रामधारी सिंह 'दिनकर'

कविता, निबंध और अन्य साहित्यिक कार्यों की समृद्ध विरासत को पीछे छोड़, २४ अप्रैल १९७४ में 'राष्ट्र-कवि' दिनकर का निधन हो गया। भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में उनके योगदान का सम्मान करते हुए, १९९९ में उनकी छवि के साथ एक स्मारक डाक टिकट जारी किया गया। इसके अतिरिक्त, उनकी स्मृति को बनाए रखने के लिए कई सड़कों और सार्वजनिक स्थानों के नाम, उनके नाम पर रखे गए हैं।

Jan 23, 2026 - 17:58
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रामधारी सिंह 'दिनकर'
Ramdhari Singh 'Dinkar'

बिहार में जन्मे रामधारी सिंह दिनकर एक प्रख्यात भारतीय कवि थे, जिन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई के दौरान अपने शब्दों और भावनाओं की ऊर्जा का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया था। उन्हें `वीर रस' का महानतम हिंदी कवि माना गया, और उन्हें 'राष्ट्र कवि' की उपाधि से सम्मानित किया गया।
रामधारी सिंह दिनकर का जन्म २३ सितंबर १९०८ को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गाँव में भूमिहार ब्राह्मण परिवार में एक सामान्य किसान `रवि सिंह' तथा उनकी पत्नी `मनरूप देवी' के पुत्र के रूप में हुआ था। दिनकर दो वर्ष के थे, जब उनके पिता का देहावसान हो गया। परिणामत: दिनकर और उनके भाई-बहनों का पालन-पोषण उनकी विधवा माता ने किया। दिनकर का बचपन और कैशोर्य देहात में बीता, जहाँ दूर तक फैले खेतों की हरियाली, बांसों के झुरमुट, आमों के बग़ीचे और कांस के विस्तार थे। प्रकृति की इस सुषमा का प्रभाव दिनकर के मन में बस गया, पर शायद इसीलिए वास्तविक जीवन की कठोरताओं का भी अधिक गहरा प्रभाव पड़ा। उनके पिता का साया भले ही बचपन में उठ गया, लेकिन शिक्षा के प्रति उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ। संस्कृत के एक पंडित के पास अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्रारंभ करते हुए दिनकर जी ने गाँव के 'प्राथमिक विद्यालय' से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की एवं निकटवर्ती बोरो नामक ग्राम में 'राष्ट्रीय मिडिल स्कूल' जो सरकारी शिक्षा व्यवस्था के विरोध में खोला गया था, में प्रवेश प्राप्त किया। यहीं से इनके मनोमस्तिष्क में राष्ट्रीयता की भावना का विकास होने लगा था। हाई स्कूल की शिक्षा इन्होंने 'मोकामाघाट हाई स्कूल' से प्राप्त की। इसके बाद इनका विवाह हो गया तथा ये एक पुत्र के पिता भी बन गये लेकिन उन्होंने अपनी पढाई जारी रखी और पटना विश्वविद्यालय से इतिहास राजनीति विज्ञान में बीए किया। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था। बीए की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक विद्यालय में अध्यापक हो गये। हिंदी के प्रति अपने प्रेम के कारण उन्होंने साहित्य की राह चुनी। १९३४ से १९४७ तक बिहार सरकार की सेवा में सब-रजिस्टार और प्रचार विभाग के उपनिदेशक पदों पर कार्य किया। १९५० से १९५२ तक लंगट सिंह कालेज मुजफ्फरपुर में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे। १९५२ में उन्हें राज्यसभा के लिए चुन लिया गया जहाँ दो कार्यकालों तक उन्होंने संसद सदस्य के रूप में योगदान किया। इसके उपरांत वह भागलपुर विश्वविद्यालय के१९६३ से १९६५ के बीच उपकुलपति नियुक्त किए गए और इसके एक वर्ष बाद ही भारत सरकार ने उन्हें अपना हिंदी सलाहकार नियुक्त कर पुनः दिल्ली बुला लिया।

रामधारी सिंह दिनकर स्वभाव से सौम्य और मृदुभाषी थे, लेकिन जब बात देश के हित-अहित की आती थी तो वह बेबाक टिप्पणी करने से कतराते नहीं थे। रामधारी सिंह दिनकर ने ये चार पंक्तियाँ पंडित जवाहरलाल नेहरू के विरुद्ध संसद में सुनायी थी, जिससे देश में भूचाल मच गया था। दिलचस्प बात यह है कि राज्यसभा सदस्य के तौर पर दिनकर का चुनाव पंडित नेहरु ने ही किया था, इसके बावजूद नेहरू की नीतियों का विरोध करने से वे नहीं चूके।
देखने में देवता सदृश्य लगता है
बंद कमरे में बैठकर गलत हुक्म लिखता है।
जिस पापी को गुण नहीं गोत्र प्यारा हो
समझो उसी ने हमें मारा है।।
१९६२ में चीन से हार के बाद संसद में दिनकर ने इस कविता का पाठ किया जिससे तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू का सिर झुक गया था। यह घटना आज भी भारतीय राजनीति के इतिहास की चुनिंदा क्रांतिकारी घटनाओं में से एक है।
रे रोक युद्धिष्ठिर को न यहां जाने दे उनको स्वर्गधीर
फिरा दे हमें गांडीव गदा लौटा दे अर्जुन भीम वीर।।
उनकी कविताओं में देशभक्ति, क्रांति और समाज सुधार की गहरी झलक मिलती है। उनकी कविताओं में देशभक्ति और वीरता की गूंज सुनाई देती है। रश्मिरथी और हुंकार जैसी रचनाओं ने युवाओं के मन में क्रांति की ज्वाला जगाई। आज भी जब उनकी पंक्तियां सुनाई देती हैं तो हृदय गर्व और साहस से भर उठता है। रामधारी सिंह दिनकर केवल कवि नहीं थे, बल्कि शब्दों के योद्धा थे। आजादी की लड़ाई के समय उनकी कविताएं युवाओं में हिम्मत जगाती थीं। परशुराम की प्रतीक्षा और संस्कृति के चार अध्याय जैसे ग्रंथों ने साहित्य को नई दिशा दी। दिनकर जी ने हमें सिखाया कि कलम की ताकत तलवार से भी बड़ी होती है। सच में, वे हिंदी के गौरव हैं। राष्ट्रकवि दिनकर जी का जीवन हम सबके लिए प्रेरणा है। साधारण किसान परिवार से निकलकर उन्होंने साहित्य और राजनीति दोनों में योगदान दिया। उनकी कविताओं में ऊर्जा, साहस और संस्कृति की गहराई मिलती है।

ओज, विद्रोह, आक्रोश के साथ ही कोमल श्रंगारिक भावनाओं के कवि दिनकर की काव्य-यात्रा की शुरुआत हाई स्कूल के दिनों से हुई जब उन्होंने रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा प्रकाशित ‘युवक’ पत्र में ‘अमिताभ’ नाम से अपनी रचनाएँ भेजनी शुरू की। १९२८ में प्रकाशित ‘बारदोली-विजय’ संदेश उनका पहला काव्य-संग्रह था। उन्होंने मुक्तक-काव्य और प्रबंध-काव्य - दोनों की रचना की। मुक्तक-काव्यों में कुछ गीति-काव्य भी हैं। कविताओं के अलावे उन्होंने निबंध, संस्मरण, आलोचना, डायरी, इतिहास आदि के रूप में विपुल गद्य लेखन भी किया।

सन १९२८ में प्रकाशित उनकी पहली प्रमुख काव्य रचना 'विजय संदेश', सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में किसानों के सत्याग्रह पर आधारित थी। हालाँकि उन्होंने आमतौर पर वीरता और स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित प्रेरक कविताएँ ही लिखीं, किंतु उनकी कृति 'उर्वशी' इस नियम का अपवाद थी। यह पुस्तक मानवीय संबंधों के बारे में थी, और इसके लिए उन्हें प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया था। उनकी कुछ अन्य प्रसिद्ध कृतियों में `धूप छाँह', `सामधेनी', `बापू', `मिट्टी की ओर', और `कृष्णा की चेतवानी' शामिल हैं। उनकी कृतियों के लिए उन्हें पद्म भूषण (१९५९), साहित्य अकादमी पुरस्कार (१९५९), और ज्ञानपीठ (१९७२) जैसे कई पुरस्कार और सम्मान दिए गए। द्वापर युग की ऐतिहासिक घटना महाभारत पर आधारित उनके प्रबन्ध काव्य कुरुक्षेत्र को विश्व के १०० सर्वश्रेष्ठ काव्यों में ७४ वाँ स्थान दिया गया।
कविता, निबंध और अन्य साहित्यिक कार्यों की समृद्ध विरासत को पीछे छोड़, २४ अप्रैल १९७४ में 'राष्ट्र-कवि' दिनकर का निधन हो गया। भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में उनके योगदान का सम्मान करते हुए, १९९९ में उनकी छवि के साथ एक स्मारक डाक टिकट जारी किया गया। इसके अतिरिक्त, उनकी स्मृति को बनाए रखने के लिए कई सड़कों और सार्वजनिक स्थानों के नाम, उनके नाम पर रखे गए हैं।

राष्ट्रीय कवि माने जाने वाले दिनकर जी, आज भी अपने उत्कट प्रशंसकों के लिए प्ररणा का स्रोत बने हुए हैं। रामधारी सिंह दिनकर साहित्य के वह सशक्त हस्ताक्षर हैं जिनकी कलम में दिनकर यानी सूर्य के समान चमक थी। उनकी कविताएं पढ़ने के बाद आपके अंदर एक अलग ही तरह का जोश भर जाएगा। दिनकर ने वैसे तो कई कविताएं लिखी है, उनकी रश्मिरथी, हुंकार, कुरुक्षेत्र जैसी रचनाएं दिल को छू जाती है। उनकी कविताएं साहस, देशभक्ति और सामाजिक चेतना से भरी होती हैं, जो आज भी युवाओं को प्रेरित करती हैं।

प्रमुख कृतियाँ
काव्य कृतियाँ- बारदोली-विजय संदेश (१९२८), प्रणभंग (१९२९), रेणुका (१९३५), हुंकार (१९३८), रसवन्ती (१९३९), द्वंद्वगीत (१९४०), कुरूक्षेत्र (१९४६), धूप-छाँह (१९४७), सामधेनी (१९४७), बापू (१९४७), इतिहास के आँसू (१९५१), धूप और धुआँ (१९५१), मिर्च का मजा (१९५१), रश्मिरथी (१९५२), दिल्ली (१९५४), नीम के पत्ते (१९५४), नील कुसुम (१९५५), सूरज का ब्याह (१९५५), चक्रवाल (१९५६), कवि-श्री (१९५७), सीपी और शंख (१९५७), नये सुभाषित (१९५७), लोकप्रिय कवि दिनकर (१९६०), उर्वशी (१९६१), परशुराम की प्रतीक्षा (१९६३), आत्मा की आँखें (१९६४), कोयला और कवित्व (१९६४), मृत्ति-तिलक (१९६४), दिनकर की सूक्तियाँ (१९६४), हारे को हरिनाम (१९७०), संचियता (१९७३), दिनकर के गीत (१९७३), रश्मिलोक (१९७४), उर्वशी तथा अन्य शृंगारिक कविताएँ (१९७४) ।
गद्य कृतियाँ - मिट्टी की ओर १९४६, चित्तौड़ का साका १९४८, अर्धनारीश्वर १९५२, रेती के फूल १९५४, हमारी सांस्कृतिक एकता १९५५, भारत की सांस्कृतिक कहानी १९५५, संस्कृति के चार अध्याय १९५६, उजली आग १९५६, देश-विदेश १९५७, राष्ट्र-भाषा और राष्ट्रीय एकता १९५५, काव्य की भूमिका १९५८, पन्त-प्रसाद और मैथिलीशरण १९५८, वेणुवन १९५८, धर्म, नैतिकता और विज्ञान १९६९, वट-पीपल १९६१, लोकदेव नेहरू १९६५, शुद्ध कविता की खोज १९६६, साहित्य-मुखी १९६८, राष्ट्रभाषा आंदोलन और गांधीजी १९६८, हे राम! १९६८, संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ १९७०, भारतीय एकता १९७१, मेरी यात्राएँ १९७१, दिनकर की डायरी १९७३, चेतना की शिला १९७३, विवाह की मुसीबतें १९७३, आधुनिक बोध १९७३ ।
दिनकर जी की अनुमानत: ५० कृतियाँ प्रकाशित हुई हैं। उनका हिन्दी काव्य छायावाद का प्रतिलोम है, यह कहना तो शायद उचित नहीं होगा पर इसमें सन्देह नहीं कि हिन्दी काव्य जगत पर छाये छायावादी कुहासे को काटने वाली शक्तियों में दिनकर की प्रवाहमयी, ओजस्विनी कविता के स्थान का विशिष्ट महत्त्व है। दिनकर छायावादोत्तर काल के कवि हैं, अत: छायावाद की उपलब्धियाँ उन्हें विरासत में मिलीं पर उनके काव्योत्कर्ष का काल छायावाद की रंगभरी सन्ध्या का समय था। आरम्भ में दिनकर ने छायावादी रंग में कुछ कविताएँ लिखीं, पर जैसे-जैसे वे अपने स्वर से स्वयं परिचित होते गये, अपनी काव्यानुभूति पर ही अपनी कविता को आधारित करने का आत्म विश्वास उनमें बढ़ता गया, वैसे ही वैसे उनकी कविता छायावाद के प्रभाव से मुक्ति पाती गयी पर छायावाद से उन्हें जो कुछ विरासत में मिला था, जिसे वे मनोनुकूल पाकर अपना चुके थे, वह तो उनका हो ही गया।

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उनकी काव्यधारा जिन दो कुलों के बीच में प्रवाहित हुई, उनमें से एक छायावाद था। भूमि का ढलान दूसरे कुल की ओर था, पर धारा को आगे बढ़ाने में दोनों का अस्तित्व अपेक्षित और अनिवार्य था। दिनकर अपने को द्विवेदी युगीन और छायावादी काव्य पद्धतियों का वारिस मानते थे। उन्हीं के शब्दों में 'पन्त के सपने हमारे हाथ में आकर उतने वायवीय नहीं रहे, जितने कि वे छायावाद काल में थे,' किन्तु द्विवेदी युगीन अभिव्यक्ति की शुभ्रता हम लोगों के पास आते-जाते कुछ रंगीन अवश्य हो गयी। अभिव्यक्ति की स्वच्छन्दता की नयी विरासत हमें आप से आप प्राप्त हो गयी।
उनका जीवन-दर्शन उनका अपना जीवन-दर्शन है, उनकी अपनी अनुभूति से अनुप्राणित, उनके अपने विवेक से अनुमोदित परिणामत: निरन्तर परिवर्तनशील है। दिनकर प्रगतिवादी, जनवादी, मानववादी आदि रहे हैं और आज भी हैं, पर 'रसवन्ती' की भूमिका में यह कहने में उन्हें संकोच नहीं हुआ कि 'प्रगति शब्द में जो नया अर्थ ठूँसा गया है, उसके फलस्वरूप हल और फावड़े कविता का सर्वोच्च विषय सिद्ध किये जा रहे हैं और वातावरण ऐसा बनता जा रहा है कि जीवन की गहराइयों में उतरने वाले कवि सिर उठाकर नहीं चल सकें।' गांधीवादी और अहिंसा के हामी होते हुए भी 'कुरुक्षेत्र' में वह कहते नहीं हिचके कि -
कौन केवल आत्मबल से जूझकर,
जीत सकता देह का संग्राम है,
पाशविकता खड्ग जो लेती उठा,
आत्मबल का एक वश चलता नहीं।
योगियों की शक्ति से संसार में,
हारता लेकिन नहीं समुदाय है।
दिनकर जी सदैव हिंदी प्रेमियों के दिलों पर राज करते रहेंगे। उनके जन्म दिवस पर उन्हें शत शत नमन।

रचना दीक्षित 
ग्रेटर नोएडा 

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