भारतीय मराठी संत

यह लेख उत्तर और दक्षिण भारत की भक्ति परंपराओं, मध्यकालीन साहित्यिक प्रवृत्तियों और मराठी संत साहित्य में स्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका का विश्लेषण करता है। इसमें ज्ञानदेव, कबीर, रामानंद, मीरा, जनाबाई, बहिणाबाई, मुक्ताबाई, भागू और कान्होपात्रा जैसी संत परंपराओं का तुलनात्मक संदर्भ प्रस्तुत किया गया है। लेख विशेष रूप से वारकरी संप्रदाय, विट्ठल भक्ति, स्त्री-अनुभव, श्रम-साधना, सामाजिक समानता और भक्ति की सर्वसुलभता पर केंद्रित है। जनाबाई और मीरा की भक्ति-भावना के माध्यम से दास्य, अधिकार और समर्पण जैसे भावों को समझने का प्रयास किया गया है। साथ ही मराठी संत कवित्रियों के अभंगों में आध्यात्मिक अनुभव, सामाजिक चेतना और भाव-सौंदर्य की विशेषताओं को रेखांकित किया गया है।

Sep 30, 2026 - 13:20
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भारतीय मराठी संत
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हिंदी भाषा नहीं भाव है और यह कहने का कारण हिन्दी भाषाभाषी वृहत् संख्या वाले लोग हैं जो इसे संप्रेषण माध्यम बनाकर अपने भाव प्रकट करते हैं। किसी भी देश अथवा क्षेत्र के लिए उसकी भाषा साहित्य में सर्वोच्च स्थान रखती होगी। भाषा के भाव बनने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल रही होगी। इस जटिलता का सामना हर उस भाषा को करना पड़ा होगा जो भाव बनने का सामर्थ्य रखती हो। साहित्य इन्हीं संचित भावों का पुंज है। संपूर्ण भारतीय साहित्य एक भाव है जो कभी रचनाकार, कभी रचना तो कभी रचना की प्रेरणा का होता है। इन सभी क्षेत्रों की भाषाओं व साहित्य का विकास लगभग और एक प्रकार की प्रवृत्तियों की प्रेरणा पर काम करता हुआ दिखाई देता है। उत्तर भारत, दक्षिण भारत, पश्चिम भारत तथा पूर्व भारत में साहित्यिक तौर पर जो प्रवृत्तिगत बदलाव आते गए उसके पीछे की प्रेरणा एक रही होगी। उदाहरण के लिए मध्यकालीन भारत एक विशेष साहित्यिक प्रवृति का द्योतक है। यह प्रवृति भक्ति के उत्स की थी। (यहां यह बिल्कुल नहीं कहा जा रहा कि यह प्रवृत्ति पहले भारतीय वांग्मय में नहीं रही होगी परंतु जिस विस्फोट के साथ यह फैली वह निश्चित रूप में क्रांति ही कही जा सकती है।) प्रभाकर मचावे जी इस परिवर्तन को बड़े कम शब्दों में कह देते हैं ‘उत्तर भारत की चारों प्रमुख भाषाओं अर्थात् बंगला, हिन्दी, गुजराती और मराठी के साहित्य का इतिहास एक ही-सी रेखा में विकसित हुआ है। आरंभ में वही सिद्ध और निर्गुण संत, फिर वैष्णव भक्ति धारा, राम-कृष्ण चरित पर आश्रित काव्य, फिर एक युग उत्तान श्रृंगार अथवा उग्र वीर-रस से भरी लोक-गीत गाथाओं के रीतिबद्ध काव्य का, फिर अंग्रेजों के आगमन के बाद एक नवजागरण का प्रस्फुटन। आधुनिक काल में भी वही प्रारंभिक विदेशी प्रभाव के प्रति शंकित-चित्त अस्थिरता, फिर घोर अनुकरण; बाद में गांधी प्रेरित राष्ट्रीयता तथा अंत में माक्स-प्रâायड के व्यापक प्रभाव की छाया, पुरानी लीक छोड़कर चलने की छट पटाहट, सभी साहित्य में एक ही-सी वृत्ति लक्षित होती है, एक-दो सदी का अंतर इधर या उधर छोड़ दें-उतना प्रत्येक प्रांत की सामाजिक-सांस्कृतिक जागृति की गति का भेद-मात्र है।’ साहित्य उत्तरोत्तर बदलता गया और यह प्रवृत्तियों का चक्र चलता रहा। 
सम्पूर्ण मध्यकालीन भारत एक विशेष साहित्यिक प्रवृत्ति का द्योतक है। उत्तर, दक्षिण, पूर्व तथा पश्चिम भारतीय क्षेत्र अलग-अलग सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक तथा सामाजिक उथल-पुथल से गुजर रहे थे। सम्पूर्ण विश्व में क्रांति की लहर दौड़ रही थी। पश्चिमी मध्यकाल का समय पांचवीं से पंद्रहवीं शताब्दी तक का माना जाता हैं। चूंकि भारतीय मध्यकाल वही चार सौ वर्ष बाद शुरू होता है और तीन सौ वर्ष आगे तक चलता है। कुछ विद्वानों का कहना है कि भारतीय मध्यकाल पश्चिम से प्रभावित होकर आया है जो कि कालांतर में खारिज कर दिया गया था। मध्यकाल की सबसे विस्फोटक प्रवृत्ति है भक्ति आंदोलन विशेषकर भारतीय संदर्भ में। भक्ति का उदय दक्षिण से मानना ही प्रायः समीचीन जान पड़ता  हैं। इसको फलने - फूलने का अवसर उत्तर भारत में ज्यादा मिला। उतरी संतो ने व्यास शैली को श्रेष्ठ माना तो दक्षिण संतो ने समास शैली को। हालांकि दोनों की तुलना केवल साधना व भक्ति के स्तर पर ही की जा सकती हैं। उत्तरी संतों में कुछ को छोड़कर अधिकतर संत अपने ज्ञानानुभव व जीवनानुभव से रचना करते थे। सही मायने में इन्हें रचना नहीं बल्कि सामाजिक उपदेश ही कहना सही होगा। संतो ने जिस समाज हित का उद्घोष किया वह संपूर्ण भारत में फैल गया था। ‘संत कवियों की रचनाएँ केवल लोकानुरंजन के लिए नहीं बनीं। उनका प्रमुख उद्देश्य ईशस्त्रावन, नाम कीर्तन, नीति उपदेश, धर्म का प्रचार, सदाचार का मार्गदर्शन और अनीति तथा पाखंड का विरोध करना था।’२ साथ ही ‘उनका काव्य आम जनता को ऊपर उठाने वाला था। सामाजिक उन्नति के साथ आध्यात्मिक उन्नति करना उनके काव्य का पवित्र ध्येय था। संत साहित्य मराठी के प्राचीन साहित्य की रीढ़ है।’३ वहीं मराठी संतो का साहित्य विशेष कर पुरुषों का, भारतीय ज्ञान परंपरा से आता हुआ दिखाई देता है। संस्कृत साहित्य से ज्ञान को स्वाभाविक ही निकाल लाये है। उत्तर व दक्षिण संतो में यदि कुछ साम्य था तो वह था गृहस्थ जीवन का स्वीकार्य और साम्प्रदायिक वेशभूषा तथा विडंबनाओं के प्रति तटस्थ भाव। मराठी आलोचक प्रो. गोविंद पुरुषोत्तम देशपांडेय जी लिखते हैं ‘संतो ने अपने अभंगो से सिद्ध कर दिया कि गृहस्थी में रहते हुए भी पवित्र आचरण एवं भक्ति के बल पर परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है।’४ 
इसे उदाहरण से स्पष्ट किया जा सकता है यथा -
ज्यों नैन में पुतली, त्यों मालिक घट माहि।
मूरख लोग न जानही, बाहर ढूंढन जाहि।। 
भाव यह है कि ईश्वर जिसे कबीर मालिक कहते है वह घर में ही हैं। मूर्ख जन ही इन्हें बाहर खोजने जाते हैं। संतों ने समस्त ज्ञान का अर्जन  सांसारिक जीवन में रहकर परंतु उससे विरक्ति से पाया है। संत ज्ञानदेव के अभंगो के वैशिष्ट को भी देखिए जिससे तुलनात्मक तौर पर आप अनुमान लगा पाएंगे -
जगाया थाए राहोंमी।
कर्म करीत जावे आपणी।
आंतरी द्रवोणी हरि स्मरणी।
वन तोचि योगी॥ 
(ज्ञानेश्वरी)
(जो व्यक्ति संसार में रहकर अपने कर्तव्य करता है और भीतर भगवान का स्मरण रखता है, वहीं सच्चा योगी हैं।) उपरोक्त काव्यगत साम्य के बाबजूद हमें यह नहीं मानना चाहिए कि कबीर व ज्ञानदेव एक दूसरे से प्रभावित थे। ऐसा इसलिए भी संभव नहीं हैं क्योंकि ज्ञानदेव का समय कबीर के कुछ पहले पड़ता हैं तथा नामदेव के समक्ष ठहरता है। आचार्य परशुराम  चतुर्वेदी जी का मत ले तो यह बात और स्पष्ट हो जाती है-‘दक्षिण भारत के संतों की परंपरा में जिस प्रकार उक्त ज्ञानदेव आदि के नाम आते हैं। उसी प्रकार उत्तरी भारत की संत परंपरा के अंतर्गत कबीर साहब, रविदास, गुरु नानक, दादूदयाल आदि के नाम लिए जाते हैं। किंतु दक्षिण भारत के संतों में ज्ञानदेव का जीवन काल जहां विक्रम की १४वीं शताब्दी के द्वितीय चरण के कुछ ही आगे तक पड़ता है वहां उत्तर भारत के संत कबीर साहब का जीवनकाल संभवतः उसकी १५वीं शताब्दी के अंतिम चरणों से लेकर १६वीं शताब्दी के प्रथम चरण तक चला जाता है। इस प्रकार पहले कम के संत दूसरे वालों के पूर्ववर्ती सिद्ध होते हैं। फिर भी दोनों परंपराओं के बीच किसी प्रत्यक्ष संबंध का कुछ भी पता नहीं चलता और ना ही ज्ञात होता है कि पहले वाले दूसरे को कहां तक अपना ऋणी ठहरा सकते हैं।’ 
उत्तर व दक्षिण भारतीय भक्ति का सामासिक रूप में अध्ययन करने से भक्तिकालीन प्रवृत्तियों का एक सीधा ढांचा हमारे सामने आता है। जो संपूर्णता में व्यक्त होता है। इसमें से किसी भी  एक पक्ष को छोड़ के बात कहना आधी बात कहना ही है।
उपरोक्त सारी बातें उत्तर व दक्षिण भारतीय संत परम्परा को समझने के लिए आव श्यक थी। आगे की बात दक्षिण भारतीय मराठी संत कवित्रियों की है। उत्तर भारत की संत कवित्रियों मीराबाई, दयाबाई, सहजोबाई आदि का नाम विशेष रूप से आता है। दक्षिण भारतीय मराठी संत कवित्रियों में जनाबाई, बहिणाबाई, मुक्ताबाई आदि का नाम शीर्ष पर है। मराठी में वारकरी संप्रदाय मुख्य रूप से प्रभाव में रहा था। इस संप्रदाय ने बहुत कम समय में निचली जातियों में भक्ति सुलभ करा दी। उच्च जातियों तथा निम्न जातियों के बीच की खाई को पाटने का भरसक प्रयास किया। 
भारतीय मध्यकालीन भक्ति आंदोलन में स्त्रियों की महती भूमिका रही हैं। साहित्य इतिहास लेखन में इस तथ्य को या तो दबाने का प्रयास किया गया है या लिखने की जरूरत नहीं समझी गई होगी। बहरहाल आंशिक तौर पर हम आंडाल और एक्का महादेवी का नाम सुनते हैं।  
एक मुख्य बात जो दोनों ही क्षेत्र की संत महिलाओं में समान रही वह यह की भक्तिभावना का स्वरूप इनमें समान रहा। अपने परमेश्वर 
( परमात्मा) की कल्पना में यह इस तरह रमी थीं कि ईश्वर से एकीकृत हो गई। स्त्री होने की समस्याओं से जूझना तथा उसकी प्रतिक्रिया में एक भयंकर विरोध को जन्म देना इनका ध्येय था। 
भक्ति के मराठी संत महिलाओं ने भक्ति के लिए विट्ठल को चुना । वह विट्ठल जो अपने संगिनी के तौर पर रुक्मणि का चयन करता है। किसी अस्थाई प्रेमिका का नहीं। अपने आराध्य को उन्होंने पति रूप में स्वीकार किया। वह पति जो समस्त बाधाओं से उनकी रक्षा करेगा और उन्हें सम्मान दिलाएगा। पंढरपुर के विठ्ठल का स्वरूप गृहस्थ ईश्वर के रूप में प्रचलित है। जो सखाभाव् रखता है और उनके साथ पारिवारिक जीवन व्यतीत करता है। उनके समस्त गृह कार्य में उनकी मदद करता है।
मराठी संत कवित्रियां श्रम की साधना को श्रेष्ठ मानती है। वारकरी संत नामदेव की गृहदासी के रूप सुख्यात कवयित्री जनाबाई ने अपने ईश्वर विट्ठल को कुछ इसी रूप में देखा है -
झाडलोट करि जनी । केर भीरी चक्रपाणि ।१।
पाटी धेऊनियां शिरी । नेऊनिया ताकि दूरी ।२।
ऐसा भक्तिसी भुलला । नीच कामें करू  लगला ।३।
जनी म्हणे विट्टूबाला । काय उतराई होऊ तुला ।४। 
  समस्त भक्ति साहित्य में इन पंक्तियों का कोई साम्य नहीं हैं। भक्ति की यह सीमा ईश्वर व दास दोनों के लिए उच्चतम सीमा है। कल्पना कीजिए कोई स्त्री झाड़ू लगा रही हो और ईश्वर स्वयं उसकी टोकरी का कूड़ा उठाकर फैंक रहे हो। यह अधिकार भाव से उत्पन्न भक्ति हैं। सहाचर्य भाव जो राधा कृष्ण में था जिसे आचार्य शुक्ल ने श्रेष्ठ भक्ति भाव बताया है इस अभंग को देखने के बाद निम्न लगने लगता है। उत्तर भारतीय संत कवित्रियों में समर्पण भाव की श्रेष्ठता दिखाई देती है। ऐसी क्या परिस्थिति रही होगी  जिसमें एक भक्त स्त्री अधिकार तो दूसरी भक्त स्त्री समर्पण दे रही हो ?  इसके उत्तर की खोज में हमें तत्कालीन स्त्रियों के जीवन व परिस्थितियों का  विश्लेषण करना होगा। जहां जनाबाई एक दासी और निम्न जाति की स्त्री है वहीं मीरा उच्चकुलवधु हैं। दासी अधिकार भाव रखती हो और उच्चकुलवधू समर्पण यह केवल भक्ति में ही संभव है। उच्चकुलवधु मीरा जो तत्कालीन सम्पूर्ण समाज और सत्ता (पितृसता, लोकसत्ता, राजसत्ता ) से  विद्रोह करती हैं। और संत संगति में हो जाती हैं। ईश्वर के प्रति समर्पण कर वह गिरिधर के घर जाने की बात करती है-
मैं गिरिधर के घर जाऊं 
गिरिधर म्हारो साचो प्रीतम देख रूप लुभाऊ 
रैन पड़े तब ही उठ जाऊं, भोर भए उठ आऊ 
रैन दिना वाके संग खेलू, ज्यों त्यों ताहि रिझाऊं 
जो पहरावे जोर पहरू, जो देवे सोए ख़्हाऊ 
मेरी उनकी प्रीत पुरानी, उन बिन चैन न पाऊं
जहां बैठावे तित बैठूं, बेचते तो बिक जाऊं,
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, बार बार बलि जाऊं।  
रामानुजाचार्य भक्ति को सर्वशुलभ कर देने के पक्षधर नहीं थे जिससे समाज में यकायक बदलाव हो जाना संभव नहीं था। परंतु रामानंद के आते ही भक्ति का सर्वत्र विस्तार हो गया। इस विस्तृत भक्ति पर किसी जाति, वर्ग, समुदाय, संप्रदाय का एकाधिकार नहीं था यह सर्व सुलभ थी। स्वयं रामानंद के शिष्यों में जुलाहा कबीर, चर्मकार रविदास, जाट धन्ना आदि शामिल थे। यह प्रवृत्ति रामानंद में कहां से आई होगी यह एक प्रश्न है। बहरहाल दक्षिण भारतीय मराठी संतों में यह प्रवृत्ति बेजोड़ रूप में मिलती है। गणिका कान्होपात्त्रा, महारिन भागू, दासी जनाबाई, भक्त बहिणाबाई आदि इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है। मराठी संत साहित्य में जितना पुरुषों का योगदान है उतना ही स्त्रियों का भी। जब शुक्ल जी यह कहते हैं ‘भक्ति द्राविड़ उपजी लाए रामानंद’ तो यह भक्ति दक्षिण से आई थी यह बात गौरतलब होनी चाहिए। रामानंद जब भक्ति को ला रहे थे तो भक्ति के साथ ही दक्षिण की प्रवृत्तियों को भी लेकर आए होंगे। रामानंद के शिष्यों में पहली बार महिला संत भी दिखाई देती है यह महज़ एक इत्तेफाक नहीं हो सकता। पहले तो भक्ति को सर्वसुलभ बनाना दूसरे स्त्रियों को भी उनमें स्थान देना एक क्रांति है। जो अनुमानतः दक्षिण से ही साथ आई होगी ।
मराठी संत भक्ति साहित्य में इन दोनों प्रवृत्तियों का साम्य दिखाई पड़ता है। एक तो भक्ति  सर्वसुलभ थी। दूसरे स्त्रियों का भी उनमें बराबर योगदान था। चौदहवीं सती की कवयित्री भागू (महारिन) भी विट्ठल की भक्ति करती है। विट्ठल जो विष्णु का ही एक अवतार है। भागों के भक्ति का स्वर भले ही दास्य हो परंतु विष्णु अवतार विट्ठल इस महारिन को भी भक्ति के लिए उपलब्ध था- 
 
       देव आले हो बाहरी। मज नेले खाद्यांवारी।
अर्थात ईश्वर बाहर से आए हैं और मुझे कंधों पर उठा लिया है।  वारकरी संप्रदाय का समाज के सभी स्तरों से होते हुए जनसाधारण तक पहुंचाने की यात्रा का वर्णन भागू की रचनाओं में स्पष्ट देखा जा सकता है। साथ ही उनमें अत्यंत उपेक्षित और पददलित घटकों के आत्मोन्नति करने के आह्वाहन का भी पता चलता है। 
दक्षिण भारतीय भक्ति का विस्तार उत्तर भारतीय भक्ति की तुलना में ज्यादा हुआ था उत्तर भारतीय संत मीरा को भी भक्ति का मार्ग अत्यंत कठिनता और विरोध के पश्चात मिला था। चूंकि दक्षिण भारतीय संतों में गणिका को भी भक्ति सुलभ थी यह कितनी बड़ी बात है।  
कान्होपात्त्रा नामक दक्षिण स्त्री संत पहले मंढ़लवीर की शामा’ नामक गणिका की पुत्री थी। निर्भीक संत कवयित्रियों में उनकी गणना की जानी चाहिए। गणिका के पेशे को छोड़कर इन्होंने विट्ठल भक्ति का मार्ग चुना। जनाबाई और कान्होपात्रा का स्थान मराठी संत कवयित्रियों में उच्च स्थान रखता है। आश्चर्य की बात यह है कि इन सब स्त्रियों में (जनाबाई को छोड़कर) माधुर्य भक्ति का रूप दिखाई नहीं देता है। यह प्रवृत्ति किन परिस्थितियों की वजह से आई होगी यह प्रश्न अनुत्रित है। धर्मपरायणता और एकनिष्ठता ही इनकी मुख्य विशेषता रही है। 
कवित्रियों की इन कविताओं से मराठी साहित्य में आध्यात्मिक अनुभवों की समृद्धि हुई है साथ ही साथ तीव्रतम भाव के आविष्कार भी हुए हैं। रचनाओं की सहजता, भावनाओं की अर्थवत्ता, शब्द योजना की लयबद्धता, भावना की एकरूपता जैसी सभी विशेषताओं का अर्थपूर्ण संगम उनके अभंगों  को भाव माधुर्य प्रदान करता है।
संदर्भ ग्रंथ:-                 
१. माचवे, प्रभाकर (प्रथम संस्करण), मराठी और उसका साहित्य, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली ( पृष्ठ संख्या -१२७) 
२. वही, पृष्ठ संख्या - ३७
३. देशपांडे, प्रो. मी. गो. ( १९५९), मराठी का भक्ति - साहित्य, चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी ( पृष्ठ संख्या - ३८) 
४. वही, पृष्ठ संख्या - ३४) 
५. चतुर्वेदी, आचार्य परशुराम (१९७२), उत्तरी भारत की संत परंपरा, भारती भंडार लीडर  प्रेस, इलाहाबाद 
दीप शिखा

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