महाश्वेता देवी का परिचय उनके उपन्यास ‘अग्निगर्भ’ के माध्यम से

यह आलेख Mahasweta Devi के उपन्यास Agnigarbha में उपस्थित दलित-आदिवासी विमर्श, वर्ग संघर्ष, नक्सलवादी चेतना तथा शोषण के विरुद्ध उभरते प्रतिरोध का विश्लेषण करता है। उपन्यास में भूमिहीन किसानों, बंधुआ मजदूरों, आदिवासियों और दलित समुदाय के जीवन संघर्ष, सामाजिक-आर्थिक विषमता, सामंती शोषण और सत्ता के दमनकारी स्वरूप को यथार्थवादी दृष्टि से चित्रित किया गया है। बसाई टुडु और द्रौपदी जैसे पात्रों के माध्यम से लेखिका ने दलित-आदिवासी अस्मिता, विद्रोह और न्याय की आकांक्षा को प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया है। यह उपन्यास केवल साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और मानवीय समानता का दस्तावेज है।

May 15, 2026 - 15:40
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महाश्वेता देवी का परिचय उनके उपन्यास ‘अग्निगर्भ’ के माध्यम से
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साहित्य के समकालिक विमर्शो मे दलित विमर्श की उपस्थित किसी तूफान से कम नही है। अपनी तूफानी उपस्थिति से दलित विमर्श उन तमाम बध्द धारणाओं और मान्यताओं को खारिज करता  हुआ चलता है, जो मानवीय मुक्ति मानवीय  समता के रास्ते मे किसी भी प्रकार का अवरोध विरोध को खड़ा करती है। यदि हम ‘दलित’ शब्द के  कोश गत अर्थ को समझे तो यह ज्ञात हो जायेगा, जो रौंदा मसला कुचला गया हो वह दलित है। कहा जा सकता है कि किसी भी तरह से शोषित व्यक्ति दलित है। वह चाहे किसी भी वर्ग का क्यो न हो, यह जरूरी नही वह जातिगत दलित हो। कुछ विमर्शकारो ने ऐसा माना है कि दलित वह है, जिसे भारतीय संविधान मे अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त  हो। दलित शब्द दबाए हुए शोषित प्रताड़ित के अर्थो के साथ जब साहित्य से जुडा है, तो वह विरोध विद्रोह नकारात्मक की ओर संकेत करता है। यह विरोध  चाहे व्यवस्था की हो, विसंगतियो का हो या धार्मिक रूढ़ियों का या भाषा प्रान्त अलगाव  का हो, या साहित्यिक पपरम्पराओं का हो दलित साहित्य वह है,जो संघर्षो से उपजा है, जिसमे समता एंड बान्धुत का भाव है, और वर्ण व्यवस्था से से उपजे जातिवाद का विरोध है ...स्वातंत्रयोत्तर बंगला साहित्य के कथा लेखिकाओं में महाश्वेता देवी एक लोकप्रिय लेखिका हैं। जिनकी कृतियाँ बांग्ला साहित्य में अपार लोकप्रिय हैं। हिन्दी पाठक वर्ग में भी वह सामान रूप से लोकप्रिय हैं।  
महाश्वेता देवी ने स्वतंत्रता के पश्चात् का,राजनैतिक परिवेश और राजनेताओं के छल छदम भ्रष्टाचार को, केन्द्र में रखकर सरकारी योजनाओं और घोषणाओं की व्यर्थता, और निर्धन ग्रामीण दलित आदिवासियों की समस्याओं को अपने साहित्य के केन्द्र में रखा हैं।   
महाश्वेता देवी ने ग्रामीण बांग्ला समाज और दार्जिलिंग जिले के नक्सलवाद से प्रभावित ग्रामीण अंचल के अधिकांश भूभाग में रहनेवाले, आदिवासी भूमिहीन किसान, खासकर, येदी,लेप्चा  भोटिया, संथाल, ओरेव, राजबंसी और गोरखा संप्रदाय के लोग है। महाश्वेता देवी ने,उनके जनजीवन को केंद्र में रखकर ‘अग्निगर्भ’ की रचना की है।

जमींदारों मालगुजारों ने वर्षों से भूमिहीन किसानों का आदिवासियो, दलितो का शोषण कर रहे थे। ‘आधिया' व्यवस्था को माध्यम बनाकर उनको लूट रहे थे, इन परिस्थितियों ने लेखिका के अंतकरण...को आंदोलित किया,दलितो  आदिवासियो शोषितों वंचितों को न्याय मिले, इस उत्तरदायित्व को पूरा करने हेतु, उन्होंने कलम चलाई है. दलितो आदिवासी निर्धनों को, उनका हक़ मिले, उनकी जमीनों पर। ऐसे समय में, उनकी दशा दिशा सुधारने बदलने की, उत्कृष्ट आकांशा, उनके मन में जाग्रत हुई। जिसे उन्होंने इस उपन्यास मे भलि भॉति उजागर किया हैं। `स्वतंत्रता के इकतीस वर्ष के बाद भी, अन्न,जल,जीवन कर्ज, बेगार, इन किसी से भी दलितो, आदिवासियो मनुष्यो को मुक्ति होते हुये नहीं देखा। जिस व्यवस्था ने,उन्हें मुक्ति नहीं दी। उसके कथन है ‘विरुद्ध, शुभ्र, शुध्द और सूर्य के समान क्रोध ही मेरी,समस्त लेखन की प्रेरणा हैं। ‘दक्षिण वामपंथ सभी दल, सामान्य मनुष्य से किये गये वायदो को, पूरा करने में असफल रहे। ऐसा मेरा विश्वास हैं। मेरे जीवन काल में इस विश्वास को ,बदलने का कोई कारण होगा। ऐसी आशा नहीं है। इसी विश्वास और सामर्थ्य के बल पर उन्होने इस उपन्यास मे आदिवासी मानव की कथा लिखी। ‘जिससे कभी सामना होने पर  इस के लिए, मुझे लज्जित न होना पड़े ‘क्योंकि लेखक को अपने जीवन काल में ही अंतिम न्याय के लिए उपस्थित होना पड़ता हैं और अपनी जबाबदेही की जिम्मेदारी रह जाती हैं। ' 
‘अग्निगर्भ’ एक प्रगतिवादी या सामन्यवादी चेतना का उपन्यास हैं। इसलिए इस उपन्यास में शोषित समाज के सर्वतोंमुखी उत्थान की गहरी तड़प हैं। इससे धार्मिक अंधविश्वासों, सामाजिक, विकृतियों और आर्थिक, विशंगतियों पर निर्मम प्रहार किया गया है। भूमिहीन किसान, दलित खेतिहर मजदूर, बंधुआ मजदूरो के लिए लेखिका ने बड़े जोरदार आवाज उठायी हैं।  
नक्सल वाद का उदय: किन हालातो मे हुआ। इस पर बहुत गहन शोध, चिंतन, मनन उनकी दु:ख कातरता से संवेदित होकर दलित शोषित बंधुआ मजबूर, मजदूरो आदिवासियो के प्रति गहरी चेतना उनके जीवन उत्थान की उत्कष्ट।  आकांक्षा से प्रेरित होकर महाश्वेता देवी ने इस उपन्यास का स्रजन किया है। उन्होने दलित वनवासी आदिवासी जीवन की समस्याओं को, बहुत ही गहराई से, मझा परखा हैं। 
यही नहीं मार्शवाद का प्रभाव जो की स्वतंत्रता के बाद उठे वर्ग संघर्ष के रूप में सामने आया हैं। नक्सलवादी आंदोलन की पृष्ठभूमि मे, कृषि से जुड़े निर्धन गरीब शोषित वर्ग, जमींदारों के खिलाफ पनपते कृषि मजदूरों के विद्रोह को, महाश्वेता देवी ने मजदूरो का  आधिकार बताया हैं।   सन्  १९.५० चाय बागानों में काम करने वाले ‘अधियां' जोतने वाले आदिवासी कृषक दलित थे परन्तु कुछ समय बाद उस योजनाओं को बीच में छोड़ दिया। उसके बाद, चाय बगान के श्रमिकों ने,मालिकों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। उनकी मूल मॉग थी,कि चाय बागान की अतिरिक्त भूमि, सरकारी अधिकार के दायरे में लाकर, उसे उन सभी दलित गरीब आदिवासी मजदूर लोगों में बॉट देनी चाहिए।यह आंदोलन बाद में बहुत बडा भंयकर,आन्दोलन बन गया। परिणामस्वरूप चाय बागानों के मालिकों ने ‘आधिया' मजदूरो को वहॉ से उखाड़ फेका उनके घर-बार हाथियों के पैरो तले कुचल कर ,तहस नहस कर दिये गये।  इस प्रकार के अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध होकर नक्सलवाडी के दलित किसान एकजुट हो कर,कठोर संगठन बनाकर विद्रोह के पथ पर निकल पड़े। उस आंदोलन में, प्रमुख रूप से वंचित, शोषित दलित, बंधुआ मजदूर, ‘अधिया' गरीब आदिवासी किसान थे।  

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महाश्वेता देवी ने इस उपन्यास में प्रारंभ से अंत तक दलित आदिवासी मजदूरों के शोषण से मुक्ति की कामना करती हैं। मजदूरों को अपने अधिकारों के प्रति आत्मचेतना भर, संचेतन होकर उनके विद्रोही रूप को दर्शाती है । इस उपन्यास का मुख्य बिंदू  यही हैं।  आज नक्सलवाद एक सर्वत्र जाना पहचाना शब्द हैं। जो पूरे भारत में प्रचलित हैं। वर्तमान व्यवस्था से असंतुष्ट युवकों के, हिंसक वर्ग को नक्सली कहा जाता हैं। मूल रूप से, पिछड़े जंगली इलाको में, उपजे शोषण के खिलाफ, युवाओं के विद्रोह को, नक्सली कहा जाता हैं। उपन्यास का, नायक काली, बसाई टूटू से कहता हैं `कहो नक्सल कहो कोनूआं दु :ख  नाहीं, जब हम बने नहीं तो, चैलने देते हैं। वे टेररिस्ट कहते हैं। बाद में कांग्रेसी कहते हैं। चलान करते हैं। ये कम्युनिस्ट हैं। आज फंर्न्ट  कहता हैं। ये नक्सल हैं। मुझे भी कहेंगे। कोई दु :ख नहीं। सब अंधे बन गये हैं। उन्हें कौन  समझायेगा।’

भूमिहीन आदिमानव दलित बंधुओं मजदूरों की समस्या : 
`अग्निगर्भ' उपन्यास में लेखिका ने बसाई टूटू ‘और नायिका ‘द्रौपदी' के माध्यम से, बंधुआ खेतिहर दलित मजदूरो की, समस्या को निरूपण किया हैं। लेखिका ने इस समस्या को, एक व्यापक राष्ट्रिय समस्या के रूप में, रेखाकिंत किया हैं। क्योंकि खेत मजदूरों की समस्या पूरे भारत की समस्या है। मजदूर की समस्या का कारण केवल भूमिहीनता नहीं हैं। वास्तविकता तो यह हैं की किसान अपने श्रम द्वारा-प्राप्य से भी वंचित हैं। पानी,खाद,बीज के लिए, दुसरे पर निर्भर हैं। आज भी उसके दिन गरीबी में कटते हैं।,देश की आर्थिक प्रगति के बावजूद आदिवासी दलित मजदूरों किसानो की जिन्दगी में कोई परिवर्तन नहीं आया हैं। वे आज भी गरीब अशिक्षित मजदूर हैं। आत्महत्या करने को मजबूर है। उपन्यास का नायक बसाई' इस परिस्थितिजन्य को बदलना चाहता है। वह कह उठता हैं `ऐसा देश गढ दो-आदिवासी गरीब- संथालो के घर कि और ऊँचे घर वाले कामरेडो में अंतर न रहे। कर सकते हो? गाडी में चढ़ना लीनेन पहनना। कर सकोगे ? लेखिका महादेवी मजदूरों के शोषण को गहराई से महसूस कर उनकी भावनाओं को अपनी लेखनी में बहुत ही जज्बातों के साथ उतारा हैं। वे लिखती हैं, ‘सूखे में और गर्मी में दलित आदिवासी  अन्याय तथाकथित दलित हिन्दू,आदिवासी ... 
‘सूखी नदि का कलेजा खोदकर पानी तलाश करते हैं, ‘भात का फेन और आसानी (वह पानी जिसमे रात भर पका चावल ‘भात’ भिगो कर रखा जाता हैं) बिकते हैं। पलामू जिले के आदिवासियों को ‘चीना घास’ के बीज के सिवा ,और कोई चीज़ खाने को प्राय: नहीं मिलती। `नायक भूमिहीन किसानो का नेता बसाई टुडु-नक्सलवादी बनता हैं, जिसका बार बार दमन किया जाता हैं। 
`अग्निगर्भ' के प्रमुख पात्र हैं-बसाई टुडु, काली, संतरा और द्रौपती। इस उपन्यास में बसाई टुडु की जीवन गाथा आदिवासी खेतीहर,मजदूरों के संगठनकर्ता की जीवन गाथा हैं। बचपन में माता पिता के,प्रेम स्नेह से,वंचित बसाई का पालन,पोषण,उसकी बुआ ने किया। बाद में, उसे मिशन को, दे दिया गया। मिशन में ही, उसे शिक्षा मिली। वहॉ से निक़ल कर वह,किसान मजदूर यूनियन के कार्यकर्ता रूप में, कम्युनिस्ट पार्टी का,कामरेड बना। किन्तु थोड़ी ही समय में उसका मोहभंग हो गया, क्योंकि वहाँ, किसानों की मजदूरों, शोषितों ,वंचितों के हक की, कोई बात नहीं होती, उनका कोर्ई  पक्ष नहीं लेता था। बसाई इसके बाद संथालों की बस्ती में रहने लगा,संथालों को संगठित कर  उनको, अपने अधिकारों के प्रति चेतना को जंगाया। उन्हें संशक्त संघर्ष के लिए तैयार करना, प्रारंभ किया। उसके प्रयासों से अनेको बार संघर्ष हुए, सरकार की निगाहों में वह अवांछित तत्व हो गया। उसके दमन के प्रयास होते रहे, पुलिस उसे मरा हुआ सिद्ध करती है ,और वह बार -बार जीवित हो संगठन को शक्ति देता  रहता है। बसाई अपने जीवन भर खेतिहर मजदूरों के लिए काम किया जिससे भूमिहीन संथालों के बीच उसकी देवता की तरह पूजा होने लगती है । 

भारत में ‘बटाई दारी’ प्रथा ,या ‘आधिया ‘प्रथा के माध्यम से भूस्वामियों द्वारा आदिवासी-मजदूरों का शोषण और उससे पनपते विद्रोह का नायक हैं बसाई टुडू। बंगाल में जहाँ एक और बड़े बड़े भूस्वामी जमींदार हैं ।वही दुसरी ओर भारी संख्या उन खेतिहर आदिवासी मजदूर  की हैं जिनके पास ,जोतने बोने के लिए, जमीन नहीं हैं। पर उनकी जीविका कृषि पर निर्भर हैं ।ये भूस्वामियों से खेती बटाई या ‘अधिया' पर लेते हैं, ‘अधिया ‘या 'बटाई दारी' वह प्रथा हैं। जिसने भूमिहीन किसानो को बीज ,हल बैले ,खाना और थोड़ी मजदूरी देकर काम लिया जाता हैं। जिससे गरीब किसान भूस्वामियों के खेतों में, काम करते हैं। इनको जो जमीन दी जाती हैं फसल काटने के बाद उससे भूस्वामी अपना हिस्सा ,बीज अादि को निक़ाल लेते हैं । केवल उन्हे एक चौथाई उपज उन दलित  मजदूरों को मिलता है। इसके साथ ही उन पर भूस्वामियों का क़र्ज़ भी रहता हैं। थोड़ा सा विद्रोह करने पर,भूस्वामी अगले वर्ष,उन्हें बटाईदारी से अलग कर देता हैं। उसकी नित्य की मजदूरी बहुत कम होती हैं। उन्हें अच्छा अनाज नहीं, मोटा अनाज दिया जाता हैं। अधिकांश आदिवासी  क्षेत्रो मे, निर्धन वर्ग की  जीविका का आश्रय ही ‘अधिया प्रथा' हैं। इन असंतोष का परिणाम ही विद्रोह हैं।। जिसे लेखिका ने, अपने नायक बसाई टुडु ,और द्रौपदी के माध्यम से उभारा हैं । दोनों ही अलग अलग विद्रोही बनते हैं ।और पुलिस प्रशासन के द्वारा मारे सताये शोषित किये जाते हैं।  बसाई नक्सलवादी बनकर भूमिगत होकर ,आंदोलन करने लगता हैं, बार बार प्रशासन ,बसाई के मारे जाने की खबर  फैलता हैं। थोड़ी समय में बसाई पुन : सक्रिय हो जाता हैं। बसाई मर मर कर जीता हैं।किंतु आपातकाल लागू होने के बाद, वह मारा जाता हैं ।और उसकी आवाज़ ख़त्म हो जाती हैं। महाश्वेता देवी कहती हैं `क्योंकि बसाई टुडु मर सकता हैं, जब तक यह व्यवस्था हैं। बसाई मरता रहेगा, और फिर जी उठेगा। वह ‘अग्निबीज' हैं, सामन्ती कृषि व्यवस्था का और ‘अग्निगर्भ' है  सामांती क्रषि व्यवस्था का’। उपन्यास के आदर्श पात्र हैं ' बसाई टुडु और द्रौपदी की ये सारी घटनाएं हो, तात्कालिक परिणाम हैं  यद्यपि संग्राम के द्वारा , उन्होंने ही समाज में,परिवर्तन किया है और परिणाम के नाम और स्थानीय अवस्थिति के सिवा काल और देश का, प्रतीक बन गये। द्रौपदी अपने गांव मे पति दुलन के साथ खेत में काम करती हैं जहाँ उन्हें टेकेदार की वासना लालुप्ता एवं शोषण को सहन करती है। फिर एक दिन इस अन्याय के  विरूद्ध द्रौपदी और उनका पति दूलन, पुलिस, ठेकेदारों के विरुद्ध, बसाई टुडु के, नक्सवादी आंदोलन में सम्मलित हो कर गुरिल्ला युद्ध में माहिर हो जाते हैं ।बाद में द्रौपदी के पति को पुलिस जंगल में मार देती हैं। और द्रौपदी पुलिस द्वारा पकड़ी जाती है और  पुलिसों के द्वारा यौन उत्पीडन को शिकार होती हैं। परंतु वह फिर भी हिम्मत नहीं हारती, द्रौपदी दुर्बोध्य हैं ।फौज के अफसर के निकट एकदम निडर हँसती हुई कॉपती है ।हँसने से  उसके विक्षिप्त होटों से खून  बहता है वह खून हथेली से पोछ कर द्रौपदी कल-कल की भीषण  आकाश भेदी आवाज कर तीखी आवाज में बोली, धोती! क्या धोती! ये क्या होती हैं। नंगा कर सकता हैं? कपडे क्या पहनायेगा! तू मरद हैं! फौजी अफसर के मुंह मे खून सने थूक थूक कर कहती हैं। यहाँ कोई आदमी हैं ! जिसे  शर्म आये? धोती मुझे पहनने मत देना। यह क्या करेगा? ले कांउन्टर कर-। इससे एक दलित शोषित आदिवासी नारी का अन्याय के विरुध्द विद्रोह की चेतना का आगाज होता है। जिसे लेखिका ने कुछ-इस प्रकार व्यक्त किया हैं। जो भीभत्स या मार्मिक द्श्यो मे  प्रकृति का रंग भी बदलता हैं नारी की अस्मिता लूटते देखकर नंगी पड़ी क्षतविक्षत. द्रौपदी के शरीर में चाँदनी पड़ती हैं, तो लेखिका का सौन्दर्य बोध विकृत हो जाता हैं। वह लिखती हैं `चाँद कुछ चाँदनी की, उलटी कर,सोने चला गया ‘बसाई टुडु और द्रौपदी अपना जीवन न्न्योछावर कर,खेतिहर दलित मजदूरों के,जीवन को ख़ुशहाल बनाना चाहते थे। 

महाश्वेता देवी भी यही चाहती हैं। सामाजिक जीवन, राजनीतिक आर्थिक व्यवस्था में न्याय स्थापित कर,समान्य मनुष्य को इसी लोक में रह कर  एक बेहतर जीवन दे सकते हैं। उन्होंने लिखा बसाई टुडु धर्मराज की तरह ही अचूक बदला लेने वाला हैं। बसाई टुडु का बहुत सम्मान होता हैं। जिसे देखकर काली अंचम्भे में पड़ गया। बसाई को छोटे बड़े सभी कामरेड कहते हैं। बसाई बहुत ज्ञानी था वह कहता हैं में ही बता रहा हूँ। काली बाबू। में नयी राह खोज रहा हूँ। राह पुरानी होने पर भी नयी हैं। बसाई छुआछूत भेदभाव के विरुद्ध था वह कहता है काली बाबू। बाम्हन कायस्थ  खेत मजदूर नहीं होते, होते वो तो खेत मजदूर में छुआछूत होती, है मेरा कपार बहुत अच्छा हैं कि नंगे,भूखे साले सब खेत मजदूर हैं। और कोडे डंडे खाकर भी आपस मे जाट पात का भेदभाव नहीं होता। एक धर्म एक हंडिया में भात खाते हैं’! 
भारतीय भाषाओँ में ‘अग्निगर्भ' मूलत: बांग्ला भाषा साहित्य से हिन्दी में अनुदित उपन्यास का अन्यतम महत्व हैं। आदिवासी ग्रामीण जीवन का, इतना व्यापक चित्रण,अन्य किसी उपन्यास में नहीं हुआ हैं। दलितो आदिवासियो के जीवन की दशा का निरूपण करते समय महाश्वेता देवी जी ने ग्रामीण अंचलों की, अर्थ व्यवस्था ‘आधिया' ‘बटाईदार' दलित मजदूरों की सोचनीय स्थिति, शोषक वर्ग की मनोवृति सामंतवाद का पोषण प्रकृति चित्रण आदिवासियों के रीत रिवाज, तथा लोक संस्कृति का अनन्य चित्रण देखने को मिलता हैं। `अग्निगर्भ' में लेखिका ने बसाई टुडु के रूप में, दलित आदिवासी कृषक जीवन का प्रतीकात्मक चित्रण किया है दलित आदिवासियो के जीवन को बारीकी से निरीक्षण कर उनके जीवन की भीषण दुख जनित विडंबनात्मक परिणीति उपस्थिति की हैं उपन्यास में। वह भारतीय साहित्य में बेजोड़ हैं।   

यह उपन्यास सामन्तवादी कृषि व्यवस्था से जुडे बड़े भूस्वामियों और दलित खेतिहर मजदूरों के संघर्ष की कथा हैं। यह संघर्ष कथा एक राष्ट्रिय समस्या है। इसमें बिहार और असम के नील एंव चाय बगानो मे काम करने वाले आदिवासी मजदूर, तथा ‘आंध्र प्रदेश'के आदिवासी आंदोलनों का भी इसमे उल्लेख हैं। किन्तु मुलत: यह कथा ‘संथाली' आदिवासियों की दलितो  की कथा हैं। यह अलग बात है कि इन आंदोलनो की चरम परिणीति, एक विशेष स्थान पर हुई। और उसे समय और स्थान का नाम दिया गया। अतः इस उपन्यास में खेत मजदूर की समस्या पूरे भारत की समस्या हैं। जिसमें केवल भूमिहीनता ही कारण नहीं हैं, अपितु खेत मजदूर के हिसाब से किसान उसके उचित लाभ से वंचित हैं। इस प्रकार यह उपन्यास महाश्वेता देवी के विचार से यह उपन्यास एक सम्यक रूप प्रस्तुतीकरण करने में समर्थ हैं। एक सामान्य कृषक मजदूर को इस उपन्यास का नायक बनाकर भूमिहीन दलित किसानों के असंतोष को संग्राम में बदला हैं। समग्र आदिवासी जीवन का चित्रण कर लेखिका ने आदिवासी कृषक निधर्न शोषित जीवन के प्रति समाज को सोचने में मजबूर कर दिया। समाज को एक नयी दृष्टि दिया। जो की अत्यन्त कठोर यथार्थ की अभिव्यकित हैं। यह उपन्यास लेखिका महा श्वेता देवी का समाज के प्रति उत्कृष्टतम योगदान हैं।   साहित्य के समकालिक विमर्शो मे दलित विमर्श की उपस्थित किसी तूफान से कम नही है। अपनी तूफानी उपस्थिति से दलित विमर्श उन तमाम बध्द धारणाओं और मान्यताओं को खारिज करता  हुआ चलता है, जो मानवीय मुक्ति मानवीय  समता के रास्ते मे किसी भी प्रकार का अवरोध विरोध को खड़ा करती है। यदि हम ‘दलित’ शब्द के  कोश गत अर्थ को समझे तो यह ज्ञात हो जायेगा, जो रौंदा मसला कुचला गया हो वह दलित है। कहा जा सकता है कि किसी भी तरह से शोषित व्यक्ति दलित है। वह चाहे किसी भी वर्ग का क्यो न हो, यह जरूरी नही वह जातिगत दलित हो। कुछ विमर्शकारो ने ऐसा माना है कि दलित वह है, जिसे भारतीय संविधान मे अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त  हो। दलित शब्द दबाए हुए शोषित प्रताड़ित के अर्थो के साथ जब साहित्य से जुडा है, तो वह विरोध विद्रोह नकारात्मक की ओर संकेत करता है। यह विरोध  चाहे व्यवस्था की हो, विसंगतियो का हो या धार्मिक रूढ़ियों का या भाषा प्रान्त अलगाव  का हो, या साहित्यिक पपरम्पराओं का हो दलित साहित्य वह है,जो संघर्षो से उपजा है, जिसमे समता एंड बान्धुत का भाव है, और वर्ण व्यवस्था से से उपजे जातिवाद का विरोध है ...
स्वातंत्रयोत्तर बंगला साहित्य के कथा लेखिकाओं में महाश्वेता देवी एक लोकप्रिय लेखिका हैं। जिनकी कृतियाँ बांग्ला साहित्य में अपार लोकप्रिय हैं। हिन्दी पाठक वर्ग में भी वह सामान रूप से लोकप्रिय हैं।  
महाश्वेता देवी ने स्वतंत्रता के पश्चात् का,राजनैतिक परिवेश और राजनेताओं के छल छदम भ्रष्टाचार को, केन्द्र में रखकर सरकारी योजनाओं और घोषणाओं की व्यर्थता, और निर्धन ग्रामीण दलित आदिवासियों की समस्याओं को अपने साहित्य के केन्द्र में रखा हैं।   
महाश्वेता देवी ने ग्रामीण बांग्ला समाज और दार्जिलिंग जिले के नक्सलवाद से प्रभावित ग्रामीण अंचल के अधिकांश भूभाग में रहनेवाले, आदिवासी भूमिहीन किसान, खासकर, येदी,लेप्चा  भोटिया, संथाल, ओरेव, राजबंसी और गोरखा संप्रदाय के लोग है। महाश्वेता देवी ने,उनके जनजीवन को केंद्र में रखकर ‘अग्निगर्भ’ की रचना की है। 

जमींदारों मालगुजारों ने वर्षों से भूमिहीन किसानों का आदिवासियो, दलितो का शोषण कर रहे थे। ‘आधिया' व्यवस्था को माध्यम बनाकर उनको लूट रहे थे, इन परिस्थितियों ने लेखिका के अंतकरण...को आंदोलित किया,दलितो  आदिवासियो शोषितों वंचितों को न्याय मिले, इस उत्तरदायित्व को पूरा करने हेतु, उन्होंने कलम चलाई है. दलितो आदिवासी निर्धनों को, उनका हक़ मिले, उनकी जमीनों पर। ऐसे समय में, उनकी दशा दिशा सुधारने बदलने की, उत्कृष्ट आकांशा, उनके मन में जाग्रत हुई। जिसे उन्होंने इस उपन्यास मे भलि भॉति उजागर किया हैं। `स्वतंत्रता के इकतीस वर्ष के बाद भी, अन्न,जल,जीवन कर्ज, बेगार, इन किसी से भी दलितो, आदिवासियो मनुष्यो को मुक्ति होते हुये नहीं देखा। जिस व्यवस्था ने,उन्हें मुक्ति नहीं दी। उसके कथन है ‘विरुद्ध, शुभ्र, शुध्द और सूर्य के समान क्रोध ही मेरी,समस्त लेखन की प्रेरणा हैं। ‘दक्षिण वामपंथ सभी दल, सामान्य मनुष्य से किये गये वायदो को, पूरा करने में असफल रहे। ऐसा मेरा विश्वास हैं। मेरे जीवन काल में इस विश्वास को ,बदलने का कोई कारण होगा। ऐसी आशा नहीं है। इसी विश्वास और सामर्थ्य के बल पर उन्होने इस उपन्यास मे आदिवासी मानव की कथा लिखी। ‘जिससे कभी सामना होने पर  इस के लिए, मुझे लज्जित न होना पड़े ‘क्योंकि लेखक को अपने जीवन काल में ही अंतिम न्याय के लिए उपस्थित होना पड़ता हैं और अपनी जबाबदेही की जिम्मेदारी रह जाती हैं। ' 
‘अग्निगर्भ’ एक प्रगतिवादी या सामन्यवादी चेतना का उपन्यास हैं। इसलिए इस उपन्यास में शोषित समाज के सर्वतोंमुखी उत्थान की गहरी तड़प हैं। इससे धार्मिक अंधविश्वासों, सामाजिक, विकृतियों और आर्थिक, विशंगतियों पर निर्मम प्रहार किया गया है। भूमिहीन किसान, दलित खेतिहर मजदूर, बंधुआ मजदूरो के लिए लेखिका ने बड़े जोरदार आवाज उठायी हैं।  
नक्सल वाद का उदय: किन हालातो मे हुआ। इस पर बहुत गहन शोध, चिंतन, मनन उनकी दु:ख कातरता से संवेदित होकर दलित शोषित बंधुआ मजबूर, मजदूरो आदिवासियो के प्रति गहरी चेतना उनके जीवन उत्थान की उत्कष्ट।  आकांक्षा से प्रेरित होकर महाश्वेता देवी ने इस उपन्यास का स्रजन किया है। उन्होने दलित वनवासी आदिवासी जीवन की समस्याओं को, बहुत ही गहराई से, मझा परखा हैं। 
यही नहीं मार्शवाद का प्रभाव जो की स्वतंत्रता के बाद उठे वर्ग संघर्ष के रूप में सामने आया हैं। नक्सलवादी आंदोलन की पृष्ठभूमि मे, कृषि से जुड़े निर्धन गरीब शोषित वर्ग, जमींदारों के खिलाफ पनपते कृषि मजदूरों के विद्रोह को, महाश्वेता देवी ने मजदूरो का  आधिकार बताया हैं।   

सन्  १९.५० चाय बागानों में काम करने वाले ‘अधियां' जोतने वाले आदिवासी कृषक दलित थे परन्तु कुछ समय बाद उस योजनाओं को बीच में छोड़ दिया। उसके बाद, चाय बगान के श्रमिकों ने,मालिकों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। उनकी मूल मॉग थी,कि चाय बागान की अतिरिक्त भूमि, सरकारी अधिकार के दायरे में लाकर, उसे उन सभी दलित गरीब आदिवासी मजदूर लोगों में बॉट देनी चाहिए।यह आंदोलन बाद में बहुत बडा भंयकर,आन्दोलन बन गया। परिणामस्वरूप चाय बागानों के मालिकों ने ‘आधिया' मजदूरो को वहॉ से उखाड़ फेका उनके घर-बार हाथियों के पैरो तले कुचल कर ,तहस नहस कर दिये गये।  इस प्रकार के अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध होकर नक्सलवाडी के दलित किसान एकजुट हो कर,कठोर संगठन बनाकर विद्रोह के पथ पर निकल पड़े। उस आंदोलन में, प्रमुख रूप से वंचित, शोषित दलित, बंधुआ मजदूर, ‘अधिया' गरीब आदिवासी किसान थे।  
महाश्वेता देवी ने इस उपन्यास में प्रारंभ से अंत तक दलित आदिवासी मजदूरों के शोषण से मुक्ति की कामना करती हैं। मजदूरों को अपने अधिकारों के प्रति आत्मचेतना भर, संचेतन होकर उनके विद्रोही रूप को दर्शाती है । इस उपन्यास का मुख्य बिंदू  यही हैं।  आज नक्सलवाद एक सर्वत्र जाना पहचाना शब्द हैं। जो पूरे भारत में प्रचलित हैं। वर्तमान व्यवस्था से असंतुष्ट युवकों के, हिंसक वर्ग को नक्सली कहा जाता हैं। मूल रूप से, पिछड़े जंगली इलाको में, उपजे शोषण के खिलाफ, युवाओं के विद्रोह को, नक्सली कहा जाता हैं। उपन्यास का, नायक काली, बसाई टूटू से कहता हैं `कहो नक्सल कहो कोनूआं दु :ख  नाहीं, जब हम बने नहीं तो, चैलने देते हैं। वे टेररिस्ट कहते हैं। बाद में कांग्रेसी कहते हैं। चलान करते हैं। ये कम्युनिस्ट हैं। आज फंर्न्ट  कहता हैं। ये नक्सल हैं। मुझे भी कहेंगे। कोई दु :ख नहीं। सब अंधे बन गये हैं। उन्हें कौन  समझायेगा।’ 

भूमिहीन आदिमानव दलित बंधुओं मजदूरों की समस्या : 
`अग्निगर्भ' उपन्यास में लेखिका ने बसाई टूटू ‘और नायिका ‘द्रौपदी' के माध्यम से, बंधुआ खेतिहर दलित मजदूरो की, समस्या को निरूपण किया हैं। लेखिका ने इस समस्या को, एक व्यापक राष्ट्रिय समस्या के रूप में, रेखाकिंत किया हैं। क्योंकि खेत मजदूरों की समस्या पूरे भारत की समस्या है। मजदूर की समस्या का कारण केवल भूमिहीनता नहीं हैं। वास्तविकता तो यह हैं की किसान अपने श्रम द्वारा-प्राप्य से भी वंचित हैं। पानी,खाद,बीज के लिए, दुसरे पर निर्भर हैं। आज भी उसके दिन गरीबी में कटते हैं।,देश की आर्थिक प्रगति के बावजूद आदिवासी दलित मजदूरों किसानो की जिन्दगी में कोई परिवर्तन नहीं आया हैं। वे आज भी गरीब अशिक्षित मजदूर हैं। आत्महत्या करने को मजबूर है। उपन्यास का नायक बसाई' इस परिस्थितिजन्य को बदलना चाहता है। वह कह उठता हैं `ऐसा देश गढ दो-आदिवासी गरीब- संथालो के घर कि और ऊँचे घर वाले कामरेडो में अंतर न रहे। कर सकते हो? गाडी में चढ़ना लीनेन पहनना। कर सकोगे ? लेखिका महादेवी मजदूरों के शोषण को गहराई से महसूस कर उनकी भावनाओं को अपनी लेखनी में बहुत ही जज्बातों के साथ उतारा हैं। वे लिखती हैं, ‘सूखे में और गर्मी में दलित आदिवासी  अन्याय तथाकथित दलित हिन्दू,आदिवासी ... 
‘सूखी नदि का कलेजा खोदकर पानी तलाश करते हैं, ‘भात का फेन और आसानी (वह पानी जिसमे रात भर पका चावल ‘भात’ भिगो कर रखा जाता हैं) बिकते हैं। पलामू जिले के आदिवासियों को ‘चीना घास’ के बीज के सिवा ,और कोई चीज़ खाने को प्राय: नहीं मिलती। `नायक भूमिहीन किसानो का नेता बसाई टुडु-नक्सलवादी बनता हैं, जिसका बार बार दमन किया जाता हैं। 
`अग्निगर्भ' के प्रमुख पात्र हैं-बसाई टुडु, काली, संतरा और द्रौपती। इस उपन्यास में बसाई टुडु की जीवन गाथा आदिवासी खेतीहर,मजदूरों के संगठनकर्ता की जीवन गाथा हैं। बचपन में माता पिता के,प्रेम स्नेह से,वंचित बसाई का पालन,पोषण,उसकी बुआ ने किया। बाद में, उसे मिशन को, दे दिया गया। मिशन में ही, उसे शिक्षा मिली। वहॉ से निक़ल कर वह,किसान मजदूर यूनियन के कार्यकर्ता रूप में, कम्युनिस्ट पार्टी का,कामरेड बना। किन्तु थोड़ी ही समय में उसका मोहभंग हो गया, क्योंकि वहाँ, किसानों की मजदूरों, शोषितों ,वंचितों के हक की, कोई बात नहीं होती, उनका कोर्ई  पक्ष नहीं लेता था। बसाई इसके बाद संथालों की बस्ती में रहने लगा,संथालों को संगठित कर  उनको, अपने अधिकारों के प्रति चेतना को जंगाया। उन्हें संशक्त संघर्ष के लिए तैयार करना, प्रारंभ किया। उसके प्रयासों से अनेको बार संघर्ष हुए, सरकार की निगाहों में वह अवांछित तत्व हो गया। उसके दमन के प्रयास होते रहे, पुलिस उसे मरा हुआ सिद्ध करती है ,और वह बार -बार जीवित हो संगठन को शक्ति देता  रहता है। बसाई अपने जीवन भर खेतिहर मजदूरों के लिए काम किया जिससे भूमिहीन संथालों के बीच उसकी देवता की तरह पूजा होने लगती है । 

भारत में ‘बटाई दारी’ प्रथा ,या ‘आधिया ‘प्रथा के माध्यम से भूस्वामियों द्वारा आदिवासी-मजदूरों का शोषण और उससे पनपते विद्रोह का नायक हैं बसाई टुडू। बंगाल में जहाँ एक और बड़े बड़े भूस्वामी जमींदार हैं ।वही दुसरी ओर भारी संख्या उन खेतिहर आदिवासी मजदूर  की हैं जिनके पास ,जोतने बोने के लिए, जमीन नहीं हैं। पर उनकी जीविका कृषि पर निर्भर हैं ।ये भूस्वामियों से खेती बटाई या ‘अधिया' पर लेते हैं, ‘अधिया ‘या 'बटाई दारी' वह प्रथा हैं। जिसने भूमिहीन किसानो को बीज ,हल बैले ,खाना और थोड़ी मजदूरी देकर काम लिया जाता हैं। जिससे गरीब किसान भूस्वामियों के खेतों में, काम करते हैं। इनको जो जमीन दी जाती हैं फसल काटने के बाद उससे भूस्वामी अपना हिस्सा ,बीज अादि को निक़ाल लेते हैं । केवल उन्हे एक चौथाई उपज उन दलित  मजदूरों को मिलता है। इसके साथ ही उन पर भूस्वामियों का क़र्ज़ भी रहता हैं। थोड़ा सा विद्रोह करने पर,भूस्वामी अगले वर्ष,उन्हें बटाईदारी से अलग कर देता हैं। उसकी नित्य की मजदूरी बहुत कम होती हैं। उन्हें अच्छा अनाज नहीं, मोटा अनाज दिया जाता हैं। अधिकांश आदिवासी  क्षेत्रो मे, निर्धन वर्ग की  जीविका का आश्रय ही ‘अधिया प्रथा' हैं। इन असंतोष का परिणाम ही विद्रोह हैं।। जिसे लेखिका ने, अपने नायक बसाई टुडु ,और द्रौपदी के माध्यम से उभारा हैं । दोनों ही अलग अलग विद्रोही बनते हैं ।और पुलिस प्रशासन के द्वारा मारे सताये शोषित किये जाते हैं।  बसाई नक्सलवादी बनकर भूमिगत होकर ,आंदोलन करने लगता हैं, बार बार प्रशासन ,बसाई के मारे जाने की खबर  फैलता हैं। थोड़ी समय में बसाई पुन : सक्रिय हो जाता हैं। बसाई मर मर कर जीता हैं।किंतु आपातकाल लागू होने के बाद, वह मारा जाता हैं ।और उसकी आवाज़ ख़त्म हो जाती हैं। महाश्वेता देवी कहती हैं `क्योंकि बसाई टुडु मर सकता हैं, जब तक यह व्यवस्था हैं। बसाई मरता रहेगा, और फिर जी उठेगा। वह ‘अग्निबीज' हैं, सामन्ती कृषि व्यवस्था का और ‘अग्निगर्भ' है  सामांती क्रषि व्यवस्था का’। उपन्यास के आदर्श पात्र हैं ' बसाई टुडु और द्रौपदी की ये सारी घटनाएं हो, तात्कालिक परिणाम हैं  यद्यपि संग्राम के द्वारा , उन्होंने ही समाज में,परिवर्तन किया है और परिणाम के नाम और स्थानीय अवस्थिति के सिवा काल और देश का, प्रतीक बन गये। द्रौपदी अपने गांव मे पति दुलन के साथ खेत में काम करती हैं जहाँ उन्हें टेकेदार की वासना लालुप्ता एवं शोषण को सहन करती है। फिर एक दिन इस अन्याय के  विरूद्ध द्रौपदी और उनका पति दूलन, पुलिस, ठेकेदारों के विरुद्ध, बसाई टुडु के, नक्सवादी आंदोलन में सम्मलित हो कर गुरिल्ला युद्ध में माहिर हो जाते हैं ।बाद में द्रौपदी के पति को पुलिस जंगल में मार देती हैं। और द्रौपदी पुलिस द्वारा पकड़ी जाती है और  पुलिसों के द्वारा यौन उत्पीडन को शिकार होती हैं। परंतु वह फिर भी हिम्मत नहीं हारती, द्रौपदी दुर्बोध्य हैं ।फौज के अफसर के निकट एकदम निडर हँसती हुई कॉपती है ।हँसने से  उसके विक्षिप्त होटों से खून  बहता है वह खून हथेली से पोछ कर द्रौपदी कल-कल की भीषण  आकाश भेदी आवाज कर तीखी आवाज में बोली, धोती! क्या धोती! ये क्या होती हैं। नंगा कर सकता हैं? कपडे क्या पहनायेगा! तू मरद हैं! फौजी अफसर के मुंह मे खून सने थूक थूक कर कहती हैं। यहाँ कोई आदमी हैं ! जिसे  शर्म आये? धोती मुझे पहनने मत देना। यह क्या करेगा? ले कांउन्टर कर-। इससे एक दलित शोषित आदिवासी नारी का अन्याय के विरुध्द विद्रोह की चेतना का आगाज होता है। जिसे लेखिका ने कुछ-इस प्रकार व्यक्त किया हैं। जो भीभत्स या मार्मिक द्श्यो मे  प्रकृति का रंग भी बदलता हैं नारी की अस्मिता लूटते देखकर नंगी पड़ी क्षतविक्षत. द्रौपदी के शरीर में चाँदनी पड़ती हैं, तो लेखिका का सौन्दर्य बोध विकृत हो जाता हैं। वह लिखती हैं `चाँद कुछ चाँदनी की, उलटी कर,सोने चला गया ‘बसाई टुडु और द्रौपदी अपना जीवन न्न्योछावर कर,खेतिहर दलित मजदूरों के,जीवन को ख़ुशहाल बनाना चाहते थे। 

महाश्वेता देवी भी यही चाहती हैं। सामाजिक जीवन, राजनीतिक आर्थिक व्यवस्था में न्याय स्थापित कर,समान्य मनुष्य को इसी लोक में रह कर  एक बेहतर जीवन दे सकते हैं। उन्होंने लिखा बसाई टुडु धर्मराज की तरह ही अचूक बदला लेने वाला हैं। बसाई टुडु का बहुत सम्मान होता हैं। जिसे देखकर काली अंचम्भे में पड़ गया। बसाई को छोटे बड़े सभी कामरेड कहते हैं। बसाई बहुत ज्ञानी था वह कहता हैं में ही बता रहा हूँ। काली बाबू। में नयी राह खोज रहा हूँ। राह पुरानी होने पर भी नयी हैं। बसाई छुआछूत भेदभाव के विरुद्ध था वह कहता है काली बाबू। बाम्हन कायस्थ  खेत मजदूर नहीं होते, होते वो तो खेत मजदूर में छुआछूत होती, है मेरा कपार बहुत अच्छा हैं कि नंगे,भूखे साले सब खेत मजदूर हैं। और कोडे डंडे खाकर भी आपस मे जाट पात का भेदभाव नहीं होता। एक धर्म एक हंडिया में भात खाते हैं’! 
भारतीय भाषाओँ में ‘अग्निगर्भ' मूलत: बांग्ला भाषा साहित्य से हिन्दी में अनुदित उपन्यास का अन्यतम महत्व हैं। आदिवासी ग्रामीण जीवन का, इतना व्यापक चित्रण,अन्य किसी उपन्यास में नहीं हुआ हैं। दलितो आदिवासियो के जीवन की दशा का निरूपण करते समय महाश्वेता देवी जी ने ग्रामीण अंचलों की, अर्थ व्यवस्था ‘आधिया' ‘बटाईदार' दलित मजदूरों की सोचनीय स्थिति, शोषक वर्ग की मनोवृति सामंतवाद का पोषण प्रकृति चित्रण आदिवासियों के रीत रिवाज, तथा लोक संस्कृति का अनन्य चित्रण देखने को मिलता हैं। `अग्निगर्भ' में लेखिका ने बसाई टुडु के रूप में, दलित आदिवासी कृषक जीवन का प्रतीकात्मक चित्रण किया है दलित आदिवासियो के जीवन को बारीकी से निरीक्षण कर उनके जीवन की भीषण दुख जनित विडंबनात्मक परिणीति उपस्थिति की हैं उपन्यास में। वह भारतीय साहित्य में बेजोड़ हैं।   

यह उपन्यास सामन्तवादी कृषि व्यवस्था से जुडे बड़े भूस्वामियों और दलित खेतिहर मजदूरों के संघर्ष की कथा हैं। यह संघर्ष कथा एक राष्ट्रिय समस्या है। इसमें बिहार और असम के नील एंव चाय बगानो मे काम करने वाले आदिवासी मजदूर, तथा ‘आंध्र प्रदेश'के आदिवासी आंदोलनों का भी इसमे उल्लेख हैं। किन्तु मुलत: यह कथा ‘संथाली' आदिवासियों की दलितो  की कथा हैं। यह अलग बात है कि इन आंदोलनो की चरम परिणीति, एक विशेष स्थान पर हुई। और उसे समय और स्थान का नाम दिया गया। अतः इस उपन्यास में खेत मजदूर की समस्या पूरे भारत की समस्या हैं। जिसमें केवल भूमिहीनता ही कारण नहीं हैं, अपितु खेत मजदूर के हिसाब से किसान उसके उचित लाभ से वंचित हैं। इस प्रकार यह उपन्यास महाश्वेता देवी के विचार से यह उपन्यास एक सम्यक रूप प्रस्तुतीकरण करने में समर्थ हैं। एक सामान्य कृषक मजदूर को इस उपन्यास का नायक बनाकर भूमिहीन दलित किसानों के असंतोष को संग्राम में बदला हैं। समग्र आदिवासी जीवन का चित्रण कर लेखिका ने आदिवासी कृषक निधर्न शोषित जीवन के प्रति समाज को सोचने में मजबूर कर दिया। समाज को एक नयी दृष्टि दिया। जो की अत्यन्त कठोर यथार्थ की अभिव्यकित हैं। यह उपन्यास लेखिका महा श्वेता देवी का समाज के प्रति उत्कृष्टतम योगदान हैं।  

डॉ. सीमा शेखर

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