राष्ट्रीयता एवं विश्व बन्धुत्व के कल्याणक स्वामी विवेकानन्द

यह आलेख Swami Vivekananda के व्यक्तित्व, विचारधारा और मानव कल्याण हेतु उनके योगदान का विश्लेषण करता है। स्वामी विवेकानन्द ने भारतीय संस्कृति, अध्यात्म, राष्ट्रीयता और विश्व बन्धुत्व के संदेश को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित किया। शिकागो धर्म संसद में उनके ऐतिहासिक भाषण ने भारत की आध्यात्मिक चेतना को विश्व मंच पर नई पहचान दी। उनके जीवन में सेवा, त्याग, सत्य की खोज, जातिभेद विरोध, मानवता और युवाशक्ति के आदर्श स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। रामकृष्ण परमहंस के शिष्य के रूप में उन्होंने भारतीय अध्यात्म को आधुनिक दृष्टि प्रदान की तथा ‘रामकृष्ण मिशन’ के माध्यम से मानव सेवा को धर्म का स्वरूप दिया।

May 15, 2026 - 16:08
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राष्ट्रीयता एवं विश्व बन्धुत्व के कल्याणक स्वामी विवेकानन्द
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मनुष्यता के मसीहा, राष्ट्रीयता के पोषक, विश्व बन्धुत्व के प्रबल समर्थक, नरों में श्रेष्ठ, विवेक के धनी, युवा संत शिरोमणि स्वामी विवेकानन्द के विशाल हृदय से उद्भूत अमृत वाणी से विश्व मानव समाज को मनुष्यता का जो सबक मिला वह स्वयं में अद्वितीय है। ‘विद्वता की आभा ललाट पर स्पष्टतया प्रदीप्त होने से दर्शन मात्र से ही इस पुरुष की दिव्यता से लोग गागर में सागर जैसी अनुभूति कर लेते थे।स्वामी जी के अल्प जीवन काल की उपलब्धियां विश्व रंग मंच पर जो ख्याति अर्जित कीं वह मनस्विता के इतिहास में दीर्घजीविता से भी काफी आगे रहीं।'अपनी सभ्यता व संस्कृति की अमूल्यता के लिए प्रसिद्ध भारत भूतल पर विवेक,ज्ञान,सहनशीलता,गुरु पितु मातु भक्ति से पूर्ण,अदम्य साहस,कर्मठता,देशभक्ति,सौन्दर्यशालिता आदि असीम एकनिष्ठ व्यक्तित्व गुणों वाले,असाधारण महापुरुष विवेकानन्द जी ने निश्चित तौर पर देश को अखिल विश्व में एक अनूठी पहचान दी।

१८५७ की क्रांति की भयंकरता और ब्रिटिश दासता की अमानवीयता से त्रस्त जनमानस जिस समय असन्तोष एवं निराशा के झंझावात से जूझ रहा था,उसी समय १२ जनवरी१८६३ ईस्वी को भारत वसुन्धरा के कोलकाता में विश्वनाथ दत्त एवं भुवनेश्वरी देवी के दाम्पत्य जीवन को आनन्द विभोरित करने वाले अलौकिक नक्षत्रवत सुत नरेन्द्र (विवेकानन्द) का अवतरण हुआ। नरेन्द्र का पठन-पाठन, क्रिया कलाप, सेवाभाव, शिष्यता,अध्यात्म,तप साधना, देशाटन, धर्म प्रचार,शिकागो धर्म सम्मेलन व्याख्यान आदि आधारित जीवन दर्शन आदर्श व्यक्तित्व सृजनता पक्ष में सदा अनुकरणीय और अनुशीलन योग्य है। स्वस्थ सामाजिक मूल्यों के विकास,राष्ट्रीयता की समृद्धता तथा विश्व बन्धुत्व को जो सच्चा सबक स्वामी विवेकानन्द ने आम जन को सुझाया,वह भारतीय लोकतंत्र और विश्व संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ के आधारिक उद्देश्यों में स्वस्थ प्राण संचार का मंत्र फूंकता है। मनुष्यता के कल्याणार्थ शांति व सुख-समृद्धता का बेहतर परिवेश कायम करने में किसी भी काल-खण्ड में स्वामी जी की शिक्षाओं की श्रेष्ठता कम नहीं हो सकती।बाल्यकाल में लोकाचारों की कमजोरियों के विरोध और उल्लंघन का प्रतिफल प्रतिकूल होने के बावजूद नरेन्द्र इनका तार्किक ढंग से उल्लंघन करते रहे।
जातिभेद सन्दर्भ में नरेन्द्र के जीवन की एक घटना लोगों के विचार व व्यवहार परिवर्तन अर्थ में परं शिक्षाप्रद रही।'नरेन्द्र के पिता के पास अनेक जातियों के लोग मुक़दमें के बारे में आते रहते थे।इनके लिए बैठक में अलग-अलग हुक्के रखे रहते थे।एक दिन इसका कारण जानने के लिए नरेन्द्र बैठक में जाकर प्रत्येक हुक्के को मुख से लगाए।इसी बीच पिता विश्वनाथ दत्त अंदर आ गए।नरेन्द्र ने पिता से कहा-सभी हुक्के गुड़गुड़ाने के बाद भी मैं पहले जैसा हूँ।यदि मैं जातिभेद नहीं मानूँगा,तो मेरा क्या अनिष्ट हो जाएगा।मैं यही परीक्षण कर रहा था।'

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उस्ताद कांसी घोषाल से पखावज व तबला वादन सीखने वाले नरेन्द्र के विषय में बँग भाषा के लेखक व साहित्यकार ने स्पष्ट कहा था कि- ‘तुम अवश्य ही बँग भाषा को गौरवान्वित करोगे।' सत्य के  खोजक स्वामी विवेकानन्द ने स्व दृढ़ प्रतिज्ञता को जताते हुए कहा था कि- ‘यदि मैं सत्य की खोज नहीं किया तो इसी प्रयत्न में प्राण त्याग दूंगा।'
ज्ञान व सत्यान्वेषी,धन,ऐश्वर्य,वासना से सदा दूर रहने वाले,जनसेवा,दरिद्र सेवापरायण नरेन्द्र जब १८ वर्ष के हुए तो इनके विवाह के बारे में इनकी राय जानने के लिए पिता विश्वनाथ दत्त ने अपनेसम्बन्धी राम चन्द्र दत्त को नियुक्त किया।कायस्थ कुलोत्पन्न नरेन्द्र ने स्पष्ट किया कि मैं विवाह के बंधन से मुक्त रहना चाहता हूँ,क्योंकि मेरे उद्देश्य की पूर्ति में विवाह बाधक है।राम चन्द्र दत्त की राय से ही आप राम कृष्ण के पास दक्षिणेश्वर गए।भाव विभोरित परमहंस रामकृष्ण बोल उठे-'अरे! तूँ इतने दिन कहाँ रहा।मैं कब से तेरी प्रतीक्षा कर रहा हूँ।विषयी लोगों से बातें करते-करते मेरा मुँह जल गया है। आज तुझ जैसे सच्चे,त्यागी से बात करके मुझे शांति मिलेगी।' इस भावुकता के मौके पर राम कृष्ण की आँखों से प्रेमाश्रु प्रवाहित होने लगे और नरेन्द्र हतप्रभ हो अपलक नेत्रों से उनकी तरफ देखते रहे।राम कृष्ण परमहंस की नरेन्द्र संदर्भित मन-मस्तिष्कीय परख कुछ इस प्रकार रही-'मैं जनता हूँ कि तूँ सप्तर्षि मण्डल का महर्षि है,नर रूपी नारायण है।जीवों  के कल्याण की कामना से ही तूनें देह धारण की है।'
रामकृष्ण में अडिग आस्था रखने वाले नरेन्द्र १८८१ से१८८४ के बीच दक्षिणेश्वर आते-जाते रहे।इस बीच इनका मन पाश्चात्य भौतिकवाद और दक्षिणेश्वर केअध्यात्मवाद के मध्य डोलता रहा।नरेंद्र के एक मित्र ने दक्षिणेश्वर से इनका मन डिगाने के लिए कहा- ‘नरेन्द्र!अपनी प्रतिभा व बुद्धि से उन्नति करो।संसार में आये हो तो जीवन का सही अर्थ पहचानो।दक्षिणेश्वर के राम कृष्ण ने तुम्हारी बुद्धि खराब कर दी है।अगर अपनी खैर चाहते हो तो उस पागल का साथ छोड़ दो।अन्यथा तुम्हारा सर्वनाश निश्चित है।'इस पर नरेन्द्र मुखर होकर बोले-भाई! उस महापुरुष को तुम क्या समझ पाओगे,जब इतने वर्ष में मैं ही नहीं समझ पाया। हार कर मित्र लौट गया और नरेन्द्र गुरु परीक्षा व भक्ति में सफल रहे। सांसारिक सुख से विरत भाव वाले विवेकानन्द भारत भ्रमण पश्चात विश्व भ्रमण का मन बनाये।इसी क्रम में उनका शिकागो विश्व धर्म महासभा की ओर प्रयाण प्रमुख रहा।

 ३१ मई १८९३ ईस्वी को पाश्चात्य देशों का भ्रमण करने हेतु स्वामी विवेकानन्द जी मुम्बई से अमेरिका की ओर प्रस्थान किये। कोलम्बो, मलाया,पेनांग, हांगकांग, कैण्टन शहर, नागासाकी,ओसाका, टोकियो तथा याकोहामा आदि होते हुए स्वामी जी शिकागो पहुँचे। यहाँ तमाम कठिनाईयों के बीच भूख और खिल्लियों का सामना करते हुए एक वृद्धा, एक युवा महिला के सहयोग तथा यूनानी भाषा के प्रोफेसर जे.एच.राइट की मदद से विवेकानन्द की शिकागो विश्व धर्म महासभा में शिरकत सुनिश्चित हुई। 
`फिर क्या,११ सितम्बर १८९३ ईस्वी को भारतीय नव चेतना के प्रवक्ता के रूप में ईसाई धर्माचार्यों से लोहा लेने में सफलता की आगाज़ शुरू हुई। २७ सितम्बर को इस महासभा में आपका अन्तिम व्याख्यान हुआ। यहाँ सात हजार प्रतिनिधियों की तालियों की गड़गड़ाहट से हाल गूंज उठा। इस धर्म महासभा में ठहरे हुए पानी पर कंकड़ मारने के समान स्वामी जी अमेरिका वासियों के मन में अध्यात्म की नव चेतना जगा दिए।'

अमेरिका के सबसे बड़े समाचार पत्र हेराल्ड में विवेकानन्द के विषय में कुछ ऐसा छपा-धर्म महासभा में विवेकानन्दनिश्चय ही महानतम व्यक्तित्व है। उनका भाषण सुनने के बाद यह अनुभव होता है कि इस विज्ञ राष्ट्र भारत में यहाँ के उपदेशक भेजना कितनी बड़ी मूर्खता है। न्यूयार्क क्रिटिक समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ कि- `धर्म सभा में आने वाले सभी धर्मों के प्रतिनिधियों ने वाक् पटुता पूर्ण भाषण दिए,किन्तु किसी ने भी धर्म महासभा के तात्पर्य एवं उसकी सीमाओं का इतने अच्छे ढंग से व्याख्यायित नहीं किया।
स्वामी जी ने इंग्लैण्ड में भी अपनी पताका फहरायी। यहाँ के समाचार पत्रों में इन्हें `हिन्दू योगी' कहा गया। आप तीन वर्षों तक अमेरिका रहे।यहां पर इन्होंने `न्यूयार्क वेदान्त सोसाइटी' की स्थापना की।१५ जनवरी सन १८९७ ईस्वी को विवेकानन्द जी भारत वापस लौटे। स्वदेश लौटकर स्वामी जी ने अपने गुरु रामकृष्ण की गरिमा की श्रीवृद्धि हेतु `राम कृष्ण मठ' और `रामकृष्ण मिशन' स्थापना का कार्य शुरू किया। इन्होंने सर्वप्रथम कोलकाता के समीप वराह नगर में और आगे चलकर मई १८९७ में बेलूर (कोलकाता) में मानव समाज के हित साधना निमित्त रामकृष्ण के संदेश के क्रम में रामकृष्ण मठ की स्थापना की। समाज निर्माण और दलित मानवता की सेवा में किशोर वय और युवावस्था को पूर्णरूपेण समर्पित करने वाले इस महापुरुष ने अपनी जीवन यात्रा ०४ जुलाई १९०२ को पूरी की।इतनी कम जीवन अवधि में विवेकानन्द जी ने जो अद्वितीय ख्याति मानवता की भलाई अर्थ में अर्जित की वह सदैव अविस्मरणीय रहेगी। सहनशीलता और गाम्भीर्यता का एक मार्मिक प्रसंग विश्व मानव समाज के समक्ष अनुशीलनीय एवं प्रेरणास्पद है। `भारत भ्रमण के गुजरात यात्रा के दौरान रेल के जिस डिब्बे में स्वामी जी चढ़े,उसमें पहले से कुछ विदेशी यात्री बैठे थे।इन्हें देखकर उनके द्वारा तल्ख़ टिप्पणी की गई। एक ने कहा- `ये भिखमंगे भी जाने कहाँ से गाड़ी में घुस जाते हैं। `दूसरे ने कहा- `इन्हीं पाखण्डी साधुओं ने भारत को अंध विश्वास और पाखंड में जकड़ रखा है,तभी तो ये मूर्ख हमारी सेवा करते हैं। `एक ने कहा-`भारत देश जंगल है और यहाँ के निवासी जंगली।' तभी एक स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी तो विवेकानन्द जी स्टेशन मास्टर से पानी का प्रबंध करने के लिए बोले। स्वामी जी आए स्टेशन मास्टर के बीच अंग्रेजी भाषा में मुखर विद्वतापूर्ण वार्ता से विदेशीअचम्भित रह गए और स्वामी जी से बोले- `महाशय! आप हमारे द्वारा की गई टिप्पणी से क्रोधित क्यों नहीं हुए। `विवेकानन्द जी ने सहज भाव से उत्तर दिया- `मेरे साथ तो अक्सर ऐसी घटनाएं होती रहती हैं। अक्सर मूर्खों से मेरा पाला पड़ता रहता है।'

डॉ.सुरेश लाल श्रीवास्तव

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