राष्ट्रीय जागरण गीत वन्दे मातरम के महान अग्रदूत बाबू बंकिम चन्द्र

यह लेख बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के राष्ट्रवाद, मातृभाषा के प्रति समर्पण, बंगाल के सांस्कृतिक पुनर्जागरण और ‘वन्दे मातरम्’ की क्रांतिकारी शक्ति को दर्शाता है। इसमें बताया गया है कि कैसे अंग्रेजियत के प्रभाव से विमुख हो रहे युवाओं में उन्होंने साहित्य के माध्यम से राष्ट्र-भावना का ज्वार भर दिया और भारत के स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊर्जा प्रदान की।

Nov 15, 2025 - 13:53
Dec 29, 2025 - 17:20
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राष्ट्रीय जागरण गीत वन्दे मातरम के महान  अग्रदूत बाबू बंकिम चन्द्र
Pioneer Babu Bankim Chandra

बाबू बंकिम चन्द्र चटर्जी की आत्मा रो उठती थी, जब वे देखते थे कि बंगाली नवयुवकों में अंग्रेजियत के प्रभाव बुरी तरह से आते चले जा रहे हैं। वे युवा जिन्हें देश की आजादी का जिम्मा निभाना है वे अपनी भारतीयता, संस्कृति तथा आत्मा को जननी जन्मभूमि से जोड़े रखने वाली मातृ भाषा तक को अत्यन्त ही हीन दीन दृष्टि से देखने लगे थे। भारत की गौरव शाली भाषा हिन्दी तो दूर बंगला भाषा भूषा से इतना विमुख होते जा रहे थे कि क्रान्ति और आजादी के स्पंदन को जगाने वाली हिन्दी बंगला के साहित्य और अखबार पढ़ने में भी हिनता महसूस करने लगे थे। इधर भारत माता अंग्रेजी दासत्व की पीड़ा से आहत हो रही थी। बाबू बंकिम सोचते थे क्या भारत का सारा गौरव, सारा ओज तेज़ स्वाभिमान दासता की काली स्याह रात में अस्त हो जाएगा। यदि यही दशा रही तो फिर मां भारती की प्राचीन संस्कृति, वीरता की गौरव गाथा, वेद उपनिषदों का अमृत औषध प्रसाद,देवालय और तैंतीस करोड़ देव पुरुष तुल्य जनसंख्या वाला राष्ट्र कुल एक करोड़ गोरे अंग्रेज के चंद शासकों का भक्ष्य होकर मृतप्राय हो जाएगा। ऐसे अनेक वीभत्स दृश्य, ज्वलंत प्रश्न उनकी आत्मा को झकझोर रहे थे। वे प्रभो श्री की प्रार्थना करते कि 'हे प्रभो,हो परमपिता भगवान ऐसा हरगिज नहीं होना चाहिए। ये तो तुम्हारी लीला स्थली है, यह भगवद्भूमि है, यह पवित्र पावन मन्दिरों, नदियों सप्त पूरियों, बारह ज्योर्तिलिंगों, बावन शक्तिपीठों, घी और दूध के मधुर शीतल प्यालों से अतिथि स्वागत की अनुपमा भूमि है इसकी रक्षा गरिमा सुरक्षा, अक्षुण्णता तो हर हाल में जीवित रहनी ही चाहिए।

उन दिनों एक तरफ अंग्रेजी साम्राज्य पूरी ताकत से आज़ादी के दीवानों को त्रासदी पूर्ण कष्ट देकर भय और गुलामी का परिदृश्य बनाने में, भारत भूमि को सदा सर्वदा के लिए पराधीनता की बेड़ियों में झगड़ने के अनेक अनेक प्रयत्नों में लोभ लालच, भय,अनेक मत मतांतरणों, धर्म जाति के भेदभाव आदि सभी कमजोरियों का इस्तेमाल करता चला जा रहा था। बंगाल की चेतना, जागृति ज्ञान परम्परा, विज्ञान गणित की दक्षता और आजाद जीवन कौशल की पारंगतता अंग्रेजों से छुपी हुई नहीं थी, वे जानते थे कि यदि बंगाल को हर तरह से अपना पराभूत कर लें तो अनायास ही भारत को दासत्व की बेड़ियों में झकडे रखना सरल हो जाएगा। बंगाली नवयुवकों की प्रखर प्रतिभा को अंग्रेज अच्छी तरह से समझते थे इसलिए उन्होंने यहां के युवाओं को अपनी गिरफ्त में लेने के लिए अनेक चक्र कुचक्र चलाए रखे थे बाबू बंकिम चन्द्र चटर्जी देख ही रहे थे कि उसके प्रभाव से युवाओं में अपनी आजादी, स्वाभिमान भाषा भूषा भोजन अपनी संस्कृति के प्रति विमुख होने के विष फल फूलने प्रारम्भ हो गए थे। बाबू ने इस घातक प्रवृति की भयंकरता का अनुभव कर लिया था उनकी आत्मा रो ही नहीं उठी, राष्ट्रीय सम्मान गौरव की पीड़ा से आत्मा तड़फ उठी थी। उन्होंने ठान लिया,' नहीं बाबू नहीं मुझे इस निराशा से खुद बचते हुए बंगाल के युवाओं के माध्यम से पूरे देश को ही जगाना ही होगा। यह तो आत्म ग्लानि, निराशा आत्म हत्या होगी यह घोर पाप होगा।'ऐसे अनेक क्रांतिकारी विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने क्रांतिकारी साहित्य का सृजन ऐसी रचनाएं करने का प्रारम्भ कर दिया कि आलस्य प्रमाद और अंग्रेजियत के मोह माया में विवेक शून्य अन्धकारमय बंगाल के जागरण का नवयुग प्रारम्भ हो गया। उनकी सरकारी नौकरी, अंग्रेजों का सम्मान किन्तु देश की दशा और दिशा मुख्यतया बंगाल और आस पास के राज्यों की दीनता हीनता दयनीयता देखकर वे यह भी नहीं सोच सके कि उनकी यह क्रान्ति उनकी सरकारी नौकरी की शान्ति को भंग कर देगी। उनकी रग रग मातृ भूमि के प्रेम भाव का उफान ले रही थी, राष्ट्र की मिट्टी की मोहक महक और नदियों का शीतल जल उनकी आत्मा को ऊष्मा से भरती चली जा रही थी बस केवल और केवल एक ही धुन 'भारत माता की जय'। अब बाबू की अन्तर आत्मा कहती थी कि मनुष्य और पशु पक्षी में अन्तर ही क्या बचेगा अगर दाना पानी ओर पद लिप्सा में वो भी दासत्व स्वीकार कर ले।

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फिर पशु पक्षी भी तो आजाद जीवन जीने के लिए पंख फड़फड़ा मृत्यु पर्यन्त प्रयास रहते ही हैं... बस कलम ने आत्मा की स्याही से बंगाल को उफान देने वाले क्रांतिकारी साहित्य को रंगना प्रारम्भ कर दिया। बाबू बंकिम चन्द्र चटर्जी राष्ट्रीय जागरण के अग्रदूत बनकर हाथ में कलम लेकर जन सेवा के आवेग में बह चले, फिर उन्हें कहां पीछे मुड़कर देखने की फुरसत ही थी। 'मातृ भूमि की आजादी का हथियार बनी मातृ भाषा ।'सच्ची भावना ओर लगन की ताकत का अहसास केवल एक ओज तेज़ और राष्ट्रीयता से परिपूर्ण गीत ने बंगाल ही नहीं सारे देश में ज्वलंत चेतना का ज्वार भर दिया। कल तक सोई हुई युवा पीढ़ी ही क्या वृद्ध बाल आबाल, मातृ शक्ति सभी टोलियो की टोलियां स्वाधीनता के लिए जान की बाजी लगाने क्रान्ति की जादुई शक्ति से ओत प्रोत होकर बाबू की अंतरात्मा की गहराई से निकली मातृ भूमि के पूजा मंत्रोपम गीत,`वन्दे मातरम' के उदघोष से गूंज उठे। अंग्रेजी सत्ता कम्पायमान हो उठी, समझ शक्ति मृत प्राय हो गई। जहां अंग्रेज निकले, वन्दे मातरम और भारत माता की जय जयकार से उनका स्वागत होने लगा। पूरा देश व्ान्दे मातरम की ध्वनियों से शक्तिमान होकर अमोघ शक्ति का केन्द्र बन गया। बंकिम बाबू का आनन्द मठ और वन्दे मातरम गीत भारत की सोई खोई आत्मा के जागरण की प्राण वायु बनकर आजादी के आंदोलन सारथी बनकर धर्म कर्म की विजय का अमृत औषध प्रसाद बनकर सतत साधना उपासना का मंत्र बन तब से आज तक और पीढ़ी दर पीढ़ी आजाद अखण्ड भारत का अटल सत्य बनकर जागरण का संचार कर रहा है। भारतीयों के दिलों दिमाग में ज्वलंत राष्ट्रीय भावनाओं को भर कर त्याग बलिदान और स्वाधीनता के कला पूर्ण साहित्य अक्षय वट वृक्ष को उगाने वाले बाबू बंकिम धन्य धन्य। बाबू बंकिम चन्द्र चटर्जी आप धन्य हों कि राष्ट्रीय जागरण के सेतु बन आजाद अखण्ड भारत के महान स्रष्टा दृष्टा बने। उन्होंने मातृ भाषा को अपनी धारदार लेखनी का आधार बनाया वे जानते थे कि जन साधारण के दिल ओर हृदय को आंदोलित करने, वैचारिक क्रान्ति को जगाने की सर्वोतम अभिव्यक्ति कौशल मातृ भाषा में ही निहित है। फिर तो दुर्गेश नंदिनी, ऐतिहासिक उपन्यास ने भारत की मूर्छित वीरता, त्याग और बलिदान, के साथ प्राचीन गौरवशाली वैभव को जीवित करने में सोने में सुहागा का काम कर दिखाया। कपाल कुंडला, विष वृक्ष, वसीयतनामा, चंद्रशेखर आदि उपन्यासों के ओज पूर्ण कथानकों ने नारी शक्ति के जागरण और रूढ़ि जनित बंधनों को काट फेकने में अहम भूमिका निभाई। जय हो जय हो भारत माता की जय हो। वन्दे मातरम गीत की क्रान्ति की ध्वनियों से हर युग में आजादी और राष्ट्र भक्ति की अलख जगाने वाले बाबू बंकिम चन्द्र चटर्जी की जय हो , इस वर्ष वन्दे मातरम गीत की रचना के एक सौ पचास वर्ष पूरे हो गए। गीत तो आज भी उतना ही नया, पालने में झूलता हुआ बालक भी वन्दे मातरम का नारा सुनते हुए पलक झपकते बड़ा होता है। 

डॉ. प्रकाश शर्मा गुन्जन 
डूंगरपुर       

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