प्रो. डॉ. दिनेशकुमार | कांदिवली, मुंबई
हिंदी साहित्य के विलक्षण प्रयोगधर्मी,आधुनिक गद्य के प्रभावशाली स्तंभ तथा कालजयी कथाकार,उपन्यासकार,नाटककार,अनुवादक और साहित्यकार कृष्ण बलदेव वैद का नाम हिंदी साहित्य जगत में अत्यंत सम्मान और आदर के साथ लिया जाता है। हिंदी गद्य साहित्य के इतिहास में कृष्ण बलदेव वैद ऐसे विरले और तेजस्वी रचनाकार हैं, जिन्होंने परंपरागत कथा-शिल्प को पूरी तरह बदलते हुए उसे एक नई, आधुनिक तथा वैश्विक पहचान प्रदान की। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब एक ओर हिंदी साहित्य में `नई कहानी' आंदोलन सामाजिक यथार्थ और मध्यवर्गीय चेतना को केंद्र में रखकर विकसित हो रहा था, उसी समय वैद जी ने मानव मन की गहरी परतों,अकेलेपन,अस्तित्वगत संकट,ऊब और मानसिक द्वंद्वों को अपनी रचनाओं का प्रमुख विषय बनाया। अंग्रेजी साहित्य के गहन विद्वान होने के बावजूद उन्होंने सृजन के लिए अपनी मातृभाषा और हिंदी का ही चयन किया। वे आजीवन साहित्यिक गुटबाज़ी,मठाधीशों तथा सरकारी पुरस्कारों की प्रतिस्पर्धा से दूर रहे, जिसके कारण उन्हें हिंदी साहित्य का `हठपूर्वक प्रयोगधर्मी' और `सन्यासी लेखक' भी कहा गया।
कृष्ण बलदेव वैद का जन्म २७ जुलाई,१९२७ को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत (वर्तमान पाकिस्तान) के डिंगा नामक कस्बे में हुआ था। उनका प्रारंभिक जीवन एक पारंपरिक मध्यवर्गीय परिवार में व्यतीत हुआ। उनके पारिवारिक वातावरण पर आर्य समाज का गहरा प्रभाव विद्यमान था। उनके बचपन का भाषाई परिवेश पंजाबी और उर्दू से परिपूर्ण था, जिसने आगे चलकर उनके भाषिक संस्कार और साहित्यिक दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया। सन् १९४७ का भारत-विभाजन वैद जी के जीवन की सबसे बड़ी और अत्यंत पीड़ादायक घटना सिद्ध हुआ। लगभग बीस वर्ष की संवेदनशील आयु में उन्होंने अपनी जन्मभूमि से विस्थापित होने, सांप्रदायिक हिंसा को निकट से देखने और सब कुछ खोकर शरणार्थी बनने की त्रासदी का सामना किया। सीमा पार कर वे भारत (पंजाब और दिल्ली) तो आ गए, किंतु इस अनचाहे विस्थापन का गहरा घाव उनके मानस पर आजीवन अंकित रहा, जिसकी स्पष्ट झलक उनके प्रसिद्ध उपन्यासों और कहानियों में दिखाई देती है। उनके व्यक्तित्व और लेखन में उपस्थित अकेलापन, अजनबीपन तथा अतीत की धुँधली स्मृतियाँ इसी विस्थापन की देन थीं। वैद जी असाधारण प्रतिभा और तीक्ष्ण बुद्धि के स्वामी थे। देश के विभाजन के बाद भी उन्होंने अपनी शिक्षा को किसी प्रकार प्रभावित नहीं होने दिया। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की उपाधि सर्वोच्च अंकों के साथ अर्जित की। इसके बाद उनकी मेधा उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर तक ले गई। वे संयुक्त राज्य अमेरिका गए और विश्वविख्यात हार्वर्ड विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। उनके शोध का विषय पाश्चात्य कथा-शिल्प से संबंधित था, जिसने उनकी आलोचनात्मक दृष्टि को व्यापक वैश्विक परिप्रेक्ष्य प्रदान किया। डॉ. वैद ने लंबे समय तक भारत और अमेरिका के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी साहित्य का अध्यापन किया। वर्ष १९५० से १९६६ तक उन्होंने दिल्ली के हंसराज कॉलेज तथा पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। इसके उपरांत वे अमेरिका चले गए, जहाँ उन्होंने न्यूयॉर्क स्टेट यूनिवर्सिटी और ब्रेंडाइस यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी एवं अमेरिकी साहित्य के प्रोफेसर के रूप में अध्यापन किया।
इसके बाद वे पुनः भारत लौटे और वर्ष १९८५ से १९८८ तक भोपाल स्थित प्रतिष्ठित कला एवं संस्कृति केंद्र `भारत भवन' में निराला सृजनपीठ के अध्यक्ष नियुक्त किए गए। इस पद पर रहते हुए उन्होंने भारतीय साहित्यिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को नई दृष्टि और रचनात्मक ऊर्जा प्रदान की।
यद्यपि कृष्ण बलदेव वैद के साहित्य को किसी एक विधा अथवा आंदोलन की सीमाओं में बाँधकर नहीं देखा जा सकता। वे आधुनिकतावाद (श्द्ीहग्ेस्) के सच्चे प्रतिनिधि और समर्थ संवाहक थे। उनके लेखन पर यूरोपीय अस्तित्ववादी चिंतकों, विशेषकर ज्यां-पॉल सार्त्र और अल्बर्ट कामू, के विचारों का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। साथ ही चेतना-प्रवाह शैली के प्रसिद्ध लेखकों, जैसे जेम्स जॉयस और वर्जीनिया वुल्फ, की रचनात्मक पद्धति से भी वे गहराई से प्रभावित थे। उन्होंने मानव जीवन की विसंगतियों और अंतर्विरोधों को बिना किसी आडंबर या लाग-लपेट के प्रस्तुत किया। उनकी कृतियों में मनुष्य के सुख-दुःख, बुढ़ापे की विचित्र मानसिकता, इच्छाएँ, वासनाएँ, आशंकाएँ तथा मृत्यु के भय का अत्यंत सूक्ष्म और संवेदनशील चित्रण मिलता है। वे जीवन को किसी आदर्शवादी दृष्टिकोण से नहीं देखते थे,बल्कि जैसा उन्होंने उसे अनुभव किया-उलझा हुआ,ऊब से भरा,अनिश्चित और निरर्थक-वैसा ही अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त किया।
वैद जी की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में उनकी भाषा-शैली प्रमुख थी। वे हिंदी के उन दुर्लभ साहित्यकारों में थे जिनकी भाषा में उर्दू की परिष्कृत अभिव्यक्ति, पंजाबी की सहजता,अंग्रेजी का अनुशासन तथा संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का संतुलित समन्वय एक साथ दिखाई देता है। उनकी भाषा सीधी और रैखिक न होकर तरंगों की भाँति बहती है, जो पाठक को निरंतर सोचने और आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है। वैद जी ने उपन्यास,कहानी,नाटक,डायरी तथा अनुवाद जैसी अनेक साहित्यिक विधाओं में विपुल और कालजयी रचनाओं का सृजन किया। उनके उपन्यासों ने हिंदी उपन्यास परंपरा के पारंपरिक ढाँचे को बदलते हुए उसे चरित्र-केंद्रित और मनोवैज्ञानिक चेतना से समृद्ध बनाया। वर्ष १९५७ में प्रकाशित `उसका बचपन' उनका प्रथम तथा अत्यंत महत्वपूर्ण उपन्यास है। इसमें `बिमल' नामक बालक की दृष्टि से पारिवारिक कलह, घुटन तथा वयस्क संसार की कठोर वास्तविकताओं का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण किया गया है। इसी प्रकार वर्ष १९७४ में प्रकाशित 'बिमल उर्फ जाएँ तो जाएँ कहाँ' वस्तुतः `उसका बचपन' का वैचारिक विस्तार है,जिसमें आधुनिक मनुष्य की मानसिक भटकन, महानगरीय जीवन की ऊब तथा अस्तित्वगत संकट का अत्यंत प्रयोगधर्मी ढंग से चित्रण किया गया है। वर्ष १९८१ में प्रकाशित `गुज़रा हुआ ज़माना' भारत-विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखा गया हिंदी साहित्य का एक उत्कृष्ट उपन्यास है, जो दंगों के राजनीतिक पक्ष की अपेक्षा मानवीय संवेदनाओं, टूटन और विस्थापन की पीड़ा को अधिक गहराई से व्यक्त करता है। उनके अन्य प्रमुख उपन्यासों में `नसरीन','काला कोलाज',`नर नारी',`माया लोक' तथा `एक नौकरानी की डायरी' उल्लेखनीय हैं, जिनमें महानगरीय अभिजात वर्ग की खोखली जीवन-शैली और एक घरेलू सहायिका की मानसिक उथल-पुथल को डायरी शैली के माध्यम से प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया गया है।
वैद जी ने सैकड़ों कहानियों की रचना की,जिनमें मानव स्वभाव के उजले और अँधेरे दोनों पक्षों का अत्यंत सजीव चित्रण मिलता है। उनकी प्रमुख कहानी-कृतियों में 'बीच का दरवाज़ा' (१९६३), 'मेरा दुश्मन' (१९६६),`दूसरे किनारे से',`लापता',`वह और मैं' `बदचलन बीवियों का द्वीप', `बोधिसत्त्व की बीवी', `पवन कुमारी का पहला साँप' तथा `रात की सैर' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
वैद जी ने अपनी विशिष्ट आधुनिक दृष्टि से हिंदी रंगमंच को भी समृद्ध किया। `भूख आग है' उनका सर्वाधिक चर्चित नाटक है, जिसमें व्यवस्था और मानवीय क्षुधा अर्थात भूख के परस्पर संबंधों पर तीखा और विचारोत्तेजक प्रहार किया गया है।वैद जी का मानना था कि डायरी लेखन किसी भी लेखक के आत्म का सबसे नग्न, निष्कपट और ईमानदार रूप होता है। उनकी प्रकाशित डायरियाँ, जैसे `डायरी : पहला हिस्सा' तथा `मुकम्मल खुद', हिंदी साहित्य में आत्म-अन्वेषण और आत्म-साक्षात्कार के अनुपम दस्तावेज़ मानी जाती हैं। अंग्रेजी और पाश्चात्य साहित्य पर उनकी असाधारण पकड़ के कारण उन्होंने अनुवाद के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय उपलब्धियाँ अर्जित कीं। उन्होंने विश्वविख्यात प्रâांसीसी-आयरिश नाटककार सैमुअल बेकेट के एब्सर्ड (विसंगतिवादी) नाटकों का अत्यंत प्रभावशाली हिंदी अनुवाद किया, जिनमें `वेटिंग फॉर गोडोट' (गोडो के इंतज़ार में) तथा `एंडगेम' (आखिरी खेल) प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने लुईस कैरोल की कालजयी कृति `एलिस इन वंडरलैंड' का हिंदी रूपांतरण `एलिस अजूबों की दुनिया में' शीर्षक से किया। उन्होंने अपनी अनेक हिंदी रचनाओं का अंग्रेजी में भी स्वयं अनुवाद किया, जिनमें `उसका बचपन' का अंग्रेजी रूप `एूाज्े ग्ह Darव्हो' विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इससे हिंदी साहित्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहचान मिली।
कृष्ण बलदेव वैद केवल भारत तक सीमित लेखक नहीं थे, बल्कि उनकी रचनाओं का अनुवाद अंग्रेजी,प्रâेंच,जर्मन,इतालवी, पोलिश,जापानी,रूसी तथा लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में किया गया। उनके समकालीन प्रतिष्ठित आलोचक और साहित्यकार, जैसे अशोक वाजपेयी तथा निर्मल वर्मा, उन्हें हिंदी गद्य का `शिल्प-गुरु' मानते थे। वैद जी का स्पष्ट विश्वास था कि साहित्य का उद्देश्य समाज को उपदेश देना अथवा उसका सुधार करना नहीं है, बल्कि जीवन के नग्न यथार्थ, उसकी जटिलताओं और निरर्थकताओं को पूरी ईमानदारी के साथ शब्दों में अभिव्यक्त करना है। उनकी रचनाओं में अध्यात्म का एक ऐसा विशिष्ट स्वरूप दिखाई देता है, जो संन्यास या वैराग्य से नहीं, बल्कि सांसारिक जीवन की ऊब, भटकन और अस्तित्वगत संकट की चरम अनुभूति से जन्म लेता है। संक्षेप में कहा जाए तो कृष्ण बलदेव वैद आधुनिक हिंदी गद्य के उन विशिष्ट शिखर पुरुषों में हैं, जिन्होंने भाषा को नवीन लचीलापन, शिल्प को मौलिक प्रयोगधर्मिता तथा विचारों को वैश्विक आधुनिकता प्रदान की। डिंगा (वर्तमान पाकिस्तान) से आरंभ होकर हार्वर्ड और न्यूयॉर्क तक फैली उनकी जीवन-यात्रा इस तथ्य की सशक्त पुष्टि करती है कि एक सच्चा रचनाकार कभी भी भौगोलिक सीमाओं में बंधकर नहीं रह सकता। उन्होंने हिंदी कहानी और उपन्यास को परंपरागत सामाजिक यथार्थवाद की सीमाओं से मुक्त कर मनोवैज्ञानिक तथा अस्तित्ववादी यथार्थ की सुदृढ़ भूमि पर स्थापित किया। उनका संपूर्ण जीवन, रचनात्मक व्यक्तित्व और अप्रतिम साहित्यिक अवदान आने वाली अनेक पीढ़ियों के लेखकों, आलोचकों और शोधकर्ताओं के लिए सदैव प्रेरणास्रोत एवं मार्गदर्शक बना रहेगा। जीवन का एक बड़ा हिस्सा अध्यापन और लेखन में बिताने के बाद, वे अंतिम वर्षों में पुनः अमेरिका चले गए। ६ फरवरी, २०२० को ९२ वर्ष की दीर्घायु में न्यूयॉर्क में इस महान साहित्यकार का निधन हो गया। उनके अवसान से हिंदी गद्य ने अपना सबसे आधुनिक और बेबाक हस्ताक्षर खो दिया।