उस छोटे से शहर के अंदर जीवन अपनी संपूर्ण विभिन्नताओं के साथ विस्तार लिए हुआ था। जहाँ तंग गलियों, पुराने मकानों और रोज़मर्रा की खींचतानों के बीच न जाने कितनी कहानियाँ पूरे होने की आस में अधूरी ही दफन हो जाया करती थीं। हर दरवाज़े के पीछे एक संघर्ष था और हर चेहरे के पीछे एक उम्मीद। उसी शहर की भीड़ में एक जीवन धीरा का भी था, जो अपने नाम के अनुकूल ही धैर्य, सहजता और समझदारी का अद्भुत संगम थी। भरी जवानी में वैधव्य का दु:ख भोगने वाली धीरा अब पचास पार कर चुकी थी, चेहरे पर झुर्रियों की आहट होने लगी थी पर उसका स्वभावगत गांभीर्य और गहरी काली आँखों की चमक उसे अपने हमउम्रों से एकदम अलग करती थी। पढ़ाई भले उसने आठवीं जमात तक की थी, पर जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों ने उसे हर वह पाठ पढ़ा दिया था जो किसी उच्च शिक्षण संस्थान से भी हासिल नहीं किया जा सकता था।
घर में उसकी तेज़-तर्रार सास दमयन्ती देवी और तीन बच्चे थे, दो बेटियाँ रुचि और श्रुति व एक बेटा राजवीर यानि राजा। दो दशक पहले हुए पति के देहांत समय रुचि छह साल की, श्रुति चार की और राजा मात्र डेढ़ बरस का था। तबसे घर के खर्चे, बच्चों की पढ़ाई, नाते-रिश्तेदारियाँ और अन्य सारी जिम्मेदारियाँ धीरा के कंधों पर आ गईं थीं। उसने कभी सिलाई-बुनाई की, कभी घरों में बच्चे संभाले, कभी बड़ी-पापड़ और अचार बनाकर बेचे। दिन-रात की मेहनत से उसने घर को संभालते हुए बच्चों को अच्छी परवरिश देने का भरपूर प्रयास किया। संपत्ति के नाम पर धीरा के पास ब्याह के समय के कुछ स्वर्णाभूषण थे और एक मकान, जो उसकी कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते, उसके पिता उसके नाम कर गए थे।
धीरा की दुनिया बहुत छोटी, पर जिम्मेदारियों का आकाश बहुत विस्तृत था। पति के रहते हुए भी घर की असली सत्ता दमयन्ती देवी के हाथ में ही थी और उनके जाने के बाद तो जैसे उनका एकाधिकार ही हो गया था। उधर धीरा अपने अधिकारों से अनभिज्ञ एक कर्मठ, जुझारू, समर्पित माँ और बहू के रूप में अपने कर्तव्यों के निर्वाह में लगी हुई थी। सख्त मिजाज़ दमयन्ती देवी के शब्दों में धार थी और निर्णयों में ज़िद। धीरा ने हमेशा खुद को उनके सामने निर्बल और असहाय ही पाया। हर छोटी-बड़ी बात पर टोका जाना, पारिवारिक निर्णयों में कोई स्थान न मिलना और हर गलती के लिए उसे ही दोषी ठहराना, ये अब रोज़ की बात हो चुकी थी। लेकिन दमयन्ती देवी की यही कठोरता न जाने कैसे मोम में तब्दील होकर पिघल जाती, जब बात राजा की होती। इकलौता वारिस होने के कारण वह उनकी आँखों का तारा था। बचपन से ही उसकी गलतियों पर वे हँसकर कहतीं, ‘लड़का है’ ये तो करेगा ही। ‘धीरा उसे टोकती’ तो उसे तुरंत डपट कर चुप करा दिया जाता। धीरे-धीरे राजा समझ गया कि उसकी हर गलती पर पर्दा डालने वाला एक मजबूत सहारा घर में मौजूद है जो हर-हाल में उसका ही पक्ष लेगा।
ऐसा नहीं था कि रुचि और श्रुति अपनी माँ के दर्द से अनजान थीं। वे कई बार उसे समझाने की कोशिश करतीं पर कभी बेटे के प्रति माँ का स्नेह, तो कभी बहू की विवशता आड़े आ जाती और इनके बीच असमंजस में झूलती धीरा हर बार उन्हें चुप करा देती।
राजा की पढ़ाई लगभग छूट चुकी थी, गलत संगत में पड़कर शराब, जुए तथा आवारागर्दी में डूब चुका था। धीरा की उसे रोकने की नाकाम कोशिशें और दमयन्ती देवी का ढाल बनकर खड़े हो जाना, सब बदस्तूर जारी था। घर में जैसे एक अदृश्य दीवार खड़ी हो गई थी, जिसके एक ओर धीरा की बेटे के भविष्य को लेकर चिंता थी और दूसरी ओर दमयन्ती देवी का पौत्र के प्रति अंधा प्रेम। दरअसल इसे प्रेम कहना ‘प्रेम’ शब्द की कोमलता, निश्छलता और सरलता का अपमान करना है। यह एक तरह की ज़िद थी, सब कुछ अपने नियंत्रण में रखने की।
उस दिन रुचि का शरीर तेज़ बुखार से तप रहा था, धीरा सिरहाने बैठी ठंडे पानी की पट्टियाँ बदल रही थी, श्रुति उसके तलवों में बर्फ घिस रही थी। राजा नशे में चूर घर लौटा और जब धीरा ने डॉक्टर को लाने के लिए कहा तो उसने चिल्लाकर पूरा घर सिर पे उठा लिया। श्रुति ने जब शांत रहने को कहा तो उसने गुस्से में पेपरवेट उठाकर जमीन पर दे मारा। इस रौद्र रूप को देखकर धीरा कांप उठी, उसके अंदर जैसे कहीं कुछ चटक गया। वह समझ गई कि पानी सिर से गुज़र चुका है, उसके मन में अब बेटे को लेकर चिंता से अधिक भय व्याप्त हो गया। बावजूद इसके बेटे के दुर्व्यवहार से पीड़ित माँ के मन में उठे आर्तनाद ने यही दुआ की, ‘हे भगवान! इसका भला करना प्रभु इसे सद्बुद्धि दे!’
अगले दिन जब राजा ने पैसे माँगे तो धीरा के मना करने पर, दमयन्ती देवी ने बिना किसी पूछ-ताछ के तुरंत उसे पैसे दे दिए। यह देख धीरा के भीतर वर्षों से दबा आक्रोश जैसे फट पड़ा, खुद को नियंत्रित करते हुए धीमे लेकिन कठोर स्वर में बोली, ‘अम्मा’ ऐसा कब तक चलेगा? इसकी हर नाजायज माँग को मानना ठीक नहीं है, यह सब इसे बर्बाद कर रहा है।‘दमयन्ती देवी ने खा जाने वाली नज़रों से धीरा को देखा और कमरे से निकल गईं।
हालात दिन-ब-दिन बेकाबू होते जा रहे थे, राजा की बदतमीज़ियाँ बढ़ती जा रही थीं, कोई उसे रोकने वाला नहीं था। उस दिन तो राजा ने सारी सीमाएं लांघ लीं जब उसने लॉकर तोड़कर, माँ के बचे-खुचे गहने निकाल लिए। उसे रोकने की कोशिश में हुई जोर-जबरदस्ती में राजा ने ऐसा धक्का दिया कि धीरा दीवार से जा टकराई और उसके माथे से खून बह निकला। राजा ने रुककर माँ की तरफ देखने की जहमत भी नहीं उठाई और गहने लेकर घर से निकल गया। उस क्षण कालचक्र मानो थम-सा गया। उस दिन धीरा की आँखों ने एक भी आँसू नहीं बहाया। वह सोचती रही अपने बेटे के बारे में, अपनी दीर्घ कालीन मौन स्वीकृतियों के बारे में और उस तमसाच्छन्न भविष्य के बारे में, जिसकी छाया अब उसकी बेटियों पर पड़ती नजर आ रही थी।
सुबह होते-होते उसके अंतर्मन में एक अटल निर्णय आकार ले चुका था। किसी अनिष्ट के घटित होने से पूर्व ही उसने निश्चय कर लिया कि जीवन मेरा है इस पर नियंत्रण भी मेरा ही होगा। पुराने ट्रंक में रखे घर के पेपर्स निकालकर वो वकील के पास गई, वसीयतनामा कर, उसे अपनी दोनों बेटियों में बराबर-बराबर बाँट दिया और बेटे को अपनी चल-अचल संपत्ति से बेदखल कर दिया। घर लौटते हुए उसे अजीब सी शांति महसूस हो रही थी। घर पर जब उसने सबको ये निर्णय सुनाया तो राजा का गुस्सा फूट पड़ा, शब्दों में आग थी, आरोप थे, तिरस्कार था लेकिन आज धीरा निडर थी, शांत थी, किसी का भी सामना करने को तैयार थी। दमयन्ती देवी स्तब्ध थीं, बहू का ऐसा रूप वे पहली बार देख रही थीं।
धीरा ने बस इतना कहा, ‘यह फैसला मैंने अपने बेटे से बदला लेने के लिए नहीं लिया बल्कि अपनी बेटियों के प्रति प्रेम और कर्तव्य के चलते लिया है’ बेटे की गलतियों की सजा मैं अपनी बेटियों को हरगिज नहीं भुगतने दूँगी। उसके खिलाफ न खड़े होकर मैं एक गलती कर चुकी हूँ लेकिन अब बेटियों के पक्ष में न खड़े होकर मैं उसे दोहराना नहीं चाहती। ‘उसकी आवाज़ शांत थी’ पर उसमें एक ऐसी दृढ़ता थी, जो वर्षों की चुप्पी से जन्मी थी।
राजा ‘देख लेने’ का दावा कर, तमतमाते हुए घर से निकल गया। धीरा एक कटे वृक्ष की भाँति सोफ़े पर गिर पड़ी। उसका दिल डूब रहा था, हाथ-पैरों में शिथिलता थी और आँसुओं का सैलाब उफान पर था। वह फक पड़ी जैसे बरसों से अपने भीतर समेटे हुए तूफान को स्वयं गुजरने का रास्ता दे रही हो।
रुचि और श्रुति उसके पास आकर बैठ गईं। बेटियों के हाथ अपने हाथ में लेते हुए धीरा ने रुँधे गले से कहा, ‘मैंने अपना एक बेटा खोकर, दो को पा लिया!’ हालांकि उसके स्वर की वेदना छिप न सकी। रुचि ने उसे ढांढस बंधाते हुए कहा, ‘नहीं माँ! तुमने उसे खोया नहीं है’ बल्कि उसे बचाने की कोशिश की है जो शायद बहुत पहले ही करना चाहिए थी।
दमयन्ती देवी की आँखों में पछतावे की नमी थी। वे कुछ कहना चाहती थीं, पर शब्दों ने उनका साथ नहीं दिया। पहली बार उन्हें यह अहसास हो रहा था कि पक्षपात पूर्ण व्यवहार किस हद तक विनाशकारी हो सकता है।
उस छोटे शहर के छोटे से घर में उस दिन बहुत कुछ बदल गया। सिर्फ एक नाम कागज़ों से नहीं हटा था, बल्कि एक माँ का मोहभंग हुआ था अपने ही शरीर के एक हिस्से से, जिसे उसने काटकर अलग कर दिया था। उस रात, जब सब सो गए, घर के हर कोने में सन्नाटा पसरा था, मानो दीवारें भी दिनभर की घटनाओं से स्तब्ध थीं। बस धीरा जाग रही थी। उसके आँसू सूख चुके थे, पर भीतर एक गहरी टीस अब भी बाकी थी। खिड़की से झांकते आकाश को निहारते हुए उसने जैसे अपनी सारी वेदना उसी असीम शून्य में समर्पित कर दी। उसके अधरों से एक धीमी, टूटती हुई प्रार्थना निकली, ‘हे ईश्वरष्ठ उसे संभाल लेना!’
कभी-कभी जीवन में ऐसे निर्णय लेने पड़ते हैं जो हृदय को तोड़ देते हैं, पर आत्मा को बचा लेते हैं। माँ का प्रेम केवल उसकी ममता में ही नहीं, बल्कि उस अदम्य साहस में भी प्रकट होता है, जब वह अपने ही जिगर के टुकड़े को सही मार्ग पर लाने के लिए कठोर निर्णय लेती है। यही कठोरता उसके प्रेम की सबसे गहरी और निस्वार्थ अभिव्यक्ति होती है।
सुश्री प्राची तिवारी ‘छबि