शरणागति

यह लेख शरणागति, ईश्वर स्मरण, भक्ति और वैराग्य के आध्यात्मिक महत्व को गहराई से प्रस्तुत करता है। इसमें बताया गया है कि अहंकार, मोह और इच्छाओं का त्याग कर ही मनुष्य सच्चे समर्पण और प्रभु कृपा को प्राप्त कर सकता है। गीता, संत वचनों और शास्त्रीय सिद्धांतों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि सत्संग, सेवा, प्रेम और आत्मसमर्पण ही आत्मिक शांति तथा मोक्ष का वास्तविक मार्ग हैं।

May 21, 2026 - 17:04
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शरणागति
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जहाँ ईश्वर का स्मरण होता है, वहीं दुख का विस्मरण होता है। मोह जब मन को आकर्षित करता है, तब केवल संतों की कृपा से ही उससे मुक्ति संभव होती है। जब मन विनीत होकर स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है, तभी सच्ची शरणागति का प्रारंभ होता है। शरणागति और स्मरण का संबंध अत्यंत गहरा है। बिना शरणागति के ईश्वर का स्मरण स्थायी नहीं हो सकता। जहाँ शरणागति नहीं, वहाँ मन में संदेह, मोह और अहंकार का जन्म होता है।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भी स्पष्ट कहा है कि- ‘अहंकार और संशय त्यागे बिना मोक्ष का मार्ग सुलभ नहीं होता।’ अर्जुन के जीवन में यही स्थिति थी। जब तक वह युद्धभूमि में अपने कर्म से विमुख होकर शोक और भ्रम में पड़ा रहा, तब तक वह शरणागति को नहीं पा सका। किंतु जब उसने अपने अहंकार को त्याग दिया, तब वह प्रभु के आदेशानुसार कर्म करने को तत्पर हुआ। यही शरणागति का सार है- अपने समर्पण का भाव।
मनुष्य का स्वभाव प्रायः भोग की ओर झुकता है। हम स्मरण करने के स्थान पर संग्रह करने में लग जाते हैं। यही कारण है कि शक्ति के स्थान पर हम निर्बलता को स्थान देते हैं और ईश्वर का स्मरण भूल जाते हैं। परंतु प्रभु का स्मरण प्रत्येक परिस्थिति में आवश्यक है, क्योंकि वही जीवन की दिशा प्रदान करता है। संसार अस्थिर है, इसलिए वैराग्य का भाव ही शरणागति का आधार है। वैराग्य, त्याग और संयम से ही भक्ति-दृढ़ होती है। सच्ची शरणागति का अर्थ केवल भक्तिभाव नहीं, बल्कि अहंकार, स्वार्थ और इच्छाओं के त्याग से है। यह कोई दुर्बलता नहीं, अपितु जीवन का परम पवित्र अनुभव है।
सच्चा भक्त केवल भगवत भक्ति अनुरागी होता है, वह मोक्ष की इच्छा भी नहीं करता और फिर मोक्ष तो प्रतिफल है। षरणागति का तात्पर्य है, अपने अहं, इच्छाओं और स्वार्थ को त्यागकर परमात्मा की षरण में जाना। यह कोई क्रिया नहीं है, अपितु जीने की एक पवित्र अवस्था है। 

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‘‘हरि व्यापक सर्वत्र समाना, प्रेम ते प्रगट होए मै जाना’’।
जीवन में सत्संग से आसक्ति कम होती है। सन्त युक्ति से आसक्ति कम कर देते हैं एवं युक्ति से मुक्ति करा देते हैं। जिस प्रकार परीक्षित को सात दिन में षुकदेव महाराज ने युक्ति से श्रीमद भागवत सुनाकर मोक्ष प्राप्त करा दिया। बिना सत्संग के ना षरणागति हो सकती है और ना प्रभु का स्मरण नहीं हो सकता है। आजकल हम भोगों को नही भोग रहे, भोग हमें भोग रहे हैं। कामना भोग से संतुश्ट नहीं हो सकती है अपितु बढ़ती है। अतिरेक भोगों को छोड़ना ही श्रेयस्कर है। 
जब जीवन सत्य से अनुप्राणित होता है, तब विवेक दृढ़ होता है। सच्ची युक्ति वही है, जो भक्ति में परिणत हो जाए। जिस प्रकार अर्जुन ने अपना समस्त अहंकार त्याग कर श्रीकृष्ण की शरण ली, वैसे ही मनुष्य को भी अपनी इच्छाओं के त्याग से प्रभु की शरण में जाना चाहिए।
जो भगवान से प्रेम नहीं करता, वह भगवान को समझ नहीं सकता। प्रेम ही शरणागति की आत्मा है। मनुष्य जब यह अनुभव करता है कि उसकी समस्त शक्तियाँ सीमित हैं, मन और बुद्धि अपूर्ण हैं, तब वह केवल ईश्वर को सर्वशक्तिमान और करुणामय जानकर उनके चरणों में आत्मसमर्पण करता है। यही शरणागति का भाव है। शरणागति केवल बाहरी कर्म नहीं, यह भीतरी परिवर्तन है। इसके बिना भक्ति का फल प्राप्त नहीं हो सकता।
संतों ने शरणागति के तीन प्रमुख मार्ग बताए हैं-१. सत्संग- जहाँ सत्य की प्रेरणा मिलती है। २. सेवा- जो विनम्रता और समर्पण को जागृत करती है। ३. कृपा- जो ईश्वर की प्रसन्नता से सहज प्राप्त होती है। इन तीनों के बिना शरणागति अधूरी है।
ध्यान करते समय तीन बातों का ध्यान आवश्यक है- १. लक्ष्य की स्पष्टता- ईश्वर ही एकमात्र आश्रय हैं। २. द्वेष या तुलना से परहेज- दूसरों की आलोचना न करें। ३. प्रयास का संतुलन- अधिक असंयम या अधीरता साधना को कमजोर करती है। साधक के लिए धैर्य और गंभीरता शरणागति के दो आधार स्तंभ हैं। प्रेम ही परम साधन है। भगवान के प्रति सबसे बड़ा प्रेम वही कर सकता है, जो अपनी आत्मा का अनुभव कर चुका है। वही सच्चा भक्त कहलाता है।


गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है-
‘रामहि केवल प्रेम पियारा।’
प्रेम से रहित भक्ति केवल कर्मकांड बनकर रह जाती है। जिस दिन मनुष्य अपने सुख-दुख, मान-अपमान सबको प्रभु को अर्पित कर देता है, उसी दिन से उसका जीवन दिव्यता की ओर अग्रसर होता है। जब जीव प्रेम और विश्वास के साथ प्रभु की शरण में आता है, तब प्रभु उसकी हर पीड़ा का अंत कर देते हैं। जैसा कि श्रीकृश्ण ने गीता में कहा-
‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।’
अर्थात् जब जीव सब धर्मों और कर्मों के बोझ को त्यागकर प्रभु की शरण में आता है, तब वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
शास्त्रों में शरणागति के छह प्रमुख अंग बताए गए हैं- १. अनुकूल्य संकल्प- ईश्वर के अनुकूल कर्म करने का संकल्प। २. प्रतिकूल्य वर्जन- ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध कर्मों का त्याग। ३. रक्षा विश्वास- प्रभु ही हमारे रक्षक हैं, यह दृढ़ विश्वास। ४. गोप्तृत्व-वरण- उन्हें ही अपना पालक मानना। ५. आत्मनिक्षेप- स्वयं को पूर्णतः ईश्वर को समर्पित करना। ६. कार्पण्य- विनम्रता और दीनता का भाव रखना। इन अंगों के बिना शरणागति अधूरी मानी जाती है। शरणागति भय और दुख से मुक्ति का द्वार है। यह आत्मा को स्थिरता और हृदय को विश्राांfत देती है। अहं और ममत्व का अंत ही सच्ची स्वतंत्रता का प्रारंभ है।

अशोक सूर

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