पाकीज़ा
‘पाकीज़ा’ महक की संघर्षपूर्ण जीवन-यात्रा पर आधारित एक भावनात्मक कहानी है, जो स्त्री की गरिमा, आघात से उबरने, पारिवारिक प्रेम और आत्मसम्मान का संदेश देती है। पिता जीत अपनी बेटी के जीवन के हर पड़ाव को खुशी से स्वीकार करते हैं और पहली माहवारी को भी उत्सव बनाकर उसके प्रति संवेदनशीलता का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। लेकिन किशोरावस्था में महक के साथ हुई एक भयावह घटना उसके जीवन को गहरे मानसिक आघात में धकेल देती है। लंबे संघर्ष, परिवार के सहयोग और काउंसलिंग के सहारे वह अपने जीवन को फिर से सँवारती है और साइकोथेरेपिस्ट बनकर दूसरों की मदद करने लगती है। विवाह और मातृत्व के बाद भी उसका अतीत कभी-कभी उसके मन में डर जगाता है। जेल में दो कैदियों की काउंसलिंग के दौरान उसे अपने परिवार से जुड़ा एक अप्रत्याशित सच पता चलता है, जो उसके जीवन और अपराध की प्रकृति को लेकर कई सवाल खड़े करता है। कहानी का मूल संदेश है कि किसी भी अपराध के लिए पीड़ित व्यक्ति दोषी नहीं होता और किसी के साथ हुई हिंसा उसकी गरिमा या पहचान को कम नहीं कर सकती। महक अंततः अपने अतीत को स्वीकार करके उसे अपने भविष्य पर हावी नहीं होने देती।
“महक, चल जल्दी तैयार हो जा... सब लोग आते ही होंगे।” घर में आज खूब चहल-पहल थी। महक बारह साल की हो चुकी थी।
“जीत, तू इतना जश्न क्यों मना रहा है? आखिर बात क्या है?” महक की माँ नीतू ने जीत से पूछा। जीत मुस्कुराते हुए बोला, “महक, बोल बेटा... तुझे क्या चाहिए?” महक ने मासूमियत से कहा, “पापा, मुझे तो आपके जैसे पापा चाहिए।” नीतू यह सुनकर चिढ़ गई।
तभी एक पड़ोसन ने पूछा, “बहनजी, आपके घर में आज किस बात की रौनक है?” नीतू ने कहा, “कुछ नहीं... आप सपरिवार शाम सात बजे तक आ जाना। केक कटिंग है... सरप्राइज़ पार्टी।”
“जी, ज़रूर।”
तभी किसी ने गीता भाभी से पूछा, “अरे गीता भाभी, आपको भी महक की बर्थडे पार्टी में जाना है क्या?” गीता बोली, “जाना तो है, पर समझ नहीं आ रहा... महक का जन्मदिन तो छह महीने पहले था। अब किस बात की केक कटिंग?” नीतू मुस्कुराकर बोली, “चलो, शाम को पता चल जाएगा।” शाम होते ही मेहमान आने लगे। महक भी तैयार होकर आ गई। घर में हर कोई किसी सरप्राइज़ का इंतज़ार कर रहा था।
तभी जीत की आवाज़ गूँजी- “सब चलो... केक काटना है! महक, बेटा इधर आओ।” महक जैसे ही केक के पास पहुँची, उसकी नज़र केक पर लिखे शब्दों पर पड़ी- “पहली माहवारी” बेटी पहली बार मासिक धर्म से हुई थी और पिता ने उसके जीवन के इस स्वाभाविक पड़ाव को भी उत्सव बना दिया था। उस दिन महक को समझ आया कि उसके पिता के लिए बेटी का हर पड़ाव खुशी का कारण था। समय बीतता गया।
कुछ समय पश्चात...
महक स्कूल से घर नहीं लौटी। परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। तीसरे दिन वह रानी तालाब के किनारे बेहोश मिली। आनन-फानन में लोग उसे अस्पताल ले गए। जाँच के बाद डॉक्टर ने जो बताया, उसने पूरे परिवार की दुनिया हिला दी। महक उस असहनीय पीड़ा को सह नहीं सकी और कोमा में चली गई। परिवार पर जैसे आसमान टूट पड़ा। तीन साल तक जीत और नीतू अपनी बेटी के लौटने का इंतज़ार करते रहे। जब महक पंद्रह वर्ष पार करके सोलहवें वर्ष में पहुँची, तो एक दिन वह कोमा से बाहर आई। धीरे-धीरे उसकी यादें लौटने लगीं। उसके लिए काउंसलिंग शुरू की गई। जीत और नीतू अपनी बेटी का मजबूत आधार बनकर उसके साथ खड़े रहे। महक ने अपने दर्द से हारने के बजाय उससे लड़ना सीखा। पढ़ाई के लिए उसे बाहर भेज दिया गया। उसने अपनी ज़िंदगी को फिर से सँवारा और डॉक्टर बनी-साइकोथेरेपिस्ट। दिल्ली में उसका अपना क्लिनिक था। साथ ही, वह जेल में कैदियों की काउंसलिंग करने भी जाया करती थी। इसी दौरान उसकी मुलाकात जेलर राज से हुई। बातचीत के दौरान महक ने राज को अपने बचपन के उस भयावह अनुभव के बारे में बताया। सच्चाई जानने के बाद भी राज ने उसका साथ नहीं छोड़ा। दोनों ने विवाह कर लिया।
एक साल बाद उनके घर एक नन्ही-सी बेटी ने जन्म लिया। समय बीतता गया। महक पैंतीस वर्ष की हो चुकी थी और उसकी बेटी पाँच साल की। लेकिन बेटी के जन्म के साथ ही महक के भीतर दबा हुआ पुराना डर फिर जाग उठा- “कहीं मेरी बेटी के साथ भी...?” वह खुद को समझाती। अपनी बेटी को देखती और फिर अपनी ही काउंसलिंग करती। वक्त अपनी रफ्तार से गुजरता रहा। एक दिन जेलर राज ने महक से कहा- “महक, आज जिन दो कैदियों की काउंसलिंग के लिए तुम आने वाली हो, वे बहुत खतरनाक हैं। दोनों एक गंभीर दुष्कर्म के मामले में बंद हैं और उन्हें मृत्युदंड मिलने की संभावना है।” महक जेल पहुँची। उसने दोनों कैदियों की काउंसलिंग शुरू की। वह उनके वर्तमान व्यवहार के पीछे छिपे अतीत को समझना चाहती थी।
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उनके बचपन से लेकर उनकी परवरिश तक की जानकारी जुटाते-जुटाते महक को पता चला कि दोनों बचपन में एक ही अनाथालय में रहते थे। बचपन से ही उनका व्यवहार बेहद हिंसक था। आगे की जानकारी जुटाने पर पता चला कि किशोरावस्था में भी वे बाल सुधार गृह जा चुके थे। महक ने उनसे बात की। दोनों ने बताया कि बचपन से ही उनके भीतर किसी को देखकर गुस्सा और हिंसा उमड़ पड़ती थी। महक के मन में एक सवाल उठा- “क्या इनके भीतर भी कोई ऐसा बचपन छिपा है, जिसे कभी किसी ने समझने की कोशिश नहीं की?” वह उसी अनाथालय पहुँची। वहाँ बच्चों के जन्म प्रमाण-पत्रों की जाँच करते हुए अचानक उसके पैरों तले की ज़मीन खिसक गई। उसने तुरंत अपने पिता जीत को फोन किया। सच्चाई जानने के बाद उसकी आँखों के सामने जैसे सब कुछ घूम गया।
माँ ने उसे बताया- जब महक कोमा में थी, तब उसने जुड़वाँ बेटों को जन्म दिया था। उन बच्चों को पालने की स्थिति में न होने के कारण जीत और नीतू उन्हें अनाथालय छोड़ आए थे। महक की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे पहली बार महसूस हुआ- “हर बार परवरिश ही दोषी नहीं होती... कभी खून भी..।” जेलर राज को उसके पिता जीत ने यह पूरी सच्चाई पहले ही बता दी थी। महक ने भीगी आँखों से राज की ओर देखा।
राज ने कहा- “महक, तुम्हारे साथ जो हुआ, उसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं था। तुम्हारी पवित्रता किसी दूसरे के अपराध से कम नहीं हो सकती।” महक की आँखों से आँसू बह निकले.. अब महक ने अपने अतीत को बदला नहीं था... बस उसे अपने भविष्य पर हावी होने से रोक दिया था। और शायद यही उसकी सबसे बड़ी जीत थी। लोगों ने उसके जीवन पर कई नाम लिखे थे-पीड़िता, बेटी, माँ, डॉक्टर... और समाज ने भी पाकीज़ा कहकर अपना लिया..। परन्तु वो नन्ही आत्मा, जिसने खूब सहा, वो चेहरे, वो मुखौटे उस पाकीज़ा को झकझोर देते हैं और फिर वो आत्मा महक से कहती है कि कल भी तू पाकीज़ा थी, आज भी है और कल भी तू पाकीज़ा ही रहेगी।
वंदना जानी
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