औक़ात

यह कहानी ‘कमला’ के जीवन संघर्ष और आत्मसम्मान की यात्रा को दर्शाती है। एक प्रतिभाशाली और शिक्षित महिला, जो विवाह और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण अपने सपनों को पीछे छोड़ देती है, लेकिन एक अपमानजनक घटना उसे अपने अस्तित्व और पहचान के लिए खड़े होने की प्रेरणा देती है। अंततः अपने लेखन के माध्यम से वह समाज में एक नई पहचान बनाती है और यह सिद्ध करती है कि धैर्य, आत्मविश्वास और निरंतर प्रयास से हर व्यक्ति अपनी ‘औकात’ स्वयं तय कर सकता है।

Mar 30, 2026 - 16:30
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औक़ात
kamla-ki-aukaat
आज कमला बहुत खुश नज़र आ रही थी। और ख़ुशी की ही तो बात थी उसकी लि खी कहानी ‘भविष्य' एक नामी पत्रिका जो छपी थी ।और इस कहानी की चर्चा लगभग सभी साहित्यिक सभाओं में हो रही थी. अब आप कहेंगे की कहानियां तो बहुत से लेखक लेखिकाएं लिख रहे हैं जो बहुत अच्छा लिख रहे हैं. पर बात यूं है की कमला एक पढी - लिखी लड़की थी, हर काम में अव्वल। पी एचडी किया था और साहित्य में रुचि भी थी । मन ही मन में स चती थी कि मैं भी एक दि न कुछ लिखूंगी। उसकी इच्छा थी की वह लेखन क्षेत्र में जाए, उसकी रचनाएँ भी प्रकाशित हों और लोग उसे उसके नाम और काम से जानें । पर अहा! जो सोचते हैं, सबको वही मिल जाए, तो सारा संसार स्वर्ग ना बन जाए। 
अभी कमला ने पढ़ाई पूरी ही की थी की एक विवाह समारोह में उसकी होने वाली सास ने उसे देख लिया और पसंद भी कर लिया। अच्छा प्रतिष्टित परिवार था, लड़का भी सरकारी नौकरी में उच्च पद पर था। कमला के घर वालों को तो जैसी मन मांगी मुराद मिल गयी। लडका कमला को पसंद भी था, यूं कहें की पसंद न आने का तो प्रश्न ही नहीं उठा। इतना संस्कारी और सुशील लड़का। बस फिर क्या था, चट मंगनी और पट ब्याह। बस कमला को एक ही बात डर था कि अब उसका लेखन कार्य कैसे होगा, पर यहाँ भी ससुराल वालों ने भरोसा दिलाया की तुम चिंता मत करो,जो तुम चाहो कर लेना। कमला बहुत खुश थी। अच्छा पति, अच्छा परिवार और उसके ससुर जी भी दिल्ली के सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल रहे चुके थे। उसे लगा जैसे उसके सपनों को अब उडान मिलेगी । 
समय मानो पंख लगा के उड़ रहा था। देखते ही देखते पांच साल बीत गए। कमला दो स्वस्थ बच्चो की माँ बन गयी। घर की देख -भाल, सास ससुर की सेवा, रिश्तेदारी नि भाते- निभाते कब बच्चे बड़े हो गए पता ही नहीं चला । घर में सभी उसका मान करते, सभी उसकी तारीफ करते ही नहीं थकते थे। हाँ,कभी कभी कमला के मन में एक कसक सी अवश्य उठती कि मेरे सपने तो सपने ही रह गए। फिर मन को ढांढस देती कि कोई बात नहीं मेरा सब की नजरों में और खास कह अपने पति की नज़रों में बहुत मान-सम्मान है । 
सब ठीक ही चल रहा था कि उसके बड़े बेटे ने एक दिन कुछ बड़ी मांग की और कमला ने वादा कर दिया की ठीक है ले लेना, और पापा से बात कर लेना। उसी शाम जब रसोई का काम निपटा कर वह बाहर निकली तो सुना पापा -बेटे में कुछ बहस हो रही है। तभी अचानक एक तेज आवाज़ सुनाई दी तेरी माँ की इतनी औक़ात नहीं है,' ये शब्द सुनते ही जैसे उसके का नों में किसी ने गर्म शीशा उड़ेल दिया हो। पैर वही जम से गए। अपना सारा जीवन इस घर को देने के बाद भी ये शब्द, ऐसी सोच ? एक पल को ‘कमला' ने सोचा क तुरंत घर से निकल जाये, जहाँ उसकी इज्जत ही नहीं , वहाँ रहने की क्या ज़रूरत । अब उसे रोना आ रहा था। जिस घर को बना ने में उसने अपने सपनों को त्याग दिया वहां तो उसकी ‘औकात' की बात हो रही है। 
पर मध्यमवर्ग की यही विडम्बना है कि आज भी स्त्रियों का घर छोड़ कर जाना समाज की नजरों में ठीक नहीं है। फिर मां-बाप की इज्ज़त वगैरह-वगैरह। पर उसी वक़्त कमला ने निर्णय किया लिया कि बस अब और नहीं।चाहे कुछ भी हो जाये अपने सपनों को जियेगी। कुछ करके दिखाएगी । 
समाचार पत्र, पत्रिकाएं तो वह पढ़ती ही थी, अब उसने जैसे ही कहीं प्रतियोगिता आदि की बात होती या नए लेखकों को निमंत्रण होता, तो तुरंत ही अपनी रचनाएं भेज देती। शुरू शुरू में तो नहीं छपी। धीरे धीरे परि पक्वता आने लगी और उसकी लिखी रचनाएँ छपने लगी। अब साहित्य जगत में ‘कमला’ नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं रहा। और एक दिन उसके कहानी `औकात' ने तो मानों तहलका मचा दिया। एक स्त्री की कथा-व्यथा का मार्मिक वर्णन किया था। कैसे संघर्ष पूर्ण रास्तों को हराकर अपनी पहचान बनाई। इस कहानी ने `कमला' को एक नई पहचान दिला दी। कमला की चौतरफ़ा प्रशंसा हो ने लगी। साहित्यिक सभाओं में निमंत्रित किया जाने लगा। उसके इस एक कदम ने सभी को उसकी `औकात' दिखा दी, बिना कोई तमाशा कि ये, बिना कोई गृह कलेश । 
सारांश यह कि अगर किसी को भी अपनी पहचान बनानी हो तो, कमला के जीवन से सबक ले सकते है, आप अगर शांति पूर्वक, मर्यादा में रह कर कोई काम करते हैं तो उसका परिणाम हमेशा ही सुखद होता है। 
रेखा भा कुनी

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