बॉलीवुड की ट्रेजडी क्वीन मीना कुमारी

Meena Kumari, the immortal actress of Indian cinema known as the “Tragedy Queen,” lived a life filled with both brilliance and sorrow. Born on August 1, 1933, she began acting as a child and rose to fame with timeless classics like Baiju Bawra, Sahib Bibi Aur Ghulam, and Pakeezah. Despite personal struggles and heartbreak, her legacy continues to define the golden era of Bollywood. मीना कुमारी, भारतीय सिनेमा की अमर अभिनेत्री, जिन्हें “ट्रेजेडी क्वीन” कहा गया, का जीवन उतना ही दर्दभरा रहा जितना उनके किरदार। १ अगस्त १९३३ को जन्मी मीना कुमारी ने बचपन से ही अभिनय शुरू किया और ‘बैजू बावरा’, ‘साहिब बीवी और गुलाम’ व ‘पाकीज़ा’ जैसी फिल्मों से अमर छाप छोड़ी। निजी जीवन में संघर्ष, प्रेम और दर्द के बावजूद उन्होंने भारतीय सिनेमा को अमर बनाया।

Nov 3, 2025 - 15:20
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बॉलीवुड की ट्रेजडी क्वीन मीना कुमारी
Meena Kumari

मीना कुमारी के अभिनय के कायल असंख्य लोग हैं। ऐसा जीवंत अभिनय कि हर किरदार में जान फूंक दे। इस अभिनय के मुरीद केवल दर्शक ही नहीं फिल्म जगत के उनके साथी भी थे। अगस्त माह में मीना कुमारी जी का जन्म हुआ तो उनको श्रधांजलि के रूप में उन्हें याद किया जाना जरुरी है। मुंबई में ०१ अगस्त १९३३ को मीना कुमारी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम अली बख्श मुस्लिम और मां बंगाली क्रिश्चिन थीं। मीना कुमारी का मूल नाम महजबीन था। दरअसल, मीना कुमारी के जन्म के समय उनके पिता बेटे की चाहत रखते थे, ऐसे में बेटी के जन्म से वह दुखी हुए और उनके पास डॉक्टर को देने के लिए पैसे नहीं थे। जिसके चलते वह मीना कुमारी को पैदा होते ही अनाथलय की सीढ़ियों पर छोड़ आए थे। लेकिन पिता का मन नहीं माना तो वह बच्ची को अनाथालय से वापस ले आए। 

मीना के पिता एक पारसी थिएटर में काम किया करते थे और माता एक नर्तकी थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति ख़राब रहने के कारण मीना कुमारी को बचपन में ही स्कूल छोड़ देना पड़ा। घर की आर्थिक स्थितियां ठीक न होने के कारण मीना कुमारी ने महज सात साल की उम्र से अभिनय करना शुरू कर दिया। अभिनेत्री को पहली फिल्म 'फरजाद-ए हिंद' थी। कहते हैं कि बक्स परिवार एक बेटा चाहता था, और तीन बेटियों में से दूसरी महजबीन, खुद को पूरी तरह से अवांछित पाती थी - जब तक कि स्टूडियो के कई चक्कर लगाने और संपर्क सूत्रों से काफी मिन्नतें करने के बाद, जब छोटी महजबीन एक बाल कलाकार बन गई, तो उसके परिवार की किस्मत बदल गई और अचानक वह सोने के अंडे देने वाली मुर्गी बन गई। जिसके बाद उन्होंने सनम, अन्नपूर्णा, तमाशा और लाल हवेली में काम किया। लेकिन मीना कुमारी को असली शोहरत फिल्म 'बैजू बावरा' से मिली। यह फिल्म साल १९५२ में रिलीज हुई थी। इस फिल्म के बाद एक्ट्रेस सफलता की सीढ़ियां चढ़ती चली गईं।

कमाल से शादी के बाद जब पिता ने घर से निकाल दिया तो मीना पति के पास पहुंचीं तो पति ने भी साथ रखने के लिए कई शर्तें रख दीं, जिनमें दूसरे डायरेक्टर के साथ फिल्म साइन ना करना, रिवीलिंग कपड़े नहीं पहनना, शाम ६ बजे से पहले घर पहुंच जाना और मेकअप रूम में किसी मर्द के ना आने जैसी शर्तें मीना कुमारी ने हंसते-हंसते मान ली। लेकिन, एक हीरोइन होने के नाते वह ऐसा कैसे कर पाएंगी यह उन्हें भी नहीं पता था। जिस दिन मीना कुमारी ने कमाल अमरोही की शर्तों पर दस्तख़त किए, उसी दिन से उन्होंने उन्हें तोड़ना शुरू कर दिया। सबसे पहली घटना तब हुई, जब `शारदा' की शूटिंग के दौरान राज कपूर ने मीना कुमारी को एक पार्टी में आमंत्रित किया। एक रूसी फ़िल्म प्रतिनिधिमंडल बंबई आया हुआ था। राज कपूर उनके सम्मान में एक स्वागत समारोह कर रहे थे। मीना कुमारी ने उनका निमंत्रण स्वीकार कर लिया और अपने पति को फ़ोन कर कहा कि वह देर से घर लौटेंगी। उन्होंने इसका कारण राज कपूर की पार्टी नहीं बताया, बल्कि ये कहा कि उनकी शूटिंग देर तक चलेगी। अगले ही दिन इत्तेफ़ाक से कमाल अमरोही की मुलाकात उन मेहमानों से हो गई जो राज कपूर की पार्टी में मौजूद थे। उनसे उन्हें पता चला कि उनकी बीबी शूटिंग में व्यस्त न होकर पार्टी में थीं। जब वह घर लौटीं तो उन्होंने इस बारे में कमाल को कुछ नहीं बताया। बाद में जब कमाल ने उनसे इस हानि रहित धोखे का ज़िक्र किया तो मीना कुमारी ने कहा कि वह उन्हें परेशान नहीं करना चाहती थीं।

इस बीच कुछ ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने कमाल अमरोही और मीना कुमारी के बीच की दूरी को पाटने के बजाए और बढ़ा दिया। सोहराब मोदी ने मीना कुमारी और कमाल अमरोही दोनों को `इरोज़' सिनेमा में एक फ़िल्म प्रीमियर पर आमंत्रित किया। सोहराब ने महाराष्ट्र के राज्यपाल से मीना कुमारी का परिचय कराते हुए कहा- `ये मशहूर अभिनेत्री मीना कुमारी हैं और ये इनके पति कमाल अमरोही हैं।' इससे पहले कि दोनों एक-दूसरे को नमस्ते कहते, अमरोही ने कहा- `नहीं, मैं कमाल अमरोही हूँ और ये मेरी पत्नी हैं। मशहूर फ़िल्म अदाकारा मीना कुमारी।' इतना कह कर वह सिनेमा हॉल से बाहर चले गए और मीना कुमारी को अकेले बैठकर वह फ़िल्म देखनी पड़ी।

मीना ने शादी के बाद कई मुश्किलों का सामना किया। यहां तक की वह कभी मां भी नहीं बन पाईं। जब वह पहली बार प्रेग्नेंट हुईं तो उनका मिसकैरिज हो गया लेकिन इसके बाद भी वह दो बार प्रेग्नेंट हुईं, लेकिन उन्होंने अबॉर्शन करा लिया, वो भी पति को बिना बताए। कमाल को जब ये पता चली तो उन्होंने मीना को जोरदार थप्पड़ जड़ दिया। पति की मारपीट से सहमी मीना कुमारी एक बार जब `साहिब, बीवी और गुलाम' के सेट पर लेट हुईं तो वह डर के मारे सेट पर ही रोने लगीं। शूटिंग तब भी हुई, लेकिन वह लगातार रोती ही रहीं। पति के जुल्म से परेशान मीना कुमारी १९७२ में पति कमाल अमरोही से अलग हो गईं। लेकिन, इससे वह इतनी परेशान रहने लगीं कि वह डिप्रेशन में चली गईं और बीमार रहने लगीं। अपनी बीमारी के बाद भी उन्होंने पाकीजा की शूटिंग पूरी की। इसी दौरान उनकी तबीयत इतनी बिगड़ गई कि उन्हें सेट से अस्पताल ले जाना पड़ा। कमाल जान्ाते थे कि शराब के चलते मीना की तबीयत बिगड़ी है। कमाल जब एक दिन घर पहुंचे तो बाथरूम में देखा कि डिटॉल की बोतल में शराब भरी हुई है। २८ मार्च को मीना को अस्पताल में भर्ती कराया गया और ३१ मार्च १९७२ को गुड प्रâाइडे के दिन लीवर सिरोसिस से उनकी मौत हो गई। उनके जीवन में, व्यक्तिगत और पेशेवर, दोनों ही रूपों में, महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लोगों की उपस्थिति में, उनकी बहनें खुर्शीद और मधु; उनके अलग हुए पति कमाल अमरोही; और फिल्म जगत की कई हस्तियाँ, जिनमें बेगम पारा और कम्मो भी शामिल थीं, जिनके घर से आब-ए-ज़मज़म (मक्का से पवित्र जल) मँगवाया गया था और मीना कुमारी के अंतिम संस्कार के समय चम्मच से उनके मुँह में डाला गया था।

अभिनेत्री के निधन के बाद उनकी फिल्म पाकीजा रिलीज हुई, जो ब्लॉकबस्टर साबित हुई। अगले कुछ दिनों, ह़फ्तों और महीनों में मीना कुमारी का नाम हिंदी फ़िल्मों की खबरों में छाया रहा। उनकी महान कृति, पाकीज़ा, १५ साल की मेहनत के बाद हाल ही में रिलीज़ हुई थी; मीना कुमारी की मृत्यु ने इस फ़िल्म को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई: हज़ारों लोग इस बेहद लोकप्रिय अभिनेत्री को श्रद्धांजलि देने के लिए पाकीज़ा देखने गए 
मीना कुमारी की पूरी ज़िंदगी सिनेमा के पर्दे पर भारतीय औरत की `ट्रैजेडी' को उतारते हुए गुज़री। यहाँ तक कि उन्हें अपनी ख़ुद की निजी ट्रैजेडी के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं मिला। लेकिन ये कहना कि मीना कुमारी के अभिनय में `ट्रैजेडी' के अलावा और कोई `शेड' नहीं था, उनके साथ बेइंसाफ़ी होगी। फ़िल्म 'परिणिता' की शांत बंगाली अल्हड़ नवयौवना को लें, या `बैजू बावरा' की चंचल हसीन प्रेमिका को लें या फिर `साहब बीबी और गुलाम' की सामंती अत्याचार झेलने वाली बहू हो या `पाकीज़ा' की साहबजान, सभी ने भारतीय जनमानस के दिल पर अमिट छाप छोड़ी है। मीना कुमारी एक अभिनेत्री के रूप में ३२ सालों तक भारतीय सिने जगत पर छाई रहीं। बेहद भावुक और सदा दूसरों की मदद करने को तत्पर मीना कुमारी की ज़िंदगी दूसरों को सुख बांटते और दूसरे के दु:ख बटोरते हुए बीती थी। कमाल अमरोही के बेटे ताजदार अमरोही के अनुसार- `मीना कुमारी को कभी ख़ूबसूरत चेहरे के तौर पर लोगों ने नहीं एडरेस किया, जैसा कि मधुबाला को कहा गया- `वीनस ऑफ़ द इंडियन स्क्रीन', नरगिस के लिए भी लोगों ने कहा- `फ़र्स्ट लेडी ऑफ़ इंडियन स्क्रीन'। मीना को ख़िताब मिला `ट्रेजेडी क्वीन' का और उन्होंने `ट्रेजेडी' को अपना ओढ़ना, बिछौना बना लिया। लोगों ने समझा कि वह जैसे किरदार फ़िल्मों में कर रही हैं, असल ज़िंदगी में भी वह वही भूमिका निभा रही हैं। दिलचस्प बात ये थी कि लोगों के साथ-साथ ख़ुद उन्होंने भी ऐसा समझना शुरू कर दिया था।

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फिल्मों के साथ-साथ असल जिंदगी में भी उनके साथ कई दु:खद हादसे हुए। जाने-माने उर्दू शायर फ़िराक़ गोरखपुरी ने एक बार मुशायरा छोड़ दिया था, क्योंकि उन्होंने देखा कि उसमें अभिनेत्री मीना कुमारी शामिल हो रही हैं। उनका कहना था कि मुशायरे सिर्फ शायरों की जगह हैं। यह वाकया १९५९-१९६० का है, जब फ़िराक़ गोरखपुरी को एक मुशायरे में आमंत्रित किया गया था। फ़िराक़ गोरखपुरी का असली नाम रघुपति सहाय था। ‘फिराक गोरखपुरी - द पोयट ऑफ पेन एंड एक्सटैसी’ नामक पुस्तक में इस वाकये का जिक्र किया गया है। फ़िराक़ की इस जीवनी के लेखक उनके रिश्तेदार अजय मानसिंह थे। इसके एक दिन बार फ़िराक़ गोरखपुरी ने कहा, `मैं मीना कुमारी की वजह से वहां से नहीं हटा था। आयोजकों और दर्शकों के व्यवहार के कारण वहां से हटा, जिन्होंने हमारी बेइज्जती की थी।' उनकी दलील थी कि `मुशायरा शायरी का मंच है। यहां के कलाकार सिर्फ शायर होते हैं और यहां की व्यवस्था में एक पदानुक्रम होता है जिसका पालन किया जाना चाहिए।'

मीना कुमारी से जुदा एक और मजेदार किस्सा है, फ़िल्म `पाकीज़ा' की शूटिंग के दौरान कमाल अमरोही और मीना कुमारी के साथ एक दिलचस्प घटना घटी। मशहूर पत्रिका `आउटलुक' के संपादक रहे विनोद मेहता ने मीना कुमारी की जीवनी `मीनाकुमारी - ए क्लासिक बायोग्राफ़ी' नाम से लिखी है, उनके अनुसार- `आउटडोर शूटिंग पर कमाल अमरोही अक्सर दो कारों पर जाया करते थे। एक बार दिल्ली जाते हुए मध्य प्रदेश में शिवपुरी में उनकी कार में पैट्रोल ख़त्म हो गया। कमाल अमरोही ने कहा कि `हम रात कार में सड़क पर ही बिताएंगे।'

उनको पता नहीं था कि ये डाकुओं का इलाका है। आधी रात के बाद करीब एक दर्जन डाकुओं ने उनकी कारों को घेर लिया। उन्होंने कारों में बैठे हुए लोगों से कहा कि वह नीचे उतरें। कमाल अमरोही ने कार से उतरने से इंकार कर दिया और कहा कि `जो भी मुझसे मिलना चाहता है, मेरी कार के पास आए।' थोड़ी देर बाद एक सिल्क का पायजामा और कमीज़ पहने हुए एक शख््स उनके पास आया। उसने पूछा- `आप कौन हैं?' अमरोही ने जवाब दिया- `मैं कमाल हूँ और इस इलाके में शूटिंग कर रहा हूँ। हमारी कार का पैट्रोल ख़त्म हो गया है।' डाकू को लगा कि वह रायफ़ल शूटिंग की बात कर रहे हैं। लेकिन जब उसे बताया गया कि ये फ़िल्म शूटिंग है और दूसरी कार में मीना कुमारी भी बैठी हैं, तब उसके हावभाव बदल गए। उसने तुरंत संगीत, नाच और खाने का इंतज़ाम कराया। उन्हें सोने की जगह दी और सुबह उनकी कार के लिए पेट्रोल भी मंगवा दिया। चलते-चलते उसने मीना कुमारी से कहा कि वह नुकीले चाकू से उसके हाथ पर अपना ऑटोग्राफ़ दे दें। जैसे-तैसे मीना कुमारी ने ऑटोग्राफ़ दिए। अगले शहर में जाकर उन्हें पता चला कि उन्होंने मध्य प्रदेश के उस समय के नामी डाकू अमृत लाल के साथ रात बिताई थी।
मीना कुमारी को मिले सम्मानों की चर्चा की जाए तो उन्हें अपने अभिनय के लिए चार बार `फ़िल्मफेयर' पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मीना कुमारी को सबसे पहले वर्ष १९५३ में प्रदर्शित फ़िल्म `परिणीता' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का `फ़िल्मफेयर' पुरस्कार दिया गया। इसके बाद वर्ष १९५४ में भी फ़िल्म `बैजू बावरा' के लिए उन्हें `फ़िल्मफेयर' के सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके बाद मीना कुमारी को `फ़िल्मफेयर' पुरस्कार के लिए लगभग ८ वर्षों तक इंतज़ार करना पड़ा और वर्ष १९६३ में प्रदर्शित फ़िल्म `साहिब बीबी और ग़ुलाम' के लिए उन्हें `फ़िल्मफेयर' मिला। इसके बाद वर्ष १९६६ में फ़िल्म `काजल' के लिए भी मीना कुमारी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के `फ़िल्मफेयर' पुरस्कार से सम्मानित की गईं।
सौजन्य: `मीनाकुमारी-ए क्लासिक बायोग्राफ़ी’ लेखक विनोद मेहता, ‘फिराक गोरखपुरी- द पोयट ऑफ पेन एंड एक्सटैसी’ लेखक अजय मानसिंह और अन्य पत्र पत्रिकाएं। 

रचना दीक्षित 
ग्रेटर नोएडा 

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