प्रयोगवाद के प्रवर्तक- अज्ञेय
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि, कथाकार और प्रयोगवाद के प्रवर्तक थे। उन्होंने नई कविता आंदोलन को दिशा दी और ‘तार सप्तक’ जैसे काव्य-संकलनों के माध्यम से आधुनिक हिंदी कविता को नया स्वरूप प्रदान किया। उनका जीवन क्रांतिकारी गतिविधियों, साहित्यिक प्रयोगों और बहुआयामी रचनात्मकता से परिपूर्ण था।
प्रयोगवाद के प्रवर्तक,बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी ‘अज्ञेय’ का पूरा नाम ‘सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय’ है। प्रयोगवाद के जनक और नई कविता के नामकरण से जुड़े होने के कारण उन्हें प्रयोगवाद का प्रवर्तक माना जाता है जिन्होंने ‘नये पत्ते’पत्रिका के माध्यम से इसे हिंदी साहित्य में स्थापित किया। वे कवि,कथाकार, निबंधकार,पत्रकार और संपादक थे।उन्होंने ‘दिनमान’ का संपादन किया और ‘शेखर: एक जीवनी’ जैसे उपन्यास लिखे। अज्ञेयजी यायावरी प्रवृत्ति के थे।अपनी यात्राओं बागवानी और फोटोग्राफी के शौक के साथ आजीवन एक जिज्ञासु और स्वतंत्र आत्मा रहे। वे स्वाधीनता को एक स्वतंत्र प्रक्रिया मानते थे।
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का जन्म ७ मार्च १९११ को उत्तर प्रदेश के कसया (आधुनिक कुशीनगर) में हुआ था।उनके पिता का नाम हीरानंद और माता का नाम जयंती देवी था ।सन १९४६ में संतोष मालवीय से उनका विवाह संपन्न हुआ। ‘वात्स्यायन’ अज्ञेय जी के परिवार का उपनाम (गोत्र) था जो उनके पिता और माता से जुड़ा था।उनका मूल नाम वात्स्यायन उनके परिचय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है किंतु वह ‘अज्ञेय’ के नाम से ज्यादा प्रसिद्ध हुए,जिसका अर्थ है- `अज्ञेय’ अर्थात जिसे जाना ना जा सके। अज्ञेयजी का बचपन लखनऊ, कश्मीर, बिहार और मद्रास में बीता
अज्ञेय जी की आरंभिक शिक्षा पिता की देखरेख में घर पर ही संस्कृत,फारसी, अंग्रेजी और बांग्ला के साथ संपन्न हुई। सन १९२५ में पंजाब से एंट्रेंस की परीक्षा पास की और उसके बाद मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में दाखिल हुए।वहाँ से विज्ञान में इंटर की पढ़ाई पूरी कर सन स्नातकोत्तर की शिक्षा के दरम्यान उनका संपर्क क्रांतिकारी गतिविधियों से हुआ। अँग्रेजी से एम.ए. करते समय क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़कर बम बनाते हुए पकड़े गए और वहाँ से फरार भी हो गए। सन १९३० में वे पहली बार जेल गए। सन १९३० से १९३६ के दरम्यान उन्हें कई बार कारावास हुआ। कारावास में रहते हुए उन्होंने छायावाद, मनोविज्ञान, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, विधि आदि विषयों का अध्ययन किया और कुछ कृतियों की रचना भी की।
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन का ‘अज्ञेय’ उपनाम की एक रोचक कथा है-दिल्ली जेल में लिखी अपनी साढ़े सात कहानियाँ प्रकाशन के लिए जैनेंद्र कुमार को भिजवाईं तब जैनेंद्र कुमार ने प्रेमचंद को भिजवाईं। इन कहानियों में से दो राजनीतिक कहानियों को प्रेमचंद ने स्वीकार कर लिया। कारावास से भेजी गई इन कहानियों को लेखक के नाम से छापना उपयुक्त नहीं था इसलिए निर्णय लिया गया कि लेखक के नाम की जगह ‘अज्ञेय’ (अज्ञात) नाम का उपयोग किया जाए। अज्ञेयजी को यह उपनाम पसंद नहीं था फिर भी उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया। वह कविता और कहानियों को ‘अज्ञेय’ उप नाम से प्रकाशित करवाते रहे जबकि लेख,विचार, आलोचना आदि के प्रकाशन के लिए अपना मूल नाम ‘सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन’ का उपयोग किया।
स्वतंत्रता संग्राम में अपनी सक्रिय भागीदारी के बाद अज्ञेयजी ने शैक्षिक क्षेत्र में भी योगदान दिया। उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय और जोधपुर विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य भी किया। इसके अलावा वे ‘ऑल इंडिया रेडियो’ से भी जुड़े रहे जहाँ उन्होंने भारतीय साहित्य और संस्कृति को बढ़ावा देने का कार्य किया। उन्होंने अपने व्यावसायिक जीवन को भी एक बहुआयामी व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया।
अज्ञेयजी जी ने प्रयोगवाद और नई कविता को साहित्य जगत में प्रतिष्ठित किया। अनेक जापानी ‘हाइकु’ कविताओं को अनूदित भी किया। उनके संपादन में निकले ‘तार सप्तक’ और ‘दूसरा सप्तक’ की प्रयोगवादी काव्य प्रवृत्तियों को देखते हुए इसे एक नई धारा के रूप में स्थापित किया गया। इसे पूर्व की काव्य- प्रवृतियों छायावाद और प्रगतिवाद की प्रतिक्रिया में व्युत्पन्न माना गया है। अज्ञेय को ‘नई कविता’ धारा का भी पथ-प्रदर्शक माना जाता है। उनके संपादन में प्रकाशित दूसरा सप्तक और तीसरा सप्तक के कवि नई कविता के प्रमुख कवियों में शामिल हैं।
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नई कविता का जनक (प्रवर्तक) मुख्य रूप से सच्चिदानंद हीरानंद अज्ञेय को माना जाता है क्योंकि उन्होंने प्रयोगवाद को आगे बढ़ाया और ‘नई कविता’ शब्द का प्रयोग किया लेकिन जगदीश गुप्त और डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी को भी इसके प्रवर्तकों में गिना जाता है खासकर नई कविता के संपादन के कारण।
प्रयोगवाद २०वीं सदी के मध्य के भारतीय साहित्य में एक महत्वपूर्ण आंदोलन था जिसका उद्देश्य कविता की संरचना और भाषा में नयापन लाना था। यह आंदोलन पुराने काव्यशास्त्र और पारंपरिक रूपों से बाहर निकलकर नई प्रयोगात्मक शैलियों की ओर अग्रसर हुआ। अज्ञेय प्रयोगवाद के प्रवर्तकों में से एक थे और इस आंदोलन में उनका योगदान बेजोड़ था।
अज्ञेय ने प्रयोगवाद के तहत कविता में नई भाषा और शैली का प्रयोग किया। उन्होंने कविता को केवल शब्दों वâा खेल नहीं माना, बल्कि शब्दों के भीतर गहरे अर्थ और विचारों के साथ एक नया रूप देने की कोशिश की। उनकी कविताएँ न केवल बौद्धिक दृष्टिकोण से बल्कि भावनात्मक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी गहरी थीं। अज्ञेय ने शब्दों और ध्वनियों के साथ प्रयोग किया, जिससे कविता की एक नई दुनिया खुली।
प्रयोगवाद में अज्ञेय ने प्रतीकवाद (एब्स्ंदत्ग्ेस्) और विम्बवाद (घ्स्aुग्ेस्) का भी प्रभाव लिया। उन्होंने कविता के माध्यम से मनुष्य की आंतरिक दुनिया, अस्तित्ववाद, और आत्मा की खोज को व्यक्त किया। उनकी कविताओं में प्रतीक और विम्ब का उपयोग गहरे और सूक्ष्म अर्थों को व्यक्त करने के लिए किया गया, जिससे पाठक को एक नई विचारधारा से साक्षात्कार हुआ।प्रयोगवादी कविता में अज्ञेय ने एक बौद्धिक और दार्शनिक दृष्टिकोण को भी प्रस्तुत किया। उनकी कविताओं में अस्तित्ववादी विचारों का गहरा प्रभाव दिखता है। उन्होंने कविता को एक साधारण साहित्यिक रूप के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे मानवता के गहरे सवालों और समाज की जटिलताओं का विश्लेषण करने का एक उपकरण माना।
नई कविता का प्रारंभ १९५० के दशक में हुआ था और इसका उद्देश्य प्रगतिशीलता, समाजवाद और अस्तित्ववाद को कविता के केंद्र में लाना था। नई कविता में, अज्ञेय की भूमिका एक प्रमुख कवि के रूप में रही है, जिन्होंने इस आंदोलन को आकार देने में मदद की। उनकी कविता में नई कविता के सिद्धांत और प्रयोगवाद के तत्व समान रूप से मिलते हैं। अज्ञेय ने नई कविता के माध्यम से कविता को मानवतावादी और व्यक्तिवादी दृष्टिकोण से देखा। उन्होंने व्यक्तित्व की गहरी आंतरिक दुनिया और सामाजिक संघर्ष को अपनी कविताओं में उभारा। नई कविता की यह विशेषता थी कि यह व्यक्तिवाद और आत्मबोध के प्रति संवेदनशील थी, और अज्ञेय ने इस दिशा में अपनी कविताओं को नई दिशा दी। अज्ञेय की कविताओं में अस्तित्ववाद का प्रभाव साफ दिखाई देता है। उन्होंने मानवीय अस्तित्व के सवालों और अस्तित्व की निरर्थकता को अपने लेखन में उठाया। नई कविता के इस प्रवृत्तिक दृष्टिकोण के तहत, अज्ञेय ने मानवता के संकटों, असंतोष और अस्तित्व के प्रश्नों को सामने रखा। उनकी कविताओं में आत्म-परिवर्तन की ओर संकेत करते हुए मनुष्य की आंतरिक दुनिया का विश्लेषण किया गया।
नई कविता में अज्ञेय ने समाजवाद और सामाजिक मुद्दों को भी उठाया। हालांकि उनका दृष्टिकोण अधिक व्यक्तिगत और अंतरंग था, फिर भी उन्होंने समाज और राजनीति के बारे में अपनी विचारधारा व्यक्त की। यह दृष्टिकोण उन्हें प्रगतिशील कवियों से अलग बनाता है, जो सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को सीधे तौर पर अपनी कविताओं में व्यक्त करते थे। अज्ञेय ने कविताओं के माध्यम से संशय और विरोधाभास की बातें की, जिससे कविता में एक गहरी बौद्धिक जटिलता आयी। नई कविता में अज्ञेय ने कविता को एक दार्शनिक रूप दिया। उनकी कविताओं में प्रकृति, संसार, और मानव अस्तित्व के बारीक दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किए गए हैं। वे कविता के माध्यम से यह बताने की कोशिश करते थे कि मनुष्य का अस्तित्व क्या है और उसकी सीमाएँ क्या हैं।
अज्ञेय की भूमिका प्रयोगवाद और नई कविता दोनों में अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने न केवल भारतीय कविता को एक बौद्धिक और दार्शनिक दृष्टिकोण दिया, बल्कि कविता में प्रयोग और नवाचार के तत्वों को भी प्रमुखता से स्थापित किया। अज्ञेय ने दोनों आंदोलनों में अपनी रचनाओं के माध्यम से आध्यात्मिकता, अस्तित्ववाद, और मानवता के सवालों को उठाया, जिससे भारतीय कविता को न केवल एक नई दिशा मिली, बल्कि यह भारतीय साहित्य के एक अनिवार्य हिस्से के रूप में स्थापित हो गया। उनके योगदान से यह दोनों आंदोलन और अधिक समृद्ध हुए और साहित्य की दुनिया में अज्ञेय का नाम सदैव अमर रहेगा।अज्ञेय का जीवन और उनका साहित्य दोनों ही भारतीय साहित्य और समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने न केवल साहित्य में एक नया मोड़ दिया, बल्कि अपने जीवन के विभिन्न पहलुओं में भी असाधारण कार्य किए। उनका साहित्य आज भी भारतीय साहित्यिक धारा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, और उनकी कविताएँ आज भी पाठकों को गहरी सोच और चिंतन के लिए प्रेरित करती हैं।
अज्ञेय के कविता-संग्रहों में भग्नदूत-१९३३, चिन्ता-१९४२, इत्यलम्-१९४६, हरी घास पर क्षण भर-१९४९, बावरा अहेरी-१९५४, इन्द्रधनुष रौंदे हुए ये-१९५७, अरी ओ करुणा प्रभामय-१९५९, आँगन के पार द्वार-१९६१, कितनी नावों में कितनी बार (१९६७) क्योंकि मैं उसे जानता हूँ (१९७०) सागर मुद्रा (१९७०) पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ (१९७४) महावृक्ष के नीचे (१९७७) नदी की बाँक पर छाया (१९८१) प्रिज़न डेज़ एण्ड अदर पोयम्स (अंग्रेजी में,१९४६) और कहानियों में-विपथगा १९३७, परम्परा १९४४, कोठरी की बात १९४५, शरणार्थी १९४८, जयदोल १९५१ उपन्यासों में, नदी के द्वीप अपने अपने अजनबी आदि प्रमुख हैं । संपादित ग्रंथों में आधुनिक हिन्दी साहित्य (निबन्ध संग्रह) १९४२, तार सप्तक (कविता संग्रह) १९४३, दूसरा सप्तक (कविता संग्रह)१९५१, तीसरा सप्तक (कविता संग्रह), सम्पूर्ण १९५९, नये एकांकी १९५२, रूपांबरा १९६० प्रमुख हैं।
उनका लगभग समग्र काव्य सदानीरा (दो खंड) नाम से संकलित हुआ है तथा अन्यान्य विषयों पर लिखे गए सारे निबंध सर्जना और सन्दर्भ तथा केंद्र और परिधि नामक ग्रंथो में संकलित हुए हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के संपादन के साथ-साथ अज्ञेय ने तारसप्तक, दूसरा सप्तक और तीसरा सप्तक जैसे युगांतरकारी काव्य संकलनों का भी संपादन किया तथा पुष्करिणी और रूपांबरा जैसे मौलिक और अनूठे काव्य-संकलनों का भी। वे वत्सलनिधि से प्रकाशित आधा दर्जन निबंध-संग्रहों के भी संपादक रहे हैं। यद्यपि अज्ञेय ने कहानियाँ कम ही लिखीं हैं और अपने उत्तरकालीन जीवन में तो न के बराबर ही लिखी हैं, परंतु हिन्दी कहानी को आधुनिकता की दिशा में एक नया और स्थायी मोड़ देने का श्रेय उन्हीं को प्राप्त है। निस्संदेह वे आधुनिक हिन्दी साहित्य के शलाका-पुरूष हैं, जिनके कारण हिन्दी साहित्य में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के बाद पुनः आधुनिक युग का प्रवर्तन हुआ।
अज्ञेय जी को ‘आँगन के पार द्वार’ के लिए वर्ष १९६४ में ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ और ‘कितनी नावों पर कितनी बार’ के लिए वर्ष १९७८ में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस प्रकार साहित्य की अनवरत सेवा करते हुए ४ अप्रैल १९८७ को ७६ वर्ष की अवस्था में नई दिल्ली में अज्ञेयजी का निधन हो गया।
प्रो. डॉ. दिनेशकुमार
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