आज अवधेश की तेरहवीं थी। हिंदू धर्म की मान्यता है कि तेरहवीं की क्रिया के पश्चात मरे हुए व्यक्ति की आत्मा को शांति मिलती है। रूपा, अवधेश की तस्वीर पर माला चढ़ाकर घी के दीए जला रही थी। इस रस्म को पूरा करते हुए रूपा जोर-जोर से रोए जा रही थी। मोहल्ले के लोग भी वहीं खड़े थे। कोई कह रहा था कि बेचारी पति के मरने के बाद कितनी निराश हो गई है, कितना बिलख-बिलख कर रो रही है। सबकी बातों को सुनकर रूपा की हिचकियां और भी तेज हो गई। उसके मन में विचारों की आंधी चलने लगी। उसका मन कर रहा था कि वह अपने दिल के टुकड़े-टुकड़े कर दे। सारी दुनिया के सामने चिल्ला-चिल्ला कर कहे कि उसने कितना बड़ा अपराध किया है, उसकी गलती तो क्षमा करने के योग्य भी नहीं है। वह किस प्रकार से पश्चाताप करे? उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था की वह क्या करे और कहां जाए... यह सब बातें सोचते-सोचते वह ज़मीन पर आंखें मूँद कर बैठ गई। उसके मन में उसका अतीत एक प्रतिछाया की तरह उसकी आँखों के सामने चलने लगा।
रूपा का जन्म ठाकुर परिवार में हुआ था। उसके पिता ज्ञानेंद्र सिंह ठाकुर अपने इलाके के दबंग एवं रसूखदार व्यक्ति थे। पूरे इलाके में उनका दबदबा था। रूपा पांच भाइयों में एकलौती बहन थी। अपने घर में वह एक राजकुमारी की तरह रहती थी। उसके मुंह से कोई बात पूरी तरह निकल भी नहीं पाती कि उसकी इच्छा पूरी हो जाती थी। इस तरह अत्यधिक दुलार से उसका लालन-पालन हुआ था। अधिक प्यार-दुलार की वजह से रूपा अभिमानी हो गई थी। अपने सामने वह किसी को कुछ भी नहीं समझती थी। उसके अंदर अहंकार कूट-कूट कर भरा हुआ था। समय बीतने के साथ-साथ रूप बड़ी होती गई। उसके साथ-साथ उसका अहंकार भी बढ़ता गया। उसने इंटरमीडिएट और बीए की पढ़ाई पास कर ली। उसके माता-पिता को उसके विवाह की चिंता होने लगी। वे सोच रहे थे कि जितनी जल्दी हो सके रूपा के हाथ पीले कर दिए जाएं। रूपा के लिए वर की तलाश का काम जोर-शोर से आरंभ कर दिया गया। पाँच-छः महीने के बाद ठाकुर साहब को एक रिश्ता पसंद आ गया। लड़के के पिता रेलवे में अधिकारी थे। जमीन-जायदाद तो अधिक न थी परंतु बहुत कम भी न थी। इतनी थी कि चार-पांच लोगों का गुजारा सरलता पूर्वक हो जाए सबसे अच्छी बात तो यह थी कि लड़का इकलौता था। वह होम्योपैथ में डाक्टरी की पढ़ाई कर रहा था। साल दो साल के बाद लड़का होम्योपैथिक का डॉक्टर बन जाएगा और लड़का शरीफ था देखने में सामान्य था यही बात ठाकुर साहब को पसंद आ गई। इस रिश्ते की बात ठाकुर साहब ने ठकुराइन को बताया तो उनको भी यह रिश्ता पसंद आया। वो भी रूपा के स्वभाव से अपरिचित न थी जैसा उनकी बेटी का स्वभाव था, उसके लिए इकलौता और सीधा-साधा लड़का ही सही रहेगा, यही बात सोच कर उन्होंने विवाह के लिए स्वीकृति दे दी। सबकी सहमति से रूपा का विवाह तय कर दिया गया।
जैसे-जैसे विवाह की तारीख पास आती गई रूपा के सपनों को पंख लगते गए। लड़का कैसा है उसकी लंबाई कितनी होगी, काला होगा या गोरा होगा? ऐसे अनेक सवाल उसके मन में चलते रहते। मेरा पति मुझे बहुत प्यार करे, मेरा ख्याल रखे, विवाह के बाद हम लोग घूमने के लिए दूसरे देश में जाएं। ऐसे बहुत सारे सपने वो दिल में सजाती रहती और उन सुनहरे सपनों में हमेशा खोई रहती। देखते-देखते रूप की शादी हो गई। अपने सुनहरे सपनों के साथ रूपा अपने बाबा का घर छोड़कर ससुराल आ गई। ससुराल में रूपा का पहला दिन था, वह अपने को और असहज महसूस कर रही थी क्योंकि उसके घर जैसा वहां पर कुछ भी ना था, ना तो माहौल और ना ही सुख सुविधा की चीज़ें। रूपा के ससुराल में आते ही उसकी सास ने दुनिया भर की रस्मों-रिवाजों को पूरा करवाया और रूपा को ढेर सारी हिदायतें भी सुनने को मिल रही थी। उसे यह सब अच्छा नहीं लग रहा था। अपनी सास के ऊपर उसे खीझ और झल्लाहट दोनों हो रही थी। वह तो बस एक ही बात सोचे जा रही थी कि कब रात हो और वह अपने पति को देखे? कब उनसे बात करे क्योंकि विवाह के समय भी वह अपने पति को ठीक से देखा नहीं पाई थी। रूपा के ससुराल वालों का कहना था कि पूरी शादी घूंघट में होगी और लड़की घूंघट में ही ससुराल जाएगी। इस घूंघट की वजह से रूपा अपने पति अवधेश का मुख दर्शन नहीं कर पाई थी। पति के बारे में सोचते हुए रूपा अपनी सास के बारे में सोचने लगी। देखने में उसे अपनी सास उजड्ड-गँवार सी लगी। सर पर पल्लू हाथों में भारी-भारी चूड़ियां और पैरों में मोटे से पायल, ऐसे भी कोई सजता-सँवरता है? इस उम्र में भी इतना सज कर रहा जाता है और बातें भी कैसे कर रही थी बिल्कुल जाहिलों की तरह।
अपनी सास के बारे में रूपा के विचार अच्छे न थे। खैर उसे क्या कितना दिन उसे यहां रहना ही है, वह तो अपने पति के साथ शहर चली जाएगी। यह बातें सोचते हुए उसकी नजर छत की तरफ गई। उसकी नज़रें चारों तरफ का जायजा लेने लगी थी।
मिट्टी का घर था, कमरे में साज सज्जा की कोई भी वस्तु न थी, सामान के नाम पर कमरे में एक पलंग, टेबल और टेबल से लगी हुई एक पुरानी सी कुर्सी थी। दरवाजा और खिड़कियों पर मोटे कपड़े के पर्दे थे। बिजली का कहीं कोई प्रबंध न था। सब ले देकर उसे यह समझ में आया कि यहां के लोग काफी पुराने विचार और पुराने ख्याल के हैं आधुनिकता से इनका कोई लेना देना नहीं है। इन सारी वस्तुओं की तुलना वह अपने पिता के घर की वस्तुओं से करने लगी दोनों में जमीन-आसमान का अंतर था। रूपा को ऐसा लग रहा था कि वह राजमहल छोड़कर झोपड़ी में आ गई है। जो उत्साह विवाह के पहले था वह अब कम हो गया। वह अपने को ढाढस बँधाती रही कि कम से कम उसका पति डॉक्टर तो मिला है। इन सब विचारों के बाद उसने यह दृढ़ निश्चय कर लिया कि वह अपने पति के साथ शहर में ही रहेगी।
जैसे-जैसे दिन ढल रहा था रूपा के विचार शांत और उदास होते गए। सुहाग सेज पर बैठी रूपा विचारों के भंवरजाल में उलझी हुई थी तभी दरवाजा खुलने की आवाज आई। उसने नज़र उठा कर देखा तो सामने उसके पति अवधेश खड़े थे। उनको देख कर रूपा के सपने धराशायी हो गए। अपने सपने में तो वह एक राजकुमार को देखती आ रही थी लेकिन उसके सामने तो एक साधारण सा व्यक्ति खड़ा था। जिसके नैन-नक्श साधारण थे, सामान्य कद और रंग सांवला था जो वस्त्र पहने थे वह भी उनपे जंच नहीं रहे थे। देखने में ऐसा लग रहा था कि किसी दूसरे का मांग कर पहना दिया गया हो।
रूपा को बहुत दुख हुआ कि उसका सपना धूल धूसरित हो गया है। उसे लगा वह ठगी गई है। घर भी झोपड़ी और पति भी साधारण। धीरे-धीरे एक-एक दिन बीतने लगे प्रतिदिन रूपा के अंदर कुछ टूटता गया क्योंकि जो सपना व सजाए थी उसका एक हिस्सा भी पूरा नहीं हुआ उसके सपने, सपने ही रह गए। शादी के एक दो हफ्तों के बाद रूपा को पता चला कि वह शहर में नहीं बल्कि गांव में ही रहेंगी। बातों ही बातों में उसने अपने पति से शहर चलने के लिए कहा परन्तु उसके पति ने मना कर दिया उन्होंने कहा कि तुम यहीं पर रहकर माँ पिताजी की सेवा करो मैं शहर में रहूँगा यह बात सुनकर रूपा चुप हो गई यह बात उसके लिए किसी कुठराघात से कम न थी।
एक महीने के बाद रूपा का पति उसे गांव में छोड़कर खुद शहर वापस चला गया। अपने सपनों को टूटता देख कर रूपा अपने ऊपर नियंत्रण न रख सकी। उसका आक्रोश दिन प्रतिदिन बढ़ता ही गया जिसका कोई अंत न था। रूपा अभिमानी तो थी ही, अब वह उदंड भी हो गई। वह छोटे बड़े का भी सम्मान करना भूल गई। वह किसी की भी बात न सुनती, अपनी मनमानी करती रहती। जब उसके मन में आता वह मायके चली जाती। वहाँ से अपने भोग विलास की वस्तुएं उठा लाती थी। इस तरह से उसके कुछ दिन आराम से कट जाते थे। हर समय अपने मायके वालों की प्रशंसा के पुल बांधती रहती। और अपनी सास को खरी-खोटी सुनाने के बाद रुपा को कुछ घंटे के लिए सुकून मिलता।
देखते-देखते शादी के दो साल बीत गए। अवधेश की डॉक्टरी पूरी हो गई। अवधेश कुछ दिन शहर में रहकर प्रैक्टिस करना चाहता था उसके पिता ने उसको इजाजत दे दी। अवधेश एक साल शहर में रहकर प्रैक्टिस करता रहा, फिर भी एक सफल डॉक्टर नहीं बन पाया। उसके खर्च के लिए घर से रुपये पैसे भेजे जाते। उसकी इस अवस्था को रूपा नहीं समझती, वह तो बस शहर में रहने की जिद करती। अवधेश उसे समझाकर थक चुका था कि वह खुद का घर खर्च ही नहीं निकाल पाता तो फिर उसको कैसे अपने साथ रखे। यह बात रूपा समझ के भी समझना नहीं चाहती। उसे तो बस शहर घूमना था शहर में रहना था। रूपा के ससुर को इस बात का पता चला तो उन्होंने सख्ती से रूपा को भेजने से मना कर दिया जिससे रूपा और भी उखड़ गई।
रूपा के ऊपर किसी भी बात और प्यार का कोई भी असर ना होता। उसने घर को एक रणक्षेत्र बना दिया था। अवधेश की माँ चुपचाप रूपा के ताने सुनती और रोती रहती अवधेश और उसके पिता से कुछ नहीं कहती यह सब अवधेश समझ रहा था उसे भी लग रहा था कि घर, घर न रहकर एक कुरुक्षेत्र बन गया है लेकिन अपने शांत स्वभाव के कारण वह रूपा पर नियंत्रण न कर सका वह क्या बोलता क्या समझाता उसे तो रूपा कुछ समझती ही नहीं थी।
समय का पहिया चलता रहा और अवधेश तीन बच्चों उसका पिता बना दो लड़कियां और एक लड़का। घर के खर्च अब और बढ़ गए। किसी तरह से सबका गुज़ारा चल रहा था। दिन महीने और साल बीतते गए बच्चे धीरे-धीरे बड़े होते गए। बेटा दसवीं में बड़ी बेटी सातवीं में और छोटी बेटी ४ साल की थी। होली के त्योहार पर अवधेश घर आया था पिता ने उससे कहा बेटा अब तुम गांव ही आ जाओ तुमको देने के लिए मेरे पास पैसे नहीं बचते हैं गांव आकर खेती बाड़ी संभाल लो हमसे अब नहीं हो रहा, जो भी डॉक्टरी करनी है गांव में ही करो इससे शायद दो पैसे बच जाएंगे घर के खर्च चलाने में आसानी होगी। अपने पिता की यह बात सुनकर अवधेश को तो बुरा लगा फिर भी वह पिता की स्थिति समझ रहा था।
अवधेश शहर बोरिया-बिस्तर समेटकर गांव आ गया और गांव में ही एक छोटा सा क्लिनिक खोल दिया, क्लिनिक भी चला लेता था और खेती का भी थोड़ा काम कर लेता, इसका परिणाम यह हुआ है कि रूपा के क्रोध का भाजन अब सबको बनना पड़ता था। घर पर रूपा का नियंत्रण हो चुका था वह रुपए पैसे की मालकिन बन बैठी थी। हर काम उससे पूछ कर ही किया जाता, सास को तो उसने नौकरानी बना दिया था, चूल्हा-चौका और सारा काम सास से करवाती, उसका गुस्सा ज्यादातर अवधेश के ऊपर ही उतरता। कभी वो अपने पति को खाना देती और कभी कुत्तों की तरह दुत्कार देती। रूपा के उग्र स्वभाव के कारण सब लोग चुप रहने में ही अपनी भलाई समझते। गाँव में एलोपैथिक क्लीनिक खुल जाने से अवधेश की क्लिनिक लगभग बंद होने की कगार पर आ गई जिसका परिणाम यह हुआ कि घर में उसकी की स्थिति नौकरों से भी बदतर हो गई। दिन भर खेत में काम करता लेकिन खाना कभी भी ढंग से न मिलता। अवधेश की माँ चोरी-छिपे अवधेश को खाना खिला देती रूपा को जब इस बात का पता चलता तो अपने सास को खूब सुनाती। एक माँ अपने बेटे को कैसे भूखा रहने देती, एक माँ तो माँ होती है। कभी-कभी तो रूपा अवधेश को एक दो दिन का बाद ही खाना देती क्योंकि रूपा को यह लगता था कि फेंकने से तो अच्छा है की यह खाना अवधेश को दे दिया जाए। अपने शांत स्वभाव के कारण अवधेश कुछ नहीं बोलता। इस तरह से रूपा अवधेश को सजा देती उसका अपमान करना झड़कना खरी-खोटी सुनाना और उसे खाना न देना यह रूपा आम हथियार थे जो अपने ही घर में अपने ही पति के ऊपर आजमाती थी।
समय चलता रहा अवधेश के माता-पिता गुजर गए, बच्चे अब बड़े हो गए थे। लड़का खेती में हाथ बंटाता बड़ी लड़की की शादी रूपा की माँ पिताजी ने ही करा दी थी। छोटी बेटी इंटरमीडिएट में थी रूपा के व्यवहार को देखकर उसके बच्चे भी अपने पिता को एक नौकर ही समझते। अवधेश की स्थिति और भी दयनीय हो गयी। जब तक अवधेश की माँ जिंदा थी अवधेश को रूखा सूखा मिल जाता था पर अब तो कोई पूछने वाला ही न था बीमार होता तो बिना दवा दारू के ही पड़ा रहता। दिन प्रति दिन और देश का स्वास्थ्य गिरता गया वह बीमार रहने लगा। सुबह उठकर किसी तरह से खेत पर जाता और शाम को लौटकर आता, कभी किसी से खाना मिल जाता कभी नहीं मिलता। इसका परिणाम यह हुआ है कि उसने चारपाई पकड़ ली परन्तु घर में इससे किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
अवधेश को बिस्तर पकड़े हुए एक हफ्ते से ऊपर हो गए थे सिर दर्द के मारे फटा जा रहा था, शरीर ऐंठा जा रहा था और पेट में कुलबुला हट हो रही थी बहुत जोरों से भूख लगी थी उसे कुछ अच्छा खाने का मन हो रहा था लेकिन उसे देता कौन उसकी माँ तो थी नहीं जो छुपा छुपा कर ला कर खिलाती, माँ की याद आते ही उसे भूख और जोरों से लग गयी ,उसे एहसास होने लगा है उसने दो दिन से खाना ही नहीं खाया है। भूख का एहसास तेज होने पर वह धीरे-धीरे उठकर अपने पड़ोसी के घर खाना मांगने जा रहा था की रास्ते में उसे चक्कर आने लगा और वह वहीं पर गिर गया। चिल्ला-चिल्ला कर आवाज दे रहा था पर उसके गले से आवाज निकल ही नहीं रही थी। अवधेश बेहोश होकर वहीं पर गिर गया, रास्ते में आते-जाते लोगों ने देखा तो उसे उठाकर घर ले आए। आनन-फानन में मोहल्लों वालों ने आपस में निर्णय लिया कि किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाते हैं और अवधेश के घर पर खबर कर दी गई उसका लड़का आया गया। डॉक्टर के यहाँ ले जाते हुए अवधेश ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। शायद भूख की प्रचंड ज्वाला अवधेश को निगल गई थी।
अपने पति के मरने के बाद रूपा को यह अहसास हो रहा था कि वो कितनी गलत थी वह क्या कर गई उसने कितना बड़ा अपराध किया है जिंदा रहने पे उसको कुछ न समझ में आया अब मरने के बाद घी के दिये जला रही है।आज वह सोच रही थी कि उसने क्यों नहीं अवधेश को स्वीकार किया वह बस इसलिए हमेशा उसकी उपेक्षा का पात्र बना रहा की उसका व्यक्तित्व साधारण था इसमें उसकी क्या गलती थी जिसकी सजा अवधेश को मिली वह सोच रही थी की क्या उसकी गलती थी कुसूर तो उसके पिता का था जो अपनी अभिमानी बेटी की शादी एक सीधे सरल आदमी से करा दी थी। सबसे बड़ी ख़ुदगर्ज़ तो वह खुद थी जो अपने सपने और अपनी महत्वाकांक्षा पर नियंत्रण न कर सकी, हे भगवान मुझे कभी माफ ना करना।
अर्चना राय