खिलौना रोबोट

यह मार्मिक बाल कहानी मानसी और उसके छोटे भाई बबलू की है, जो एक खिलौना रोबोट पाने के लिए माता-पिता के पैसों का बटुआ चुराने की योजना बनाते हैं। लेकिन बटुआ खोजते समय मानसी को अपनी माँ की डायरी मिल जाती है। डायरी के पन्नों से उसे परिवार की आर्थिक कठिनाइयों, माँ के त्याग और उसकी इच्छाओं को पूरा न कर पाने की मजबूरी का पता चलता है। यह सच्चाई मानसी के मन को भीतर तक बदल देती है और उसे एहसास होता है कि माता-पिता की डाँट या रोक-टोक के पीछे भी उनका प्रेम और संघर्ष छिपा होता है। कहानी बच्चों को संयम, माता-पिता के त्याग, पारिवारिक प्रेम और आर्थिक संवेदनशीलता का भावपूर्ण संदेश देती है।

Sep 29, 2026 - 12:38
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खिलौना रोबोट
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मानसी पूरे बारह वर्ष की हो चुकी थी। स्वभाव से एकदम शांत व गंभीर। पिछले महीने जब वह मम्मी के साथ स्कूल यूनिफॉर्म के रिबन व जूते खरीदने गई, तभी उसकी नज़र दुकान में सजाकर रखे एक खिलौना रोबोट पर पड़ी। वह आश्चर्य से उसे देखती रह गई। उसको वह खिलौना बहुत पसंद आ गया। घर आकर उसने पापा से वह खिलौना रोबोट दिलाने के लिए कहा। पापा ने जल्दी ही दिलवा देने का वादा किया। वह खुश होकर बाहर चली गई। जल्दी से अपने दोस्तों को यह बात बताना चाहती थी। उसने पापा को कई बार याद दिलाया, पर मम्मी ध्यान ही नहीं देतीं। झटपट बात पलट देतीं। वह मन मसोसकर रह जाती। उसको लगता, मम्मी बहुत कंजूस हैं।
कई बार वह गुस्सा हो जाती। पापा कितना कमाते हैं, फिर भी उसको खिलौना नहीं दिलवाते। मम्मी भी तो ध्यान नहीं देतीं। हर बार बात टाल देती हैं। आज पहली तारीख को पापा ने नोटों से भरा बटुआ माँ को दिया। मानसी ने फिर याद दिलाया, ‘अब तो दिलवा दो न हमें वह खिलौना रोबोट।' 
पापा से रुपये लेकर मम्मी उसे और बबलू को जल्दी से बाहर भेज देतीं। फिर पापा और मम्मी मिलकर उन रुपयों का जाने क्या-क्या हिसाब लगाते। मानसी सोचती कि पापा-मम्मी इतने सारे रुपयों का क्या करते हैं? ज़रूर मम्मी उन रुपयों को बैंक में रखती होंगी! अपने कमरे में आकर वह अनमने भाव से किताब के पन्ने पलटने लगी। तभी बबलू आ गया। बबलू उससे तीन वर्ष छोटा था, फिर भी उससे तेज था। मानसी का शांत व गंभीर स्वभाव बबलू के विपरीत था। दोनों भाई-बहन में अक्सर झगड़ा हो जाता था। लेकिन आज मम्मी के व्यवहार से उसके शांत स्वभाव में भी गुस्सा आ रहा था। वह मम्मी से नाराज़ हो रही थी। उसका मन विद्रोह कर उठा। उसे बबलू से दोस्ती करना ज़रूरी लगने लगा।
इशारे से उसने बबलू को पास बुलाया। कोई गुप्त बात पता चलने की आशा में बबलू दौड़कर उसके पास आ गया। उसने धीरे से बबलू से कहा, `हमारी मम्मी बहुत कंजूस हैं। तुझे कभी दुःख नहीं होता...?' ‘क्यों, क्या हो गया?' बबलू एकदम बुज़ुर्ग बनते हुए बोला।
‘हुआ क्या! मैं खिलौना रोबोट लेना चाहती हूँ। पापा दिलवाने की कहते भी हैं, पर मम्मी दिलवाने की बात टाल देती हैं। तू कोई उपाय बता न, जिससे वह रोबोट मुझे मिल जाए।' रोबोट प्राप्त करने के लिए वह मचल उठी।
उसकी बात पर बबलू भड़क उठा। कहने लगा, ‘तुझे तो अपने रोबोट की पड़ी है। मुझे भी तो फुटबॉल चाहिए। सच्ची, दीदी! पापा-मम्मी के पास कभी भी हमारे खिलौनों के लिए पैसे रहते ही नहीं।'
बबलू ने उपाय बताया, पर मानसी को पसंद नहीं आया। तभी मानसी को एक उपाय सूझा। जल्दी से बबलू को अपने पास बुलाकर अपनी योजना बताने लगी, ‘बबलू, क्यों न हम रुपयों का बटुआ गायब कर दें और ले आएँ अपनी-अपनी चीज़ें?' सुनते ही बबलू उछल पड़ा, ‘सच! बड़ा मज़ा आएगा, दीदी। ठीक है, हम पापा का बटुआ गायब करेंगे।' 
लेकिन मानसी सोच में पड़ गई। उनको तो पता ही नहीं था कि पापा-मम्मी रुपयों का बटुआ रखते कहाँ हैं। फिर क्या करें कि रुपयों का बटुआ उनको मिल जाए और अपना रोबोट झटपट खरीद लाएँ। मानसी ने दुःखी मन से यह बात बबलू को बताई।
‘दीदी, तू तो बस बुद्धू ही है... मुझसे अधिक समय घर में रहती है, फिर भी इतनी-सी बात नहीं मालूम। आलमारी के ऊपर वाले खाने में रखती है मम्मी उसे।' दोनों ने गुपचुप योजना बना ली। रात को जब पापा-मम्मी सो जाएँगे, तब बटुआ पार किया जाएगा।
योजना के अनुसार बबलू ने शाम को ही एक स्टूल आलमारी के पास लाकर रख दिया था। रात होने पर वे पापा-मम्मी के सोने का इंतज़ार करने लगे। जैसे ही दोनों को नींद आई, मानसी व बबलू चुपके से आलमारी के पास पहुँच गए। मानसी ने आलमारी खोल दी। बबलू ने जल्दी से उसके पास स्टूल रख दिया। स्टूल पर खड़ी होकर वह बटुए की तलाश करने लगी। 
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अचानक उसकी नज़र मम्मी की डायरी पर पड़ी। वह स्टूल पर ही खड़े-खड़े डायरी के पन्ने पलटने लगी। उसमें घर के खर्चों के हिसाब के साथ प्रतिदिन का वृत्तांत लिखा था। मानसी यह देखकर अवाक रह गई। वह देखने लगी कि डायरी कहाँ तक भरी है। तभी अंतिम पृष्ठ, यानी उसी दिन के पृष्ठ पर उसकी नज़र ठहर गई। मम्मी ने अपने मोती जैसे अक्षरों में लिख रखा था-
‘आज सुबह से ही उसका मन उदास है। मेरी प्यारी मानसी बिटिया एक खिलौना रोबोट खरीदना चाहती है, लेकिन मैं उसको वह खिलौना नहीं दिलवा पा रही हूँ। मैंने एक रोज़ चुपके से दुकान से उसका मूल्य पूछवाया था। मुझे पता चला कि उसकी खरीद हमारे बजट को गड़बड़ा देगी। सुबह उसने मुझे खिलौने के लिए फिर याद दिलाया, पर समझाने पर वह मान भी गई। भगवान का लाख-लाख धन्यवाद, जो मुझे इतने समझदार बच्चे दिए।' 
वह दूसरा पन्ना पलटकर पढ़ने लगी, तो बबलू ने डाँट दिया, ‘यह तू क्या पढ़ने लगी? बटुआ ढूँढ़ न, जल्दी से।' बबलू की डाँट की तरफ ध्यान दिए बिना वह डायरी के पन्ने पलटने लगी। एक पन्ने पर उसकी नज़र रुक गई। लिखा था- ‘सिर्फ दस हजार रुपयों में घर का खर्च चलाना अब बड़ा कठिन लगने लगा है। आज सुबह मानसी अपने पापा के वेतन के बारे में पूछ रही थी। मैंने कह दिया- ढेर सारे रुपये मिलते हैं। लेकिन मुझे दुःख हुआ, क्योंकि मुझे झूठ बोलना पड़ा। सही वेतन जान लेने से मेरी प्यारी मानसी में हाrन भावना घर न कर जाए। इसलिए भगवान से मेरी प्रार्थना है कि मेरे बेटा-बेटी पढ़-लिखकर बड़े आदमी बनें और खूब कमाएँ।'
इतना सब जान लेने के बाद बटुआ ढूँढ़ने की हिम्मत उसमें नहीं रही। मन में सजे खिलौना रोबोट को उसने अपने मन से निकाल दिया। मानसी के हाथ से डायरी छूट गई और स्टूल पर खड़े-खड़े ही प्रâॉक से आँखें ढाँपकर वह फूट-फूटकर रो पड़ी। बबलू अचंभित-सा उससे रोने का कारण पूछता ही रह गया। 

राजकुमार जैन राजन,

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