भारतविद्या के अनन्य साधक प्रो. वासुदेव शरण अग्रवाल
यह लेख प्रो. वासुदेव शरण अग्रवाल के बहुआयामी व्यक्तित्व, उनके इतिहास-दर्शन और भारतीय दृष्टिकोण से किए गए इतिहास, साहित्य, पुरातत्व और लोकसंस्कृति के अनुशीलन का समग्र मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। लेख बताता है कि किस प्रकार उन्होंने साम्राज्यवादी, मार्क्सवादी और विभेदनकारी इतिहास लेखन से अलग हटकर भारतीय सांस्कृतिक तत्वों, भाषाशास्त्र और पुरातात्विक स्रोतों के समन्वय से भारतीय इतिहास की पुनर्व्याख्या की।
भारत और इसके इतिहास को देखने जानने और पढने वाले विद्वान तो बहुत हुए देशी भी और विदेशी भी। पर विशुद्ध भारतीय दृष्टिकोण से भारत और भारतीय इतिहास - संस्कृति को देखने - परखने वाले कुछ ही विद्वान हुए। उन विद्वानों में प्रो. वासुदेव शरण अग्रवाल विशिष्ट स्थान रखते हैं। आधुनिक काल में जब से भारतीय इतिहास का लेखन प्रारंभ हुआ इतिहास लेखकों पर साम्राज्यवाद, मार्क्सवाद, नस्लवाद या फिर चर्च अथवा बौद्ध या ब्राह्मण श्रेष्ठता की दृष्टि से भारतीय इतिहास की प्रस्तुति करने, उसे विकृत करने या निम्नतर करके दिखाने का आरोप लगता रहा है। विलियम जोंस से लेकर ,जेम्स मिल, मैक्समूलर, विन्सेंट स्मिथ, मैकडोनल, कीथ,,ज्योतिबा फूले, पेरियार, डी डी कौशांबी, राहुल सांकृत्यायन, राजबलि पांडे ,डी एन झा, रोमिला थापर, आदि वर्तमान मे कार्यरत इतिहासकार तक इस आरोप की जद में लाये और घेरे जाते रहे हैं। पर ई.बी. हैवेल, ए. के कुमार स्वामी, आर के मुखर्जी आदि कुछ विद्वान ऐसे भी हैं जिन्होंने भारतीय इतिहास को देखने की भारतीय शैली अपनायी ।भारतीय सांस्कृतिक तत्वों से युक्त भारतीय इतिहास का लेखन किया। इन्हीं विद्वानों की श्रेणी में एक विद्वान थे- प्रो वासुदेव शरण अग्रवाल जिन्होंने भारत और भारतीय इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण से देखा, परखा और लिखा। जिनके लेखन का क्षितिज बहुआयामी, बहुरंगी, विविधतापूर्ण था। जिसमें देशीपन की सुगंधी थी और विशिष्ट शोध प्रविधियो की देशी छौंक भी। जिनके विविध कार्यों के लिए विविध संज्ञाओं से अभिहित किया गया।
७ अगस्त १९०४ को संयुक्त प्रांत के मेरठ जिले के खेड़ा गांव में जन्में वासुदेव शरण अग्रवाल ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव में ही पूरी कर आगे की पढ़ाई काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से पूरी की।यहां बी. ए के दौरान वे जाने माने विद्वान आचार्य रामचंद्र शुक्ल, प्रोफेसर अनंत सदाशिव अल्टेकर के संसर्ग से साहित्य, इतिहास और पुरातत्व की बारीकियों से परिचित हुए। आगे की पढ़ाई के लिए वे लखनऊ विश्वविद्यालय गये जहां डॉ राधाकुमुद मुखर्जी के निर्देशन में अपना एम ए का लघुशोध India as described by manu ' विषय पर पूर्ण किया। उनके इस कार्य से प्रसन्न होकर डॉ मुखर्जी ने उन्हें पाणिनीकृत व्याकरण ग्रंथ अष्टाध्यायी पर पी एच डी का विषय दिया- 'India as known to Panini'। वासुदेव शरण ने सोलह वर्षों तक कड़ा परिश्रम कर इसे पूर्ण किया और पी एच डी के साथ इस पर डी लिट की उपाधी भी प्राप्त की। उन्होंने स्वयं पाणिनीकालीन भारतवर्ष नाम से इसका अनुवाद किया और इस लोकविश्रुत कार्य हेतु अपार यश प्रशंसा अर्जित की। साथ ही,साहित्यिक स्रोतों के अध्ययन और विश्लेषण की कई दृष्टियों और प्रविधियों को अर्जित किया। शोध के साथ वासुदेव शरण मथुरा और लखनऊ के संग्रहालय में क्यूरेटर रहे। प्रायः १८ वर्ष तक इन संग्रहालयों में बिताये समय ने उन्हें पुरातात्विक सामग्रियों के विवेचन और विश्लेषण की विलक्षण सूझ प्रदान की। इस प्रकार वे साहित्यिक और पुरातात्विक दोनो स्रोतों के अध्ययन में निष्णात बने। आर्य समाज और भागवत वैषणव परंपरा से उनकी निकटता ने उन्हे वैदिक और पौराणिक साहित्य के अनुशीलन की विशिष्ट विधाओ से संपन्न किया। इस सारे अनुभव के साथ वे १९४६ में सर मार्टिमर व्हीलर के निर्देशन में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में कार्यरत रहे और स्वतंत्रता के उपरांत सेंट्रल एंटीक्वीटीज म्युजियम की साउथ एशिया गैलरी में सुपरिटेंडेंट के पद पर रहे और दिल्ली मे स्थापित राष्ट्रीय पुरातत्व संग्रहालय की स्थापना में भूमिका निभाई। सन १९५१ में वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में कॉलेज आफ इंडोलॉजी में व्याख्याता बने और जीवन पर्यंत यहीं रहे। २७ जुलाई १९६७ को काशी में ही उनका देहावसान हुआ।
काशी ने उनके जीवन को जैसे नयी दिशा दी और अब तक के सीखे सारे ज्ञान, सारी विद्या को छातरोंके बीच बांटने के साथ ही वे उसे विभिन्न प्रकार के साहित्य के ऐतिहासिक और भारतीय कला और पुरातत्व के साहित्यिक और दार्शनिक अभिप्राय से युक्त अनुशीलन में लगाये। मार्कण्डेय पुराण, हर्षचरित,पद्मावत, मेघदूत, कादंबरी,कीर्तिलता,वामन पुराण, लिंग पुराण, मत्स्य पुराण,,अंगविज्जा ,अशोकावदान और महाभारत जैसे ग्रंथों के ऐतिहासिक सांस्कृतिक अनुशीलन में वासुदेव शरण ने अब तक के किये साहियत्यानुशीलन के आगे एक बड़ी लकीर खींची । इनमें से कई साहित्य काल्पनिक कथाओं और मिथकों से पूरित थे। जैसे, कादंबरी, महाभारत और पुराण ग्रंथ। किंतु पाठानुसंधान, स्तरीकरण, भाषाई और वैयाकरणीय युक्तियों और पुरातात्विक स्रोतों का ससंदर्भ तुलनात्मक प्रयोग करते हुए इन साहित्य की भी उन्होंने अपेक्षाकृत अधिक प्रामाणिक व्याख्या प्रस्तुत की। हर्ष चरित और पद्मावत के कार्य हेतु पुरस्कृत भी हुए। पद्मावत की संजीवनी व्याख्या पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस प्रकार संस्कृत से लेकर प्राकृत, अवधी, अवहट्ट भाषा तक उन्होंने अपने साहित्यानुशीलन के कार्य को संपन्न किया। वेदव्यास से लेकर कालिदास, बाणभट्ट, विद्यापति और जायसी जैसे रचनाकार वासुदेव शरण अग्रवाल के साहित्य अवगाहन के विषय रहे ।अपने अध्ययन व शोध की बहुरंगी छटा के लिए वासुदेवशरणको बहुरंगी अभिधानोंसे अभिहित किया गया। शबद और व्याकरण को अपनी लाठी बनाकर भारतीय इतिहास के दुरूह पृष्ठों को पलटा और आधुनिक पाणिनी कहलाए। पाणिनीय व्याकरण अष्टाध्यायी की नयी व्याख्या की तो आधुनिक पतंजलि कहलाए, शब्दों की नैरूक्तिक व्याख्या सै वैदिक और अन्य साहित्य के दुरूह शब्दों और उनमें वर्णित त्वों का विवेचन किया तो आधुनिक यास्क कहे गये, भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में लोक-संस्कृति व लोकधर्म के विविध तत्वों की पुनः प्रतिष्ठा कर आधुनिक वेदव्यास कहलाए- (झाबेरभायी मेवाणी), जनपदीय अध्ययन की प्रतिष्ठा कर आधुनिक हेमचंद्राचार्य कहलाए ( मारूतिनंदन तिवारी), पुराण साहित्य के अध्ययन की आधुनिक प्रविधी विकसित की और आधुनिक उग्रश्रवा कहलाने के अधिकारी बने, महाभारत पर प्राच्य और प्रातीच्य दोनों दृष्टियों का संगम कर उस पर अब तक का सर्वश्रेष्ठ कार्य किया ( प्रभाकर श्रोत्रिय) और आधुनिक वैशमपायन बने। भागवद गीता और भागवत पुराण की नवीन व्याख्या की और आधुनिक शुकदेव कहलायले (देव कुमार अग्रवाल) ।
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इनके अतिरिक्त उन्होंने भारतीय कला पर स्टडीज इन इंडियन आर्ट, भारतीय कला, कला और संस्कृति, भारतीय देवशास्त्र पर शिव महादेव : द ग्रेट गॉड, भारतीय लोकधर्म पर प्राचीन भारतीय लोकधर्म, वैदिक दर्शन पर कल्पवृक्ष, कल्पतरू, वेद धारा, वेद रश्मि, विजन इन लांग डार्कनेस, हिम्न आफ क्रिएशन, वैदिक लेक्चर्स आदि पुस्तकों की रचना की। संग्रहालय अध्ययन पर म्युजियम स्टडीज जैसा ग्रंथ लिखा। क्षेत्रीय अध्ययन के उस दौर में वासुदेव शरण ने इसे नया आयाम दिया। उन्होंने इसे जनपदीय अध्ययन का नाम दिया और इसके तौर तरीकों पर कयी उपयोगी निबंध लिखे जो पृथ्वी पुत्र निबंध संग्रह के रूप में छपे। भारतीय संस्कृति की महत्ता पर कई निबंध लिखे जो इंडिया ए नेशन ,भारत की मौलिक एकता और माता भूमि आदि निबंध संकलनों में प्रकाशित हुए। साथ ही देश के एकत्व का संदेश देती पुस्तक चक्रध्वज की भी रचना की और चक्र, स्तूप, यूप, स्तंभ आदि की प्राचीनता को स्थापित करते हुए विभेदणकारी इतिहास लेखन पर कड़ा प्रहार किया।
वासुदेव शरण के इतिहास लेखन की बात करें तो उसमें साहित्यिक और पुरातात्विक स्रोतों के समन्वित प्रयोग के साथ साथ भाषाई शोध के उपकरण- शब्द शास्त्र, निरूक्त, लोप के नियम, अपभ्रंश, तुलनात्मक भाषा अध्ययन आदि का खूब जमकर प्रयोग मिलता है और इतिहास की कयी गुत्थियां सुलझती दिखती हैं। शामयद्यपि कन्हैया सिंह, इन्द्र चंद्र नारंग और कृष्णदेव उपाध्याय जैसे कयी आलोचकों ने उनकी इस प्रविधि और कयी स्थापनाओं का खंडन भी किया।वैदिक साहित्य और संस्कृति की विवेचना में नैरूक्तिक प्रविधि का उन्होंने अतिशय प्रयोग किया जिसके लिए उन्हे विद्वानों की तीखी आलोचना झेलनी पड़ी तथापि राष्ट्रवादियों ने खुल कर उनकी प्रशंसा की। लोकधर्म पर कार्य करते हुए वासुदेव शरण ने ऐतिहासिक स्रोतों के साथ साथ निरंतरता अर्थात लोक व्यवहारों, कुलाचारों, लोकाचारों आदि मौके अध्ययन और जाति, संप्रदाय और स्थान के आधार पर उनके तुलनात्मक अध्ययन पर जोर दिया। जनपदीय अध्ययन हेतु इन सबके साथ, जनजातीय अध्ययन, नृजातिकी, भूगोल, संगीत , समाजशास्त्र, मानव विज्ञान, आदि ज्ञानशाखाओं का प्रयोग करते हुए, प्रश्नावली, साक्षात्कार, क्षेत्र सर्वे, और वाचिक परंपराओं के उपयोग का सुझाव दिया। जैसे, लोककथा, भाषा, बोली, गीत, मेले, कहावतें, सूक्ति, मुहावरे, वंशावली, भजन विभिन्न वस्तुओं के लिए प्रयोग होने वाले शब्द आदि । जनपदीय अध्ययन पर अपनी रचना पृथ्वी पुत्र में इस समृद्ध प्रविधीक प्रयोग के कयी उदाहरण उन्होंने दिये हैं जिसके लिए बनारसी दास चतुर्वेदी ने पृथिवी पुत्र को जनपदीय अध्ययन की बाईबल कहा।
वासुदेव शरण के इतिहास लेखन का एक महत्वपूर्ण पक्ष है- समनवयवादी इतिहासकारी। हृदय से कट्टर भागवत वैष्णव होते हुए भी उन्होंने कहीं भी जाति, धर्म, संप्रदाय के आधार पर विद्वेषपूर्ण लेखन नहीं करते। उनके लिए जितना विष्णु का महत्व था उतना ही बुद्ध और महावीर का भी । सगुण साधक होकर भी जब वे निर्गुण तत्वों की व्याख्या करते हैं तो उनका पाठक चकित हुए बिना नहीं रहता। आर्य समाज से जुड़ाव होने पर भी वे अपने लेखन में लोकधर्म के प्रति जो उदारता और सम्मान रखते हैं वो हमारे फूले पेरियार और अंबेडकरवादियों के विखण्डनकारी और द्वेषपूर्ण प्रमेयों और परिकल्पनाओं पर बहुत भारी पड़ता है। उनकी तुलना में वासुदेव शरण की परिकल्पना मात्र समन्वयवादी नहीं बल्कि टिकाउ प्रतीत होती है। ऐतिहासिक का दृष्टिकोण लेख में बारंबार वासुदेव शरण विभेदनकारी लेखन से बचने की बात करते हैं। निश्चय ही धर्म के नाम पर देश विभाजन और उससे उपजी घृणा से हुए नरसंहार ने उनके हृदय पर जो गहरा घाव किया था,यह उसका प्रभाव है।
अपने कार्यों की प्रामाणिकता के कारण वासुदेव शरण मात्र राष्ट्रवादी इतिहासकारों द्वारा नहीं बल्कि मार्क्सवादी विद्वानों द्वारा भी सम्मानित हुए। भगवान सिंह ने उनके लिखे एक पैराग्राफ को पूरी पी एच डी के योग्य, उनके कृतियों के अनुशीलन को समुद्र में पैठना यहां तक कि उन्हें पढे बिना भारतीय संस्कृति को नहीं जान पाना बताया है। भारतविदों के नक्षत्र लोक में वासुदेव शरण अग्रवाल सबसे दैदीप्यमान नक्षत्र माने जाते हैं।
डॉ मल्लिका मंजरी
भागलपुर, बिहार
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