वाह! क्या चटपटा जीवन है!
‘जीवन का चटपटापन’ आधुनिक समाज की मानसिकता, सोशल मीडिया के दिखावे, बढ़ती तुलना और असंतोष पर आधारित एक रोचक व्यंग्यात्मक लेख है। शर्मा जी, वर्मा जी, गुप्ता जी और मोहल्ले के नेता के संवादों के माध्यम से लेखक उस प्रवृत्ति पर कटाक्ष करता है, जिसमें लोग सामान्य और सुखी जीवन को नीरस समझने लगे हैं तथा अपनी परेशानियों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करके महत्व प्राप्त करना चाहते हैं। सोशल मीडिया पर दुखों की ब्रांडिंग, दूसरों की सफलता से ईर्ष्या, बाजार द्वारा नई इच्छाएँ पैदा करना और राजनीति द्वारा जनता को लगातार उत्तेजित रखना इस लेख के प्रमुख विषय हैं। लेखक बताता है कि आज मनुष्य अपने पास मौजूद सुख-सुविधाओं से संतुष्ट होने के बजाय दूसरों से तुलना करके स्वयं को दुखी बनाता है। जीवन को चटपटा बनाने की यह होड़ अंततः बेचैनी, दिखावे और मानसिक असंतोष को बढ़ावा देती है। हास्य और व्यंग्य के माध्यम से लेख यह संदेश देता है कि वास्तविक सुख बाहरी प्रदर्शन या समस्याओं की अधिकता में नहीं, बल्कि संतोष, सहजता और जीवन को उसकी वास्तविकता में स्वीकार करने में है।
उस दिन सुबह-सुबह शर्मा जी मेरे घर आ धमके। चेहरे पर ऐसी गंभीरता थी, मानो संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें विश्व-शांति का दायित्व सौंप दिया हो। मैंने पूछा, ठक्या बात है, शर्मा जी? बड़े परेशान दिख रहे हैं।ठ वे सोफे पर धम्म से बैठे और बोले, ठभाई साहब, जीवन में बड़ा संकट आ गया है।ठ मैं घबरा गया। मैंने सोचा, कहीं नौकरी चली गई, स्वास्थ्य बिगड़ गया या कोई पारिवारिक समस्या हो गई। मैंने पूछा, ठक्या हुआ?ठ शर्मा जी ने लंबी साँस ली और बोले, ठजीवन में चटपटापन खत्म हो रहा है।ठ मैं कुछ क्षण उन्हें देखता रहा। मुझे लगा, शायद उन्होंने सुबह की चाय की जगह कोई और द्रव्य ग्रहण कर लिया है।
ठमतलब?ठ
ठमतलब यह कि पिछले दस दिनों से कोई बड़ी समस्या नहीं आई। घर ठीक चल रहा है, दफ्तर ठीक चल रहा है, बैंक वाले फोन नहीं कर रहे, डॉक्टर ने भी रिपोर्ट सामान्य बता दी। अब बताइए, ऐसे नीरस जीवन का क्या करूँ?ठ मैंने कहा, ठशर्मा जी, इसे सुख कहते हैं।ठ
वे हँस पड़े। ठआप भी पुराने विचारों के आदमी हैं। आजकल सुख से कोई प्रतिष्ठा नहीं मिलती। प्रतिष्ठा तो संघर्ष से मिलती है।ठ मैं चुप हो गया। तर्क में दम था। आजकल आदमी जितना दुखी दिखाई देता है, उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है।
तभी वर्मा जी भी आ गए। वे मोहल्ले के स्वयंभू चिंतक हैं। दुनिया की हर समस्या पर उनकी राय होती है और अपनी किसी समस्या का समाधान नहीं। उन्होंने आते ही पूछा, ठकिस विषय पर चर्चा चल रही है?ठ शर्मा जी बोले, ठजीवन के चटपटेपन पर।ठ
वर्मा जी गंभीर हो गए। वे बोले-ठभाई साहब, मेरा जीवन तो एकदम चाट जैसा है।ठ
मैंने पूछा, ठकैसे?ठ
बोले, ठसुबह पत्नी नाराज़ रहती हैं, दफ्तर में बॉस खफा रहता है, बैंक किस्त माँगता है, डॉक्टर परहेज बताते हैं और बच्चे जेब खर्च बढ़ाने की माँग करते हैं।ठ
मैंने कहा, ठमित्रवर, यह जीवन नहीं, बहुस्तरीय आपदा प्रबंधन योजना है।ठ लेकिन वे अपनी बात पर अड़े रहे। उनका मानना था कि जिस जीवन में जितनी अधिक समस्याएँ होंगी, वह उतना ही चटपटा कहलाएगा।
वे बोले, ठदेखिए, आज देश में दो तरह के लोग हैं। एक वे, जिनका जीवन वास्तव में कठिन है। दूसरे वे, जो हर हालत में अपने जीवन को कठिन सिद्ध करना चाहते हैं। दूसरा वर्ग बहुत तेजी से बढ़ रहा है।ठ शर्मा जी ने तुरंत समर्थन किया।
ठबिल्कुल सही। मैंने तो सोशल मीडिया पर देखा है कि लोग सुबह की चाय पीकर भी लिखते हैं, 'आज का दिन बहुत संघर्षपूर्ण रहा।'ठ
मैंने कहा, ठलेकिन इसमें हानि क्या है?ठ
वर्मा जी बोले, ठहानि यह है कि लोग जीवन जीना भूल रहे हैं और उसका ट्रेलर दिखाने में लगे हैं। आज हर आदमी अपने जीवन का प्रचार मंत्री बना हुआ है। कोई अपनी खुशी का विज्ञापन कर रहा है, कोई अपने दुख का। सब कुछ सार्वजनिक है। केवल जीवन निजी नहीं रहा। अब तो दुखों की भी ब्रांडिंग हो रही है। पहले लोग दुख छिपाते थे, अब सजाकर दिखाते हैं। किसी को ब्लड प्रेशर है, तो वह ऐसे बताता है जैसे उसे कोई राष्ट्रीय पुरस्कार मिला हो। कोई कहता है, 'कल रात केवल दो घंटे सो पाया।' दूसरा तुरंत जवाब देता है, 'मैं तो तीन दिन से नहीं सोया।' यह प्रतियोगिता दुखों की नहीं, चटपटेपन की है।ठ
इसी बीच मोहल्ले के नेता जी भी आ पहुँचे। वे हर चर्चा में राजनीति घुसाने का संवैधानिक अधिकार रखते थे। उन्होंने पूछा, ठक्या मुद्दा है?ठ शर्मा जी बोले, ठजीवन का चटपटापन।ठ नेता जी मुस्कुराए। वे बोले, ठराजनीति ने जनता को बहुत कुछ दिया है।ठ
मैंने पूछा, ठक्या?ठ
वे बोले, ठनिरंतर उत्तेजना।ठ
ठवह कैसे?ठ
ठदेखिए, यदि जनता शांत हो गई तो प्रश्न पूछेगी। इसलिए उसे व्यस्त रखना आवश्यक है। एक दिन भाषा का विवाद, दूसरे दिन इतिहास का, तीसरे दिन धर्म का, चौथे दिन सीमा का। जनता को हर समय कुछ न कुछ चबाने के लिए मिलना चाहिए।ठ मैंने देखा, नेता जी के चेहरे पर गर्व था। मानो वे लोकतंत्र नहीं, चाट की दुकान चला रहे हों।
वर्मा जी बोले, ठसही कहा आपने। अब तो समाचार भी सूचना नहीं, मसाला बन गए हैं।ठ
नेता जी ने कहा, ठजनता को सादा भोजन पसंद नहीं।ठ
शर्मा जी ने तुरंत समर्थन किया।
ठऔर सोशल मीडिया तो चाट मसाला उद्योग का सबसे बड़ा कारखाना है।ठ सोशल मीडिया में हर आदमी अपने जीवन का होटल खोलकर बैठा है। कोई अपनी विदेश यात्रा परोस रहा है, कोई अपनी प्रेम कहानी, कोई अपनी असफलता और कोई अपनी सफलता। सोशल मीडिया ने मनुष्य को तीन चीजें दी हैं-तुलना, प्रदर्शन और बेचैनी। पहले आदमी अपनी कमीज देखकर खुश हो जाता था। अब वह पहले पड़ोसी की कमीज देखता है। फिर अभिनेता की। फिर उद्योगपति की। और अंत में अपनी कमीज से घृणा करने लगता है। यही आधुनिक विकास है।
तभी गुप्ता जी आ गए। वे मोहल्ले के सबसे सफल व्यक्ति थे और इसलिए सबसे अधिक दुखी भी। उनके पास बड़ा घर था, कार थी, व्यवसाय था। लेकिन संतोष नहीं था। उन्होंने बैठते ही कहा, ठजीवन बड़ा कठिन है।ठ
मैंने पूछा, ठअब आपको क्या कमी है?ठ
उन्होंने कहा, ठसामने वाले अग्रवाल जी ने दूसरी कार खरीद ली है।ठ
मैंने कहा, ठतो?ठ
वे बोले, ठतो अब मेरी पहली कार भी पुरानी लगने लगी है।ठ
शर्मा जी बोले, ठगुप्ता जी, आपका जीवन सचमुच चटपटा है।ठ
गुप्ता जी गर्व से मुस्कुरा दिए। उन्हें लगा जैसे किसी ने पद्मश्री दे दी हो। कुछ देर बाद चर्चा जीवन-दर्शन पर पहुँच गई।
मैंने पूछा, ठआखिर यह चटपटेपन की भूख आई कहाँ से?ठ
वर्मा जी बोले, ठबाजार से।ठ आज यह संस्था मनुष्य को यही समझा रही है कि वह पर्याप्त नहीं है। उसके पास जो है, वह कम है। जो मिला है, वह अपर्याप्त है। जो मिला नहीं, वही आवश्यक है। यही आधुनिक सभ्यता का मूलमंत्र है। असंतोष ही अर्थव्यवस्था का ईंधन है। बेचैनी ही राजनीति की पूँजी है और तुलना ही सोशल मीडिया की प्राणवायु है। इन सबके बीच पिसता हुआ मनुष्य कहता है-ठमेरा जीवन बहुत चटपटा है।ठ
शाम होने लगी थी। सभी लोग उठने लगे।
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जाते-जाते शर्मा जी ने कहा, ठभाई साहब, आज की चर्चा बहुत अच्छी रही।ठ
मैंने पूछा, ठतो अब क्या निष्कर्ष निकला?ठ
वे मुस्कुराए और बोले-ठनिष्कर्ष यह निकला कि जीवन उतना चटपटा नहीं है, जितना हम उसे बना लेते हैं।ठ
मैंने राहत की साँस ली। मुझे लगा कि शायद शर्मा जी को ज्ञान प्राप्त हो गया। लेकिन अगले ही क्षण उन्होंने कहा-ठफिर भी थोड़ा चटपटापन बना रहना चाहिए, वरना सोशल मीडिया पर पोस्ट क्या करेंगे?ठ
और मैं समझ गया कि चटपटापन अभी समाप्त नहीं हुआ है। दुनिया चलती रहेगी। लोग तुलना करते रहेंगे। नेता उत्तेजना बेचते रहेंगे। बाजार इच्छाएँ बेचता रहेगा। सोशल मीडिया बेचैनी बेचता रहेगा। और आदमी, अपनी ही बनाई हुई जलन में आँसू बहाते हुए कहता रहेगा-ठवाह! क्या शानदार, क्या रोमांचक, क्या चटपटा जीवन है!ठ
प्रभाष पाठक
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