अंतराल

यह भूमि की जीवन-यात्रा की मार्मिक कहानी है, जिसमें प्रेम, विवाह, मानसिक बंधन, आत्मसम्मान और पुनः आत्मनिर्भर बनने का संघर्ष दिखाई देता है। अपनी पसंद से विहान से विवाह करने वाली भूमि धीरे-धीरे उसके नियंत्रण और उपेक्षा के कारण अपनी प्रतिभा, इच्छाएँ और आत्मविश्वास खो देती है। विहान की अचानक मृत्यु के बाद वह स्वयं को पूरी तरह अकेला पाती है, लेकिन अपने पुराने प्रमाण-पत्रों, मेडल और ट्रॉफियों को देखकर अपने भीतर छिपी प्रतिभा को फिर से पहचानती है। मित्र ऋषभ और हेमांगी के सहयोग से वह नई दुनिया से जुड़ती है, अध्यापिका बनती है और समाजसेवा में सक्रिय होती है। श्रीधर के साथ विकसित हुई मित्रता उसके जीवन में फिर से आशा और साथ का नया सूर्योदय लेकर आती है। कहानी संदेश देती है कि जीवन का कोई भी पड़ाव आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और नई शुरुआत के लिए देर नहीं होता।

Sep 29, 2026 - 13:07
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अंतराल
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सॉंझ ढले सिंदूरी नभ की सुंदर छटा को बरामदे में खड़ी भूमि अविराम निहार रही थी। सूरज स्वर्णिम किरणों की लालिमा समेटते हुए अपनी रेशमी किरणों की डोर थामे रथ पर सवार अपने आशियॉं की ओर धीरे-धीरे जाने‌ लगा। उसे देख लगता जैसे साम्राज्य सूरज का ही है, ये किरणें तो जैसे उसकी दासियॉं ही थी जो भोर में उसके स्वागत में तत्पर रहती और सॉंझ ढले उसके संग जाने आतुर। सूरज को अपने किरदार पर गुमान होना भी लाजमी था। उसी से ही कर्म पथ का आगाज जो होता। ढलती सॉंझ में भी उसका महत्त्व कम नहीं था। उसके जाने के साथ-साथ ही पंछी भी अपने नीड़ की और उडा़न भरने लगते । 
भोर में उसकी कोमल किरणों का स्पर्श हर मन को आल्हादित करता। सुबह-सुबह खिलखिलाते पेड़ पौधों पर चहकते पंछी समस्त वातावरण में उल्हास भर देते, जैसे यह सूरज रोजाना ही नवसृष्टि का निर्माण कर आशाओं की अनेक किरणों को जन्म देता। कितनों के जीवन में खुशियों के इंद्रधनुषी रंग भर देता तो कहीं आशाओं के दीपक सुलगाए रखता। सूर्योदय से सूर्यास्त तक के अंतराल में अपने सभी किरदार यह कितनी शिद्दत से निभाता है तभी तो पेड़- पौधों का इसके अभाव में जीवन ही दुर्लभ है। आसमान में टक टकी लगाये भूमि यहीं सोच रही थी। जीवन का भी यही यथार्थ है। जन्म से मृत्यु तक और इस बीच का जो अंतराल है वही अगर उद्देश्यहीन हो तो जीवन का क्या लाभ? अपने दैनिक कर्म तो पशु-पक्षी भी करते हैं और वह भी केवल वही कर रही है। उसे एहसास हुआ आज उसकी जो भी दशा है कहीं ना कहीं इसकी जिम्मेदार वह स्वयं है। वह अन्याय का विरोध करने का साहस ही नहीं जुटा पायी। कभी -कभी बहुत अच्छा होना भी अपने आप के लिए बहुत बड़ी सजा है जिसका लाभ साथ जुड़े सभी लोग बहुत लेते है और उसे हमेशा मन मसोस कर रहना पड़ता है। विचलित मन तरह-तरह की आशंकाओं से घिरा था। क्या उम्र के इस पड़ाव में जीवन को सार्थक रूप देना संभव है? मन ही मन यह सवाल उसके अंतर्मन के पट खटखटाने लगा। 
कितना अंतर होता है एक पुरुष और एक स्त्री के मन में जहाँ स्त्री समर्पण, सहनशीलता की मूर्ति वहीं पुरुष अपनी अभिलाषा और आकांक्षाओं का आदी। अपने वर्चस्व की डोर को कस के थामें रखना ही उसे पसंद। उन्हें जरा सी ढील देने मात्र से उनके हृदय में अपना वर्चस्व कम होने का भय बना रहता है। स्त्री के सम्मानों की गाथा केवल बंद किताबों में ही नजर आती है। वर्तमान में स्थिति जरूर कुछ बदली है पर बरसों पहले तो स्थिति यही थी और आज भी यही रहती। अब युवतियॉं जीवन की परिभाषा को समझ गई है। व्यर्थ में किसी के भी समक्ष झुकना उन्हें गंवारा नहीं । पढ़ी-लिखी युवतियां भावावेश में नहीं बहती वह अपने जीवन के निर्णय सोच समझकर ले रही है। अपने उपर अन्याय, अत्याचार के विरोध में आवाज उठाने की उनमें हिम्मत आ गई है। भूमि को लगा उम्र की ऐसी दहलीज पर आकर जीवन नौका ठहर गई जहॉं उसे केवल अंधकार ही नजर आ रहा था। व्यक्ति प्रतिकूल स्थिति में बरसों बिता दे तो उसके लिए सोच के सकारात्मक दीप प्रज्ज्वलित करना एक सपने जैसा ही है। अब तक तो मन की सारी इच्छाएँ भी मर चुकी थी। जीवन जैसे एक साँचे की तरह ढल गया जिसमें कोई भी चीज जैसी डालो वैसी ही बनकर निकल आती है। 
अब भूमि के जीवन में विहान का लौटकर आना तो मुमकिन ही नहीं। वैसे उसके सानिध्य की लालसा तो बहुत पहले ही खत्म हो चुकी थी। इस रिक्त स्थान के साथ यूँ ही जिंदगी गुजारना आसान नहीं था। आसमान में चॉंद, तारों की बारात लेकर समय दस्तक दे चुका था किंतु आसमान में चमकते सितारों में उसे कहीं भी विहान नजर नहीं आ रहा था। बचपन में माँ कहती' ‘दादी अब आसमान का तारा बन चुकी है।' वह सचमुच किसी चमकते तारे को देख उसमें अपनी दादी का प्रतिबिंब देखने लगती। आज इन तारों में उसे कहीं विहान नजर नहीं आया। शायद उसके साथ जिंदगी केवल कट रही थी जैसे कोई मरीज कोमा में चला जाता है। उसकी उपस्थिति कोई मायने नहीं रखती। केवल वह जीवित है मात्र यह समाधान रहता। विहान ने कभी उसकी पसंद को प्राथमिकता दी ही नहीं। खाना-पीना, पहनना सब-कुछ उसकी मर्जी से ही होता। बड़े शौक से उसने अपनी उपलब्धियों को शोकेस में सजा कर रखा था। यह देख विहान ने प्रशंसा तो दूर, झल्लाते हुए कहा,' यह कबाड़खाना यहॉं क्यों फैला रखा है?' और वह चुपचाप खून के घुट पीकर रह गई। कितनी ही देर बरामदे में आराम कुर्सी पर बैठ  सोचती रही। एक छोटी-सी मुलाकात ने जीवन की दिशा और दशा दोनों ही बदल दी। शीतल पुरवाई के संग आती रात रानी की महक कितनी लुभाती थी उसे किंतु आज उसने दरवाजा बंद कर उसे भीतर प्रवेश करने से रोक दिया। यह सोचकर, बहुत हुआ जीवन में बहकना और कमरे में आ गई।  
आज उसे अपने मन के अंधेरे पर विजय पाना नितांत जरूरी लग रहा था। वरना यूँ तो अवसाद उसे चारों ओर से जकड़ लेता। एक बार स्वयं को विहान को सौंप दिया। क्या, अब बची जिंदगी अवसाद को सौंप दें भीतर से आवाज आयी- ‘नहीं-नहीं, जब जागो तभी सवेरा।'  
दूसरे ही पल उसने अपने बचपन के तमाम प्रशस्ति-पत्र, मेडल, ट्रॉफियों से भरा संदूक पलंग के नीचे बन्ो बॉक्स से जहॉं सहेजकर रखा था वहां से निकाला। जिसे देखकर उसके मुख पर रोशनी की आभा प्रदीप्त हो गई। एक-एक कर सभी प्रशस्ति पत्रों को वह बारी-बारी देखने लगी। नृत्य, गायन, वक्तृत्व के साथ ही बास्केटबॉल की ट्रॉफियों पर नजर पड़ी। एक आत्मविश्वास उसके भीतर तक प्रवेश कर गया। गायन,नृत्य और बास्केटबॉल का तो अभ्यास छुट ही गया था। अब इस उम्र में वह सुर-ताल, मधुरता आएगी या नहीं कहा नहीं जा सकता। फिर अपनी उच्च शिक्षा की डिग्री हाथ में लेकर उसने मन ही मन कहा,' इसे व्यर्थ नहीं जाने दूँगी।'  
रात गहरा रही थी। उसने संदूक को यूँ ही खुला रखा यह सोचकर की सुबह इन सारी चीजों को शोकेस में रखेगी। जिसे देखकर सकारात्मक ऊर्जा मिलती रहेगी। भूमि अपनी मॉं- बाबूजी की एकलौती संतान थी। जिस चीज पर उसकी नजर पड़ती वह उसके लिए हाजिर हो जाती। कॉलेज से बास्केटबॉल टूर्नामेंट में खेलने गई भूमि का ट्रेन में विहान से परिचय हुआ। सफर लंबा था। कोलकाता से मुंबई भूमि खेलने जा रही थी और विहान रायपुर से इंटरव्यू के सिलसिले में मुंबई जा रहा था। दोनों आमने-सामने की सीट पर बैठे थे। कई बार नजरें चार हुई। आखिर भूमि ने ही चुप्पी तोड़ी।वह वैसे ही खुले विचारों की थी। बातों का सिलसिला बढ़ते ही गया। मुंबई पहुँच कर दोनों ने एक-दूसरे से विदा ली। इत्तेफाक से दो दिन बाद दोनों के वापसी एक ही ट्रेन से थी। स्टेशन पर फिर मुलाकात हुई। सीट नंबर जरूर अलग-अलग थे किंतु विहान ने भूमि के पास बैठे लड़के को अपनी जगह दी और स्वयं भूमि के पास आ बैठ गया। भूमि के मुख पर जीत की खुशी थी वहीं विहान भी इंटरव्यू में सफल रहा। लंबा सफर मानों पलक झपकते बीत गया दोनों ने मोबाइल के नंबर का आदान-प्रदान किया। सफर में हुई यह दोस्ती प्रेम की पगडंडी पर अग्रसर हो गई। उस वक्त लग रहा था यहाँ केवल फूल ही फूल है जो जीवन को महकाएँ रखेंगे। फूल के साथ कॉंटें भी रहते ही है, लेकिन उम्र की उस दहलीज में उन कॉंटो पर ध्यान ही नहीं गया।  
         भूमि के विवाह को लेकर माँं - बाबूजी के अरमान कुछ और थे पर इंसान सदा ही हारता है तो अपनी संतान के आगे। उसकी ज़िद के आगे उनकी एक ना चली। वैसे विहान की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी अच्छी ही थी। धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ पीहर से विदा हो कुछ दिन भूमि ससुराल में रही, जहाँ बहुत ही जल्द वह सब से घुल-मिल गई थी। विहान की छुट्टियॉं खत्म हो चुकी थी दोनों मुंबई माया नगरी में आ बस गए। धीरे -धीरे विहान का अलग ही रूप सामने आया। वह हर बात में भूमि को रोक-टोक करता रहता। वह किसी से जरा भी बात कर लें तो उसके मन में शक का कीड़ा  कुलबुलाने लगता । भूमि किसी से कुछ कह भी नहीं सकती थी क्योंकि पसंद उसकी थी। कितना मुश्किल है इंसान को परखना। दिखता कुछ और है होता कुछ और है । समय के साथ -साथ भूमि केवल उसके हाथों नाचने वाली कठपुतली बन कर रह गई। 
        भूमि के पैरों तले उस दिन जमीं खिसक गई जब उसे पता चला कि विहान की शारीरिक व्याधियों के चलते वह मॉं नहीं बन सकती। उस दिन जो आघात उसे लगा फिर उससे उभरना उसके लिए नामुमकिन हो गया।  दोनों के बीच मौन की तटस्थ दीवार अपना स्थायी मुकाम बना चुकी थी। एक ग़लती की सजा उसे उम्र भर भुगतनी होगी। पश्चाताप की अग्नि में झुलसने के अतिरिक्त अब कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। शायद भूमि का हृदय परिवर्तन ना हो इसी डर से विहान ने उसे सोने के पिंजरे में बंद कर रखा था। अब तो वह इस बंद पिंजरे की ऐसी आदी हो चुकी थी की शायद खुला आसमान मिल भी जाए तो वह उड़ ना पाए। समय के चक्र में उसके भीतर की प्रतिभा, उसका व्यक्तित्व सब कुछ दब चुका था।  
भूमि रोजमर्रा के कामों में व्यस्त थी। तभी विहान के ऑफिस से फोन आया। अचानक हृदयाघात से विहान की सॉंसे थम गई। यह सुन वह जड़वत मुर्तिवत बैठ गई ।उसकी ऑंखें पथरा गई थी। कुछ समझ नहीं आ रहा था। ना ही वह यहॉं  किसी को जानती थी। अड़ोस-पड़ोस के रिश्तेदारों ने ही उस से दोनों परिवारों के नजदीकी लोगों के फोन नंबर लिए और उनके पहुँचने तक क्रिया कर्म की सारी तैयारियॉं की। रिश्तेदार आए औपचारिकता निभा कर उसे दिलासा देकर चले गए। पर आज कल कौन किस की जिम्मेदारी लेता है। तेरहवीं कर के सब अपने-अपने रास्ते निकल गए और वह नितांत अकेली .....  
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जीवन के बीस बसंत व्यर्थ गंवाने के बाद अब जीवन की जंग लगी गाड़ी को पटरी पर ला रफ्तार देना आसान नहीं था। रात-भर यही  सोचते हुए कब फिर सूरज ने भोर में आ दस्तक दी पता ही नहीं चला । छुट्टी का दिन था सुबह ग्यारह बजे कॉल बेल बजी। दरवाज़ा खोलने गई तो सामने ऋषभ को देख हतप्रभ रह गई। ऋषभ कॉलेज में उसका सब से अच्छा दोस्त था। आज वह अपनी पत्नी के साथ भूमि से मिलने आया था। दोनों ही एक साथ बहुत अच्छे लग रहे थे। उनका आपसी सामंजस्य देखकर भूमि के मन में टीस उठी वह तो जीवनभर यह सामंजस्य पाने की लालसा में अतृप्त रही। ऋषभ और उसकी पत्नी हेमांगी दोनों ही जबरदस्ती उसे दो - चार दिन के लिए अपने साथ ले आए । 
दो चार दिनों में हेमांगी ने उसे बाहर की दुनिया से रुबरु करवाया। सुबह- शाम उसे सैर करने अपने साथ ले जाती। ऋषभ ने  भी बैंक के सारे दस्तावेज देख उससे संबंधित सभी कार्य उसे समझाए। वह दोनों ही बीच-बीच में भूमि से मिलने आते रहते यूँ तो विहान के कारण कोई घर आता जाता नहीं था।  
बरामदे का दरवाजा खोलकर उसने सूरज के किरणों की साक्षी में पूर्वाग्रहों को झकझोर कर सोचा। जीवन‌ का अब तक अंतराल व्यर्थ गया किंतु वह हर एक पल की भरपाई करेगी। थोड़ा प्रयास करने पर ही एक स्कूल में अध्यापिका के पद पर उसकी नियुक्ति हो गई। छुट्टी के दिन वह अनाथालय में सेवा देती और अपनी हम उम्र सहेलियों के साथ घूमने -फिरने का लुत्फ उठा रही थी। रातरानी की महक की और उसके कदम बढ़ने लगे।
इसी बीच स्कूल में एक अध्यापक श्रीधर गुप्ता से उसकी गहरी मित्रता हो गई जिनकी पत्नी की कैंसर से मृत्यु हो गई थी। उनके साथ घूमना फिरना होते रहता। कभी भूमि उनका टिफिन ले आती तो कभी कैंटीन में साथ बैठ चाय का लुत्फ लेते, नए-नए विषयों पर चर्चा होती । अब वह पहले की भॉंति सजने संवरने लगी। खोया हुआ आत्मविश्वास फिर से मिलना याने समंदर में मोती मिलने जैसा ही है। श्रीधर जी ने ही स्कूल के कार्यक्रम में भाषण देने हेतु भूमि का नाम सुझाया था वह बड़े आत्मविश्वास के साथ अपने संबोधन में कह रही थी, ' जीवन और मृत्यु के बीच हमारे जीवन का जितना भी अंतराल हमें ईश्वर से मिला है उसे सार्थक रूप दें और अपने लक्ष्य से निगाहें हट ना पाए यह ध्यान रखें। जीवन के उपरांत भी  हमारा नाम लोगों की जुबान पर रहे। मान, मर्यादा का पूरी तरह जतन जरूर करें पर अपने स्वाभिमान का दीपक बुझ ना पाए इसका ध्यान रखें । युवक हो चाहे युवतियॉं अपने हिस्से का दायित्व निर्वहन बखूबी करें किंतु अपने जीवन की डोर किसी और के हाथों ना सौंपे। अन्याय सहना भी अन्याय करने जितना ही ग़लत है। अपने भीतर छिेपे कला गुणों पर रोशनी डालते रहें। अंधकार का साया  उनपर ना पड़ने दें ।'  
           उसका प्रभावी भाषण सुनकर तालियों की गड़गड़ाहट से सभागृह गुंजने लगा।वक्त का पहिया तेजी से चल रहा था। एकाकी जीवन जीने वाले दो प्राणियों को एक सहयात्री की आवश्यकता थी ताकि जीवन यात्रा सुगम होजाये। खुशियों के फूल खिल  जाए। श्रीधर व भूमि भी एक दूसरे को पसंद करने लगे।समयांतराल  दोनों ने भी जीवन यात्रा साथ साथ गुजारने का तय किया ताकि सफर् आसान बन जाये। जीवन के अंधकार में उम्मीद का नया सूर्योदय हो चला था। 
राजश्री राठी

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