सादगी भरे संगीत के सुरः गजेन्द्र सिंह चैहान

यह लेख संगीत को केवल मनोरंजन या आनंद का साधन न मानकर मानव जीवन, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम मानता है। लेख में गजेन्द्र सिंह चौहान की संगीत साधना और उनके गुरु पंडित गोपाल लक्ष्मण गुणे से प्राप्त संस्कारों के संदर्भ में बताया गया है कि संगीत की वास्तविक शुद्धता कलाकार के अंतर्मन, चरित्र, विचारों और जीवन के संतुलन से उत्पन्न होती है। स्वर-साधना, ध्यान, एकाग्रता, नैतिकता, प्रेम, अनुशासन, दया और सकारात्मक विचारों को श्रेष्ठ संगीत का आधार बताया गया है। लेख यह भी स्पष्ट करता है कि संगीत मनुष्य के मानसिक तनाव को शांत करने, आत्मविश्वास और एकाग्रता बढ़ाने तथा जीवन में सरलता, सादगी और सौहार्द विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

Sep 3, 2026 - 17:44
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सादगी भरे संगीत के सुरः गजेन्द्र सिंह चैहान
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कला मानवीय जीवन का प्रमुख अंग है। जन्म से लेकर मृत्यु तक मानव जीवन का प्रत्येक पहलू संगीतमय होता है। जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में भी संगीत अपनी सहजता व प्रभावोत्पादकता के कारण मानवीय जीवन को हर्षोल्लास से परिपूर्ण कर देता है। संगीत समस्त कलाओं में अग्रणी होने के साथ-साथ आत्म-दर्शन तथा मोक्ष-प्राप्ति का भी साधन है। संगीत का प्रभाव इतना अनन्त है कि आत्म-साक्षात्कार, ईश्वरोपासना, प्राणायाम, ध्यान, योग इत्यादि विषय भी संगीत के प्रभाव से अछूते नहीं हैं।

संगीत के विविध स्वरूप हैं किन्तु समस्त स्वरूपों में संगीत का भाव-सम्प्रेषण एवं सुगमता (सादगी) इसे साकार रूप में प्रकट करती है। संगीत में भाव और सादगी इसे विशुद्ध रूप प्रदान करती है तथा परिष्कृत संगीत का ज्ञान पूर्णतः आन्तरिक शुद्धता पर निर्भर करता है। संगीत के स्वरों में सादगी का भाव व्यक्ति की आन्तरिक प्रबलता एवं महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप ही प्रकट होता है। व्यक्ति संगीत का कलाकार (प्रदर्शनकर्ता) तो सरलता से बन सकता है किन्तु एक संगीत साधक तभी बन सकता है जब उसके जीवन में स्थिरता, सन्तुलन और सकारात्मक ऊर्जा का समावेश हो। भारतीय संगीत अत्यन्त पवित्र है अतएव हमारे कण्ठ से वैसा ही संगीत प्रवाहित होगा जैसा हमारे अन्तर्मन की विचारधारा होगी। सरल और सन्तुलित संगीत का ज्ञान हमारी बुद्धि एवं आत्मा को शुद्ध तथा व्यवहार को सादगी से सराबोर करता है।

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सादगी भरे संगीत का पर्याय गजेन्द्र सिंह चौहान एक ऐसा व्यक्तित्व है, जिनका जीवन सन्तुलित व सकारात्मक विचारधारा के संगीत को समर्पित है। जिनके सुरों में शुद्धता, करुणा, नैतिकता आदि सद्गुणों की झलक प्रदर्शित होती है। इन सभी गुणों का अभ्युदय इनके सुरों में पंडित गोपाल लक्ष्मण गुणे जी के गुरुतत्वों से प्रस्फुटित हुआ है। आपके अन्तर्मन से मानवीय संस्कारों के अनुरूप ही स्वरों की अभिव्यक्ति होती है। आपके व्यक्तित्व और आपकी संगीत साधना से भारतीय संगीत जगत के जिज्ञासुओं को प्रेरणा मिलती है। संगीत में शुद्धता किस प्रकार सुनिश्चित की जाए? इसका नितांत उपाय है कि व्यक्ति को अपने चरित्र से द्वेष, लोभ, अहंकार, अनैतिकता जैसे विकारों को पृथक करना होगा। इन सभी विचारों की अशुद्धि का प्रभाव हमारे व्यक्तित्व के साथ-साथ हमारी संगीत साधना व प्रदर्शन में भी परिलक्षित होता है। जिस प्रकार जीवन में आत्म निरीक्षण आवश्यक है, उसी प्रकार संगीत साधना में भी आत्म निरीक्षण आवश्यक है। अन्तर्मन में विकसित होने वाले विचारों को परखना अति आवश्यक है। मौन और ध्यान की सतत प्रक्रिया से यह कार्य अधिक सरल हो जाता है। इस क्रिया को संगीत में प्रवाहित करने का एकमात्र साधन है स्वर-साधना। स्वर हमारा तभी शुद्ध होगा जब हमारे विचारों में सन्तुलित, सुखी एवं अर्थपूर्ण जीवन के लिए शुद्धता का क्षणिक प्रभाव न होकर वैचारिक शुद्धि का अनिवार्य व दीर्घकालिक विकास होगा।

यह सर्वमान्य है कि संगीत प्रतियोगिता या वर्चस्व स्थापित करने का विषय नहीं है। सच्चा व सरल संगीत हमारी बुद्धि, आत्मा एवं चित्त तीनों को व्यवस्थित व नियन्त्रित करता है। संगीत कला हो या व्यक्ति के विचार उनमें आन्तरिक भाव स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होते हैं। गायक अथवा वादक जो भी स्वर व राग प्रस्तुत करते हैं तो उसकी अवधारणा मन-मस्तिष्क में प्रकट होती है, शुद्ध व नैतिक विचार के मन-मस्तिष्क में स्पष्ट और स्थिर स्वर-स्वरूप प्रकट होते हैं जो राग-ध्यान के अन्तर्गत उत्कृष्ट राग की अवतारणा करते हैं। संगीत में चित्त की एकाग्रता अति आवश्यक है, गजेन्द्र सिंह जी के विचारों से संगीत में ध्यान, चित्त, चरित्र और विवेकशीलता का एक अपना स्वतन्त्र महत्व है। चूंकि संगीत में कृति पूर्व नियोजित नहीं होती है वरन् त्वरित निष्पादित होती है। रागों का स्वरूप, बन्दिश का भाव, ताल की सौंदर्यता आदि समस्त पहलुओं का प्रमुख केन्द्र बिन्दु स्वर ही होता है। संगीत में लावण्य, सादृश्यता, उत्कृष्टता, विचार, ध्यान, कल्पना, प्रकृति, आध्यात्मिकता, भक्ति-भाव, धर्म, मोक्ष, अर्थ इत्यादि तत्वों का शुद्धतम रूप में समावेश तभी सम्भव है, जब हमारा वैचारिक शुद्धिकरण उच्चतम हो।

संगीत मात्र आनन्द की वस्तु नहीं, संगीत हमारे आन्तरिक भावों का दर्पण है। संगीत के सुरों में वह सामर्थ्य है कि वह मनुष्य के मानसिक विकारों की पीड़ा व तनाव को शान्त कर आत्मा को शुद्धतम रूप प्रदान करता है। संगीत व स्वर-साधना से मानवीय जीवन में उल्लास व सरसता का संचार स्थापित होता है। संगीत द्वारा भावों की अभिव्यक्ति के माध्यम से स्वयं के साथ-साथ दूसरों को भी आनन्दित किया जा सकता है। संगीत एक ऐसी कला है जिसके माध्यम से भिन्न-भिन्न रूपों में भावों का एकीकरण किया जा सकता है। संगीत का प्रभाव हमारे जीवन में तभी दृष्टिगोचर होता है जब हम नैतिकता, प्रेम, अनुशासन, दया, सौहार्द का अनुसरण करते हैं। यूनानी दार्शनिक प्लैटो ने भी कहा है कि “संगीत से व्यक्ति में धर्म की प्रवृत्ति आ जाती है। वह व्यक्ति कभी अन्याय नहीं कर सकता जो कि संगीत की मधुर स्वर लहरियों में बंधा होता है। संगीत हमारे चरित्र को ढालता है।”

संगीत से अनुशासन, आत्मविश्वास एवं एकता की भावना जाग्रत होती है। सूक्ष्म बुद्धि का विकास, एकाग्रता, स्मरण शक्ति का विकास तथा व्यवहार में सरलता व सादगी का निर्माण जैसे गुणों का प्रस्फुटन एक संगीत साधक में अनिवार्य रूप से पाया जाता है। बशर्ते संगीत के शुद्ध व सरल रूप को अपनाया जाये, वर्तमान व आधुनिक संगीत को नहीं। सादगी भरा संगीत मानव जीवन के प्रत्येक पहलू को प्रभावित करता है। इमैनुअल काण्ट ने संगीत को स्नेह की भाषा का दर्जा दिया, जॉर्ज विल्हेम फ्रेडरिक हेगल ने भी कहा है कि “संगीत सीधे आत्मा से बात करता है।” अतः हम कह सकते हैं कि संगीत हमें एकाएक प्रेम की ओर प्रेरित करता है। संगीत के बिना मानव जीवन नीरस व बोझिल सा हो जाता है। मनुष्य जीवन में काम, मोक्ष, अर्थ, पुरुषार्थ को संगीत के माध्यम से नियन्त्रित किया जा सकता है। संगीत हमारे जीवन में महत्वपूर्ण ही नहीं वरन् आवश्यक है, फिर चाहे वह स्वर रूप में हो, ताल रूप में हो, गायन रूप में हो या वादन रूप में हो।

डॉ. हरिओम माहौर

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