सीख
तब मैंने यह जानना चाहा कि यह आवाज कहाँ से आ रही है। मैंने आवाज की दिशा की ओर देखा तो पाया की एक नन्हीं सी चिड़िया, बगल के घर में जो मेरे चाचा का था, उस घर में बने काँच के गवाक्ष पर अपनी चोंच मार रही है। जिससे ठक-ठक की तीखी ध्वनि उत्पन्न हो रही थी।

कुछ समय पहले की बात है। मई का महीना था और गर्मी अत्यधिक पड़ रही थी। मैं अपने घर की
छत पर सोया था।उस रात अत्यधिक गर्मी के कारण रात को नींद देर से आयी। किन्तु सुबह-सुबह
एक तीखी ध्वनि से मेरी नींद खुल गई। पर मैं फिर भी सोने की कोशिश करने लगा। लेकिन उस
तीखी ध्वनि के कारण मुझे नींद ही नहीं आ रही थी।
तब मैंने यह जानना चाहा कि यह आवाज कहाँ से आ रही है। मैंने आवाज की दिशा की ओर देखा
तो पाया की एक नन्हीं सी चिड़िया, बगल के घर में जो मेरे चाचा का था, उस घर में बने काँच के
गवाक्ष पर अपनी चोंच मार रही है। जिससे ठक-ठक की तीखी ध्वनि उत्पन्न हो रही थी। कुछ देर
तक ऐसा ही होता रहा। फिर अचानक किसी ने गवाक्ष खोला तो तुरंत नन्हीं चिड़िया उड़ गई।
दूसरे दिन प्रातः काल वही घटना फिर घटी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि वो छोटी सी चिड़ियां
ऐसा क्यों करती है। ध्यान से देखने पर ज्ञात हुआ कि कांच की बनी खिड़की की एक खासियत थी।
की घर के अंदर से अगर कोई गवाक्ष के बाहर देखे तो बाहर की सारी वस्तुएँ साफ-साफ दिखाई देती,
और घर के बाहर से देखने पर उस काँच के वने गवाक्ष पर अपना ही प्रतिबिंब नजर आता था। उस
नन्हीं सी चिड़िया को भी अपना प्रतिबिंब नजर आ रहा था।
उस पंछी को लगता कि उसका कोई अपना इस गवाक्ष के अंदर कैद है। और वो उसे बाहर निकालने
का पूरा प्रयास करती है। वह तब-तक उस गवाक्ष पर अपनी चोंच से प्रहार करना नहीं छोड़ती जब
तक कोई कांच के गवाक्ष को नहीं खोलता। भले उस छोटे से प्राणी में हम इंसान की तरह सोचने की
क्षमता न हो, मगर वह यह बात अच्छी तरह जानती है कि अपनों की मदद कैसे करनी है। भले वह
इस प्रयास से सफल न हो, मगर वह अपना प्रयास जारी रखती है।
आज के समय में इंसान जहाँ अपनी इंसानियत भूलता जा रहा है, हमें इस छोटे से प्राणी से सीख
लेनी चाहिए।
प्रियव्रत झा
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