पाश: क्रान्ति का कवि
एक ऐसा कवि जो सरकारों के सामने सवाल उठाता रहा, जिसने पंद्रह साल की उम्र में पहली कविता लिखी, १९ साल की उम्र में पहली बार जेल गया और ३८ साल की उम्र में खालिस्तानी आतंकवादियों ने उसे मौत के घाट उतार दिया। ९ सितंबर १९५० को पंजाब के जालंधर में जन्मे पाश अपने दौर में भी साहित्यकारों और आम अवाम के लाडले थे और वे आज भी साहित्य प्रेमियों, क्रांतिकारी किस्म की सोच रखने वाली आवाजों और असहमति का दम भरने वालों की यादों में जिंदा हैं।
लोगों को प्यार करने वाले कवि थे पाश। सत्तर के दशक में काव्य जगत के आकाश पर छाया रहा, एक ऐसा कवि जिसने जन आन्दोलनों को ठीक-ठीक समझा फिर कलम चलाई। उनका यह क्रांतिकारी मानवतावाद उनकी शहादत तक सलामत रहा।
पाश को क्रांति का कवि कहा जाता है और उनकी कविताएं व्यवस्था से सीधे टकराती हैं, सवाल करती हैं। लेकिन असल में उनके इस रचनात्मक प्रतिरोध के पीछे देश और दुनिया के प्रति उनकी मोहब्बत थी। पाश की कविताएं पंजाब की गलियों, चौराहों, लोगों, कस्बों, खेतों, खलिहानों, बूटों की चरमराहटों, संगीनों आदि के विषय में बहुत कुछ कहती थी। पंजाब का पूरा चरित्र पाश की कविताओं में दिखाई देता है। अपनी कविताओं में वह खुद सपने देखते थे और लोगों को सपने देखने के लिए उकसाते थे। उनका कहना था कि सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना। पाश की कविताओं में गर्मी थी, तेज था, विद्रोह था, बगावत थी, ललकार थी, आदर्श थे, जो इब्सन की कविताओं में हुआ करती थी। उनकी पंजाबी कविताओं में पाठक उनके साथ बहता था। वह पंजाब के खेतों और खलिहानों में गन्ना चूसते हुए ले जाते और बताते कि कैसे उनके बचपन की चोरी, चोरी न थी और कैसे जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही उनकी बात में सत्ता से बगावत की बू आने लगी, और कैसे उनके पूरे शरीर को बेड़ियों से जकड़ने के लिए सत्ता उतावली रहती थी।
यदि देश की सुरक्षा यही होती है
कि बिना ज़मीर होना ज़िंदगी के लिए शर्त बन जाए
आँख की पुतली में हाँ के सिवाय कोई भी शब्द
अश्लील हो
और मन बदकार पलों के सामने दण्डवत झुका रहे
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है
हम तो देश को समझे थे आलिंगन-जैसे एक एहसास का नाम
हम तो देश को समझते थे काम-जैसा कोई नशा
हम तो देश को समझते थे कु़र्बानी-सी वफ़ा
लेकिन गर देश
आत्मा की बेगार का कोई कारख़ाना है
गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है
तो हमें उससे ख़तरा है
बगावत और विद्रोह के एहसास से भरी इन लाइनों में पंजाबी लेखक अवतार सिंह संधू 'पाश' के हांथ के उस पसीने की यादें हैं, जो कलम को पकड़कर निडरता से लिखते वक्त छूटता है। एक ऐसा कवि जो सरकारों के सामने सवाल उठाता रहा, जिसने पंद्रह साल की उम्र में पहली कविता लिखी, १९ साल की उम्र में पहली बार जेल गया और ३८ साल की उम्र में खालिस्तानी आतंकवादियों ने उसे मौत के घाट उतार दिया।
९ सितंबर १९५० को पंजाब के जालंधर में जन्मे पाश अपने दौर में भी साहित्यकारों और आम अवाम के लाडले थे और वे आज भी साहित्य प्रेमियों, क्रांतिकारी किस्म की सोच रखने वाली आवाजों और असहमति का दम भरने वालों की यादों में जिंदा हैं। वो कवि आज भी हजारों-हजार कलमों-दवातों में ऊर्जा भरने का काम कर रहा है। पाश की कविताएं मौजूदा दौर में भी बगावत की जिंदा आवाज हैं।
मैं घास हूँमैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊँगा
बम फेंक दो चाहे विश्वविद्यालय पर
बना दो हॉस्टल को मलबे का ढेर
सुहागा फिरा दो भले ही हमारी झोपड़ियों पर
मेरा क्या करोगे
मैं तो घास हूँ हर चीज़ पर उग आऊँगा
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क्रांतिकारी विचारों और बागी लहजे में कविताएं कहने की वजह से पाश को कई बार गिरफ्तार किया गया। पहली बार साल १९७० में पाश को कथित नक्सली संबंधों के आरोप में जेल करीब एक साल की जेल हुई। इसके बाद साल १९७२ में पंजाब छात्र आंदोलन के दौरान और १९७४ में अखिल भारतीय रेलवे कर्मचारियों की हड़ताल के दौरान भी उन्हें गिरफ्तार किया गया। पंजाब का वो दौर जब खालिस्तानी आंदोलन अपने सबाब पर था और देश को क्रांतिकारी आवाजों की जरूरत थी। ऐसे वक़्त में साहित्य की दुनिया से कलम का एक ऐसा जंग-जू निकला, जिसने अपनी कविताओं के जरिए विरोध की नई धारा शुरू की, जिसका असर आज भी जिंदा है।
१९८० के दशक में जब खालिस्तानी आंदोलन का दायरा बढ़ने लगा, तो पाश ने खालिस्तानियों के धार्मिक कट्टरपंथी कार्यक्रमों का मुकाबला करने की ठानी और उन्होंने सिक्ख धर्म के गुरबानी ग्रंथ के संदेशों को लेते हुए हाथ से लिखे पोस्टर बनाए और उन्हें पंजाब के एक इलाके तलवंडी सलेम में दीवारों पर चिपकाना शुरू कर दिया। खालिस्तानियों के खिलाफ मोर्चा खोलने के बाद पाश को ये मालूम चल गया था कि खालिस्तानी उन्हें किसी भी तरह पकड़ना चाहते हैं। इसलिए वो साल १९८६ में अपने परिवार के साथ अमेरिका चले गए। अमेरिका में विजिटर वीजा पर जाने की वजह से पाश को अमेरिका से लौटना पड़ा और वो तलवंडी सलेम वापस आए। इसके बाद उन्होंने देश से बाहर जाने की कई कोशिशें कीं और इस कोशिश में उन्हें ब्राजील का मिला। पाश ब्राजील जाने की तैयारी कर रहे थे और दो दिन के बाद ही उन्हें निकलना था लेकिन वक्त का पहिया किसी और दिशा में मुड़ रहा था।
२३ मार्च १९८८ को पूरा हिंदुस्तान स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह की शहादत का गम मना रहा था और इस गम की लकीर थोड़ा और लंबी हो गई। इसी दिन पाश को एक खेत में ट्यूबवेल के पास गोली मारकर हत्या कर दी गई।
पाश की लेखनी में जो प्रभाव था, एक तो ये था कि वो गांव में पैदा हुए थे। दूसरा - उनके पिता जी सैनिक थे। पाश के गांव का जो पूरा एरिया था, उसमें काफी ज्यादा आंदोलन चल रहे थे, उन दिनों पंजाब स्टूडेंट यूनियन भी प्रसिद्ध था। उनके ऊपर उस क्षेत्र में चल रहे आंदोलनों का काफी प्रभाव था। धीरे-धीरे इन चीजों की वजह से उनके अंदर क्रांतिकारी लहजा आया।
पाश ने जिस वक्त 'सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना...' कविता लिखी, उसका भी एक दिलचस्प किस्सा है। वो हालात को देख रहे थे, जो खालिस्तानियों ने आतंक फैलाया था, वो एक तरफ। दूसरी तरफ राज्य का अपना अलग आतंक था, स्टेज टेरर अलग था। खालिस्तानियों के नाम पर बहुत सारे निर्दोष लोगों की हत्याएं हुई थीं। खालिस्तानी भी बहुत निर्दोष लोगों की हत्याएं कर रहे थे। दोनों तरफ से निर्दोषों की हत्याएं की जा रही थी और इस माहौल में चारों तरफ एक निराशा और डर का माहौल था। उसी वक्त उन्होंने ये कहा कि पुलिस की मार चाहे जितनी हो... ये सब चीजों से सब कुछ खत्म नहीं होता, जितना आदमी के अंदर के सपनों का मर जाना। यानी बुरे से बुरे हालात में भी सपने जिंदा रहने चाहिए। ये रहना चाहिए कि हालात बदलेंगे और हम जरूर समाज में परिवर्तन लाएंगे।
आप भी पाश की उस कविता एक बार जरुर पढ़ें -
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
गद्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना- बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना- बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में
सही होते हुए भी दब जाना- बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढ़ना- बुरा तो है
मुट्ठियाँ भींचकर बस वक़्त निकाल लेना- बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर जाना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
पाश कविताएं, हिंदी में- ‘जंजीरें टूटेंगी', राजकमल से छपी किताब- ‘बीच का रास्ता नहीं होता',,, बहुत लोकप्रिय हुई। बांग्ला में पाश का अनुवाद है, मराठी में पाश की कविताओं के दो अनुवाद हुए हैं और भी बहुत सारी भाषाओं में पाश की कविताओं के अनुवाद किए गए हैं। पाश की जरूरत है, तभी दूसरी भाषाओं में उसका अनुवाद होता है, इसलीए पाश इस वक्त बहुत ही प्रासंगिक कवि हैं।
अवतार सिंह संधू 'पाश' हमें भले ही छोड़कर चले गए लेकिन उनके कलम की आवाज आज भी जिंदा है। पाश के द्वारा भगत सिंह की याद में लिखी गई कविता '२३ मार्च' उनकी भी याद दिलाती है...
उसकी शहादत के बाद बाक़ी लोग
किसी दृश्य की तरह बचे
ताज़ा मुंदी पलकें देश में सिमटती जा रही झाँकी की
देश सारा बच रहा बाक़ी
उसके चले जाने के बाद
उसकी शहादत के बाद
अपने भीतर खुलती खिडकी में
लोगों की आवाज़ें जम गयीं
उसकी शहादत के बाद
देश की सबसे बड़ी पार्टी के लोगों ने
अपने चेहरे से आँसू नहीं, नाक पोंछी
गला साफ़ कर बोलने की
बोलते ही जाने की मशक की
शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था ईश्वर की तरह
लेकिन ईश्वर की तरह वह निस्तेज न था
उनका जन्मदिन ९ सितम्बर को आता है, उन्हें उनके जन्मदिन हम सब की ओर से शत शत नमन।
डॉ. रवीन्द्र दीक्षित
ग्रेटर नोएडा
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