"मद्महेश्वर " स्वर्ग की एक झलक

यह यात्रा-वृत्तांत उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित पंचकेदारों में दूसरे केदार मद्महेश्वर महादेव मंदिर की रोमांचक और आध्यात्मिक यात्रा का अनुभव प्रस्तुत करता है। ऊखीमठ से शुरू होकर मनसूना, राउंलेक, रासी, गोंडार, वनतोली, खड्डरा, नानू और मैखंबा जैसे पड़ावों से गुजरती यह कठिन पैदल यात्रा हिमालय की प्राकृतिक सुंदरता, ग्रामीण जीवन और स्थानीय लोगों के संघर्षों से परिचित कराती है। रात के अंधेरे में चंद्रमा की रोशनी के सहारे मंदिर तक पहुँचना, बूढ़ा मद्महेश्वर से दिखाई देने वाले बर्फ से ढके हिमालय के अद्भुत दृश्य और भगवान शिव के नाभि स्वरूप के दर्शन इस यात्रा को अविस्मरणीय बनाते हैं। यह यात्रा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति, कठिन परिश्रम, आत्मानुभूति और जीवन के नए अनुभवों से जुड़ने का अवसर भी है।

Sep 29, 2026 - 12:17
 0  1
"मद्महेश्वर " स्वर्ग की एक झलक
madmaheshwar-mahadev-yatra-yatra-vrittant
मद्महेश्वर महादेव मंदिर पांच केदारों में से दूसरा केदार के रूप में जाने जाते हैं। जो कि उत्तराखंड राज्य के रुद्रप्रयाग जनपद में स्थित है,एवं जहां भगवान शंकर नाभि स्वरूप में विराजमान हैं। उत्तराखंड अपनी सुंदरता सुरम्यता एवं प्रकृति के साथ उम्दा तालमेल के लिए प्रसिद्ध है। यहां के लोग काफी सहज सरल एवं शांत होते हैं,उत्तराखंड अपनी सुंदरता के साथ साथ अपनी संस्कृति विरासत एवं  परिवेश के लिए भी उत्तुंग शिखर पर है, यहां कण कण में रमणीयता बिखरी पड़ी है जहां एक ओर ऊंचे ऊंचे पहाड़ हैं तो कहीं गहरी गहरी नदियां जो तीव्रगामी पथ को परास्त करते हुए बहती है जिसके  निर्मल जल से हर कोई पवित्र होने की कल्पना करता है  मद्महेश्वर मंदिर ऊंची पहाड़ियों के मध्य में स्थित बहुत ही सुंदर मंदिर है  भगवान शिव के मध्य में स्थित उनकी नाभि के कारण पावन स्थल को मद्महेश्वर के रूप में जाना जाता है, बात करें यात्रा मार्ग की तो कुछ ऐसा है पैदल मार्ग, पैदल लगभग १०/१८ किलोमीटर के बीच जबकि मील के पत्थर के हिसाब से १० किलोमीटर है ,मैं अपनी बात करूं या फिर मेरे साथ जाने वाले साथियों के अनुसार भी दूरी लगभग १०/१८ के बीच ही होनी चाहिए। लेकिन यात्रा मार्ग बहुत ही रमणीक है छ फिट चौड़ा पैदल मार्ग है जो मंदिर तक जाता है 
सुन्दर सीढ़ीदार खेतों में बसा ऊखीमठ जो कि अपनी सुंदरता एवं आध्यात्मिक आभास के लिए प्रसिद्ध है। जहां भगवान मद्महेश्वर छ महीने के लिए निवास करते हैं। ऊखीमठ से गाड़ी से हम सभी,गुरुजी सैलानी जो कि हमारे प्रधानाचार्य हैं,अनुज आशु रौथाण,अनुज विनय नेगी (डोडो)उपनाम और स्वयं मैं चलते हैं गाड़ी आशु रौथाण चला रहे थे हम सभी हंसी मजाक करते हुए गाड़ी में जा रहे थे। हमारे साहब बीच बीच में  कुछ गुदगुदाने वाली बातें कर रहे थे,जिससे हंसते हंसते अब तो पेट भी दुखने लग गया था। धीरे धीरे चलते हुए  यात्रा का आनंद लेते हुए, लेकिन सड़कें भी उतनी अच्छी नहीं थी, किंतु ठीक ही  समझो `ना मामा से काणा मामा ही ठीक' ये कहावत सटीक बैठती है। एक बात तो सरकार से कहनी पड़ेगी कि इन सड़कों को ठीक रखना चाहिए ताकि यात्रा में किसी भी प्रकार की रुकावट ना हो।
यात्रा मार्ग  कुछ तरह से है ऊखीमठ शहर के आरंभ से एक सड़क बाईं ओर से जाती है। प्रकृति के  बीच बसे गांव सुंदर एवम् सुंदर खेतों के बीच में बनी सड़कें मन को आनंदित करती हैं। ऊखीमठ के बाद 
 मनसूना गांव अपने आप में बेहद रमणीक है बांज बुरांश के जंगलों के बीच में बसा यह गांव आलू,राजमा,आदि के लिए प्रसिद्ध है यहां के लोग काफी संघर्षशील हैं मनसूना के बाद आगे राउंलेक गांव आता है जिसकी भौगोलिक स्थिति भी मनसूना की भांति है राउंलेक के बाद रासी गांव आता है जो काफी ऊंचाई पर स्थित है जहां आपको राग के जंगल भी दिख जाएंगे,इस गांव में भी राजमा,गेहूं,रागी (मंडुवा) आलू,मार्छू (चौलाई ) आदि फसलें होती हैं रासी गांव में माता रानी का सुंदर एवं पौराणिक कला से निर्मित मंदिर है। वहां से आगे चलने पर आगे अगतोली धार जहां गाड़ी अंतिम स्टैंड है तथा छोटा सा बाजार भी है वहां से आगे पैदल ही चलना पड़ता,वैसे आगे भी सड़क निर्माणाधीन है जो कि गोंडार तक है,गोंडार गांव मधु गंगा तट पर स्थित है बहुत ही सुंदर गांव है, यहां लोगों की आमदनी का साधन पर्यटन,खेती, खेती में आलू रागी (मंडुवा) राजमा बहुत सारी और व्यापारिक फसलें होती हैं। गोंडार से वनतोली तक २.१३२ किमी का पैदल मार्ग है, वनतोली छोटा सा गांव है जो कि मधु गंगा एवं मोर गंगा के संगम पर स्थित है यहां पर कुछ पक्के मकान हैं तथा यात्रियों के लिए टेंट की व्यवस्था है यहां के लोग पर्यटन पर आश्रित हैं इसके अलावा खेती बाड़ी पशुपालन इनका मुख्यकार्य है। वहां से आगे मार्ग धीरे धीरे कठिन होता चला जाता है और हल्की हल्की चढ़ाई भी आरंभ होती जाती है चारों तरफ घास से घिरे रस्ते मन को मुग्ध करते हैं और यात्रा पर चार चांद लगा देते हैं। 
धीरे धीरे हम लोग अब पैदल वनतोली से आगे चल दिए धीरे धीरे आपस में गप्पें लगाते हुए चल रहे थे धीरे धीरे हमारे साहब जो कि चलने में माहिर हैं वो हमसे काफी आगे निकल गए और हम तीनों धीरे धीरे चल रहे थे काफी दूरी तय करने के बाद साहब आराम करते दिखे तो मैने कहा क्या बात आप थक गए तो साहब ने भी थोड़ा मजाकिया भाव में कहां मैं नहीं तक तुम लोग मुझ से भी उम्रदराज हो गए हो तुम्हारी बस की बात नहीं हमने स्वीकार किया और अब कुछ दूरी तक हम सभी साथ साथ चलने लगे। परन्तु साहब की रफ्तार के आगे दो साथी धराशाही हो गए अब मैं और साहब आगे निकल गए वो दो साथी आराम से आ रहे थे। बातों बातों में हम दोनों खड्डरा नामक स्थान पर पहुंच गए जो वनतोली से लगभग १.५५७ किमी के आस पास हैं। वहां पर दो तीन दुकानें थी जहां पर चाय, स्थानीय जूस थोड़ा बहुत खाने का सामान जैसे बिस्किट,नमकीन आदि रखते हैं परन्तु एक बात है सारे लोग जो व्यवसाय कर रहे हैं वो गोंडार के ही हैं। जबकि क्षेत्र बहुत बड़ा है ये बात हजम नहीं हो पाई कि ऐसा क्यों रोजगार के लिए हक हुकूमत की नीति उचित नहीं बाहर के न सही परंतु क्षेत्रीय लोगों को मौका मिलना चाहिए। खैर छोड़िए मैं इस उद्देश्य से नहीं लिख रहा परन्तु जो बात मुझे खली वो लिख दिया। खड्डरा भी बुग्याली क्षेत्र है परन्तु घर बुग्याली नहीं है। खड्डरा से आगे ३.३७५ किमी की दूरी पर स्थित नानू है जहां एक लोक मान्यता है कि वहां पर भगवान शिव के पुत्र गणेश जी का निवास है वहां पर उन्होंने अपना निवास बना लिया था क्योंकि दुर्गम चढ़ाई न चढ़ सकने के कारण वो यहीं रुक गए थे तब से इस स्थान का नाम नानू (गढ़वाली बोली में नानू का तात्पर्य पुत्र होता है) फिर असली यात्रा ओर कठिन यात्रा नानू से है क्योंकि यहां से असली चढ़ाई आरम्भ होती है। हम दोनों नानू से थोड़ी ऊपर पहुंचे तो अब अंधेरा भी हो गया था मैंने साहब से कहा गुरुजी अब उनको भी रुक जाते हैं क्योंकि अब सभी साथ में चलेंगे दूसरी बात  चलकर काफी पसीना आ गया था तो सूखने पर ठंड लगने लग गई लेकिन जैकेट साथी के बैग में था और वो लोग हमसे लगभग २/३ किमी पीछे रहे होंगे अब ठंड से बचने के लिए हम दोनों एक आड़ (ऐसा स्थान जहां पर हवा न आ रही हो) पर बैठ गए और उनका इंतजार करने लग गए लग भाग आधा पौन घंटे के बाद वो भी आ गए सबसे पहले साहब ने अपना जैकेट पहना और उनको भी आराम करने दिया फिर चल दिए मार्ग में खूब चहल-पहल थी यात्री कुछ मंदिर के लिए जा रहे तो कुछ समूह के समूह मंदिर से वापस आ रहे कुछ लोग हमको देख कर दिलासा दे रहे की आराम से जाओ पहुंचने वाले हैं और कुछ लोग मनोबल को गिराने की कोशिश की अभी बहुत दूर है दो तीन घंटे लग जाएंगे। 
खैर हम पर क्या प्रभाव पड़ना था। अब अंधेरा भी काफी हो चुका था परन्तु रास्ता दिख रहा था क्योंकि अब चन्द्रमा की रोशनी भी हमारा साथ दे रही थी।हम धीरे धीरे बढ़ते रहे और अब चारों साथ में चल रहे थे। नानू से मैखंबा की दूरी लगभग ३.३७५ किमी होगी मुताबिक मील के पत्थर के परन्तु दूरी  ज्यादा है मैखंबा नानू की चढ़ाई के बाद का आराम करने के लिए स्थान है वहां पर चाय नाश्ता की व्यवस्था है। हम लोग नहीं रुक पाए क्योंकि काफी अंधेरा हो गया था और जो यात्री थक गए थे वो लोग वहीं रुक गए थे।वहां पर खच्चर वाले भी रहते हैं। हम वहां ना रुककर वह से दो सो मीटर दूरी पर बैठे अब सभी साथी थक चुके थे,परन्तु जाना तो मंदिर में ही था इस लिए हम लोग वहां से चल दिए। वहां के लोगों की एक बात बहुत अच्छी लगी उन लोगों ने पूरे रास्ते भर मोटी मोटी लकड़ियां काट कर रखी थी वो इसलिए जहां तक मेरे विचार से जो यात्री रास्ते में रुके वो आग के सहारे रात को काट सके। उन लोगों द्वारा के कार्य बहुत सराहनीय है मैं इस कार्य की प्रशंसा करता हूं। मैखंबा से आगे की काफी दूरी तय करने के बाद हमें कुछ प्रकाश दिखाई दिया परन्तु काफी दूर सामने की पहाड़ी पर मन बहुत खुश हुआ और हम सब आपस में संवाद करने लग गए कि चलो अब पहुंच गए। थोड़ा ऊर्जा मिली और हम आगे बढ़ने लगे काफी अंधेरा हो गया था और हम चारों में टार्च केवल एक था। फिर भी चल ही रहे थे क्योंकि उच्चावच होने के कारण चन्द्रमा का प्रकाश भी हो रखा था। जहां पर प्रकाश दिख रहा था वहां से कुछ दूरी पर पहुंचने पास हम सब का खुशी के ठिकाना ना रहा लेकिन जैसे वहां पहुंचे वैसे ही आशा निराशा में तब्दील हो गई क्योंकि जिसे हम मंदिर समझ रहे थे वास्तविक रूप से वहां का नाम कून था जहां से लगभग २/३ किमी की दूरी पर मद्महेश्वर जी का मंदिर होगा। जब कून पहुंचकर पता किया तो उन्होंने कहा अभी और आगे है अब हम सब की देह शिथिल पड़ गई और अब तो ऐसा लगा कि अब आगे नहीं जाना है यहीं रुक जाते हैं। इतना ही नहीं,हमारे साहब ने तो बोल भी दिया 
कहीं पर उड्डयार (गुफा) मिले तो वहीं रुक लेंगे लेकिन मैने ओर आशु ने कहा जब नहीं रुकना है और बैठते बैठते हम आगे बढ़ने लगे और धीरे धीरे हमे वो पहाड़ी दिखने लगी जो बर्फ से लबालब थी। जब  बर्फ से लबालब हिमालय दिखा तो अब समझ गए थे कि इससे ऊपर नहीं हो सकता धीरे धीरे निराशा अब आशा में तब्दील होती नजर आ रही थी। सबके चेहरों से थकान की भरी आहट समाप्त होती नजर आ रही थी। तभी सामने छोटे से मोड़ के बाद अचानक सपना पूरा होता दिखा हमें मंदिर परिसर दिखा सभी ने जोर से हर हर महादेव का जयकारा लगाया और आगे बढ़े वहां पहुंचते ही जब घड़ी पर नजर पड़ी तो देखा कि समय १०:३० हो रहा है हम लोगों ने १५/१७ किमी खड़ी पैदल दूरी लगभग ५:३० घंटे में तय कर ली थी। अब पहुंचते ही एक होटल पर रुके और सबसे पहले हाथ पैर धोए और खाना खाया, खाना परोसने तक मैने एक चाय मंगा ली और चाय पी।उसके बाद  सबने  खाना खाया  क्योंकि भूख भी काफी लगी थी खाना खाने के बाद उनसे  एक टेंट रेंट पर लिया  जिसका किराया ४००० रुपया था, थकान काफी थी इसलिए चारों बिस्तर पर लेटते ही सो गए सुबह साहब ने जल्दी उठा लिया था मन तो नहीं था पर उठना पड़ा और सुबह बूढ़ा मद्महेश्वर चले गए वहां का दृश्य बहुत ही सुंदर है क्योंकि ठीक सामने बर्फ से लबालब पहाड़िया नजरों के सामने होती हैं और जब सूर्य का प्रकाश पड़ता है तो सच मानो चांदी जैसी दिखने लग जाती है। हमारे गढ़रत्न श्री नरेंद्र सिंह नेगी जी कहां भी है' हिंवाली कांठी चांदी की वणी गेनी' बूढ़ा मद्महेश्वर मद्महेश्वर मंदिर से लगभग १ किमी की दूरी पर स्थित है, जो सुन्दर सी आधिपत्यका है जहां पर मखमली घास का मैदान है तथा छोटा सा जलाशय है जिसमें हिमालय का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। 
बूढ़ा मद्महेश्वर में मानो ऐसा लगता है जैसे हिमालय आपसे आपका कुशलक्षेम पूछ रहा हो यानि बहुत ही पास में,बूढ़ा मद्महेश्वर के दर्शन के बाद हमने मद्महेश्वर मंदिर के दर्शन किए जिनके दर्शन करने से मन को असीम शांति मिली कुछ समय ध्यान में रहने के बाद प्रभु आशुतोष जी के नाभि स्वरूप के दर्शन किए तथा वापस आने लगे और लगभग ४ घंटे पैदल चल कर वापस अपनी गाड़ी तक पहुंच गए। बहुत ही सुखद रही यात्रा जिसमें बहुत कुछ देखने को मिला, प्रकृति से सीखने को मिला,उस क्षेत्र के लोगों के संघर्ष भरे जीवन के बारे में देखा, मानो वो एक नई दुनियां हो ऐसा आभास हुआ, उनके चेहरे की रौनक उनका परिश्रम सड़कों पर बैठे तपती जून माह की गर्मी में भी सूखे कंठों से पर दूसरों के कंठों को तृप्त करती बालाएं ये उनकी आवश्यकता थी। परंतु बहुत ही उम्दा रही यात्रा आप लोग भी महादेव के दर्शन करने आ सकते हो यात्रा का परम अर्थ यही है कि स्वयं को कष्ट देकर प्रभु दर्शन करना यही सफल यात्रा है।  
 यात्रा जीवन में कई बदलाव लाती है क्योंकि यात्रा हमें नए अनुभवों से परिचित कराती है। 
कैलाश चंद्र उप्रेती "कोमल"

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0