भारत में लगभग ३०० वर्षों तक मुगलों ने शासन किया और अंग्रेजों ने लगभग २०० वर्षों तक। लेकिन युगों के परिवर्तन के बाद भी भारत की कुछ परंपराएँ नहीं टूटीं, आज भी वे अडिग हैं।
उनमें से एक प्रमुख परंपरा है- हम वर्ष में एक दिन अपने पितरों को स्मरण करते हैं और उनके साथ आत्मिक संबंध स्थापित करते हैं।
औरंगज़ेब ने अपने पिता शाहजहाँ को बंदी बना लिया था। शाहजहाँ को गिनकर थोड़ी-सी वस्तुएँ भेजी जाती थीं-तीन रोटियाँ, एक थाली जिसमें माँस के दो टुकड़े और थोड़ा शोरबा होता। एक फूटा हुआ मिट्टी का घड़ा भी दिया जाता, जिसमें पानी की मात्रा निश्चित होती थी-‘इतना ही दिया जाएगा।’ गर्मी आई। शाहजहाँ भीषण गर्मी में पीड़ित होने लगे। उन्होंने पहरेदारों से कहा- ‘मेरे राजा (अर्थात औरंगज़ेब) और मेरे बेटों से कह दो कि गर्मी में पानी की मात्रा थोड़ी बढ़ा दी जाए।’
यह सुनकर औरंगज़ेब ने उत्तर दिया- ‘जो दिया जा रहा है, उसमें अगर जी सको तो जी लो, नहीं तो मर जाओ।’
अत्यंत कष्ट पाकर शाहजहाँ ने फ़ारसी में कुछ पंक्तियाँ लिखकर भेजीं, जिसका अर्थ था- ‘हे मेरे पुत्र, तू एक अजीब मुसलमान जन्मा है-अपने जीवित पिता को पानी के लिए तरसा रहा है। जिस देश पर हम शासन कर रहे हैं, न मैं उस देश को समझ पाया और न तू। एक ओर तू है, जो अपने जीवित पिता को पानी के लिए व्याकुल कर रहा है; और दूसरी ओर उसी देश के लोग हैं, जो श्राद्ध में अपने मृत पितामह-प्रपितामह तक को जल और पिंड अर्पित कर रहे हैं।’
बचपन में देखता था, महालया के दिन मेरे पिता पितृ तर्पण करते थे। ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्हें एक ब्राह्मण को बुलाकर भोजन कराते और दान देते देखता था। बचपन में इस बात को ठीक से समझ नहीं पाता था। कोशिश करता लेकिन पिता से पूछने पर भी मन में बात साफ़ नहीं बैठती थी। बाद में पढ़ाई करके इस दिन के विषय में बहुत कुछ जाना। सनातन धर्म में पितृलोक को दिवंगत पूर्वजों की आत्माओं का निवास स्थान माना जाता है। यह एक आध्यात्मिक और आदर्श लोक है, जो मृत्युलोक के ऊपर और स्वर्गलोक के नीचे स्थित है। पितृलोक के अधिपति आर्यमन हैं। यहाँ आत्माएँ पुनर्जन्म के मध्यकाल में रहती हैं, जब तक कि वे अपने कर्मफल के आधार पर अगला लोक प्राप्त न कर लें।
पितृपक्ष को श्राद्धपक्ष भी कहा जाता है। यह १५ दिनों का एक पर्व है, जब हिंदू अपने पूर्वजों की आत्मा को स्मरण करते हैं और तर्पण, पिंडदान तथा विविध अनुष्ठान करते हैं। इस समय पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है और पितृदोष से मुक्ति भी।
पितृपक्ष का समापन महालया अमावस्या को होता है। इसलिए इसे सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। महालया अमावस्या विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। विश्वास है कि इस दिन श्राद्ध करने पर पूर्वज प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद देते हैं। पूर्वजों की तृप्ति के लिए महालया अमावस्या अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसे सर्वपितृ अमावस्या अथवा देवी-पितृकार्य अमावस्या भी कहा जाता है।
श्राद्धपक्ष में सर्वपितृ अमावस्या का महत्व अपार है। यह पितरों को विदा करने की अंतिम तिथि मानी जाती है। यदि कोई व्यक्ति नियत श्राद्ध तिथि पर श्राद्ध न कर पाए, या फिर पूर्वजों की तिथि ज्ञात न हो, तो अमावस्या के दिन किया गया श्राद्ध सभी पितरों को तृप्त करता है। इसीलिए इसे सर्वपितृ अमावस्या कहते हैं। इसके पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है, जो अच्छोदा नदी और पितृगण से जुड़ी है।
देवताओं के पितृगण अग्निष्वात्त सोमपथ लोकवासी थे। उनकी मानसकन्या थीं अच्छोदा, जो नदी और सरोवर के रूप में अवतरित हुईं। मत्स्य पुराण में उल्लेख है कि कश्मीर में अच्छोदा सरोवर और एकसदा नदी स्थित हैं।
अच्छोदा नाम तेषां तु मानसी कन्यका नदी॥ १४.२ ॥
अच्छोदं नाम च सरः पितृभिर्निर्मितं पुरा।
अच्छोदा तु तपश्चक्रे दिव्यं वर्षसहस्रकम्॥ १४.३ ॥
एक बार अच्छोदा ने सहस्र वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर अग्निष्वात्त, बृहस्पति और अन्य पितृगण आश्विन मास की अमावस्या को प्रकट हुए।
उन्होंने कहा-
‘हे कन्या, हम तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हैं। जो चाहो, वर मांग लो।’
लेकिन अच्छोदा की दृष्टि अपने पितृगण की ओर न जाकर तेजस्वी पितृ ‘अमाबसु’ पर टिकी रही। वह उन्हें अपलक निहारती रहीं।
बार-बार अनुरोध करने पर अच्छोदा बोलीं-
‘यदि सचमुच वर देना चाहते हैं तो मैं अमाबसु के साथ मिलन का आनंद पाना चाहती हूँ।’
यह सुनकर सभी पितृगण क्रुद्ध हो गए और अभिशाप दिया-
‘तुम पितृलोक से पतित होकर पृथ्वी पर जन्म लोगी।’
अभिशाप पाकर अच्छोदा रोती हुई पितृगण के चरणों में गिर पड़ीं। उनके विलाप से पितृगण का हृदय पिघल गया। उन्होंने करुणा में कहा—
‘तुम मत्स्यकन्या रूप में जन्म लोगी और महर्षि पराशर तुम्हारे पति होंगे। तुम्हारे गर्भ से व्यासदेव का जन्म होगा। फिर आगे चलकर दिव्य वंशों में जन्म लेकर तुम अभिशाप से मुक्त हो जाओगी और पुनः पितृलोक लौट जाओगी।’
इस घटना में अमाबसु के ब्रह्मचर्य और धैर्य की सभी पितृगण ने प्रशंसा की और आशीर्वाद दिया- ‘आज का यह दिन अमाबसु के नाम पर ‘अमावस्या’ कहलाएगा। जो व्यक्ति नियत तिथि पर श्राद्ध न कर सके, यदि वह अमावस्या के दिन श्राद्ध-तर्पण करे तो उसे पूरे पितृपक्ष का पुण्य मिलेगा और उसके पितृ तृप्त होंगे।’
इसी प्रकार अमावस्या का दिन सर्वपितृ अमावस्या के रूप में श्रद्धा से मनाया जाने लगा।
बाद में वही अच्छोदा मत्स्यकन्या बनकर जन्मीं और महर्षि पराशर की पत्नी हुईं। उनके गर्भ से महर्षि व्यास का जन्म हुआ। आगे चलकर वे सत्यवती नाम से प्रसिद्ध हुईं और राजा शांतनु की पत्नी बनीं। उनके गर्भ से चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक दो पुत्र हुए। उन्हीं के नाम पर कलियुग में अष्टका श्राद्ध मनाया जाता है।
सर्वपितृ अमावस्या केवल पितरों के तर्पण का दिन नहीं है, बल्कि यह मानव समाज और पितृलोक के बीच के शाश्वत संबंध का प्रतीक है। अच्छोदा और अमाबसु की कथा हमें सिखाती है कि पितरों की उपेक्षा कभी नहीं करनी चाहिए। श्रद्धा और कृतज्ञता से किया गया श्राद्ध उन्हें तृप्त करता है और संतान के जीवन में सुख, समृद्धि और शांति लाता है।
पितृपक्ष में कौए को भोजन कराने का भी महत्व है। विश्वास है कि कौआ पितृलोक का दूत है। इसलिए कौए को भोजन कराना मतलब वह अन्न सीधे पितृलोक पहुँच जाता है और पितृगण तृप्त होते हैं।
लेकिन प्रश्न आता है-कौआ ही क्यों? इसके पीछे एक कथा है जो रामायण से जुड़ी है।
स्वर्गराज इन्द्र के पुत्र जयन्त ने अहंकारवश एक बार भगवान श्रीराम की परीक्षा लेनी चाही। वे कौए का रूप लेकर पृथ्वी पर आए।
उस समय श्रीराम और सीता माता वनवास में थे। एक दिन जब वे एकांत में बातें कर रहे थे, तभी कौए के रूप में जयन्त आकर सीता माता के चरणों में चोंच मारने लगे। इससे सीता माता वेदना से कराह उठीं।
श्रीराम यह देखकर केवल एक तिनका उठाकर उसमें ब्रह्मास्त्र संधान कर दिया। तत्क्षण वह जयन्त के पीछे लग गया। भयभीत जयन्त इन्द्र, देवताओं और ऋषियों के पास दौड़े लेकिन सभी ने कहा-
‘तुमने श्रीराम का अपराध किया है, तुम्हें कोई नहीं बचा सकता।’
अंततः जयन्त देवर्षि नारद के शरण गए। नारद मुनि ने उपदेश दिया-
‘अपराध तुमने किया है, उसका प्रायश्चित केवल श्रीराम और सीता माता से क्षमा माँगने में ही संभव है।’
जयन्त ने वैसा ही किया और श्रीराम से क्षमा माँगी। दयालु श्रीराम ने उन्हें मृत्युदंड नहीं दिया, केवल एक आँख अंधी कर दी। और तब श्रीराम ने उन्हें यह वर दिया-
‘आज से कौआ ही पितृलोक का दूत होगा। पितृपक्ष में कौए को भोजन कराने से पूर्वज वही अन्न स्वीकार करेंगे और संतुष्ट होंगे।’
इसी कारण पितृपक्ष में कौए को भोजन कराना आज भी एक अनिवार्य धार्मिक अनुष्ठान है। यह केवल परंपरा ही नहीं, बल्कि पितरों से संबंध जोड़ने का महान माध्यम है।
दानवीर कर्ण जब स्वर्गलोक पहुँचे तो देखा, उन्हें भोजन की जगह केवल सोना दिया जा रहा है। कारण यह था कि जीवन में उन्होंने कभी अन्नदान नहीं किया था। तब उन्हें १५ दिनों के लिए पृथ्वी पर लौटकर ब्राह्मणों और गरीबों को अन्नदान तथा पितृ तर्पण करने की अनुमति दी गई। यही समय बाद में पितृपक्ष कहलाया।
एक और कथा है- पाटलिपुत्र में शंखुकर्ण नामक एक ब्राह्मण ने बहुत धन संपत्ति अर्जित की थी, लेकिन कभी देवपूजा या पितृ तर्पण नहीं किया। एक बार साँप के दंश से उसकी मृत्यु हुई और अगले जन्म में वह साँप योनि में जन्मा। धन के लोभ में वह साँप रूप में अपने धन की रक्षा करने लगा।
स्वप्न में उसने अपने पुत्रों से कहा- उसे मुक्त करने का एक ही उपाय है, श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का पाठ कराना और ब्राह्मणों को अन्नदान करना। पुत्रों ने वैसा ही किया, फलस्वरूप शंखुकर्ण मुक्त हो गए और मोक्ष प्राप्त किया। मैं स्वयं ब्राह्मण परिवार में जन्मा था, इसलिए बचपन से ही ये सारी कथाएँ सुनता आया हूँ। बचपन बीता न्यू जलपाईगुड़ी के रेलवे क्वार्टर में। महानंदा नदी घर से दूर नहीं थी। रेलवे क्वार्टर होने के कारण मोहल्ले में अनेक समुदाय और भाषाओं के लोग रहते थे। लेकिन इस विशेष दिन सभी को देखा था- हर कोई अपने-अपने तरीके से पितरों को याद कर रहा है।
मेरे लिए महालया का आगमन एक बड़ा आनंद था और घर के भीतर पितृपक्ष का महत्व भी समझता था। भोर में उठकर नदी की ओर जाता। घाट पर भीड़ लगती- कोई पिंडदान कर रहा है, कोई तर्पण, कोई दीपक जलाकर नदी में प्रवाहित कर रहा है। इसके साथ ही महालया की सुबह ‘महिषासुरमर्दिनी’ सुनना एक अद्भुत रोमांचक अनुभव था। लगता था जैसे रोमांच से पूरा शरीर काँप रहा है। किसी घर में रेडियो बजता, किसी घर में श्वेत-श्याम टीवी- हर कोई उस सुबह के वातावरण में डूबा रहता।
पितृपक्ष के इस दिन ही हम पितरों को तृप्त करते हैं- जल, पिंड, दान देकर ब्राह्मण की सेवा करते हैं। उसके बाद आरंभ होती है माँ दुर्गा के आगमन की तैयारी। सुना है, कई जगह आज ही मूर्तिकार माँ दुर्गा की आँखें बनाते हैं। तभी लगता था कि शरद आ गया है- शिउली के फूलों की सुगंध चारों ओर फैल जाती, पूरी धरती सजने लगती। दुर्गा की मूर्तियों में ‘चक्षुदान’ भी प्रायः आज ही होता है। शायद यह कोई विशेष नियम है या नहीं, यह तो पता नहीं। लेकिन लगता है कि आज ही माँ हमारे घर आ जाती हैं। हम अपने पितरों को तृप्त कर उन्हें आमंत्रित करते हैं। जल, अर्घ्य अर्पित कर उनका स्वागत करते हैं। शरद की हवा में वही अनुभूति रहती है, हृदय स्मृतियों से भर जाता है- जो कभी भुलाए नहीं भूलती।
पंकज कुमार झा
शिलिगुड़ी