साहित्यकार-नाटककार-डॉ. रामकुमार वर्मा
डॉ. रामकुमार वर्मा हिंदी साहित्य के महान साहित्यकार, कवि, नाटककार और आलोचक थे, जिन्हें हिंदी एकांकी का ‘जनक’ एवं युग प्रवर्तक माना जाता है। उन्होंने १५० से अधिक एकांकी लिखकर हिंदी नाट्य साहित्य को समृद्ध किया। उनके साहित्य में भारतीय इतिहास, संस्कृति, राष्ट्रप्रेम, आदर्शवाद, त्याग, बलिदान और मानवीय संवेदनाओं का सुंदर समन्वय मिलता है। ‘बादल की मृत्यु’, ‘पृथ्वीराज की आँखें’, ‘रेशमी टाई’, ‘चारुमित्रा’ और ‘दीपदान’ जैसी रचनाएँ उनकी साहित्यिक प्रतिभा का प्रमाण हैं। छायावादी कवि के रूप में उनकी कविताओं में प्रकृति, प्रेम, विरह, रहस्यवाद और दार्शनिकता दिखाई देती है। साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें १९६३ में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। ५ अक्टूबर १९९० को प्रयागराज में उनका निधन हुआ। उनका जीवन हिंदी भाषा और साहित्य की निरंतर साधना का प्रेरणादायक उदाहरण है।
डॉ. रामकुमार वर्मा हिंदी साहित्य जगत के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्हें मुख्य रूप से हिंदी एकांकी का ‘जनक’ माना जाता है। उन्होंने नाटक, एकांकी, कविता, आलोचना और इतिहास लेखन जैसी विधाओं को अपनी लेखन प्रतिभा से समृद्ध किया। उन्होंने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विषयों में १५० से अधिक एकांकी लिखे हैं।
डॉ. रामकुमार वर्मा का जन्म १५ सितंबर १९०५ को मध्य प्रदेश के सागर जिले में हुआ था। उनके पिता श्री लक्ष्मी प्रसाद वर्मा सम्मानित रीवा राज्य के डिप्टी कलेक्टर थे। इसी वजह से उनके परिवार का वातावरण अत्यंत अनुशासित, सुशिक्षित और सुसंस्कृत था। उनकी माता श्रीमती राजरानी देवी एक धार्मिक और साहित्य-प्रेमी महिला थीं, जिन्होंने रामकुमार वर्मा के बालमन पर रामायण, महाभारत और पौराणिक कथाओं के संस्कार डाले। घर-परिवार में उन्हें प्यार से ‘कुमार’ कहकर पुकारा जाता था। इसी स्नेहिल और साहित्यिक माहौल ने उनके भीतर छिपी प्रतिभा को कम उम्र में ही निखार दिया था।
डॉ. रामकुमार वर्मा की प्रारंभिक शिक्षा सागर और रीवा में हुई। वह बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा प्रयाग विश्वविद्यालय (इलाहाबाद विश्वविद्यालय) से पूरी की। उन्होंने वर्ष १९२९ में प्रयाग विश्वविद्यालय से एम.ए. हिंदी की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके लिए उन्हें स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया था। इसके बाद उन्होंने इसी विश्वविद्यालय से ‘हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास’ पर पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। शिक्षा पूर्ण करने के बाद वे प्रयाग विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्राध्यापक नियुक्त हुए और बाद में विभागाध्यक्ष के पद को सुशोभित करते हुए सेवा से निवृत्त हुए।
हिंदी नाट्य साहित्य के क्षेत्र में डॉ. वर्मा का आगमन एक नए युग की शुरुआत थी। उनसे पहले हिंदी में एकांकी का कोई सुगठित रूप नहीं था। उन्होंने पाश्चात्य नाट्य तकनीक और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का अनूठा मिश्रण कर हिंदी एकांकी को एक निश्चित और वैज्ञानिक रूप प्रदान किया, इसलिए उन्हें हिंदी एकांकी का सम्राट कहा जाता है। उनके नाटकों और एकांकियों का मूल स्वर और ऐतिहासिक गौरव, देश-प्रेम और पारिवारिक आदर्श रहा है।
डॉ. रामकुमार वर्मा की साहित्यिक रुचि बाल्यकाल से ही जाग्रत हो चुकी थी। मात्र १७-१८ वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने ‘देश-सेवा’ नाम की कविता प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन (१९२१) से प्रभावित होकर उन्होंने कुछ समय के लिए अपनी पढ़ाई भी छोड़ दी थी, जिसने उनके भीतर राष्ट्र-प्रेम की अलख जगाई।
डॉ. रामकुमार वर्मा कृत ‘बादल की मृत्यु’ हिंदी का पहला एकांकी है, जिसमें कल्पना एवं काव्यात्मकता की प्रधानता है। वर्मा जी के अनेक एकांकी संग्रह इसके बाद प्रकाशित हुए, जिनमें उल्लेखनीय हैं-पृथ्वीराज की आँखें, रेशमी टाई, चारुमित्रा, विभूति, कौमुदी महोत्सव, ऋतुराज, रजतरश्मि, दीपदान, कामकंदला, बापू, इंद्रधनुष और रिमझिम, पाँचजन्य, मयूर पंख, जूही के फूल।
वर्मा जी ने ऐतिहासिक एवं समस्यामूलक एकांकियों की रचना की है। उनके एकांकियों का मूल स्वर आदर्शवादी है। उनके ऐतिहासिक एकांकियों में भारतीय आदर्श की झलक दिखाई देती है। प्रेम, सेवा, उदारता, त्याग और बलिदान की भावनाओं से ओत-प्रोत इन ऐतिहासिक एकांकियों में भारत के अतीत गौरव को प्रस्तुत करते हुए राष्ट्रीयता की भावना जगाने का प्रयास किया गया है। समस्यामूलक एकांकियों में वर्मा जी ने शिक्षित मध्यवर्गीय दम्पत्तियों की अनेक समस्याओं-प्रेम, सेक्स, संदेह, दम्भ आदि को कथानक का विषय बनाया है, किन्तु उनकी परिणति आदर्श में ही हुई है, क्योंकि उनके एकांकियों की नायिकाएँ यथा-रेशमी टाई की ललिता, १८ जुलाई की शाम की उषा और एक्ट्रैस की प्रभात कुमारी अन्ततः अपने पति के सम्मान की रक्षा करते हुए दिखाई पड़ती हैं। अतिशय आदर्शवादिता के कारण वर्मा जी के एकांकी यथार्थ से दूर हो गए जान पड़ते हैं, किन्तु एकांकी शिल्प की दृष्टि से वे हिन्दी के युग प्रवर्तक एकांकीकार जाने जा सकते हैं। वर्मा जी के एकांकी रंगमंचीयता एवं अभिनेयता के गुणों से भी सम्पन्न हैं तथा उनमें सरसता के साथ-साथ शिल्प की प्रौढ़ता भी विद्यमान है। वस्तुतः एकांकी कला को चरम यौवन पर पहुँचाने का श्रेय डॉ. रामकुमार वर्मा को ही दिया जा सकता है।
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डॉ. रामकुमार वर्मा मूलतः छायावादी युग के महत्वपूर्ण कवि माने जाते हैं। उनकी कविताओं में प्रकृति का मानवीकरण, अलौकिक प्रेम-विरह और दार्शनिकता कूट-कूट कर भरी है। उनकी रचनाओं में रहस्यवाद का सुंदर समन्वय भी देखने को मिलता है।
रामकुमार वर्मा का व्यक्तित्व बहुआयामी, प्रभावशाली और अत्यंत गरिमामय था। डॉ. वर्मा जितने बड़े रचनाकार थे, स्वभाव से उतने ही सरल, शांत और सहृदय थे। वे अपने शिष्यों और समकालीन साहित्यकारों के प्रति हमेशा स्नेहपूर्ण व्यवहार रखते थे। उनके व्यक्तित्व पर महात्मा गांधी और महर्षि अरविंद के विचारों का गहरा प्रभाव था। वे सत्य, अहिंसा, त्याग और मानवीय करुणा के प्रबल समर्थक थे, जो उनकी रचनाओं के पात्रों में भी दिखाई देते हैं। वे केवल लेखनी से ही देशभक्त नहीं थे, बल्कि देश के स्वतंत्रता संग्राम में भी उन्होंने सक्रिय वैचारिक भागीदारी निभाई। देश की ऐतिहासिक विरासत और संस्कृति के प्रति उनके मन में अगाध श्रद्धा थी। डॉ. वर्मा केवल नाटक लिखते ही नहीं थे, बल्कि उन्हें रंगमंच पर खेलने की कला में भी माहिर थे। वे स्वयं एक अच्छे अभिनेता और कुशल वक्ता थे।
साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान को रेखांकित करते हुए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष १९६३ में ‘पद्म भूषण’ की उपाधि से अलंकृत किया था। इसके अतिरिक्त उन्हें मध्य प्रदेश सरकार और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा भी अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
डॉ. रामकुमार वर्मा की लेखनी अत्यंत उर्वर थी। उन्होंने गद्य और पद्य दोनों क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में साहित्य सृजन किया। डॉ. वर्मा का जीवन एक ऋषि के समान था। उन्होंने अपने कृतित्व से हिंदी भाषा के गौरव को बढ़ाया। उन्होंने एकांकी विधा को रंगमंच और पाठकों के दिलों तक पहुँचाया। आज भी उनके नाटक और एकांकी विद्यालयों और विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में पढ़ाए और मंचित किए जाते हैं।
डॉ. रामकुमार वर्मा का संपूर्ण जीवन सरस्वती की साधना में बीता। वे जीवनपर्यंत लेखन कार्य से जुड़े रहे। इस प्रकार साहित्य सेवा करते हुए ५ अक्टूबर १९९० को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) में इस महान साहित्यकार का भौतिक शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया।
प्रो. डॉ. दिनेशकुमार
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