अब न कुछ आस ना ही अंकुरण

प्रेम और अनुराग से सिक्त था हृदय जो  अब   हमारे  दिल  से  उठती  वेदना है| 

Apr 16, 2024 - 15:41
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अब न कुछ आस ना ही अंकुरण
meera

क्या कहें हम उनसे बातें अब रूहानी, 
उनसे अब ना आस की संभावना है| 

जिक्र जिनका मेरी अक्षर में था अक्सर 
वह सदा  करते मेरी  आलोचना है| 

प्रेम और अनुराग से सिक्त था हृदय जो 
अब   हमारे  दिल  से  उठती  वेदना है| 

मेरे दिल को यह भरम  कुछ हो गया था 
उनके  दिल में  कुछ  बची   संवेदना है| 

क्यों बतायें  हम कुछ भी अब  व्यथाएँ 
अंतस में हुई जागृत अब  चेतना  है| 

ऐसा कुछ कुछ अब अंदेशा लग रहा है| 
भेजना वो चाहते प्रस्तावना  है|

अब हमें न  बैर  है ना कुछ भी उनसे|
अंकुरण अब  स्नेह  का  हो   कल्पना है|   

लक्ष्य मेरा अब उन्हीं  पर जाकर ठहरा  
करना  मुझको बस उन्हीं की साधना हैं| 

तेरे  चरणों में  समर्पित अब ये  तन मन 
"मीरा" को करना "मोहन" की अर्चना है|

सविता सिंह मीरा 

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