विनायक दामोदर सावरकर, जिन्हें भारत की जनता वीर सावरकर कहती है, एक महान क्रांतिकारी विचारक थे जिनके हृदय में हिन्दू, हिन्दू राष्ट्र और हिन्दू समाज के प्रति अगाध प्रेम था। उन्हें भारत में उग्र हिन्दू पुनरुत्थान के पीछे की प्रेरणा शक्ति कहना उचित होगा। उन्होंने हिन्दुत्व को जीवन शैली से सम्बद्ध कर राष्ट्रवाद शब्द को स्पष्ट करते हुए अपने मन्तव्य को सबके समक्ष प्रस्तुत किया जिसे भारतीय संस्कृति एवं परंपरा में प्रमुख स्थान दिया गया है। हिन्दू शब्द की सुसंगत, तर्क सम्मत तथा सर्वमान्य व्याख्या वीर सावरकर की एक महान वैचारिक देन है।
वीर सावरकर हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र के प्रबल समर्थक थे तथा हिन्दू सांस्कृतिक और दार्शनिक उपलब्धियों में उन्हें गहन विश्वास था। उनकी युवावस्था जेल में बीती, लेकिन सार्वजनिक जीवन में जो अवसर मिला, उन्होंने हिन्दुओं को संगठित करने तथा उनमें हिन्दू राष्ट्रवाद की भावनायें जगाने का अथक प्रयास किया। वास्तव में हिन्दुओं का पुनरुत्थान उनके जीवन का चरम लक्ष्य था। ‘संगठन में शक्ति है’ का विचार सावरकर ने जनमानस को दिया। उन्होंने कहा कि हिन्दुओं का वास्तविक विकास तभी सम्भव है जब वे संगठित हों तथा परस्पर एक सूत्र में बंधे हों। हिन्दुओं में उत्तरदायित्व की भावना का विकास किया जाय और उनमें परस्पर बन्धुत्व तथा विश्वास की भावना जाग्रत की जाय।
सावरकर ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दुत्व’ में हिन्दू की परिभाषा करते हुए कहा है कि हिन्दू वह है जो हिन्दू जीवन और हिन्दू सभ्यता पर गर्व करते हैं। सावरकर के हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा सप्त सिंधु में निवास करने वाले लोगों से है। ‘हिंदू वह है जो सिन्धु नदी से समुद्र तक सम्पूर्ण भारतवर्ष को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि मानता है।’ उनका मानना था कि हिन्दुओं का प्राचीन और आधुनिक इतिहास समान है। उनके शत्रु और मित्र समान हैं। उन्होंने समान रूप से संकटों का सामना किया है तो उनकी युद्धों में प्राप्त की गई विजय भी समान है। उनके राष्ट्रीय दुख भी समान हैं तो आकाक्षायें भी समान।
उन्होंने हिन्दुत्व की तीन कसौटियां बतायीं हैं-
हिन्दुत्व का पहला तत्व राष्ट्र अथवा प्रादेशिक एकता है। सावरकर का विश्वास था कि क्षेत्रीय अथवा प्रादेशिक निकटता एकता की भावना का संचार करती है। हिन्दू के मन में सिंधु से ब्रह्मपुत्र तक और हिमालय से कन्याकुमारी तक सम्पूर्ण भौगोलिक क्षेत्र के प्रति अनुराग होना स्वाभाविक है। हिन्दुत्व का दूसरा तत्व जाति अथवा रक्त संबंध है। हिन्दू वह है जिसकी धमनियों में उन लोगों का रक्त बहता है जिसका मूल स्रोत वैदिक सप्तसिन्धव के हिमालय प्रदेश में बसने वाली जाति थी। सावरकर ने किसी जातिगत श्रेष्ठता का प्रतिपादन नहीं किया बल्कि इस तथ्य पर बल दिया कि सदियों से साथ रहने के फलस्वरूप हिंदुओं में ऐसी जातिगत विशेषतायें विकसित हो गईं हैं जो अन्य लोगों से भिन्न हैं। हिन्दुत्व का तीसरा तत्व है संस्कृति। जिस व्यक्ति को हिन्दू सभ्यता और संस्कृति पर गर्व है, वह हिंदू है।
सावरकर ने इंग्लैण्ड में शिक्षा ग्रहण की थी। अंडमान की सेलुलर जेल भेजे जाने तक वह धर्मनिरपेक्ष थे। वह १८५७ की क्रांति के नायकों के भी प्रशंसक थे। लेकिन अंडमान की सेलुलर जेल ने सावरकर के विचारों को बदल कर रख दिया। हिंदुत्व के प्रति झुकाव सावरकर के जीवन की विषम परिस्थितियों की देन है। इस विचार का उद्भव और सघनीकरण बहुत धीरे-धीरे हुआ, जब वह बंदी के रूप में अंडमान निकोबार में काला पानी की सजा काट रहे थे। १९११ में जब सावरकर जी अंडमान जेल गये तब कुछ ही महीनों में उन्हें यह ज्ञात हो गया था कि कुछ हिंदू बंदी अंडमान आने के बाद मुसलमान बन गये और उन्होंने अपने नाम भी बदल लिये हैं। उन्होंने पूछा कि धर्मान्तरण की प्रक्रिया यहाँ कैसे चल रही है? तो हिन्दुओं की राय में यह एक इतनी परिचित घटना है कि उसकी पूछताछ करने की भी कोई आवश्यकता नहीं है।
स्वाधीनता और देशप्रेम की प्रचण्ड भावना के कारण सेल्युलर जेल में हिंदू क्रांतिकारियों की संख्या बहुत अधिक थी। उनको नियंत्रित करने और यातनाएँ देने के उद्देश्य से जेलर ने मुसलमान अपराधी कैदियों को वार्डर, पहरेदार और हवलदार वगैरह नियुक्त कर दिया था। हिंदू कैदियों के साथ नरमी न बरते जाने का आदेश यह एक प्रशासनिक कदम के रूप में उचित हो सकता था। किंतु सेल्युलर जेल में बंद अपराधी पश्चिमोत्तर में सीमा प्रांत के धर्मांध और दबंग कबीलाई पठान बहुतायत में थे। वे हट्टे-कट्टे और उत्पाती किस्म के अपराधी थे और मद्रास, बंगाल या बंबई प्रेजीडेंसी से आने वाले मुसलमान कैदियों को भी आधा काफिर कहकर बेइज्जत करते थे। उन्हें अपने जैसा कट्टर बनाने की कोशिश भी करते थे।
कुछ तो उनके जैसा बनाने की कोशिश में उनसे भी अधिक भयानक यातनायें देने वाले बन जाते थे। सावरकर ने लिखा है कि लगभग हर सप्ताह वे किसी हिंदू कैदी को मुस्लिम साथियों के साथ बैठा देखते और समझ जाते कि उसका धर्म परिवर्तन होने वाला है। जब वे इस सम्बन्ध में हिंदू कैदियों से बात करते तो उनका जवाब होता कि जो लोग प्रताड़ना के डर से धर्म-परिवर्तन के लिए तैयार हो जाते हैं, तो हिंदू धर्म ऐसे लोगों के बिना बेहतर रहेगा। सावरकर ने उन्हें इसके दूरगामी परिणामों से अवगत कराया। इसके राजनीतिवâ निहितार्थ की ओर उनका ध्यान आकृष्ट किया।
इन घटनाओं का परिणाम यह हुआ कि सेल्युलर जेल में रहते हुए ही सावरकर हिंदू एकता और हिंदू संगठन की आवश्यकता पर चिंतन-मनन करने लगे थे। सनातनी, आर्यसमाजी, सिख, जैन और बौद्ध मतावलंबियों को मिलाकर एक अखिल भारतीय संगठन बनाने की दिशा में विचार करने लगे। उन्होंने ‘हिंदू’ होने के अर्थ को भी अपने ढंग से परिभाषित कर लिया था। उनके अनुसार हिंदू केवल उस धर्म को मानने वालों तक सीमित नहीं हैं, जिसे हिंदू धर्म कहा जाता है। उनका मत था कि इस देश को अपनी मातृभूमि और पुण्यभूमि मानने वाला हर व्यक्ति हिंदू है। उन्होंने लिखा कि उनकी यह परिभाषा समाज में और अधिक बिखराव व अलगाव को रोकने तथा हिंदुओं को भारत के लोगों का एक समुदाय बनाने में सशक्त भूमिका निभायेगी। लेकिन जेल के अनुभवों के अलावा अन्य भी महत्वपूर्ण कारण थे जिसने उनकी हिन्दुत्व की अवधारणा को बल दिया।
१९०६ में आगा खान की अगुवाई में मुस्लिम धर्मगुरुओं का प्रतिनिधि मंडल तत्कालीन वायसराय लॉर्ड मिंटो से मिला। इस बैठक में उन्होंने धर्म के आधार पर स्थानीय निकायों से लेकर लेजिसलेटिव काउंसिल में मुस्लिमों को प्रतिनिधित्व देने की मांग रखी। लार्ड कर्जन ने इसी मांग के आधार पर बंगाल का धर्म के आधार पर विभाजन किया था।
१९०६ में जब मुस्लिम लीग की स्थापना हुई तो उसने मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था होने का दावा किया। तभी शौकत अली के नेतृत्व में खिलाफत आन्दोलन भी शुरु हुआ जिसका उद्देश्य खलीफा की बहाली और भारतीय मुसलमानों का अरब जगत के मुसलमानों से सम्बन्ध जोड़ना था। उनका अनुराग इस देश के और हिन्दुओं के प्रति नहीं बल्कि मुस्लिम जगत के प्रति था। खिलाफत आन्दोलन ने भी सावरकर की हिन्दू राष्ट्र की सोच को और बल प्रदान किया। सावरकर तुष्टीकरण की नीति के विरोधी थे। वे मुसलमानों के सहयोग का स्वागत करते थे, लेकिन उन्हें यह भी विश्वास था कि स्वराज मुसलमानों के सहयोग के बिना भी प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने मुसलमानों से स्पष्ट रूप से कहा- ‘हिन्दू अपनी राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए यथासामर्थ्य संघर्ष करते रहेंगे। यदि तुम साथ देते हो तो तुमसे मिलकर संघर्ष करेंगे, यदि तुम साथ नहीं देते हो तो तुम्हारे बिना ही लड़ते रहेंगे और यदि तुम विरोध करोगे तो उस विरोध के बावजूद युद्ध जारी रखेंगे।’
१९२१ में मालाबार तट पर रहने वाले मोपलाओं ने जेहाद का ऐलान करते हुये हजारों हिन्दुओं की हत्या की, महिलाओं का शीलभंग किया और धर्मपरिवर्तन किये। जिसे इतिहास मोपला विद्रोह के नाम से जाना जाता है। सावरकर ने दिल दहलाने वाली घटनाओं का अपने प्रसिद्ध उपन्यास मोपला में समस्त सत्य घटनाओं का चित्रण किया है।
वीर सावरकर ने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के बीच किसी भी प्रकार का विरोध नहीं माना। उनका मानना था कि भारत-भक्त हुये बिना हिन्दू नाम सार्थक ही नहीं हो सकता। भारत हिन्दुओं की पितृभूमि और पुण्यभूमि है, इसीलिये विदेशी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए राष्ट्रीय संघर्ष में सबसे अधिक हिन्दू ही आगे हैं। उन्होंने हिन्दुओं को संगठित होने की प्रेरणा दी तथा हिन्दुओं में व्याप्त अस्पृश्यता का विरोध किया।
सावरकर ने भारतीय इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीयता पर गहन चिंतन किया। सावरकर का हिन्दुत्व न केवल धार्मिक पहचान तक सीमित था बल्कि यह एक व्यापक राजनीतिक और सांस्कृतिक दर्शन था, जो भारत को एक सशक्त, एकीकृत और अखण्ड राष्ट्र के रूप में देखता था। सावरकर के हिन्दुत्व और अखण्ड भारत का विचार आज भी भारतीय राजनीति और समाज में प्रासंगिक है। वह सदैव इस बात पर बल देते थे कि हमें किसी भी प्रश्न पर निर्णय लेते समय एक ही बात ध्यान में रखनी चाहिए कि ‘निर्णय से हिन्दू का हित होगा अथवा अहित।’ उनकी यह मान्यता थी कि भारत में हिन्दू हित ही राष्ट्रहित है। स्वतंत्र भारत की राजनीति का आधार भी यही होना चाहिए। सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय शक्ति पर जोर देने वाली विचारधारा ने भारत में राष्ट्रीयता के नये विमर्श को जन्म दिया।
डॉ मनोरमा सिंह