शुभ्रा मेटरनिटी अस्पताल के लेबर रूम में थी। प्रतीक्षालय में बैठे अमेय और उनकी माँ कुंती देवी, दोनों के चेहरों पर चिंता के भाव स्पष्ट अंकित थे। कुंती देवी मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना कर रही थीं कि उनकी मनोकामना पूर्ण हो जाए और उनके आँगन में पोते की किलकारियाँ गूँज उठें।
कुछ ही देर बाद नर्स ने गुलाबी तौलिये में लिपटे शिशु को कुंती देवी की गोद में दे दिया और खिलखिलाते हुए बोली, ‘अम्मा जी, लक्ष्मी आई हैं! मिठाई खिलाइए।’ नर्स के मुख से निकले ये शब्द क्षणभर के लिए कुंती देवी को कर्कश-से प्रतीत हुए और उनका चेहरा उतर गया। पास में बैठे अमेय ने नर्स से तुरंत सवाल किया, ‘मैडम, तो ठीक हैं न? `नर्स ने उत्तर दिया, ‘हाँ जी सर! जच्चा और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं।’ अमेय ने बेटी की खुशी में पूरे अस्पताल में मिठाई बँटवा दी।
तीसरे दिन शुभ्रा अस्पताल से छुट्टी मिलते ही अपनी नन्हीं गुड़िया के साथ घर आ गई। वह दिन-रात अपने कलेजे के टुकड़े हंसिनी की देखभाल में लगी रहती और उसके भावी जीवन के इंद्रधनुष को मनभावन रंगों से सँजोने में खोई रहती। अमेय अपने कार्यालय के कार्यों में व्यस्त रहते।
हंसिनी के पैरों में खनकती पायल की रुनझुन और उसकी तोतली बोली ने शुभ्रा और अमेय के जीवन को खुशियों से भर दिया था। कभी-कभी शुभ्रा सोच में पड़ जाती कि जब यही बेटी किसी दिन दुल्हन बनकर डोली में बैठकर पराए घर जाएगी, तब उसके हृदय पर क्या बीतेगी? पर अगले ही क्षण वह स्वयं को समझा लेती, ‘अरे! यह तो संसार की रीति है... बेटियाँ तो पराया धन होती हैं।’ और उसकी आँखें गीली हो जातीं।
समय पंख लगाकर उड़ता गया। हंसिनी ने स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। वह आधुनिक विचारों वाली युवती यौवन के ऐसे मोड़ पर थी, जहाँ सही-गलत की समझ प्रभावहीन हो जाती है। सौंदर्य की प्रतिमूर्ति हंसिनी—पाँच फीट पाँच इंच लंबी, गोरी-चिट्टी, पतले गुलाबी होंठों वाली—कमरे में रखी ड्रेसिंग टेबल के सामने ठिठकी और नीचे से ऊपर तक अपना मुआयना किया। उसके चेहरे पर प्रेम की हल्की लालिमा छिटक रही थी, जिसकी भनक उसने अपने माता-पिता को नहीं लगने दी थी।
अपने हल्के सुनहरे बालों को सँवारते हुए वह माँ से कहने लगी, ‘माँ! आप चिंता मत करना, मैं शाम तक लौट आऊँगी।’
रात्रि ने अपनी स्याह चादर बिछा दी। हंसिनी अभी तक घर नहीं लौटी थी। अमेय और शुभ्रा की आँखें दरवाजे पर ही टिकी थीं। हर आहट पर उन्हें लगता, शायद हंसिनी आई होगी। दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे को कोस रहे थे।
शुभ्रा चिंतित मन से कहने लगी, ‘आपके ज़्यादा लाड़-प्यार ने उसे बिगाड़ दिया है। इतनी रात हो गई, न जाने कहाँ है?’ घबराहट में उसने हंसिनी की कई सहेलियों को फोन मिला दिया, परंतु हर ओर से ‘न’ में ही उत्तर मिला। शुभ्रा और अमेय की नींद खो गई थी। अनगिनत आशंकाएँ उठती-गिरती रहीं। हंसिनी के चहकते स्वरों को सुनने के लिए माता-पिता बेचैन थे। यकायक शुभ्रा का मोबाइल बज उठा। उसने तुरंत फोन उठाया। दूसरी ओर से हंसिनी की धीमी आवाज आई- ‘माँ... मेरा इंतज़ार मत करना। मैंने अमोघ के साथ जीवन बिताने का निर्णय ले लिया है।’
यह सुनते ही शुभ्रा के होश उड़ गए। हाथ से मोबाइल छूटकर फर्श पर गिर पड़ा। उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। क्या यह उसकी लाड़ली बेटी की ही आवाज थी? उसे स्वयं पर क्रोध आने लगा कि संतान-मोह ने उसे इतना अंधा बना दिया था कि वह हंसिनी की हर ज़िद पूरी करने के लिए अमेय की बातों को भी अनदेखा कर देती थी। पश्चाताप की अग्नि उसके भीतर धधक उठी। उसके अंतर्मन की माँ उससे प्रश्न कर रही थी- ‘क्या उसने केवल माँ होने का दायित्व ही निभाया? उसने कभी उसकी सखी बनने का प्रयास क्यों नहीं किया? उसे मान-मर्यादा, परिवार की इज़्ज़त और संस्कारों का अर्थ क्यों नहीं समझाया?’ अगले ही क्षण उसने अमेय की ओर देखा। अमेय, जिसका वटवृक्ष-सा विशाल हृदय अनायास आए तूफान से भीतर तक हिल गया था, स्वयं को सँभालते हुए शुभ्रा को ढाँढस बँधाने लगा-
‘शायद हमारी परवरिश में कहीं कमी रह गई... उसी का यह परिणाम है। लेकिन जो बच्चे अपने माता-पिता के प्रेम और परिवार की प्रतिष्ठा भूल जाते हैं, वे एक दिन अवश्य पछताते हैं।’
दोनों की आँखों से मौन अश्रुधाराएँ बह निकलीं। हृदय पर पत्थर रखकर वे दोनों समय काटने लगे। शुभ्रा ने घर से बाहर निकलना लगभग बंद कर दिया। पिता अंदर ही अंदर घुटते रहते।
वक्त बीतता गया। एक दिन अचानक शुभ्रा की तबीयत बिगड़ गई। अमेय उन्हें अस्पताल लेकर पहुँचे। जैसे ही दोनों ने आगंतुक कक्ष में प्रवेश किया, हंसिनी की नजर अपने माता-पिता पर पड़ी। वह दौड़कर अपनी माँ के गले से लिपट गई। उसकी आँखों से पीड़ा का बाँध फूट पड़ा।
उस मासूम की कोख में चार महीने का गर्भ पल रहा था। जिस युवक के प्रेम-जाल में फँसकर उसने अपने माता-पिता के असीम स्नेह को ठुकरा दिया था, वही उसे छोड़कर जा चुका था। वह अकेली थी।
हंसिनी रोते-रोते अपने साथ हुए धोखे की पूरी कहानी माँ को सुनाने लगी। बेटी के साथ हुए विश्वासघात की घटना सुनकर शुभ्रा अपना सारा दुख भूल गई। माँ ने अपनी ममता के आँचल में अपने रक्त से सींचे उस उजड़े पुष्प को फिर से सहेज लिया।
हंसिनी के काँपते स्वर बार-बार विनती कर रहे थे-
‘माँ! मुझे माफ कर दो...
माँ! मुझे माफ कर दो...’
पिता ने परिपक्वता का परिचय देते हुए बेटी के माथे को चूम लिया और शांत स्वर में कहने लगे- ‘अगर सुबह का भूला शाम को घर लौट आए, तो उसे भूला नहीं कहते।’
राजश्री बिष्ट 'रश्मिका'