रामलीला का वैश्विक स्वरुप
रामलीला भगवान श्री राम के जीवन पर आधारित एक पारंपरिक लोकनाट्य है, जिसका मंचन विशेष रूप से विजयदशमी के अवसर पर किया जाता है। इसकी परंपरा का श्रेय गोस्वामी तुलसीदास को दिया जाता है। यह केवल धार्मिक नाटक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों का संदेश देने वाला माध्यम है। भारत के साथ-साथ विश्व के अनेक देशों में भी रामलीला विभिन्न रूपों में प्रस्तुत की जाती है।
रामलीला संपूर्ण भारत में परंपरागत रूप से खेला जाने वाला रामचरित पर आधारित नाट्य मंचन है। जो विजयदशमी के अवसर पर किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि रामलीला की अभिनय परंपरा के प्रतिष्ठापक गोस्वामी तुलसीदास हैं। इन्होंने रामलीला परंपरा का श्री गणेश किया उनकी प्रेरणा से ही अयोध्या और काशी के तुलसी घाट पर प्रथम बार रामलीला का मंचन हुआ। कुछ मान्यताओं के अनुसार रामलीला का प्रारंभ त्रेता युग में हुआ जब अयोध्या वासी वन गमन के दौरान श्री राम की स्मृति में उनकी बाल लीलाओं का अभिनय किया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार तुलसीदास के शिष्य मेधा भगत ने १६२५ ईस्वी में रामलीला का मंचन प्रारंभ किया। मेधा भगत को स्वयं भगवान राम ने स्वप्न में दर्शन देकर रामलीला करने का आदेश दिया था।
रामलीला एक सामुदायिक गतिविधि है जिसमें समाज के सभी वर्ग के लोग भाग लेते हैं। यह बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है इसके माध्यम से धार्मिक एवं सामाजिक सीख दी जाती है। रामलीला कई दिनों तक चलती है और दशहरे के उत्सव के साथ समाप्त होती है। रंगमचीय दृष्टि से रामलीला तीन प्रकार की होती है- सचल लीला, अचल लीला तथा स्टेज लीला। गोस्वामी तुलसीदास द्वारा स्थापित रंगमंच की कई विशेषताओं में से एक यह भी है कि स्वाभाविकता प्रभाव उत्पादकता और मनोहरकता की सृष्टि के लिए अयोध्या, जनकपुर चित्रकूट, लंका आदि अलग-अलग स्थान बना दिए गए और एक स्थान पर उसी से संबंधित सभी लीलाएं दिखाई जाती है। यह ज्ञातव्य है की रंगशाला खुली होती थी और पात्रों को संवाद जोड़ने घटाने में स्वतंत्रता होती थी। रामलीला की सफलता उसका संचालन करने वाले व्यास सूत्रधार पर निर्भर करती है,क्योंकि वह संवादों की गत्यात्मकता तथा अभिनेताओं को निर्देश देता है,साथ ही रंगमंच की व्यवस्था पर भी पूरा ध्यान रखता है ।रामलीला के प्रारंभ में एक निश्चित विधि स्वीकृत है।
स्थान काल-भेद के कारण विधियों में अंतर लक्षित होता है, कहीं भगवान के मुकुट के पूजन से तो कहीं अन्य विधान से रामलीला प्रारंभ होती है। रामलीला में गीत-संगीत की प्रधानता नहीं होती क्योंकि चरित्र नायक गंभीर वीर- धीर, शालीन एवं मर्यादा प्रिय पुरुषोत्तम है। परिणामास्वरुप वातावरण में विशेष प्रकार की गंभीरता रहती है। लोकनाट्य के रूप में प्रचलित रामलीला को देश के विभिन्न प्रांतो में अलग-अलग तरीकों से मंचन किया जाता है। उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में रामलीला मुख्ययरुप से गीत नाट्य शैली में प्रस्तुत की जाती है। न केवल भारत अपितु विश्व के लगभग ६० देशों में राम कथा का अस्तित्व है। इसमें २४ देशों में रामलीला होती है। अमेरिका रुस,मलेशिया, दक्षिण कोरिया, फिजी ,सूरीनाम, ट्रिनडाड एंड टोबैगो, श्रीलंका, नेपाल मॉरीशस, चीन,जापान आदि देशों में रामलीला का मंचन किया जाता है अमेरिका के माउंट मैडम स्कूल में ४० वर्षों से रामलीला का मंचन होता आ रहा है। यहां सत्रवार २५० बच्चे ३ माह तक प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। फिजी में रामलीला का मंदिर है जहां रामलीला की एक समृद्ध परंपरा है यहां रामलीला की लगभग ५२ मंडलिया सूचीबद्ध है। जापान के लोकप्रिय कथा संग्रह होबुत्सुशू में संक्षिप्त राम कथा संकलित है, जिसके आधार पर वहां रामायण का मंचन होता है। सूरीनाम में हिंदी और डच भाषा के मिश्रण से रामलीला का मंचन किया जाता है। मॉरीशस में रामलीला झाल- ढोलक के साथ गाई जाती है। रामायण एवं रामलीला को सर्वाधिक आत्मसात दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों ने किया। जिसमें इंडोनेशिया, थाईलैंड, बर्मा, मलेशिया, लाओस, कंबोडिया आदि देश सम्मिलित है। इस क्षेत्र में प्राचीन काल से ही रामलीला का प्रचलन था। जावा के सम्राट बाली तुंग के एक शिलालेख में एक समारोह का विवरण है, जिसके अनुसार सिजालुक ने उपर्युक्त अवसर पर नृत्य एवं गीत के साथ रामायण का मनोरंजक प्रदर्शन किया था।
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इस शिलालेख की तिथि ९०७ ईस्वी है। थाई नरेश बोरमत्रयी लोकनाथ की राजभवन नियमावली में रामलीला का उल्लेख है। इसकी तिथि १४५८ ईस्वी है। वर्मा के शासक ने १७६७ ईस्वी में श्याम (थाईलैंड) पर आक्रमण किया था, युद्ध में श्याम पराजित हो गया। विजेता सम्राट अन्य बहुमूल्य सामग्रियों के साथ रामयण के कलाकारों को भी बर्मा ले गया। बर्मा के राज भवन में थाई कलाकारों द्वारा रामलीला का प्रदर्शन किया, तब से वहां रामलीला की परंपरा स्थापित हो गई। माइकल साइमंस ने बर्मा के राज भवन में राम नाटक १७९४ इस्वी में देखा था। दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में रामलीला के दो स्वरूप हैं-मुखौटा रामलीला एवं छाया रामलीला। मुखौटा रामलीला के अंतर्गत इंडोनेशिया एवं मलेशिया के लाखौन, कंबोडिया के ल्योखोन तथा वर्मा के यामप्वे का प्रमुख स्थान है। इंडोनेशिया एवं मलेशिया में लाखोन के माध्यम से रामायण के अनेक प्रसंगों को मंचन किया जाता है। इंडोनेशिया एक मुस्लिम बहुल राष्ट्र है लेकिन फिर भी यहां रामायण एवं रामलीला का व्यापक महत्व है। यहां के प्रंबनान मंदिर में रामायण वर्ष भर चलती रहती है। यहां राम कथा पर आधारित बेले डांस अर्थात नाटक है। जिसमें सीता हरण,मारीचि मरण जैसे दृश्य देखने को मिलते हैं। लाओस में बाल्मीकि रामायण का मंचन होता है। गाने बजाने के साथ डांस, पेंटिंग और थिएटर भी इसमें देखने को मिलते हैं। कंबोडिया में राम्ालीला का अभिनय लखोन खोल के माध्यम से होता है। मुखौटा नाटक के माध्यम से प्रदर्शित की जाने वाली रामलीला को थाईलैंड में खोन कहा जाता है। यह थाई रामायण (रामकिएन) पर आधारित है। इसमें संवाद के अतिरिक्त नृत्य गीत एवं हाव-भाव प्रदर्शन की प्रधानता होती है। यह नृत्य अत्यंत कठिन एवं श्रम-साध्य होता है। इसमें गीत एवं संवाद का प्रसारण पर्दे के पीछे से होता है। इसमें अधिकांस नर्तक पुरुष होते हैं। जो रामायण के विभिन्न पात्रों की भूमिका निभाते हैं। मुखौटा केवल बंदर एवं भालू की भूमिका निभाने वाले अभिनेता ही लगाते हैं। दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में छाया रामलीला (कठपुतली नृत्य)का भी ब्यापक प्रचलन है।
थाईलैंड में छाया रामलीला को नंग-थाई कहा जाता है। नंग का तात्पर्य चमड़े से होता है इस प्रकार नंग थाई का तात्पर्य चमड़े की पुतलियों से है। छाया नाटक को जावा एवं मलेशिया में वेयांग कहा जाता है। जापानी भाषा में वेयांग से तात्पर्य `छाया' होता है। इसलिए इसे छाया नाटक कहा जाता है। इसके अंतर्गत सफेद पर्दे को प्रकाशित किया जाता है और उसके सामने चमड़े की पुतलियों को इस प्रकार नचाया जाता है कि उसकी छाया पर्दे पर पड़े। छाया नाटक के माध्यम से रामलीला का प्रदर्शन तिब्बत एवं मंगोलिया में भी होता है।वेयांग प्रदर्शित करने वाले मुख्य कलाकार को दालांग कहा जाता है। यही नाटक का केन्द्र बिन्दु होता है। यह वाद्य यंत्रो की ध्वनि पर पुतलियों को नचाता है,साथ ही गीत भी गाता था। आवाज बदल-बदल कर बारी-बारी से विभिन्न संवादों को बोलता है। किन्तु जब पुतलियां बोलती हैं तो वाद्ययंत्र बंद रहतें हैं। इसी प्रकार अन्य विभिन्न देशों में भी रामलीला का मंचन किसी न किसी रूप में होता है। इससे रामलीला एवं रामायण की वैश्विकता प्रमाणित होती है ।
डाॅ. जितेन्द्र प्रताप सिंह
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