कृष्णा सोबती : शब्दों की बेमिसाल शख्सियत
कृष्णा सोबती हिंदी साहित्य की ऐसी निर्भीक और प्रयोगधर्मी लेखिका थीं जिन्होंने स्त्री जीवन, उसकी स्वतंत्र चेतना, कामुकता, अस्मिता और सामाजिक संघर्षों को अपनी रचनाओं का केंद्र बनाया। उनकी भाषा में पंजाबी, उर्दू और हिंदी संस्कृतियों का अनूठा मिश्रण दिखाई देता है। ‘मित्रो मरजानी’, ‘ज़िंदगीनामा’, ‘दिलोदानिश’ और ‘ऐ लड़की’ जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने हिंदी कथा साहित्य को नई दृष्टि और नई अभिव्यक्ति दी। साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कृष्णा सोबती ने अपने साहसी व्यक्तित्व और मौलिक लेखन से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया।
कृष्णा सोबती का जन्म पंजाब प्रांत के गुजरात शहर में १८ फरवरी १९२५ गुजरात में चेनाब नदी के पास एक छोटे से कस्बे में हुआ था, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। इनकी शिक्षा लाहौर, दिल्ली और शिमला में हुई। इन्होंने अपने तीन भाई बहनों के साथ स्कूल में अपनी शुरुआती शिक्षा की पढ़ाई शुरू की। इनका परिवार औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार के लिए काम किया करता था। उन्होंने शुरुआत में लाहौर के फतेहचंद कॉलेज से अपनी उच्च शिक्षा की शुरुआत की, परंतु जब भारत का विभाजन हुआ तो इनका परिवार भारत आ गया। विभाजन के तुरंत बाद इन्होंने २ साल तक महाराजा तेज सिंह के शासन में कार्य किया जो कि सिरोही, राजस्थान के महाराजा थे। कृष्णा सोबती की मृत्यु दिल्ली में उनके घर पर लंबी बीमारी की वजह से २५ जनवरी २०१९ को हुई।
दिल्ली में आने के बाद वे दिल्ली की हो गयीं और तब से यहीं रहकर उन्होंने साहित्य-सेवा की। सोबती के बारे में कहा जाता है कि इन्होंने हिन्दी की कथा-भाषा को अपनी विलक्षण प्रतिभा से अप्रतिम ताज़गी़ और स्फूर्ति प्रदान की है। उन्होंने पचास के दशक से ही अपना लेखन कार्य प्रारम्भ कर दिया था। इनकी पहली कहानी 'लामा' थी, जो साल १९५० में प्रकाशित हुई थी।
कृष्णा सोबती हिंदी में लिखते समय कई बार पंजाबी और उर्दू के मुहावरों का उपयोग किया करतीं थीं। समय के साथ इन्होंने राजस्थानी मुहावरों को भी अपने लेखन में शामिल कर लिया। उर्दू, पंजाबी और हिंदी संस्कृतियों की परस्पर क्रिया ने इनकी रचनाओं में प्रयुक्त भाषा को अत्यधिक प्रभावित करने के साथ वह नयापन भी प्रदान किया जो उस समय सामान्यता देखने को नहीं मिलता था। उनकी कहानियों के पात्र दबंग, साहसी और चुनौतियों को स्वीकार करने के लिए तैयार रहने वाले होते थे। सोबती की रचनाएं मुख्य रूप से स्त्री की पहचान और उसकी सेक्सुअलिटी जैसे मुद्दों से जुड़ी होती थीं, जिसके कारण वे कई बार विवादों में भी रही। उन्होंने १९७९ में जिंदगीनामा-जिंदा रुख नाम से एक उपन्यास निकाला, जिसके लिए कृष्णा सोबती को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। हिंदी साहित्य में पहली बार उन्होंने महिलाओं की कामुकता, साहस और आत्मीयता के साथ-साथ उनकी आंतरिक भावनाओं के लिए भी पर्याप्त स्थान बनाया, और यह गहनता उनकी पहचान बन गई। कृष्णा सोबती उन दुर्लभ व्यक्तियों में से एक रहेंगी जो कभी भुलाए नहीं जा सकते।
कृष्णा सोबती के स्त्री पात्र अपने में एक पहेली हैं। उनके यहाँ स्त्री के हर रूप की झलक है- समर्पिता, आज्ञाकारी, गर्वीली, प्रेम-निमग्न, गृहस्थी में खटती लेकिन संतुष्ट स्त्रियाँ, स्वामिनी-सेविका-रखैल आदि। कृष्णा जी सृजित पात्रों की ख़ासियत यह है कि वे सब अपनी ज़िंदगी, अपनी शर्तों पर जीती हैं।
इन्होंने १९६६ में मित्रो मरजानी नामक एक उपन्यास लिखा, जो ग्रामीण पंजाब के ऊपर आधारित था। इसमें एक युवा विवाहित महिला द्वारा अपनी कामुकता का अन्वेषण और उसकी पुष्टि करते हुए दिखाया गया है। इसका कई भाषाओं में अनुवाद हुआ।
‘मित्रो की देह की आदिम अगन किसी भी अपराध बोध से परे है। वह सिर्फ परिवार की बहू, बेटी, भावज और सरदारी की पत्नी ही नहीं, वह कुछ और है, कुछ और भी। वह अपनी संज्ञा में ढूँढती है अपनी अस्मिता को। यह मैं हूँ, मै हूँ न, मैं भी। परिवार के बीचोंबीच उसकी छटपटाहट एक शोर पैदा करती है। एक देह भाषा गढ़ती है।’
मित्रो अपने शारीरिक सौंदर्य पर स्वयं तो रीझती ही है और साथ ही यह भी चाहती है कि और लोग भी उसके इस भाव को स्वीकारें। वह गृहस्थी को लच्छमन की लीक नहीं मानती; परिवार के अनुबंधों को स्वीकार नहीं करती; उसके तन ऐसी हौंस व्यापती है जो पारिवारिक मर्यादाओं के विपरीत पड़ती है। उसका पति सरदारी उसकी यह प्यास नहीं समझता इसलिए मित्रो अपने जेठ बनवारी से ही यह अपेक्षा करने लगती है,
डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी का मत है, ‘मित्रो इस कहानी में संयुक्त परिवार की भीरु आत्मतुष्ट दुनिया के सर पर पड़ने वाली डंडे की चोट है।’
यह स्थिति उस भारतीय परंपरा से मोहभंग की स्थिति है जहाँ विवाह दो शरीरों का संयोग नहीं दो आत्माओं का पवित्र बंधन माना जाता है। मित्रो के इस पूरे आचरण में कहीं भी पाप-बोध या कुंठा का भाव नहीं है क्योंकि उसके लिए उसकी देह उसकी पहचान भी है, अभिव्यक्ति भी। समस्त पारिवारिक मर्यादाओं को परे रख उसमें अपनी बात खुलकर कहने की शक्ति भी है।
निर्मला जैन ने भी इसी विचार पर मुहर लगाते हुए लिखा है, ‘मित्रो मरजानी में भले ही सबसे तीखी आवाज़ इस आदिम कुंठाहीनता की हो पर अपनी परिणति में यह संयत-संतुलित सामाजिकता की तरफ वापसी की कहानी है।’
पितृसत्तात्मक समाजों में एक ओर जहाँ स्त्रियों को लेकर आने वाली ख़बरें छेड़-छाड़ से शुरू हो बलात्कार पर ख़त्म हो जातीं हैं, अमूमन वहाँ आज भी स्त्री की स्वतंत्र यौनिक अभिव्यक्ति को उसके कमज़ोर चरित्र से जोड़ कर देखा जाता है।
‘ऐ लड़की’ में अम्मू का कथन- ‘देह तो एक वसन है, पहना तो इस ओर चले आए, उतार दिया तो परलोक’ - कबीर की उसी दार्शनिक उदात्तता को प्रतिध्वनित करता है जहाँ ‘फूटा कुंभ, जल-जलहि समाना’ जैसा सार तत्व है।
जब उनका एक प्रसिद्ध उपन्यास, दिल-ओ-दानिश (हृदय्ा और मन), प्रकाशित हुआ तो अंग्रेजी भाषा के प्रेस में भी इसकी व्यापक समीक्षा हुई थी। यह १९२० के दशक के दिल्ली में घटित कहानी, एक दरबारी महिला की बेटी, महक और उसके प्रेमी, संरक्षक और दो बच्चों के पिता, प्रतिष्ठित वकील कृपा नारायण की दुनिया को दर्शाती है। लेकिन यह सिर्फ उनके प्रेम प्रसंग की कहानी से कहीं बढ़कर थी। इसमें नारायण की हवेली के जीवन और उनकी पत्नी कुटुंब प्यारी की भावनाओं की भी गहरी झलक मिलती है।
साल २०१७ में ही, ९२ वर्ष की उम्र में उनकी 'गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान तक' रचना प्रकाशित हुई। जिसमें उन्होंने अपने बचपन की यादों और विभाजन के बाद अपने घर को छोड़ दिल्ली आकर बसने के दर्द को बयान किया है। बँटवारे की तड़प और कुछ न कर पाने की टीस, इस पहले भी सोबती की रचनाओं में झलकी है।
इसे भी पढ़िए :- बाबूजी
उनके लिए कहा जाता है कि उन्होंने समय और समाज को केंद्र में रखकर अपनी रचनाओं में एक युग को जिया है। बहुत बार उनकी रचनाएँ हमारे दोगले और स्वार्थी समाज की नींव को हिलाती हुई नज़र आती हैं।
अपने उपन्यास `ज़िंदगीनामा' के लिए 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' पाने वाली वे पहली महिला हिंदी लेखिका थीं। हालाँकि इसके बाद भी उन्हें कई सम्मानों से नवाज़ा गया। सोबती को जब ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया तो बहुत से प्रसिद्द लेखकों और साहित्य-प्रेमियों ने कहा कि यह पुरस्कार सोबती को बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था। उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार तत्कालीन उपराष्ट्रपति द्वारा दिया जाना था लेकिन खराब स्वास्थ्य के कारण वे नियत दिन कार्यक्रम में नहीं आ सकीं और यह पुरस्कार अशोक बाजपेई जी द्वारा उनकी तरफ से लिया गया। इस कार्यक्रम में मुझे भी जाने का अवसर मिला था लेकिन कृष्णा जी के दर्शन न हो पाने का मलाल जरुर रहा।
२५ जनवरी २०१९ को कृष्णा सोबती ने ९४ वर्ष की उम्र में इस दुनिया से विदा ली। और अपने पीछे छोड़ गयीं अपनी उम्रभर की विरासत- ऐसी विरासत; जिसका ना तो कोई मोल है और ना ही शायद कोई इस विरासत की बराबरी कर सकता है।
उनकी रचनाओं की बात करें तो - कहानी संग्रह- बादलों के घेरे-१९८० ।
लम्बी कहानी (आख्यायिका/उपन्यासिका)-डार से बिछुड़ी - १९५८, मित्रो मरजानी-१९६७, यारों के यार-१९६८, ऐ लड़की-१९९१, सिक्का बदल गया, मेरी माँ कहा है, जैनी मेहरबान सिंह- २००७(चल-चित्रीय पटकथा; `मित्रो मरजानी' की रचना के बाद ही रचित, परन्तु चार दशक बाद २००७ में प्रकाशित) ।
उपन्यास- सूरजमुखी अँधेरे के- १९७२, ज़िन्दगी़नामा-१९७९, दिलोदानिश-१९९३, समय सरगम-२०००, गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान- २०१७ (निजी जीवन को स्पर्श करती औपन्यासिक रचना) ।
विचार-संवाद-संस्मरण- हम हशमत (तीन भागों में), सोबती एक सोहबत, शब्दों के आलोक में, सोबती वैद संवाद,
मुक्तिबोध : एक व्यक्तित्व सही की तलाश में - २०१७, लेखक का जनतंत्र-२०१८, मार्फ़त दिल्ली-२०१८ ।
यात्रा-आख्यान- बुद्ध का कमण्डल : लद्दाख़।
कृष्णा जी की शख्सियत के बारे में उनसे जुड़े बहुत से प्रसंग हैं वे शुरू से ही एक खुद्दार महिला थीं उनके उपन्यास ‘चन्ना’ की कहानी बताते हुए कृष्णा जी के प्रकाशक और राजकमल प्रकाशन समूह के अध्यक्ष अशोक महेश्वरी कहते हैं, ‘चन्ना कृष्णा जी का पहला उपन्यास था जो उन्होंने तीस की उम्र में लिखा था। फिर छपने के लिए वह उस वक़्त के सबसे मशहूर प्रकाशक- इलाहाबाद के भारतीय भंडार लीडर प्रेस के जाने माने सम्पादक वाचस्वती पाठक के पास गया। वह उस वक़्त के बड़े प्रकाशक थे। निराला से लेकर महादेवी वर्मा तक, सबकी किताबें वहीं से प्रकाशित होती थीं। वहाँ बात तय हो गयी, अनुबंध हुआ और उपन्यास छपने के लिए भी चला गया। इस बीच कृष्णा जी के पास किताब की डमी पहुँची । उन्होंने पढ़ा और देखा कि प्रकाशक-सम्पादक ने पंजाबी स्वर वाले कुछ शब्द बदल दिए हैं। जैसे ‘पौड़ियाँ ’ को उन्होंने सीढ़ियाँ कर दिया था। इस बात पर कृष्णा जी इतनी नाराज़ हुईं कि संदेश भिजवा कर चलती छपाई को रुकवा दिया। फिर तुरंत इलाहाबाद पहुँची और छपाई पर हुए ख़र्चे का भुगतान करके अपना उपन्यास वापस ले लिया। अपने सृजन को लेकर ३० की उम्र में पहली किताब के साथ खड़ी एक नई लेखिका के तौर पर भी उनमें इतनी हिम्मत और बेबाक़ी थी। यह हिम्मत सारी ज़िंदगी उनमें क़ायम रही’।
इसी तरह के कुछ और किस्से कृष्णा जी खुद सुनाया करतीं थीं उन किस्सों को उनकी जुबानी ही देखिये- ‘एक बार अमृता प्रीतम के साथ मेरा विवाद हो गया। वह विवाद किताब के शीर्षक को लेकर था। मेरी किताब थी जिंदगीनामा। इसके कुछ दिनों बाद इसी शीर्षक से अमृता जी की भी एक किताब का विज्ञापन छपा। मूवी स्टार में वह विज्ञापन छपा- अमृता प्रीतम का नया उपन्यास जिंदगीनामा- जिंदगी की हकीकतों को उजागर करता हुआ। इस पर मुझे ऐतराज हो गया। मैंने अपने प्रकाशन को भी कहा कि मैं इस तरह की बात बर्दाश्त नहीं कर सकती। मैं इस मामले को लेकर हाईकोर्ट तक गई। जज ने मुझसे पूछा कि आप कौन हैं? मैंने आपके बारे में कभी सुना नहीं है। बाद में मेरे वकील ने मुझसे पूछा कि आपको जज की बात बुरी तो नहीं लगी? मैंने कहा कि नहीं, मुझे अपने बारे में कोई गलतफहमी नहीं है। अगली तारीख में जज ने कहा कि अब मैं आपके बारे में जान गया हूँ। वह मुकदमा करीब २५ साल तक चला। ख़ूब चर्चा हुई। बाद में वह बडे़ मामूली तरीके से खत्म हुआ। इन्हीं वजहों से मुझे अक्खड़ माना जाता रहा। मैं जो कहना चाहती थी, वह ज़रूर कहती थी। कुछ न कह पाने की सूरत में मैं अपनी नींद खराब नहीं करना चाहती’।
एक किस्सा यह भी वे सुनाती थीं कि मैंने कई बड़े पुरस्कारों को लेने से मना कर दिया। एक दिन मेरे पास फोन आया कि आपको पद्म भूषण देना चाहते हैं। मैंने विनम्रता से मना कर दिया। मेरा मानना है कि हिंदी बहुत बड़ी भाषा है। इन पुरस्कारों को लेकर अब सोच बदलने की ज़रूरत है। जब तक किसी हिंदी के लेखक को पद्म पुरस्कार दिए जाने का नंबर आता है, वह ७० पार कर चुका होता है। पुरस्कार देना ही है, तो ४० की उम्र में दीजिए। ५० में दीजिए, हद से हद ६० में दे दीजिए। यह क्या कि जब अस्पताल में जाने का समय हो गया, तब आप किसी को पुरस्कार दे रहे हैं? हिंदी के साथ अब बड़ी भाषा जैसा बर्ताव होना चाहिए।
कृष्णा सोबती ने अपने और अपने पति शिवनाथ के जीवन की सारी जमा पूँजी - एक करोड़ रुपए और दिल्ली के मयूर विहार इलाक़े में मौजूद उनके रिहाइशी ़फ्लैट को - अशोक वाजपेयी द्वारा प्रशासित रज़ा फ़ाउंडेशन के नाम कर दिया था। कृष्णा जी चाहती थीं और कि रज़ा फ़ाउंडेशन द्वारा इस पैसे और संपत्ति का इस्तेमाल भारतीय लेखकों और सृजन के काम को आगे बढ़ाने के लिए किया जाए। साक्षात्कार के दौरान अशोक वाजपेयी यह ज़ोर देकर कहते भी हैं कि ऐसा कोई दूसरा भारतीय लेखक नहीं, जिसने इतनी दरियादिली से दूसरों लेखकों और सृजन के लिए पैसे दिए हों।
रचना दीक्षित
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0