थल सेना दिवस

यह लेख भारतीय थल सेना के गौरवशाली इतिहास, संरचना, उद्देश्य और राष्ट्र रक्षा में उसके अतुलनीय योगदान को प्रस्तुत करता है। इसमें सेना दिवस के महत्व, फील्ड मार्शल के.एम. करियप्पा के योगदान, भारतीय सेना की वीरता, अनुशासन, सैन्य परंपराओं तथा आधुनिक भारत में सेना के आधुनिकीकरण और तकनीकी विकास पर प्रकाश डाला गया है। लेख भारतीय सैनिकों के त्याग, बलिदान और राष्ट्रभक्ति को श्रद्धापूर्वक नमन करता है।

May 22, 2026 - 12:39
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थल सेना दिवस
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भारतीय थल सेना, सेना की भूमि-आधारित दल की शाखा है और यह भारतीय सशस्त्र बल का सबसे बड़ा अंग है जिसका प्राथमिक उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रवाद की एकता सुनिश्चित करना, राष्ट्र को बाहरी आक्रमण और आन्तरिक खतरों से बचाव, और अपनी सीमाओं पर शान्ति और सुरक्षा को बनाए रखना हैं। भारतीय सेना प्राकृतिक आपदाओं और अन्य गड़बड़ी के दौरान मानवीय बचाव अभियान भी चलाते है और आन्तरिक खतरों से निपटने के लिए सरकार भी समय-समय पर सहायता हेतु अनुरोध करती है। भारतीय नौसेना और भारतीय वायुसेना के साथ राष्ट्रीय शक्ति का एक प्रमुख अंग भारतीय थल सेना भी है।

भारत का राष्ट्रपति, थल सेना का प्रधान सेनापति होता है, और इसकी कमान भारतीय थल सेनाध्यक्ष के हाथों में होती है जो कि चार-सितारा जनरल स्तर के अधिकारी होते हैं। पाँच-सितारा रैंक के साथ फील्ड मार्शल की रैंक भारतीय सेना में श्रेष्ठतम सम्मान की औपचारिक स्थिति है, आजतक मात्र दो अधिकारियों को इससे सम्मानित किया गया है। भारतीय सेना ब्रिटिश भारतीय सेना से व्युत्पन्न हुई है तो इसकी संरचना, वर्दी और परम्पराओं को अनिवार्य रूप से विरासत के रूप में ब्रिटिश से लिया गया हैं। भारतीय सेना का उद्भव ईस्ट इण्डिया कम्पनी, जो कि ब्रिटिश भारतीय सेना के रूप में परिवर्तित हुई थी, और भारतीय राज्यों की सेना से हुआ, जो स्वतन्त्रता के पश्चात राष्ट्रीय सेना के रूप में परिणत हुई। भारतीय सेना की टुकड़ी और रेजिमेंट का विविध इतिहास रहा हैं इसने दुनिया भर में कई लड़ाइयाँ लड़ी की और अभियानों में हिस्सा लिया है, तथा आजादी से पहले और बाद में बड़ी संख्या में युद्ध सम्मान अर्जित किये।

भारतीय सेना में एक सैन्य-दल (रेजिमेंट) प्रणाली है, लेकिन यह बुनियादी क्षेत्र गठन विभाजन के साथ संचालन और भौगोलिक रूप से सात कमान में विभाजित है। यह एक सर्व-स्वयंसेवी बल है और इसमें देश के सक्रिय रक्षा कर्मियों का ८०ः से अधिक हिस्सा है। यह १२,००,२५५ सक्रिय सैनिकों और ९,९०,९६० आरक्षित सैनिकों के साथ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी स्थायी सेना है। राजस्थान के झुंझुनू जिले को सैनिकों का शहर कहा जाता है।
भारत में ’थल सेना दिवस’ देश के जांबाज रणबांकुरों की शहादत पर गर्व करने का एक विशेष मौका है। यह दिन देश की एकता व अखंडता के प्रति संकल्प लेने का दिन है। ’सेना दिवस’ के अवसर पर पूरा देश थल सेना की वीरता अदम्य साहस और शौर्य की कुर्बानी की दास्ताँ को बयान करता है। इस दिन उन सभी बहादुर सेनानियों को सलामी भी दी जाती है जिन्होंने कभी ना कभी अपने देश और लोगों की सलामती के लिये अपना सर्वोच्च न्योछावर कर दिया। देश की सीमाओं की चैकसी करने वाली भारतीय सेना का गौरवशाली इतिहास रहा है। देश की राजधानी दिल्ली के इंडिया गेट पर बनी अमर जवान ज्योति पर शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है। इस दिन सेना प्रमुख दुश्मनों को मुँहतोड़ जवाब देने वाले जवानों और जंग के दौरान देश के लिए बलिदान होने वाले शहीदों की विधवाओं को सेना मैडल और अन्य पुरस्कारों से सम्मानित करते हैं। हर वर्ष जनवरी में ’थल सेना’ दिवस मनाया जाता है और इस दौरान सेना अपने दम-खम का प्रदर्शन करने के साथ ही उस दिन को पूरी श्रद्धा से याद करती है। यह दिन सैन्य परेडों, सैन्य प्रदर्शनियों व अन्य आधिकारिक कार्यक्रमों के साथ नई दिल्ली व सभी सेना मुख्यालयों में मनाया जाता है। 

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’सेना दिवस’, भारत में हर वर्ष १५ जनवरी को लेफ्टिनेंट जनरल (बाद में फील्ड मार्शल) के.एम. करियप्पा के भारतीय थल सेना के शीर्ष कमांडर का पदभार ग्रहण करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। ५ अगस्त १९४७ को जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब देश भर में व्याप्त दंगे-फसादों तथा शरणार्थियों के आवागमन के कारण उथल-पुथल का माहौल था। इस कारण कई प्रशासनिक समस्याएं पैदा होने लगी और फिर स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सेना को आगे आना पड़ा। इसके पश्चात एक विशेष सेना कमांड का गठन किया गया, ताकि विभाजन के दौरान शांति-व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके। परन्तु भारतीय सेना के अध्यक्ष तब भी ब्रिटिश मूल के ही हुआ करते थे। १५ जनवरी १९४९ को फील्ड मार्शल के.एम. करिअप्पा स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय सेना प्रमुख बने थे। उस समय भारतीय सेना में लगभग २ लाख सैनिक थे। उनसे पहले यह पद कमांडर जनरल रॉय प्रâांसिस बुचर के पास था। उन्होंने १५ जनवरी १९४९ को ब्रिटिश राज के समय के भारतीय सेना के अंतिम अंग्रेज शीर्ष कमांडर जनरल रॉय प्रâांसिस बुचर से यह पदभार ग्रहण किया था। उसके बाद से ही प्रत्येक वर्ष १५ जनवरी को सेना दिवस मनाया जाता है। के.एम. करिअप्पा पहले ऐसे अधिकारी थे जिन्हें फील्ड मार्शल की उपाधि दी गई थी। १५ जनवरी, १९४९ को कमांडर-इन-चीफ का पद पहली बार ब्रिटिश सैन्य अधिकारी से भारतीय सैन्य अधिकारी को मिला था. कमांडर-इन-चीफ तीन सेनाओं के प्रमुख को कहा जाता है. इस समय भारत में कमांडर-इन-चीफ भारत के राष्ट्रपति हैं जो तीनों सेनाओं के प्रमुख हैं. तब फील्ड मार्शल के.एम. करियप्पा ने जनरल सर प्रâांसिस बुचर से भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ के तौर पर पदभार ग्रहण किया था. फील्ड मार्शल के.एम. करियप्पा उस समय लेफ्टिनेंट जनरल थे. उस समय करियप्पा की उम्र थी ४९ साल. के.एम. करियप्पा ने ’जय हिंद’ का नारा अपनाया जिसका मतलब है ’भारत की जीत’.

भारतीय सेना का गठन ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं से हुआ जो बाद में ’ब्रिटिश भारतीय सेना’ और स्वतंत्रता के बाद, भारतीय सेना बन गई. भारतीय सेना को विश्व की चैथी सबसे मजबूत सेना माना जाता है. भारतीय सेना में फील्ड मार्शल की पांच सितारा रैंक वाले दो ही अधिकारी रहे हैं. पहले हैं के.एम. करियप्पा और दूसरे हैं फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ. के.एम. करियप्पा का जन्म २८ जनवरी, १९०० को कर्नाटक में हुआ था. पहले विश्वयुद्ध (१९१४-१९१८) के दौरान उन्हें सैन्य प्रशिक्षण मिला था. १९४२ में करियप्पा लेफ्टिनेंट कर्नल का पद पाने वाले पहले भारतीय अफसर बने. १९४४ में उन्हें ब्रिगेडियर बनाया गया और बन्नू प्रâंटियर ब्रिगेड के कमांडर के तौर पर तैनात किया गया. १५ जनवरी १९८६ को उन्हें फील्ड मार्शल बनाने की घोषणा की गई. तब उनकी उम्र ८६ साल के करीब थी. फील्ड मार्शल करियप्पा ने १९४७ के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पश्चिमी कमान संभाली थी. लेह को भारत का हिस्सा बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. हर साल सेना दिवस का दिल्ली छावनी के करियप्पा परेड ग्राउंड में आयोजन किया जाता है.  दिल्ली में आयोजित परेड के दौरान अन्य देशों के सैन्य अतिथियों और सैनिकों के परिवारों वालों को बुलाया जाता है। सेना इस दौरान जंग का एक नमूना पेश करती है और अपने प्रतिक्रिया कौशल और रणनीति के बारे में बताती है। इस परेड और हथियारों के प्रदर्शन का उद्देश्य दुनिया को अपनी ताकत का एहसास कराना है। साथ ही देश के युवाओं को सेना में शामिल होने के लिये प्रेरित करना भी है। ’थल सेना दिवस’ पर शाम को सेना प्रमुख चाय पार्टी आयोजित करते हैं, जिसमें तीनों सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उनकी मंत्रिमंडल के सदस्य शामिल होते हैं। परंपरागत रूप से सेना दिवस परेड नई दिल्ली में होती थी, लेकिन हाल के वर्षों में इसे अन्य शहरों में आयोजित किया जा रहा है।  भारत में ७८वां सेना दिवस १५ जनवरी २०२६ को जयपुर (राजस्थान) में मनाया जाएगा। यह आयोजन दिल्ली से बाहर आयोजित सेना दिवस परेड की परंपरा को आगे बढ़ाता है, जिसका उद्देश्य सेना को देश के विभिन्न राज्यों से जोड़ना, विभिन्न राज्यों की सैन्य भूमिका को सम्मान देना, क्षेत्रीय भागीदारी को सशक्त करना और सेना के साथ नागरिकों का संपर्क बढ़ाना है। राजस्थान का चयन रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह राज्य पश्चिमी सीमाओं और मरुस्थलीय युद्ध अभ्यासों के लिए जाना जाता है। सेना दिवस की थीम भारतीय सेना द्वारा घोषित की जाती है। इस बार सेना दिवस की विशिष्ट थीम आधिकारिक तौर पर घोषित नहीं की गई है लेकिन मुख्य फोकस ’विकसित भारत-२०४७’ के लक्ष्य के साथ सेना के आधुनिकीकरण, तकनीकी प्रगति (जैसे ड्रोन युद्ध) और नेटवर्किंग एवं डेटा-केंद्रितता पर रहेगा, जिसका उद्देश्य भारतीय सेना को भविष्य के लिए तैयार करना और समर्थ भारत, सक्षम सेना बनाना है।
                               

राजेश कुमार 

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