आयुर्वेदिक एक्यूप्रेशर के जनक जे.पी. अग्रवाल से संवाद
श्री जे.पी. अग्रवाल के इस साक्षात्कार में एक्यूप्रेशर, आयुर्वेद और समग्र चिकित्सा पद्धति पर उनके अनुभव, शोध और समाज सेवा के संकल्प का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत है।
जे.पी. अग्रवाल (अध्यक्ष, एक्यूप्रेशर शोध प्रशिक्षण एवं उपचार संस्थान, प्रयागराज) मूल रूप से बेरी तहसील, रोहतक, हरियाणा के निवासी हैं। ३० अप्रैल, १९५४ में जन्मे श्री अग्रवाल जी पूर्व मेम्बर ट्रिब्यूनल वाणिज्य कर, इलाहाबाद के शीर्षस्थ पद से सेवानिवृत्त हैं। अपने जीवन के अनुभवों से सीख लेकर आपने एक्यूप्रेशर उपचार के माध्यम से लोगों की सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। भारत एवं विदेशों में भी आपको आयुर्वेदिक एक्यूप्रेशर के जनक के रूप में ख्याति प्राप्त है।तीस वर्षों से एक्यूप्रेशर उपचार के माध्यम से लाखों लोगों को रोग मुक्त जीवन देने के साथ ही अब तक आपकी ५० से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन एक्यूप्रेशर शोध प्रशिक्षण एवं उपचार संस्थान प्रयागराज के माध्यम से हो चुका है। एक्यूप्रेशर संस्थान के अध्यक्ष श्री जे.पी. अग्रवाल जी से बातचीत के कुछ अंश......
आप लम्बे समय से एक्यूप्रेशर के प्रति समर्पित हैं। आपका रूझान इस तरफ कैसे हुआ?
तीस वर्ष पहले आदरणीय देवेन्द्र बोरा जी का मुम्बई से आगमन हुआ, तब हमारा परिचय एक्यूप्रेशर से हुआ। उस समय मेरी धर्मपत्नी का स्वास्थ्य चिंताजनक था। वो पूरी तरह से ऑक्सीजन पर थीं। उस वक्त ऐसी किसी अनोखी विधा की खोज थी जो कुछ राहत पहुँचा सके। ऐसे में एक्यूप्रेशर का प्रयोग स्व. मोतीलाल बोरा जी के निर्देशन में आरम्भ किया गया। पहले सप्ताह में ही ८ घंटे और फिर १ माह होते-होते ऑक्सीजन सपोर्ट के बिना भी उनका रहना संभव होने लगा। यह मेरे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। अपने जीवन के ऐसे ही अनुभवों से प्रेरित होकर शहर के मध्य स्थित `मारवाड़ी धर्मशाला' में प्रशिक्षण और उपचार का सिलसिला शुरू हुआ। विश्वभर के एक्यूप्रेशर साहित्य का अध्ययन एवं अनुवाद का कार्य और फिर व एक्यूप्रेशर के प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया। जिसमें कोरिया से सर पार्क जे.वू. से हम और हमारे साथियों ने गहन प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके साथ ही कलकत्ता के मोती लाल शाह से भी प्रारंभिक प्रशिक्षण प्राप्त किए। धीरे-धीरे यह सिलसिला चल पड़ा। यह आरम्भ एक्यूप्रेशर शोध, प्रशिक्षण एवं उपचार संस्थान के रूप में आज आप सबके सामने है।
आरम्भिक दौर में इसकी नींव डालने वाले लोगों में आपके साथ कौन-कौन नाम शामिल रहे?
पहला नाम में बहुत आदर से लेना चाहूँगा, वो हैं हमारे प्रेरणा स्रोत एवं सर्वकालीन अध्यक्ष श्रद्धेय माता प्रसाद खेमका जी, फिर श्री श्याम सुन्दर सराफ जी, श्री एस. पी. सिंह, कु. पारूल अग्रवाल, स्वर्गीय के. सी. गोयल, स्वर्गीय एस. सी. डी. गोयल, श्री एस.पी. केसरवानी, एम के मिड्ढा, दिलीप गोयल, सुमन खेमका, आलोक कमलिया, ए. के. द्विवेदी, एम. बी. त्रिपाठी, संगीता बर्मन, नीरज गुप्ता ये वो नाम हैं जिन्होंने इस संस्था के नींव के पत्थर की भूमिका निभाई।
सतही ज्ञान से इतना बड़ा कार्य संभव नहीं था। इसकी गहराई में जाने के लिए आपने कैसे और क्या प्रयास किया?
जैसा कि मैंने पहले भी बताया कि विश्व भर के हर भाषा में मौजूद एक्यूप्रेशर साहित्य के संकलन, अध्ययन और अनुवाद के पश्चात् उसका प्रयोग करना, परिणाम को परखना और तत्पश्चात् उसे सरल भाषा में अपने भारतीय संस्करण के रूप में प्रस्तुत करना, यह क्रम रहा एक्यूप्रेशर को आधार प्रदान करने के लिए। यह सब कुछ श्रद्धेय खेमका जी के नेतृत्व में आरम्भ किया गया। जब संस्थान की स्थापना के बाद एक्यूप्रेशर साहित्य का लेखन और प्रकाशन आरम्भ हुआ तो संस्थान की पहली पुस्तक `आत्मज्ञान दीपिका' के रूप में सामने आई। यह पुस्तक हम सभी के संकल्प और प्रबल इच्छा शक्ति का परिणाम थी। जो हमारे साथियों के शोध का परिणाम स्वरूप प्रकाशित हुई।
सर, हम सभी आपको आयुर्वेदिक एक्यूप्रेशर के जनक के रूप में जानते हैं। कृपया आप यह बताएँ कि एक्यूप्रेशर में आखिर आयुर्वेद है क्या?
आयुर्वेद के जनक वास्तव में परमपिता हैं, ब्रह्मा जी हैं। हम जब एक्यूप्रेशर उपचार के लिए अध्ययन कर रहे थे तो आयुर्वेद यानि `आयु का विज्ञान’ यह सूत्र काफी रोचक लगा। हमारी शोध समिति ने अध्ययन करना आरम्भ किया तो आयुर्वेद के ग्रंथों में जगह-जगह वो सूत्र मिले जो कि एक्यूप्रेशर को सैद्धान्तिक और प्रायोगिक तौर पर पुष्ट करते हैं और युगों से स्वास्थ्य के लिए इसकी आवश्यकता को स्वीकार करते हैं। उन्हीं सिद्धान्तों, और सूत्रों को हमने आयुर्वेदिक एक्यूप्रेशर का आधार बनाया, आयुर्वेद में मौजूद वात, पित्त, कफ का सिद्धान्त बारीकी से समझा, जाना और फिर उसे अपने उपचार प्रबन्धों में खुलकर प्रयोग किया। लोगों को लाभ मिला तो भीड़ बढ़ती गयी। चरक संहिता, सुश्रत संहिता सहित कई ग्रंथ पढ़े, संस्कृत का पठन-पाठन कुछ कठिन था लेकिन रूचिकर रहा। जिसके परिणाम आज हम सबके सामने नजर आ रहे हैं। हमें यह कहते हुए गर्व हो रहा है कि हमारे ऋषियों, पूर्वजों ने हमारे ग्रंथों में स्वास्थ्य रक्षा हेतु जो आयुर्वेद के सूत्र दिए है वो अनमोल है।
शोध प्रकोष्ठ के मुखिया के रूप में आपसे जानना चाहती हूं कि आपके शोध का क्या आधार है और आप इस उपचार विधा को कितना सफल मानते है।
शोध का हमारा आधार हमारा होलिस्टिक एप्रोच है ऐसा मैं मानता हूँ। हमारी विधा में शरीर के प्रत्येक अंग और उससे जुड़ी व्याधियां एक ही स्थान पर एक साथ देखी, समझी जाती हैं और उनव्ाâा एक साथ उपचार होता है। क्योंकि हम मानते हैं कि शरीर का हर अंग और अवयव एक दूसरे के पूरक हैं, एक दूसरे के पोषक हैं, इसीलिए एक के बिना दूसरे का उपचार कई बार हमें पूर्णत: स्वास्थ्य लाभ नहीं दे पाते। अतः `सिंगल विंडो ट्रीटमेन्ट' हमारे शोध का आधार हैं ऐसा मैं मानता हूँ और इसके परिणाम भी बेहद उत्साहवर्धक मिल रहे हैं।
आधुनिक चिकित्सा के साथ आप कैसे तालमेल बिठा पाते हैं और इस विधा को आप वैज्ञानिक कैसे कह सकते हैं?
जर्मनी के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. वॉल ने सभी एक्यू बिन्दुओं और मेरीडियन को 'डर्माट्रोन' नामक उपकरण से और सभी आधुनिक एवं वैज्ञानिक कसौटियों पर जाँचा परखा और पुष्ट किया। ये पूर्व की बात हैं, मैं आपको बताना चाहता हूँ कि इस समय अपने-अपने क्षेत्रों के कई नामचीन चिकित्सक हमारे तकनीकि सहयोगी है, जो हमारे साथ हमेशा मार्गदर्शक के रूप में खड़े हैं। पिछले तीन दशक में जिनसे सबसे अधिक प्रोत्साहन हमें मिला स्व. डॉ. जीसी अग्रवाल को हम नमन करते हैं, जिन्होंने हमें वैज्ञानिक धरातल पर चलने की सीख दी।
आपका संस्थान कई प्रकार के रेगुलर कोर्स, और पत्राचार कोर्स आदि संचालित करता है, एक सामान्य व्यक्ति इससे कैसे जुड़ सकता है?
जी हाँ प्रशिक्षण हमारे संकल्प का प्रमुख भाग है। क्योंकि हमें इसी माध्यम से हम मजबूत एक्यू सेना तैयार कर सकते है और घर घर यह ज्ञान पहुंचा सकते हैं। तीन स्तर पर हमारे प्रशिक्षण चल रहे हैं। पहला जनजागरण दूसरा बेसिक प्रशिक्षण जो कि संस्थान कराता रहता हैं। तीसरा और सबसे प्रमुख है हमारे महाविद्यालय 'माता प्रसाद खेमका एक्यूप्रेशर महाविद्यालय' द्वारा संचालित ६ माह के सर्टिफिकेट से लेकर १० सेमेस्टर तक के एडवांस कोर्स से सभी कोर्स ऑनलाइन एवं ऑफलाइन दोनों माध्यमों से संचालित लिए जाते हैं। यह विधा सरल हैं अत: हाईस्कूल किए हुए व्यक्ति `बेसिक प्रशिक्षण प्राप्त' कर सकते हैं और तत्पश्चात् सभी कोर्स के लिए रास्ते खुल जाते हैं।
मान्यता की प्रक्रिया जटिल है लेकिन आवश्यक है। इस विषय में आप क्या कहेंगे?
प्रक्रिया जटिल है लेकिन हमारे प्रयास जारी हैं। जनस्वीकृति हमें लगातार मिल रही हैं जो मुझे अधिक आवश्यक लगता है। एक लाभार्थी दूसरे और तीसरे को लेकर आता है। यह सिलसिला चलता रहता है। सरकारी मान्यता के बगैर भी औषधिविहीन समाज की दिशा में हमारी मान्यता पक्की है। यही वजह है कि अमेरिका दुबई, जर्मनी, स्वीडन सहित तमाम देशों से भी लोग हमारे साथ आ रहे हैं।
एक्यूप्रेशर के साहित्य/पुस्तकों का प्रकाशन आपने बड़ी संख्या में किया हैं। इसका आधार क्या है?
नि:सन्देह इसमें विश्व एक्यूप्रेशर साहित्य का अध्ययन और इस विधा द्वारा किए गए उपचार परिणाम ही इसका आधार हैं।
सामान्य जन को क्या संदेश देना चाहेंगे?
मैं चाहता हूँ हर परिवार में एक व्यक्ति एक्यूप्रेशर उपचारक अवश्य हो। इसके लिए संस्थान के द्वारा जनजागरण कार्यक्रम चलाए जाते है। कई स्तर पर कई लोगों को प्रशिक्षण दिया जाता है। भारत के आखिरी व्यक्ति तक स्वास्थ्य लाभ पहुँचाना हमारा संकल्प है और इस दिशा में हम सतत् क्रियाशील हैं।
आप ०-९ की बात करते हैं। क्या आप ऐसे दस नाम लेना चाहेंगे जो आप के शोध कार्य में सक्रिय हैं?
हमारे समर्पित साथियों को हम संख्या में नहीं बांध सकते। अगर हम कुछ चुनिंदा नाम लेना चाहें तो उनमें हैं - राम कुमार शर्मा, प्रभात वर्मा, आलोक कमलिया, रमोला मदनानी, विशाल जायसवाल, राजेश वर्मा, सीमा सेठ, सुनील मिश्रा, अभय त्रिपाठी, अनिल सिंह, अनिल नैना सिंह, ए.के. द्विवेदी, अर्चना त्रिवेदी, अनिल शुक्ला, रश्मि अग्रवाल और भी कई नाम है जो इस राह में हमारे साथी है।
उर्वशी उपाध्याय
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