भरत भूमि अलौकिक भारत...!

यह लेख भारत भूमि की पौराणिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक प्राचीनता का विस्तृत वर्णन करता है। रामायण और महाभारत युग की कालगणना से लेकर भरतवर्ष की संकल्पना, सनातन वैदिक परंपराएँ, हिमालय की आध्यात्मिक महत्ता और भारत को कर्मभूमि मानने की अवधारणा तक—यह लेख भारत को विश्व की सबसे पवित्र और प्राचीन सभ्यता के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

Jan 2, 2026 - 18:21
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भरत भूमि अलौकिक भारत...!
Bharat Bhoomi supernatural India...!
भारत भूमि का इतिहास अति प्राचीन है और वह कोई पांच दस हजार सालों का इतिहास अपने आप में समेटे हुए थोड़े ही ना है! हर युग में भारत भूमि का अस्तित्व सदा रहा है, फिर चाहे वो रामायण युग हो या फिर महाभारत युद्ध का युग हो! त्रेतायुग के अंतिम चरण में राम रावण युद्ध हुआ था और द्वापर युग के अंतिम चरण में महाभारत युद्ध........!!
राम रावण युद्ध पश्चात भगवान श्रीराम ने अयोध्या में ११००० वर्षों तक राज किया था और तत्पश्चात वे अपने परम धाम वैकुंठ में चले जाते है....!!
द्वापर युग की आयु ८,६४,००० मानव वर्ष है और द्वापर युग के अंतिम चरण में महाभारत युद्ध हुआ था! युद्ध के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका में ३६ वर्षों तक राज किया और फिर १२५ वर्ष की आयु में उन्होनें अपना मानव शरीर त्याग कर अपने परम धाम वैकुंठ में चले जाते है......!!
महाभारत युद्ध के समय युधिष्ठिर की आयु ५७ वर्ष की थी और युद्ध के पश्चात उन्होंने ३६ वर्षों तक हस्तिनापुर में राज किया, तत्पश्चात वो स्वर्ग चले गए थे तब उनकी आयु ९३ वर्ष की थी.......!!
अत: उपरोक्त काल गणनाओं से यह भलीभांति ज्ञात होता है और प्रमाणित होता है कि भारत भूमि अति प्राचीन है न की पांच दस हजार सालों का इतिहास..!! भारत भू भाग को समय समय पर भिन्न भिन्न नामों से संभवत संबोधित किया गया हो, जैसे वर्णन मिलता है कि महाभारत काल से पूर्व में भारत भू भाग को अजनाभवर्ष के नाम से जाना जाता था, और यह नाम राजा नाभि के नाम पर प्रचलित में आया था, जिन्हें हिमवर्ष का भू-भाग मिला था.....!! एक अन्य पुराणिक कथाओं में वर्णित है कि दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत एक महान शक्तिशाली और न्यायप्रिय राजा थे; अत: उनके नाम से इस भू भाग को भारत कहा जाने लगा...!!
एक अन्य कथा अनुसार ऋषभदेव के १०० पुत्र थे, जिनमें ज्येष्ठ पुत्र का नाम राजा भरत था, जो चक्रवर्ती राजा था और उनके नाम इस भू मंडल को भारत कहा जाने लगा..!!
इस तरह अनेक प्रकार की पौराणिक कथाओं में भिन्न भिन्न वर्णन मिलता है; परंतु राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत वाली कथा सबसे अधिक प्रचलित है!! सनातन वैदिक पूजन पद्धति में आचमन (आत्मशुद्धि), आसन शुद्धि, कुश पवित्री धारण, पृथ्वी पूजन, संकल्प, दीप पूजन, शंख पूजन, घंटा पूजन, और स्वस्तिवाचन जैसे कर्मकांड शामिल है! संकल्प लिए बिना पूजा अर्चना आदि मांगलिक कार्य अधूरा है; अत: संकल्प लेते समय भारत के बारे में कहा गया है कि....भूर्लोके जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे .... अत: हमें यह समझना चाहिए और जानना चाहिए कि भारत भू मंडल की महिमा और महत्त्व कितना बड़ा महान है......!!
जिस तरह पशुओं में गाय, पेड़ों में पीपल, नदियों में गंगा, वर्णों में ब्राह्मण पवित्र माने जाते है; उसी तरह संपूर्ण विश्व में भारत भूमि पवित्र मानी जाती है; क्योंकि यह कर्म प्रधान भूमि है और शुभ कर्म को यहां प्रधानता दी जाती है, इसलिए देवता भी मनुष्य देह में यहां अवतीर्ण होने को अति आतुर रहते है.....!!
भारत के उत्तर दिशा में हिम आच्छादित हिमालय की विशाल पर्वत मालाएं पश्चिम से पूर्व दिशा तक अपनी महान विशालताएं फैलाए हुए युगों युगों से निडर होकर सशक्त प्रहरी के रूप में खड़ा है! साइबेरिया से आने वाली भयानक शीत लहरों को थामकर  कवच की भांति भारत भू मंडल की रक्षा करता है! भारत की जलवायु को नियंत्रित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है! क्योंकि मध्य एशिया से आने वाली ठंडी और शुष्क हवाओं को थाम लेता है, जिससे भारत का उत्तरी भाग प्रचंड शीत लहरों से बचा रहता है......!!
आदि काल से ही हिमालय पर्वत को आध्यात्मिकता का मुख्य केंद्र माना जाता रहा है! क्योंकि हिमालय पर्वत का क्षेत्र देवताओं, ऋषियों, मुनियों एवम् आध्यात्मिक साधकों के लिए मनपसंद पवित्र स्थान सदा से रहा है! हिमालय की शांत और एकांत वातावरण, प्राकृतिक सौंदर्यता, ऊंची ऊंची हिम आच्छादित चोटियाँ आत्म-चिंतन, एकांतवास, अंतर्मन शांति की अभिलाषा रखने वालों को लुभाती रहती है, आकर्षित करती रहती है......!!
अनेकता में एकता भारत भूमि की विभिन्न विशेषताएं हैं, जिनमें विविध स्थलाकृति, उपजाऊ मैदान, नदियाँ, पहाड़, पठार, द्वीप, जलवायु, मिट्टी, सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक सहिष्णुता आदि शामिल है! यह भारत भूमि ही है जहां छः ऋतुएं समय समय पर आती जाती रहती है, जो स्वास्थ्यवर्धक के साथ साथ अद्भुत और अकल्पनीय भी है....!!
हर भारतवासी इंसान की यह आध्यात्मिक अभिलाषा रहती है कि वह अपने जीवन का अंतिम सफर भोलेनाथ शिव की नगरी काशी में समाप्त कर के मोक्ष की प्राप्ति करे; उसी भांति जीवात्मा की भी यहीं अभिलाषा रहती है कि उसे मनुष्य देह की प्राप्ति हो और फिर पृथ्वी की भारत भूमि पर जन्म मिले; क्योंकि भरत भूमि भारत की रज का एक एक कण हमारे ऋषि मुनियों की तपस्याओं से और भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण देवों के चरणों से पावन पवित्र बनी हुई है......!!
भरत भूमि भारत, भिन्न भिन्न ऋतुओं से अलंकृत होती है!
जहां ब्रह्मलोक की नदियां, कलकल निनाद कर बहती  है!
ऐसे महान भारत भूमि की गाथा 'उपासक'.......
पौराणिक प्रसंग - प्राचीन सभ्यता,  वर्णन किया करती है!!
जय हिन्द -  जय भारत.....!!
पवन कुमार सुरोलिया
सीकर,राजस्थान

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