवा बाजार में गंगादीन रामकुमार इंटर कालेज रामगढ़ स्कूल की स्थापना के बाद क्षेत्र में शिक्षा का प्रचार-प्रसार बढ़ा। चाचाजी १९६५ के पहले ही मुंबई आ गए। गाँव वाले पाल के तबेले में ही रहने लगे। पहलवानी में उत्‌नी कामयाबी नहीं थी किंतु शारिरिक बल भरपूर था। तबेले के बगल में ही कपड़े की दिलखुश कम्पनी थी,वहीं पर काम करने लगे। तबेले पर ही उनकी मुलाकात राजबहादुर सिंह से हुई जो डान मिल में क्लर्क थे। दोनों की दोस्ती बढ़ी तथा साथ-साथ रहने लगे। राजबहादुर सिंह की सलाह पर चाचाजी का सर्टिफिकेट गाँव से मँगाया गया ।उस समय पांचवीं पास लोगों की ‘आर.पी.एफ.’ (रेलवे सुरक्षा बल) में भरती हो जाती थी। चाचाजी पुलिस के रूप मे भरती हुए। रिपोर्टिंग करने के लिए अंग्रेजी के अक्षरों को सीखा । बाद में नायक के रूप में प्रमोशन हुआ। शिक्षा कम होने कारण आगे प्रमोशन नहीं हुआ। चाचाजी शारिरिक रूप से बहुत मजबूत थे। पढ़े कम थे लेकिन व्यवहारिक ज्ञान में तेज। पुलिसिया डायलाग से लोगों को हिला देते थे। 
चाचाजी की शादी लगभग१९७२ में हुई। उस समय मै लगभग तेरह वर्ष का था। मुझे काफी घटनाएँ याद हैं’। ‘शादी के बाद चाचीजी घर आईं। पहले दुलहनों को घर में गवाया,नचाया जाता था। मैं छोटा था इसलिए मैं भी वहाँ मौजूद था। चाची जी ने जो गीत सुनाया ‘और नृत्य किया उन गीतों का मुखड़ा मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहला गीत जिस पर नृत्य किया-
‘तनी होखे द सयान राजा हमरा के ।
जइसे लचके बाँस कै कईनिया 
वइसई लचकउबे राजा तोहरा के ।’
दूसरागीत भक्ति रस से परिपूर्ण था-
‘सुनिला सखी राम बड़े हऊवे दानी ।
 सबके त देने राम दुई-दुई लइकवा, 
हम का बिटअऊ में हानी – 
 सबके त देने राम पूरी मिठाइया 
हमका मकुनिउ में हानी । सुनिला...’ 
चाचीजी बहुत बुद्धिमान नहीं थीं, किंतु सीधी-सरल थीं। गाँव में ही परिवार के साथ रहती थीं।
       मुंबई में चाचाजी के दोस्त राजबहादुर सिंह डान मिल में मैनेजर हो गये। उनके भी कोई संतान न होने के कारण अपनी पत्नी को गाँव से लाना था। इसलिए मालाड में फ्लैट खरीदा तथा चाचाजी को मालाड (प.) चिंचवली बंदर रोड पर एक रूम खरीदवाया। उस समय का रूम जिसकी लोहे-पत्रे की दीवाल होती थी तथा ऊपर सीमेंट का पत्रा होता था। कई वर्ष कोई संतान न होने के कारण चाचाजी चाची को मुंबई ले आये। चाचा जी को तीन संतानें हुईं जिसमें एक पुत्री तथा दो पुत्र हुए। एक पुत्र की मृत्यु मुंबई से गाँव जाते समय इलाहाबाद में हो गई। जिसे चाचाजी ने कलेजे पर पत्थर रखकर गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया। उसकी उम्र कुछ ही महीने थी। २५ मई १९८२ को मेरी शादी थी, उसी कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए मामा मंगलाप्रसाद तथा बड़े भाई वृजलाखन सिंह के साथ घर आते समय यह दुर्घटना हुई। इस दुःखद घटना से पूरा परिवार हिल गया, बहू,बेटियाँ, फुआएँ सभी रोने लगीं। पिताजी ने शादी टालने की बात की, किंतु चाचाजी ने मना कर दिया और कहा- ‘शादी उसी तारीख को होगी और नाच-गाना सब होगा। कुछ भी बंद नहीं होना चाहिए।’ शादी धूमधाम से संपन्न हुई। चाचाजी के चेहरे पर कोई शिकन न थी। छुट्टी खत्म होने पर चाचाजी और बड़े भाई मुंबई लौट गए। उस समय गाँव में दुश्मनी तथा मुकदमे बाजी का दौर था। चाचाजी ने पिताजी का भरपूर सह‌योग किया  दोनों भाइयों में अपार प्रेम था। कम उम्र में ही दादा-दादी की मृत्यु हो जाने के कारण पिताजी मात्र बड़े‌ भाई की तरह नहीं बल्कि संरक्षक की तरह उनका पालन-पोषण किया था।
मालाड के छोटे से रूम में ही चाचाजी के साथ मामा, बड़े भाई रहते थे। छोटे भाई सूबेदार भी मुंबई आ गए। बाद में मामा ने एक रूम उसी-चाल में और खरीद लिया। जिसका परिवार रहता था वह अंदर के रूम में रहता था। बाहर के रूम मे अन्य सदस्य रहते थे। पुलिस होने तथा परिवार में कई मर्द होने के कारण च्ााचाजी का चाल में दबदबा था। ठाकुर साहब, बाबू साहब, हवलदार आदि नामों से उन्हें संबोधित किया जाता था।
एम.ए.,बी.एड. तक किसी तरह शिक्षा पूर्ण करने के बाद मैंने बहुत प्रयास किया किंतु उत्तर प्रदेश में नौकरी मन मुताबिक नहीं मिली। जून १९८५ में गाँव के लालजी सरोज जिसकी आर.पी.एफ. में नौकरी चाचा जी ने लगवाया था, मुंबई आ रहे थे, उन्हीं के साथ मैं भी मुंबई आ गया। उस समय काशी एक्सप्रेस से ही जंघई के इर्द-गिर्द के लोग आया करते थे। दादर में ही चाचा जी मुझे लेने आए। उनके साथ रात में मुझे मुंबई बहुत रंगीन लगी। चाचा जी पिक्चर देखने के बडे शौकीन थे। इसलिए सिनेमा के डायलागों का प्रयोग भी धड़ल्ले से करते थे। उन्होंने दादर में मुझसे कहा, ‘किस्मत तुम्हारी, प्रयास हमारा।'
हफ्ते में एक दिन की छुट्टी रहती थी। गाँव के लोग एक दूसरे से मिलने जाया करते थे। छुट्टी के दिन चाचा जी मुझे लेकर राजबहादुर सिंह के यहाँ गए। वह मालाड (पूर्व) स्टेशन के पास ही रहते थे। डान मिल में सेल्स मैनेजर थे। फ्लैट में रहते थे। उन्होंने कहा-‘बी.एड. किये हो तो कहीं मास्टरी का प्रयास करो, यदि नहीं मिलती है तो देखेंगे।’
        चाचाजी स्वास्थ्य के प्रति जागरुक रहते थे। खानपान पर बहुत ध्यान देते। मछली, मटन और अंडों का प्रयोग भी करते थे। ठाकुरी शान में बीड़ी, सुर्ती, सिगरेट के साथ कभी-कभी शराब का भी प्रयोग करते थे,लेकिन बहुत ही सीमित दायरे में। एक बार हमारे साले नरेन्द्र सिंह, लालजी सरोज तथा चाचाजी चखने के साथ मड़‌हे में बैठकर शाम को शराब पी रहे थे। मुझसे पानी माँगे मै लेकर गया। चाचाजी नशे में बोले-‘मास्टर आबादी के पूर्वी छोर पर एक मंदिर बनाना है।’ मैंने कहा, ‘ठीक है, पासबुक, चेकबुक दीजिए।’उनका नशा कापूर हो गया। बोले-‘मुझे मूर्ख समझते हो मै चेकबुक दे दूँगा।’ कहकर हँसने लगे ।
       १९९२ में चाचाजी का प्रमोशन हुआ। वह नायक बने, उनका स्थानान्तरण उस समय  फुलेरा राजस्थान हो गया। चाचा का परिवार गाँव में था। विवाह के दस वर्ष बाद अस्पताल में मेरी पत्नी को अक्टूबर में बच्चा पैदा होने वाला था। उसी समय बहुत ही कम उम्र में चाची जी का निधन हो गया। फोन की उस समय व्यवस्था नहीं थी । टेलीग्राम द्वारा सूचना मिली। मैं धर्म संकट में आ गया, अब क्या करूँ? गाँव जाऊँ या पत्नी को देखूँ। मैं भागा-भागा शाम को राजबहादुर सिंह के पास गया। उन्होंने कहा, ‘यह बहुत दुःखद् घटना है। तुम्हारे पिताजी खुद सक्षम हैं। बड़े भाई को १० हजार रूपया देकर भेज दो। पैसा नहीं है तो मैं देता हूँ।' दूसरे दिन मामा और बड़े भाई को दस हजार रुपया देकर चाची की तेरहवीं के लिए गाँव भेज दिया।चाचा का पारिवारिक जीवन लगभग २०-२२ वर्षों तक ही रहा। पुत्री बड़ी थी, पुत्र छोटा। दोनों की पढ़ाई, पालन-पोषण बहुत बड़ा संकट था। संयुक्त परिवार होने के कारण पुत्री को गाँव में तथा पुत्र को मुंबई में साथ में रखा। कठिन परिस्थितियों में चाचा जी हार नहीं माने। परिवार के लोगों का सहयोग लेकर अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया ।
        १९९३ में पिताजी ने घर बनाने की इच्छा जाहिर की। कच्चा मकान जर्जर हो चुका था। यद्‌यपि हमारे तीनो भाई-बहनों का विवाह उसी मकान से हो चुका  था। एक-एक कोठरी सबको मिली थी। हम तीन भाई थे। घर कैसे बने? इस पर गहन चर्चा हुई। स्वर्गीय राजबहादुर सिंह (सेल्स मैनेजर डान मिल) स्व. रामजी प्रधान,मामा एम.पी सिंह राजपति पाल के सामने बात हुई। मकान बड़ा ग्यारह घर का बनाया जाय। दो घर प्रवेश द्वार का कमरा, स्नानगृह सार्वजनिक रहेगा। दो-दो घर तीनों भाइयों को मिलेगा। तीन घर चाचा को मिलेगा) दो तिहाई खर्च हम तीनों भाइयों को देना पड़े‌गा तथा एक तिहाई चाचा जी को देना होगा। वसुही नदी के किनारे मुर्दहवा पर अमृतलाल गुप्ता ने भट्ठा खोला था जिसमें जमींन देकर काफी ईंटें मिल चुकी थीं। कमाई कम थी, पारिवारिक खर्च अधिक था। बड़े भाई वैद्‌यनाथ की दु‌कान पर काम करते थे। छोटे भाई आटो रिक्शा चलाते थे। मैं प्राइमरी का शिक्षक था। इसलिए घर बनाने में तीन वर्ष लगे। न तो प्लास्टर हो पाया न ही बरामदा बन पाया। १९९५ में चाचाजी ने अपनी लड़की सरिता की शादी करने की तैयारी की।
पिताजी बहुत ही सामाजिक थे। उन्होंने कहा नये घर से शादी करने के लिए गृह प्रवेश करना पड़ेगा। उसके लिए अखंड रामायण, कराकर पूरे क्षेत्र को खिलाया जायेगा। चाचाजी को मंजूर नहीं था। इसको लेकर विवाद बढ़‌ता देख मैंने चाचाजी से कहा-‘ आप विवाह की व्यवस्था देखिए, हम लोग बखरी का होम (गृहप्रवेश) की व्यवस्था देख लेंगे। कहना आसान होता है पर करना कठिन। उसके लिए गोमती नदी जौनपुर जाकर नाव से कील निकलवाना, राजा के दरवाजे की मिट्टी लाना, सत्ताइस कुओं से जल लाना बहुत काम था। बड़ी मेहनत के बाद यह कार्य पूरा हुआ। सरिता की शादी भी हो गई। चाचाजी ने लड़के की शादी भी जल्दी किए। उसमें शरीक होने के लिए गाँव से पिताजी, जीजा रामलखन सिंह, कड़ेदीन विश्वकर्मा आए। शादी होने के दो-तीन दिन बाद पिताजी और सभी का गाँव का टिकट था। चाचाजी ने अलग रहने का प्रस्ताव रखते हुए कहा- ‘भइया आपके लड़के, लड़कियों की शादी हो गई तथा मेरे भी लड़के, लड़की की शादी हो गई, अब हमें अलग हो जाना चाहिए।’
         ाfपताजी ने चाचाजी के हिस्से के खेत को जोतना-बोना छोड़ दिया। किंतु लड़के की शहर की शादी  न चल पाई। चाचाजी पुनः एक में हो गए। गाँव से दूसरी शादी हुई। चाचाजी की तबीयत कम ठीक रहती थी । बार- बार अस्पताल में भरती होना पड़ता था। मैने वालिन्ट्री रिटायरमेंट के लिए कहा ।नौकरी दो वर्ष बाकी थी। उन्होंने इस्तीफा दे दिया। पिताजी-ने चारोंधाम यात्रा की इच्छा जाहिर किया। हम सब पूरा परिवार घर गए। सात दिन तक भागवत सप्ताह चला। गया का भात दिया गया। कच्ची-पक्की दो दिन खाने की व्यवस्था की गई। पिताजी ने चाचाजी से खर्च की माँग की। उन्होंने देने से इन्कार कर दिया। विवाद बढ़ते देख मैंने कहा-‘पूरा खर्च में करूँगा।’ जिससे विवाद शांत हो गया।उसके बाद घर खेत सब पिताजी ने बाँट दिया। माँ के नाम से कुछ खेत था, उसमें भी हिस्सा दे दिया। उसके बाद आबादी में बँटवारा नहीं होने से चाचा जी असंतुष्ट रहे। १० मार्च २००८ को पिताजी की मृत्यु हो गई। चाचाजी ने मुझसे असंतुष्ट रहते हुए भी कहा करते थे-‘ मेरा अंतिम क्रिया-कर्म मास्टर गाँव में कर देना। चाचाजी ने दीक्षान्त गुरु श्री देवीप्रसाद महाराज से दीक्षा भी लिया। मांस-मदिरा सब छोड़कर पूजापाठ भी करने लगे। जीवन पूरा मुंबई में बीता। 
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मैं परिवार के साथ गाँव से मुंबई के लिए चला। वह भी अपने बेटे-बहू के साथ उसी दिन मुंबई से रवाना हुए। कहीं-न-कहीं आने-जाने वाली रेलगाड़ियाँ मिली होंगी, किंतु अंतिम समय दर्शन नहीं हो पाया। रास्ते में ही चाचा जी की तबीयत खराब थी। घर पहुँचने पर दूसरे दिन ज्यादा तबीयत खराब हुई। जीप से उन्हें मछली शहर ले जाया गया। डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित किया। रास्ते में ही उनकी मृत्यु हो चुकी थी। संदीप और‌ गाँव वालों के सहयोग से वाराणसी शव को ले जाया गया। उनके बेटे मनोज ने मणिकर्णिका घाट पर मुखाग्नि दी। ईश्वर ने उनकी इच्छा के मुताबिक उन्हें मृत्यु दी। अक्टूबर २०१७ की यह घटना है, उस समय मैं सेवानिवृत्त था। दूसरे दिन में और बड़ा भतीजा संजीव घर के लिए रवाना हुए। छोटे भाई सूबेदार तीन-चार दिन बाद पहुँचे। मामा मंगलाप्रसाद सिंह घर पर पहुँच चुके थे। उनकी इच्छा के ‌मुताबिक तेरहवीं का कार्यक्रम हुआ।
         चाचाजी बहुत मेहनती थे। घर के वह पहले व्यक्ति थे जो मुंबई आए। बाद में पूरा परिवार ही मुंबई में बस गया है। हमारे खानदान ने कई पुस्त से सरकारी सेवा की। दादाजी, चाचाजी ने पुलिस विभाग में नौकरी की। आज अनुज सूबेदार रेलवे सुरक्षाबल में कार्यरत हैं। परिवार की आर्थिक उन्नति में चाचाजी का बड़ा योगदान रहा। उनकी स्मृति से आज भी पीड़ा होती है, जैसे सामने खड़े हैं और कुछ कहना चाहते हैं। मेरी माँ ने मरते समय चाचा जी से कहा था- ‘रस्सी के धागे की तरह जुड़े रहना, तुम्हे कोई नहीं तोड़ पायेगा।’ इस बात का प्रायः जिक्र किया करते थे। अंतिम समय तक इसका पालन किया । 
रामसिंह चंदेश सिंह

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