साहित्यविहीन शिक्षा : संवेदनाशून्य समाज की ओर

यह लेख आधुनिक शिक्षा में साहित्य और मानवीय संवेदनाओं के महत्व को रेखांकित करता है। परीक्षा, अंकों और करियर की प्रतिस्पर्धा के बीच साहित्य बच्चों में करुणा, सहानुभूति, नैतिकता, रचनात्मकता और सामाजिक जिम्मेदारी विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ जैसी रचनाओं के उदाहरण से लेख बताता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल सफल पेशेवर बनाना नहीं, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी है। तकनीक और साहित्य के संतुलित समन्वय से ही शिक्षा को समग्र और सार्थक बनाया जा सकता है।

Oct 13, 2026 - 13:52
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साहित्यविहीन शिक्षा : संवेदनाशून्य समाज की ओर
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मनुष्य को यदि केवल जीवित रहना होता, तो शायद उसे शिक्षा की आवश्यकता नहीं पड़ती। शिक्षा इसलिए आवश्यक है क्योंकि वह मनुष्य को केवल ज्ञान नहीं देती, बल्कि उसे विचार, विवेक, संस्कार और संवेदनाएँ भी प्रदान करती है। शिक्षा ही वह माध्यम है जो एक सामान्य व्यक्ति को समाजोपयोगी नागरिक बनाती है। किंतु आज जब हम आधुनिक शिक्षा व्यवस्था को देखते हैं, तो एक गहरी चिंता मन में जन्म लेती है-क्या हमारी शिक्षा वास्तव में मनुष्य बना रही है, या केवल मशीनों की तरह कार्य करने वाले व्यक्तियों का निर्माण कर रही है?
वर्तमान समय विज्ञान, तकनीक और तीव्र प्रतिस्पर्धा का समय है। शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन हुए हैं। विद्यालयों में स्मार्ट क्लास, डिजिटल बोर्ड, ऑनलाइन शिक्षण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वर्चुअल प्रयोगशालाएँ शिक्षा को नया स्वरूप दे रही हैं। यह परिवर्तन आवश्यक भी हैं, क्योंकि समय के साथ शिक्षा को आधुनिक बनाना अनिवार्य है। परंतु इस आधुनिकता की दौड़ में कहीं न कहीं साहित्य और संवेदनाओं का स्थान कम होता जा रहा है। शिक्षा अब ‘जीवन को समझने’ से अधिक ‘करियर बनाने’ का माध्यम बनती जा रही है।
आज अभिभावकों की सबसे बड़ी चिंता यह होती है कि उनका बच्चा कितने अंक ला रहा है, किस प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है और भविष्य में कितना सफल होगा। विद्यालयों का मूल्यांकन भी परिणामों और प्रतिशत के आधार पर होने लगा है। बच्चों के जीवन में पाठ्यपुस्तकों का भार बढ़ता जा रहा है, लेकिन उनके मन के भीतर संवेदनाओं का संसार छोटा होता जा रहा है। यही वह स्थिति है जहाँ साहित्य की आवश्यकता सबसे अधिक महसूस होती है।
साहित्य मनुष्य के भीतर छिपे भावनात्मक संसार को जागृत करता है। वह हमें दूसरों के दुःख को महसूस करना सिखाता है। कविता हृदय को कोमल बनाती है, कहानियाँ जीवन का यथार्थ समझाती हैं और उपन्यास समाज के संघर्षों से परिचित कराते हैं। साहित्य हमें यह सिखाता है कि जीवन केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व और मानवीय संबंधों का भी नाम है। 


यदि शिक्षा से साहित्य को हटा दिया जाए, तो मनुष्य के भीतर ज्ञान तो रहेगा, पर संवेदनाएँ धीरे-धीरे समाप्त होने लगेंगी। आज हम समाज में यही स्थिति देखने लगे हैं। बच्चे तकनीकी रूप से अत्यंत दक्ष हैं। वे मोबाइल और कंप्यूटर का संचालन सहजता से कर लेते हैं, लेकिन अनेक बार अपने ही परिवार के लोगों से खुलकर संवाद नहीं कर पाते। सोशल मीडिया पर हजारों मित्र होने के बावजूद वे मानसिक रूप से अकेले महसूस करते हैं। छोटी-छोटी असफलताओं पर अवसाद, तनाव और निराशा की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। इसका कारण केवल प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि संवेदनात्मक रिक्तता भी है।
एक समय था जब विद्यालयों में प्रार्थना सभा के दौरान प्रेरक कविताएँ सुनाई जाती थीं। शिक्षक बच्चों को पंचतंत्र, अकबर-बीरबल, प्रेमचंद और सुभद्रा कुमारी चौहान की कहानियाँ सुनाते थे। बच्चे पुस्तकालयों में घंटों बैठकर बाल साहित्य पढ़ते थे। उन कहानियों में जीवन के मूल्य छिपे होते थे-सत्य, करुणा, ईमानदारी, साहस और सहयोग।
मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ का छोटा-सा पात्र हामिद आज भी बच्चों को त्याग और प्रेम का अर्थ सिखा देता है। वह मेले से खिलौने या मिठाई न लेकर अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदता है, क्योंकि उसे उनकी तकलीफ दिखाई देती है। यह केवल कहानी नहीं, बल्कि संवेदनशील मनुष्य बनने का पाठ है। इसी प्रकार महादेवी वर्मा की रचनाएँ मनुष्य और प्रकृति के बीच भावनात्मक संबंध स्थापित करती हैं। रामधारी सिंह दिनकर की कविताएँ युवाओं में राष्ट्रप्रेम और आत्मसम्मान जगाती हैं।
कल्पना कीजिए, यदि बच्चों का परिचय ऐसे साहित्य से न हो, तो वे जीवन के इन मूल्यों को कहाँ से सीखेंगे? आज शिक्षा का वातावरण अत्यधिक परीक्षा-केंद्रित हो गया है। बच्चे पाठ को समझने से अधिक उसे याद करने में लगे रहते हैं। विद्यालयों में ‘रैंक’ और ‘परिणाम’ की चर्चा अधिक होती है, जबकि ‘व्यक्तित्व’ और ‘संस्कार’ की चर्चा कम होती जा रही है। बच्चों को यह तो सिखाया जा रहा है कि सफल कैसे बनना है, पर यह कम सिखाया जा रहा है कि अच्छा मनुष्य कैसे बनना है।
कुछ समय पहले एक विद्यालय में एक अत्यंत प्रतिभाशाली छात्र था। वह हर परीक्षा में उच्च अंक प्राप्त करता था, परंतु उसका व्यवहार बहुत कठोर था। वह दूसरों की गलतियों पर हँसता था और अपने मित्रों की सहायता नहीं करता था। एक दिन विद्यालय में कहानी लेखन प्रतियोगिता आयोजित हुई। विषय था-‘यदि मैं किसी भूखे बच्चे से मिलूँष्ठ’। उस छात्र ने पहली बार किसी और की पीड़ा के बारे में सोचते हुए कहानी लिखी। कहानी लिखते समय उसका दृष्टिकोण बदला। बाद में उसने स्वयं स्वीकार किया कि उसने कभी किसी गरीब बच्चे की भावनाओं को समझने का प्रयास ही नहीं किया था। साहित्य ने उसके भीतर वह संवेदना जगाई, जो केवल पाठ्यपुस्तकें नहीं जगा सकीं। 

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विज्ञान और तकनीक के इस युग में साहित्य की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है। विज्ञान मनुष्य को शक्ति देता है, लेकिन साहित्य उसे दिशा देता है। यदि विज्ञान के साथ संवेदनाएँ न हों, तो वही शक्ति विनाश का कारण भी बन सकती है। इाfतहास इसका साक्षी है। तकनीकी प्रगति ने दुनिया को आधुनिक बनाया, लेकिन युद्धों और हिंसा ने यह भी दिखाया कि केवल बुद्धि का विकास पर्याप्त नहीं है। मनुष्य के भीतर करुणा और नैतिकता भी आवश्यक है।
कोरोना महामारी के समय यह बात और अधिक स्पष्ट हुई। जब लोग अपने घरों में बंद थे, तब साहित्य ने अनेक लोगों को मानसिक सहारा दिया। किसी ने कविताएँ लिखीं, किसी ने डायरी लिखी, किसी ने कहानियाँ पढ़ीं। लोगों ने महसूस किया कि मनुष्य केवल भोजन और तकनीक से नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव से भी जीवित रहता है। उस कठिन समय में साहित्य ने आशा, धैर्य और संवेदना को जीवित रखा।
नई शिक्षा नीति में समग्र शिक्षा, अनुभवात्मक अधिगम और रचनात्मकता पर विशेष बल दिया गया है। यह एक सकारात्मक संकेत है। अब आवश्यकता इस बात की है कि विद्यालयों में साहित्यिक वातावरण को पुनः जीवंत बनाया जाए। पुस्तक पठन को बढ़ावा दिया जाए। बच्चों को कविता पाठ, नाटक, कहानी लेखन और वाद-विवाद जैसी गतिविधियों से जोड़ा जाए। शिक्षकों को केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित न रहकर बच्चों के भीतर मानवीय मूल्यों का विकास करने का प्रयास करना चाहिए।
आज तकनीक का विरोध करना समाधान नहीं है। आधुनिक शिक्षा में डिजिटल संसाधनों का होना आवश्यक है। लेकिन यदि बच्चे केवल स्क्रीन तक सीमित रह जाएँ और पुस्तकों से दूर हो जाएँ, तो उनका भावनात्मक विकास अधूरा रह जाएगा। इसलिए आवश्यक है कि तकनीक और साहित्य के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। बच्चे यदि विज्ञान के साथ कविता भी पढ़ेंगे, कंप्यूटर के साथ कहानियाँ भी सुनेंगे और आधुनिकता के साथ संस्कृति को भी समझेंगे, तभी शिक्षा वास्तव में पूर्ण कहलाएगी। वास्तव में शिक्षा का उद्देश्य केवल डॉक्टर, इंजीनियर या अधिकारी बनाना नहीं है। उसका सबसे बड़ा उद्देश्य एक संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक का निर्माण करना है। जिस समाज में साहित्य समाप्त होने लगता है, वहाँ मनुष्य धीरे-धीरे भावनाओं से रिक्त होने लगता है। ऐसे समाज में संबंध कमजोर होने लगते हैं, संवाद कम हो जाते हैं और व्यक्ति केवल स्वयं तक सीमित होकर रह जाता है। इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम शिक्षा को पुनः मानवीय मूल्यों से जोड़ें। बच्चों को केवल सफल बनने की नहीं, बल्कि सहृदय बनने की शिक्षा दें। क्योंकि अंततः वही शिक्षा समाज को सुंदर बना सकती है, जिसमें ज्ञान के साथ संवेदनाएँ भी जीवित हों। साहित्य और शिक्षा का संबंध शरीर और आत्मा की तरह है-एक के बिना दूसरा अधूरा है।  

श्रद्धा गुप्ता

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