यादों की मंजूलिषा: बरोट वैली
यह यात्रा-वृत्तांत हिमाचल प्रदेश के खूबसूरत बरोट वैली की प्राकृतिक सुंदरता, पहाड़ी संस्कृति और शांत वातावरण का जीवंत चित्रण करता है। यात्रा के दौरान लेखक ने ढलते सूरज, चांदनी रात, उहल नदी, देवदार के जंगल, लोक संस्कृति और प्रकृति प्रेमी प्रोफेसर से मुलाकात जैसे अनुभवों को संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया है। यह कहानी केवल एक पर्यटन यात्रा नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ आत्मिक जुड़ाव की अनुभूति है।
नवम्बर में वीकेंड की छुट्टियों में हमलोग कार से बरोट के लिए निकले और जैसे-जैसे हम ऊपर बरोट की तरफ बढ़ते गए वहाँ के नज़ारे लुभले लगे। एक तरफ पहाड़ों की ऊंचाइयां थी तो दूसरी तरफ गहरी खाई और सामने से लहराती सड़के। धर्मशाला से बरोट का रास्ता तो ४ घंटे का ही था लेकिन दुर्गम सड़कों और नज़ारों की वजह से वही रस्ता हमलोगों ने ६ घंटे में पूरा किया। डूबता सूरज, पहाड़ी रास्ते और इन रास्तों की खूबसूरती तो का क्या ही कहना। वह घरौंदों में लौटती हुई चिड़ियों का झुंड, डूबता हुआ सूरज, साँझ का धुंधलापन, ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों का समूह जैसे सब हमारे स्वागत में खड़े थे। इन्ही नज़ारे को और करीब से देखने के लिए और उस पल को जीने के लिये हम लोग एक छोटी सी चाय की दुकान पर रुक गये कि सनसेट को देखते-देखते चाय पी जाए। चाय पीते हुए हमारी निगाहें ढलते हुए सूरज पर ही टिकी थी। सूरज ढलते ही अंधेरा गहराने लगा। शाम धुंधली और सर्द हो गई।
सूरज अपने घर की तरफ जा रहा था और हम अपने गंतव्य की तरफ। जैसे-जैसे हम बरोट की ओर ऊपर बढ़ते जा रहे थे वैसे-वैसे चांद तारे हमारे और करीब महसूस होते जा रहे थे। ऐसे लग रहा था कि हाथ बढ़ाओ और लपक को चांद तारों को। आसमान में एक बड़ा सा चांद अपनी रोशनी बिखेर रहा था साथ में छोटे-छोटे सितारे भी झिलमिला रहे थे जो अपने-आप को चांद से कम नहीं समझ रहे थे। वे अपनी खुबसूरती पर इतरा रहें थे। चांदनी रात में बर्फ से ढके पहाड़ एक अलग ही सौंदर्य की वर्षा कर रहे थे। यह समझ में नहीं आ रहा था कि क्या-क्या अपने मन के पिटारे में कैद कर लूँ जो समय आने पर दोबारा खोल कर देख सकूं। एक भी खुबसूरत दृश्य छूट न जाए। शाम होते ही ऐसा लगा कि बहुत रात हो गई है, शायद! रास्ता सुनसान होने की वजह से ऐसा लग रहा था। इक्का-दुक्का लोग ही रास्ते में दिखाई दे रहे थे। जो नज़ारे हमें अब तक सुकून दे रहे थे वही हमें डराने लगे और मन में बुरे- बुरे ख्याल आने लगे जैसे अभी कोई आकर लूटपाट करने लगे तो क्या होगा वगैरा-वगैरा।
डर और सुकून दोनों को एक साथ जीते-जीते हम रात के ८:०० बजे गेस्ट हाउस पहुंचे, जिसको हमने पहले से ही बुक करके रखा था। रात के क़रीब ९:०० बजे हम डैम के पास पहुंचे जहां पर कुछ बच्चे आग जलाकर उसके चारों तरफ घेरा बनाकर हाथ सेक रहे थे। बच्चे किसी कॉलेज के थे जो ग्रुप बनाकर आए थे और साथ में स्पीकर भी लेकर आए थे जिसमें महेंद्र कपूर के गाने बज रहे थे। महेंद्र कपूर मेरे पसंदीदा गायक है, मेरे लिए तो सोने पे सुहागा हो गया। उन बच्चों को देखकर मुझें अपना कॉलेज टाइम याद आ गया। बच्चों से ही पता चला कि बस २०० मीटर पर फ़ाउंटेन के पास एक होटल ओपन है जिसमें डिनर मिल रहा है । यह बात सुनकर हम लोग उठकर डिनर के लिए चले गए और फिर गेस्ट हाउस आ कर सो गए।
सुबह पाँच बजे अचानक मेरी नीद खुल गई फिर मैंने सोचा बेड पर लेटने से तो अच्छा है कि बाहर जाकर सनराइज ही देखा जाए। बाहर निकली तो आसमान में हल्का हल्का उजाला फैल रहा था। सूरज तो अभी निकाला नहीं था पर उसकी लालिमा बिखर रही थी। उजाला लिए हुए आसमान, कहीं-कहीं बादल का टुकड़ा वह भी हल्की लालिमा लेकर, चारों तरफ देवदार के घने पेड़, सामने बड़ा सा डैम जिसका पानी शांत और चमकीला था, यह सब काफ़ी मनमोहक और शांत लग रहा था। मैं बालकनी में चेयर लेकर बैठ गई उस शांति में खोने के लिए। चिड़ियों की मधुर आवाज सुनकर ऐसा लग रहा था कि वे हमसे कुछ कहना चाह रही है और हम उसे समझ नहीं पा रहे हैं। भोर क्या होता है यह आज समझ में आ रहा था। जब प्रकृति को ध्यान और गहराई से देखा तो अपना वजूद शून्य सा हो गया। प्रकृति के आगे हमारा वजूद तिनका सा नजर आता है। जैसे-जैसे सूरज पहाड़ की चोटियों से ऊपर आ रहा था वैसे-वैसे ठंड का असर कम होता जा रहा था। प्रकृति अपना स्वरूप भी बदलती जा रही थी। पहले आसमान स्याह सा हल्की रोशनी से भरा था और अब वह गहरा लाल हो गया था। जो देवदार के पेड़ पहलें घने साये नजर आ रहे थे वह अब हरा-भरा चमकीला दिख रहा था। सामने का डैम जो शांत और स्थिर नजर आ रहा था वह सूरज की किरणों से खेलता अब अपना सुनहरा रूप बिखेर रहा था और जब हवा चलती तो हवा से अठखेलियें करती जल तरंगें ऐसा आभास कराती कि जैसे असंख्य हीरे भरे हुए हैं इस डैम में जो अपने रूप से सबको लुभा रहे हैं।
मेरे आवाज़ देने पर इस दृश्य को देखने के लिए सभी सदस्य रूम से बाहर आ गए और बालकनी में चेयर लेकर बैठ गए। सभी शांत और एकाग्र होकर प्रकृति को देख रहे थे, ना कोई आपस में बात कर रहा था न ही कोई किसी को डिस्टर्ब। नौ बजते-बजते नाश्ता आ गया और नाश्ता करते-करते हम लोग पूरे दिन का घूमने का प्लान भी बना डाला। गेस्ट हाउस से हम उहल नदी के पास नेचुरल फ़ाउंटेन के लिए पैदल निकल गए। जैसे-जैसे आगे बढ़ते गए दृश्य और भी मनमोहक होता गया, जो नजारे रात में शांत थे वह दिन में और भी सजीव हो गए। पूरा माहौल खुशनुमा और सजीव था। सामने बड़ी सी उहल नदी थी और उसके ऊपर एक छोटा सा ब्रिज था जो बारोट को मुख्य सड़क से जोड़ता था। नदी का पानी सफेद मोती जैसा चमक रहा था। नदी के अंदर छोटे बड़े पत्थर थे, वे भी क़ीमती रत्नों की तरह प्रतीत हो रहे थे। पानी बिल्कुल साफ और चमकीला था। नदी के किनारे किनारे छोटी-छोटी दुकानों की कतारें थी जिसमें जरुरत का हर सामान मौजूद था। वहां का सबसे खास था अचार किसी भी चीज का अचार मिल रहा था जैसे लहसुन का, बांस का, मशरूम का, लुगुड़ू का इत्यादि और जो वहां का फेमस था वह था लुंगड़ू का अचार।
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आस-पास की दुकानों को देखते हुए हम आगे बढ़ते गए, उहल नदी पर फाउंटेन के पास एक पिकनिक स्पॉट बना हुआ था। एक तरफ चमकीली नदी तो दूसरी तरफ बड़ा सा मैदान,बड़े-बड़े देवदार के पेड़ और पेड़ों के बीच से गिरता हुआ वॉटरफॉल ऐसा लग रहा था मानो दूध की नदी बह रही हो। इन सभी मनोरम नजारों के बीच में हंसते मुस्कुराते लोग, जो सब कुछ भूल कर इसी में रम से गए थे। हम लोग बातें करते-करते नदी के किनारे चले गए और वहां पर किसी न किसी पत्थर को अपनी कुर्सी समझते हुए बैठ गए। अपने पैरों को नदी के पानी में डालकर जो आनंद आता है,उसका तो क्या ही कहना। एक अलौकिक आनंद की अनुभूति हो रही थी। अभी हम लोग नदी के पानी का आनंद ही ले रहे थे कि इतने में वहां की लोकल महिलायें झुंड बनाकर गीत गाती हुई आई और नदी के पानी में कुछ पूजा का कार्यक्रम करने लगी। मैने उनकी संस्कृति और बरोट के बारे पुछा तो उन्होँने ने मुझें बताया- `बरोट मंडी जिले में पड़ता है यहाँ उहल नदी बहती हैं जिसमें मछलियाँ रहतीं हैं जो यहाँ के लोगों के जीवन-यापन का साधन हैं। यह बरोट खूबसूरत पहाड़ों के बीच में स्थित है यह सुंदरनगर के शानन प्रोजेक्ट की वजह से जाना जाता है सुंदरनगर में जो बिजली बनती है तो पानी की सप्लाई यहीं बरोट से की जाती है। बरोट ट्राउट फिश के लिए भी जाना जाता है ,यहां पर लोग फिशिंग करने के लिए आते हैं । लोग ट्रैकिंग के लिए भी आते हैं जिसको ट्रैकिंग करना पसंद है वह इस खूबसूरत जगह को बहुत ज्यादा पसंद करते हैं और यहां पर वॉटरफॉल है जिसका नाम लपास गाँव में पड़ने के कारण लपास है। यहां पर सनसेट भी बहुत खूबसूरत होता है,यहाँ एक स्टार्गेज़िंग पॉइंट भी है जहां अपनी दूरबीन से सितारों को निहारने काफ़ी लोग आते हैं। यहां पर आने का जो मौसम होता है वह अप्रैल और जून ज्यादा बेहतर होता है। जिसको गर्मियों से राहत पाना होता है वह गर्मियों में आना पसंद करता हैं और अगर बर्फबारी देखनी पसंद हो तो आपको ठंडी में आना होगा, जनवरी से लेकर मार्च तक मौसम बर्फबारी का होता है। इस समय पर्यटकों की वजह से बरोट गुलजार रहता हैं लेकिन यहां पर जुलाई, अगस्त, सितंबर इस ३ महीने लोग नहीं आते हैं क्योंकि बारिश की वजह से धुँध हो जाती है और रास्ते भी बंद हो जाते हैं जगह-जगह पत्थर गिरते रहते हैं, इस वजह से यहां दो-तीन महीने लोग नहीं आते हैं और पर्यटकों को मना भी कर दिया जाता हैं। यहां के लोग सीधे-साधे हैं बस! अपनी लाइफ, अपना कल्चर फॉलो करते हुए जीते हैं। बाहर की देश -दुनिया से बहुत मतलब नहीं होता है और हम अपनी संसकृति को ही मानते है, उसी को फॉलो करते है। अपनी संस्कृति से हमें ज्यादा लगाव है, इसमें हम लोग हर किसी का हस्तक्षेप पसंद नहीं करते हैं। हमें अपना गांव,अपने लोग,अपना बरोट, अपनी उहल नदी, जिसको हम लोग पूजते हैं क्योकिं उससे ही हमारी जीविका चलती हैं, सबसे ज़्यादा पसंद है । हमारा गाँव छोटा होते हुए भी अपने-आप में परिपूर्ण है, ये रहा सामने हमारा गांव और ये हैं हम लोग'। मैंने भी उनको धन्यवाद कहा।
इतने में मेरी नजर घड़ी की तरफ गई शाम के ४:०० बजने वाले थे। अपने चारों तरफ देखा तो मेरे घर वाले डैम के किनारे पर धूप सेकते नजर आए, मैं भी उनके पास गई और पूछा कि आगे का क्या प्रोग्राम है। उन्होंने बताया कि यहां से थोड़ी दूर कोई रेस्तराँ है वहां से सनसेट बहुत अच्छा दिखता है वह यहां का फेमस रेस्तराँ है। चलो! वहीं पर चलकर शाम की चाय पी जाए और सनसेट भी देखा जाए । बात करते-करते हम लोग उस रेस्तराँ के अंदर आ गए। उसके अंदर जाते ही मुख्य दरवाजे से ही सूरज नजर आ रहा था, हम लोग सीधे रेलिंग के पास आ गए। उस रेस्तराँ में हम लोगों के अलावा एक और सज्जन थे बाकी पूरा रेस्तराँ खाली था। उसी रेस्तराँ से नीचे की ओर एक खूबसूरत वैली दिख रही थी जो हरे-भरे पेड़ों और जंगली फूलों से लड़ी हुई थी। उस वैली के बीचो-बीच एक धवल दूध सी नदी बह रही थी जो वैली की खूबसूरती में चार चांद लगा रही थी। और ऊपर नीले आसमान में सूरज अपनी रोशनी को समेट हुआ घर जाने की तैयारी में था। नीले रंग का आसमान सिंदूरी रंग में रंग गया था और उस ढलते हुए सूरज से तो नजर ही नहीं हट रही थी। जो भी वहां पर मौजूद था सब की नजरे डूबते हुए सूरज पर ही थी। मन में एक सुकून, एक शांति थी और नज़रें सूरज पर । बिना कुछ कहे, बिना कुछ बोले, हम सभी सूरज को निहारने में लगे थे। ऐसा लग रहा था कि अगर पलक झपकी तो कहीं कुछ छूट जाएगा। इस तरह से सभी सनसेट का आनंद ले रहे थे। सूरज को देखते-देखते कब शाम से अंधेरा हो गया पता ही नहीं चला।
हमारी तंद्रा तब टूटी जब हमारे साथ में बैठे उस सज्जन की आवाज आई ‘ओहो! तो आप लोग भी ढलते सूरज को देखना पसंद करते हैं। ऐसी शाम की तो बात ही कुछ अलग है। मैंने बोला जी! हम तो इसको देखने के लिए ही बड़ी दूर से आए हैं ।बहुत तारीफ सुनी थी इस ढलते सूरज की और यहां से उसका दीदार करने की। लगता हैं कि आपको भी पसंद है ढलते सूरज को देखना, क्योकि जितनी तन्मयता से आप देख रहे थे उससे तो यही लगता है । उन्होंने बोला ‘हां यह मेरा पुराना शौक है मैं हमेशा ऐसी जगहों पर आया करता हूं’। इतनी देर में हमारी चाय भी आ गई। हमने उनको भी चाय के लिए इनवाइट किया। बहुत आग्रह करने के बाद उन्होंने हमें जॉइन किया। चाय पीते-पीते मैंने कहा आप अपने बारे में कुछ बताइए। उन्होँने बोलना शुरु किया `मैं एक प्रकृतिवादी हूं मुझे प्रकृति से बहुत लगाव है,ऐसे खूबसूरत नजारे मुझे बहुत पसंद है। जिसको देखने के लिए मैं कहीं पर भी आता-जाता रहता हूं ,उसको देखते-देखते उसमें रम जाने की आदत है मेरी। अब आप मेरा परिचय सुन लीजिए मैं एक यूनिवर्सिटी में में प्रोफेसर हूं, मेरा घर धर्मशाला की पहाड़ियों पर, हरे भरे जंगलों में पड़ता है। मैंने भी इस जगह के बारे में बहुत सुन रखा था तो मैं भी आ गया यहां का सनसेट देखने के लिए। मेरे दो शौक है, एक है प्रकृति का दीदार करना और दूसरा बाइक का। जब भी मार्केट में नई बुलेट आती है तो मैं सबसे पहले जाकर खरीदता हूं। नई बुलेट, नया माडल,नया जोश और नया और अजनबी रास्ता,इन सबसे मेरी जिन्दगी में उत्साह बना रहता हैं। पहाड़ी रास्तों पर बुलेट से धीरे- धीरे चलना और रास्ते का आनंद लेना मुझे बड़ा अच्छा लगता है’।
मैंने बोला प्रकृति से आपको लगाव है और हर खुबसूरत जगहों के बारे में आपको जानकारी भी है तब तो आप पक्का कुछ लिखते भी होंगे। उन्होंने कहा-हां जब भी मैं प्रकृति को इतने करीब से देखा हूं तो लिखता भी हूं पर डेली नहीं लिख पाता हूं और नेचर से तो इतना लगाव है कि पूछिए मत, जब भी कभी मौसम सुहाना होता है, तो मैं अपनी बाइक लेकर पहाड़ के सर्पीले रास्तों पर घूमता हूं और रास्ता भी वह चुनता हूं जिस पर भीड़ कम हो। सड़कें घुमावदार हो और जिस पर बुलेट चलाने में मजा आ जाए। कभी-कभी तो ऐसा होता है कि कोई रास्ता सुनसान होता है। उस रास्ते पर चाय- पानी की दिक्कत होती है। दूर-दूर तक किसी दुकान का नामो-निशान भी नहीं होता है तब अगर चाय की तलब ज्यादा होती है तो मैं किसी अनजान आदमी के घर का दरवाजा खटखटा लेता हूं। लोग पूछते हैं-क्या है,क्या हुआ, क्या चाहिए?। मैं बोलता हूं -मुझे आपके यहां एक कप चाय पीनी है। क्या आप मुझे चाय पिलायेंगे? मैं आपको नहीं जानता, आप मुझे नहीं जानते पर फिर भी, मुझे आपके यहाँ एक कप चाय पीनी है। पता नहीं उनको क्या लगता है, शायद मेरा आग्रह या मेरा हठ देखकर मुझे बड़े प्यार से चाय पिला देते हैं। फिर चाय पर चर्चा भी हो जाती है, जो कि हर बार एक नया अनुभव मुझे देती है।
अपनी बात को पूरा करते हुए वह गंभीर हो गए। इस तरह से अपनी बात को कहते-कहते वह अपनी बाइक की चाभी लेते हुए खड़े हो गए, जाने के लिए। मैंने बोला 'सर जाते-जाते अपना नाम तो बताते जाएं।
उन्होंने बोला नाम में क्या रखा है, नाम तो किसी दूसरे की दे हुई पहचान है जो अपनी-खुद की पहचान बनती वह हैं वह है अपना विचार, अपना व्यक्तित्व। इस तरह से हमारा बरोट वैली का सफर पूरा हुआ जो बहुत खूबसूरत, बेहतरीन और दिलचस्प था। सोने पर सुहागा तो प्रोफेसर साहब का मिलना हो गया ,उनकी वजह से हमारी यात्रा जीवंत हो गई। उनके ही बताई हुई दूसरी जगह जो मनाली में सोलंग गांव था, अब वहीं पर जाने की तैयारी शुरू हो चुकी थी।
अर्चना राय
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