विज्ञान में महिलाओं और लड़कियों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस ११ फरवरी को मनाया जाता है, ताकि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (एसटीईएम) में महिलाओं और लड़कियों की महत्वपूर्ण उपलब्धियों और योगदान को मान्यता दी जा सके। यह दिन दुनिया भर में लैंगिक समानता और महिलाओं और लड़कियों के सशक्तिकरण के महत्व को दर्शाता है, विज्ञान और प्रौद्योगिकी की दुनिया में उनके सफल नेतृत्व का जश्न मनाता है। विभिन्न प्रयासों के बावजूद, दुनिया भर में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अभी भी काफी लैंगिक असंतुलन है। साल २०१५ में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ११ फरवरी को विज्ञान में महिलाओं और लड़कियों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में घोषित किया। यह दिन एसटीईएम क्षेत्रों में लैंगिक समानता के महत्व के बारे में याद दिलाता है और इस साल हम इस दिवस की १२वीं वर्षगांठ मना रहे हैं।
विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व नियुक्ति एवं पदोन्नति से लेकर पुरस्कृत किये जाने और विज्ञान अकादमियों के सदस्य/फेलो के रूप में चुने जाने से लेकर वैज्ञानिक संस्थानों में नेतृत्वकारी पदों पर आसीन किये जाने तक समग्र कैरियर प्रक्षेपवक्र में नज़र आता है। विज्ञान अकादमियों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति वैज्ञानिक समुदाय के अंदर उनकी समग्र स्थिति को दर्शाती है। इस समस्या को दो स्तरों पर संबोधित किये जाने की आवश्यकता है- पहला, सामाजिक स्तर पर जिसके लिये दीर्घकालिक प्रयास की आवश्यकता और दूसरा, नीतिगत एवं संस्थागत स्तर पर, जिसे तत्काल प्रभाव से शुरू किया जा सकता है।
वर्ष २०२० में किये गए एक सर्वेक्षण से पता चला है कि भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के १०४४ सदस्यों में से केवल ८९ महिलाएँ हैं जो कुल सदस्यों का मात्र ९ज्ञ् है। हालाँकि वर्ष २०१५ में उनके प्रतिनिधित्व में और अधिक कमी थी जिसमें ८६४ सदस्यों में मात्र ६ज्ञ् महिला वैज्ञानिक सदस्य शामिल थी। इसी प्रकार, भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के शासी निकाय में वर्ष २०२० में कुल ३१ सदस्यों में से केवल ७ महिलाएँ शामिल थीं जबकि वर्ष २०१५ में इसमें कोई महिला सदस्य शामिल नहीं थी। भारत की तीनों अकादमियाँ- भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (INSA), भारतीय विज्ञान अकादमी (IAS) और नेशनल अकादमी (NAS) पेशेवर निकायों और संबंधित संस्थानों सहित विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं।
देश में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEMed) के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व की समस्या को संबोधित करने हेतु ‘विज्ञान ज्योति कार्यक्रम’ शुरू किया गया था। आरंभ में इसे स्कूल स्तर पर शुरू किया गया था जहाँ कक्षा ९-१२ की मेधावी छात्राओं को एऊEश् क्षेत्र में उच्च शिक्षा और करियर बनाने हेतु प्रोत्साहित किया गया। हाल ही में कार्यक्रम के दूसरे चरण का १०० ज़िलों में विस्तारित किया गया है। महिला वैज्ञानिकों को शैक्षणिक और प्रशासनिक स्तर पर अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से वर्ष २०१४-१५ में ‘किरण योजना’ शुरू की गई। योजना के तहत शामिल `महिला वैज्ञानिक योजना' बेरोज़गार महिला वैज्ञानिकों एवं प्रौद्योगिकीविदों को करियर के अवसर प्रदान करती है, विशेषकर उन महिलाओं को जिनके करियर में एक अवरोध आया है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नवाचारों को बढ़ावा देने और भविष्य में AI-आधारित नौकरियों के लिये कुशल जनशक्ति तैयार करने के लक्ष्य के साथ महिला विश्वविद्यालयों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रयोगशालाएँ भी स्थापित की हैं। महिलाओं के लिए इंडो-यूएस फेलोशिप कार्यक्रम के तहत महिला वैज्ञानिकों को अमेरिका में अनुसंधान प्रयोगशालाओं में कार्य करने का अवसर प्रदान किया गया है।
महिला विश्वविद्यालयों में नवाचार और उत्कृष्टता हेतु विश्वविद्यालय अनुसंधान का समेकन कार्यक्रम का उद्देश्य महिला विश्वविद्यालयों में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उत्कृष्टता के सृजन हेतु अनुसंधान एवं विकास अवसंरचना में सुधार लाना और अत्याधुनिक अनुसंधान सुविधाओं की स्थापना करना है। STEMed क्षेत्र में लैंगिक समानता का आकलन करने हेतु एक व्यापक चार्टर एवं प्रमवर्क विकसित करने के लिये ‘जेंडर एडवांसमेंट फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंस्टीट्यूशंस’ (GATIed) कार्यक्रम शुरू किया गया।
इस वर्ष यूनेस्को मुख्यालय में इस दिवस ११ फरवरी २०२६, को 'दृष्टि से प्रभाव तक: लैंगिक अंतर को कम करके STEMed को पुनर्परिभाषित करना' विषय पर एक हाइब्रिड एक दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इस कार्यक्रम में नई और उभरती प्रौद्योगिकियों और लैंगिक समानता पर उनके प्रभाव पर विशेष जोर दिया जाएगा । इस संस्करण की गोलमेज चर्चाओं में व्यक्तिगत अनुभवों और साक्ष्य-आधारित विचार-विमर्श के माध्यम से समावेशिता के सकारात्मक प्रभाव को उजागर किया जाएगा। विभिन्न क्षेत्रों और पेशेवर पृष्ठभूमियों के पैनलिस्ट चार प्रमुख क्षेत्रों स्वास्थ्य अनुसंधान, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम होशियारी और वैज्ञानिक उद्यमिता में लैंगिक अंतर को कम करने में प्रभावी साबित हुए ठोस उपायों को साझा करेंगे। वे उन परिस्थितियों पर भी विचार करेंगे जिनके कारण ये सफलताएँ संभव् हुईं और इस बात पर भी कि ऐसी प्रथाओं को अन्य संदर्भों में कैसे अपनाया या विस्तारित किया जा सकता है।
भारत में ऐसे देखा जाए तो माहिलाओं की वैज्ञानिक भागीदारी का इतिहास बहुत पुराना है। वेदों, उपनिषदों और अन्य प्राचीन ग्रन्थों में उनके बौद्धिक योगदान का उल्लेख मिलता है। कई विदुषियां विज्ञान और दर्शन में पारंगत थीं। गार्गी और मैत्रेयी जैसी विद्वान महिलाएं तर्क शास्त्र, खगोल विज्ञान और गणित में निपुण थीं। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य की पुत्री लीलावती गणित में बहुत कुशल थी, उनके नाम पर लिखी पुस्तक लीलावती भारतीय गणित की महत्वपूर्ण पुस्तक रही है। इसी तरह से चिकित्सा के क्षेत्र में भी महिलाओं ने अहम भूमिका निभाई है। वैदिक काल से ही महिलाओं को जड़ी बूटियों की अच्छी पहचान थी और उनसे उपचार की विधियाँ भी पता थीं। बहुत सी महिलाएं वैद्य के रूप में भी प्रसिद्द थीं और उन्होंने आयुर्वेद में गहन योगदान किया है। उदाहरण के रूप में कैदाम्बिनी नामक वैद्य आयुर्वेद में प्रमुख स्थान रखती थी। वृषत और मदालसा नामक महिलाओं का उल्लेख चरक और सुश्रुत संहिता में भी मिलता है।
ताज़ा समय में भी महिलाओं का योगदान विज्ञान के क्षेत्र में रहा है और उनमें से कुछ प्रमुख महिला वैज्ञानिकों का नाम लिया जा सकता है जैसे- दर्शन रंगनाथन-वे भारत की मशहूर रसायन वैज्ञानिक थीं। उनकी उच्च शिक्षा दिल्ली यूनिवर्सिटी से हुई। वे दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा कॉलेज में कई वर्षों तक रसायन विज्ञान विभाग की अध्यक्ष रहीं। इन्होंने अपने कार्य के दौरान यूरिया चक्र और प्रोटीन संरचना पर कई खोज की।
आसिमा चटर्जी- विज्ञान में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल करने वाली पहली महिला थीं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्कॉटिश चर्च कॉलेज से केमिस्ट्री में ग्रेजुएशन और बायोलॉजिकल केमिस्ट्री में डॉक्टरेट किया। उन्होंने मलेरिया की रोकथाम करने वाली दवाओं पर काफी शोध किया।
डॉक्टर कादम्बिनी गांगुली-कादम्बिनी गांगुली को भारत की दूसरी महिला फिजिशियन के तौर पर भी जाना जाता है। १८९२ में मेडिसिन की उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए वे इंग्लैंड गईं और वहां से वापस लौटने के बाद डफरिन अस्पताल में काम करना शुरू किया और कई खोज की ।
जानकी अम्माल- जानकी अम्माल को वनस्पति विज्ञान में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल करने वाली पहली महिला के तौर पर भी जाना जाता है। केरल के कुन्नुर जिले में जन्मी जिन्होंने अमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय से बॉटनी में एम.एससी. और पीएचडी. की डिग्री हासिल की। इनकी गन्नों की हाइब्रिड प्रजाति खोज और क्रॉस ब्रीडिंग पर शोध को पूरी दुनिया में मान्यता मिली।
अन्ना मणि- उन्हें मशहूर मौसम वैज्ञानिक के तौर पर जाना जाता है। केरल के त्रावणकोर में जन्मी सरकार के स्कॉलरशिप पर वे मौसम विज्ञान में उच्च अध्ययन करने के लिए लंदन गई और वापस लौट कर भारतीय मौसम विज्ञान विभाग में काम करना शुरू किया। उन्होंने सौर विकिरण, ओजोन परत और वायु ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया।
रमन परिमाला- इन्होंने मद्रास यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन किया और बॉम्बे यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की। वे कई वर्षो तक मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में प्रोफेसर रहीं। इन्होंने गणित के क्षेत्र में काम किया है। १९८७ में उन्हें शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार और २००३ में उन्हें श्रीनिवास रामानुजन जन्म शताब्दी पुरस्कार दे कर सम्मानित किया गया।
राजेश्वरी चटर्जी- कर्नाटक की पहली महिला इंजीनियर के तौर पर पहचान बनाने वाली राजेश्वरी चटर्जी ने अमेरिका से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की। वे बेंगलुरु के भारतीय विज्ञान संस्थान में प्रोफेसर रहीं। इलेक्ट्रिकल कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग विभाग की वे अध्यक्ष भी रहीं। उन्होंने माइक्रोवेव तकनीक के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया।
बिभा चौधरी- कलकत्ता विश्वविद्यालय से भौतिक विज्ञान में एम.एस.सी. करने वाली पहली महिला थीं। उन्होंने होमी जहांगीर भाभा और विक्रम साराभाई के साथ भी काम किया। उन्होंने देवेन्द्र मोहन बोस के साथ मिल कर बोसोन कण की खोज की। उन्होंने मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की। उनके कई शोध पत्र देश-विदेश के प्रमुख जर्नल्स में प्रकाशित हुए।
टेसी थॉमस- 'भारत की मिसाइल महिला' के रूप में जानी जाती हैं, DRDध् में एक प्रमुख वैज्ञानिक हैं। टेसी थॉमस भारत की एक प्रक्षेपास्त्र वैज्ञानिक हैं। वे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन में अग्नि चतुर्थ की परियोजना निदेशक एवं एरोनाटिकल सिस्टम्स की महानिदेशक थीं। भारत में प्रक्षेपास्त्र परियोजना का प्रबन्धन करने वाली वे पहली महिला हैं।
रितु करिधाल- `रॉकेट वुमन ऑफ इंडिया' के नाम से मशहूर, इसरो के मंगल मिशन (श्ध्श्) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रितु करिधल श्रीवास्तव भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (आईएसआरओ) में वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के लखनऊ में हुआ था और उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी की। चंद्रयान-३ मिशन की सूत्रधार हैं। `भारत की रॉकेट महिला' के नाम से मशहूर ऋतु करिधल ने चंद्रयान-२, मंगलयान और भारत के मंगल ऑर्बिटर मिशन (एमओएम) सहित कई प्रमुख अंतरिक्ष अभियानों को सफलतापूर्वक नेतृत्व किया है।
किरण मजूमदार शॉ-एक भारतीय महिला व्यवसायी, टेक्नोक्रेट, अन्वेषक और बायोकॉन की संस्थापक है, जो भारत के बंगलौर में एक अग्रणी जैव प्रौद्योगिकी संस्थान है। वे बायोकॉन लिमिटेड की अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक तथा सिनजीन इंटरनेशनल लिमिटेड और क्लिनिजीन इंटरनेशनल लिमिटेड की अध्यक्ष हैं।
वी. आर. ललिताम्बिका- इसरो में उन्नत प्रक्षेपण तकनीकों और गगनयान कार्यक्रम की निदेशक रही हैं। पिछले तीस वर्षों से इसरो में एक अनुभवी नियंत्रण प्रणाली इंजीनियर और कुशल टास्कमास्टर हैं। एक ही मिशन में १०४ उपग्रहों के सफल प्रक्षेपण सहित १०० से ज़्यादा अंतरिक्ष अभियानों में उनका महत्वपूर्ण योगदान, भारत के अंतरिक्ष अन्वेषण प्रयासों पर उनके उल्लेखनीय प्रभाव को दर्शाता है।
मीनल संपत- एक भारतीय वैज्ञानिक हैं, जो इसरो (घ्एRध्) के साथ काम करती हैं और मंगल ऑर्बिटर मिशन (मंगलयान) और अन्य अंतरिक्ष परियोजनाओं में महत्वपूर्ण योगदान के लिए जानी जाती हैं; वह इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार इंजीनियरिंग में स्वर्ण पदक विजेता हैं और उन्होंने भारत के पहले मंगल मिशन में एक सिस्टम इंजीनियर के रूप में टीम का नेतृत्व किया
कल्पना चावला- भारतीय मूल की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री, जिन्होंने नासा के कोलंबिया शटल मिशन में भाग लिया। एक भारतीय अमरीकी अन्तरिक्ष यात्री और अन्तरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ थी और अन्तरिक्ष में जाने वाली प्रथम भारतीय महिला थी। वे कोलंबिया अन्तरिक्ष यान आपदा में मारे गए सात यात्री दल सदस्यों में से एक थीं।
भारत की जनसंख्या को देखते हुए भारत में महिला वैज्ञानिकों की संख्या सीमित है और इसे बड़े पैमाने पर बढ़ाने की आवश्यकता है। भारत सरकार जिस तरह के प्रयत्न अतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ सामंजस्य कर कर रही है उसके अच्छे परिणाम आने स्वाभाविक हैं लेकिन इस पर लगातार काम करना होगा। इस कार्य में प्रयाप्त उर्जा और जागरूकता बनाये रखने में विश्व दिवस जैसे कार्यक्रम महती भूमिका निभाएंगे।
डॉ. रवीन्द्र दीक्षित